Chapter 4 of 13 10 min read
सुनने वाले
चिंटू गुड़िया का असली नाम ढूँढ निकालता है, मेहक तोमर, और एक चौंकाने वाली बात, वो मरने से कुछ महीने पहले रेडियो सेहर में intern रह चुकी थी। उस रात सितारा अपने शो को एक छुपी हुई जाँच बना देती है, और कोचिंग के डरे हुए बच्चे अपने डर उँडेल देते हैं। कबीर भड़क उठता है, पर मेहक का नाम सुनते ही उसका रंग उड़ जाता है। तूफ़ान में फँसे दोनों के बीच एक चार्ज्ड पल आता है, और अंत में सितारा को मेहक की intern फ़ाइल में emergency contact मिलता है, के. मेहरा।
गाड़ी पंद्रह मिनट बाद गई।
सितारा खिड़की पर खड़ी रही, बिना हिले, बिना बत्ती जलाए, और देखती रही। एक पल के लिए, जाने से ठीक पहले, गाड़ी के अँधेरे शीशे के पीछे एक मोबाइल की नीली रोशनी जली, जैसे किसी ने कोई तस्वीर खींची हो, या किसी को कोई ख़बर भेजी हो। फिर वो बुझ गई, और गाड़ी ने आख़िरकार अपनी हेडलाइट जलाई, धीरे से गेट से निकली, और पुराने शहर की किसी गली में घुलकर ग़ायब हो गई। उसने नंबर देखने की कोशिश की। बहुत दूर था। बहुत अँधेरा।
पर एक बात साफ़ थी। दो बजे का वो आदमी सही था।
अब वो अकेली नहीं सुन रही थी।
उसने चिंटू को कुछ नहीं बताया। ये उसने तय कर लिया था, उसी रात, खिड़की पर खड़े खड़े। चिंटू बाईस का था, उसके पास एक माँ थी जो उसे रोज़ टिफ़िन देती थी, और एक पूरी ज़िंदगी थी जो अभी शुरू भी नहीं हुई थी। अगर इस कहानी में कोई गाड़ी अँधेरे में इंतज़ार करने वाली थी, तो वो सितारा की खिड़की के नीचे रुके, चिंटू के घर के नीचे नहीं।
पर चिंटू को रोकना, सितारा को जल्द पता चला, उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल था जितना उसने सोचा था।
अगली शाम वो स्टेशन पहुँची तो चिंटू पहले से वहाँ था, और उसके सामने मेज़ पर काग़ज़ बिखरे थे, और उसकी आँखों में वही ख़तरनाक चीज़ थी जो पहली रात थी। पर अब उसमें डर ज़्यादा था, उत्साह कम।
"दीदी," उसने कहा, बिना नमस्ते के। "बैठ जाओ।"
"चिंटू, मैंने कहा था ना कि..."
"मेहक तोमर।"
सितारा रुक गई।
"यही नाम था उसका।" चिंटू ने एक काग़ज़ आगे बढ़ाया, एक प्रिंटआउट, एक धुँधली सी अख़बार की कतरन। "गुड़िया। उसका असली नाम मेहक तोमर था। उन्नीस साल की। शहर के सबसे बड़े कोचिंग में पढ़ती थी। और..." वो रुका, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "सात महीने पहले, अपने हॉस्टल की छत से। पुलिस ने ख़ुदकुशी लिखा। केस बंद। दो लाइन की ख़बर, पाँचवें पन्ने पर, किसी कोने में।"
सितारा ने वो कतरन उठाई। इतनी छोटी ख़बर। एक पूरी ज़िंदगी, दो लाइन में निपटा दी गई।
"पर ये सबसे अजीब बात नहीं है, दीदी।" चिंटू ने थूक निगला। "मैं उसका नाम इसलिए ढूँढ पाया, क्योंकि वो हमारे अपने सिस्टम में था।"
"मतलब?"
"मेहक तोमर ने... मरने से कुछ महीने पहले... यहीं intern किया था। रेडियो सेहर में। तीन हफ़्ते। बोर्ड चलाना सीखने आई थी, बच्ची कॉलेज की।" चिंटू ने सितारा की तरफ़ देखा, और उसका चेहरा सफ़ेद था। "वो इसी कुर्सी पर बैठी थी, दीदी। मेरी कुर्सी पर। उसने आपका शो अंदर से देखा था। इसीलिए... इसीलिए उस रात उसने आपको फ़ोन किया। पूरे शहर में, उसने आपको चुना, क्योंकि वो आपको जानती थी। उसने यहाँ बैठकर आपको लोगों को बचाते देखा था।"
और सितारा को लगा जैसे किसी ने कमरे की सारी हवा खींच ली हो।
वो लड़की कोई अजनबी नहीं थी। वो यहाँ रही थी, इन्हीं दीवारों के बीच, इसी अँधेरे में जो हर रात गर्म और सुरक्षित लगता था। उसने सितारा को एक मसीहा समझा था। और फिर, अपनी सबसे बुरी रात में, उसने उस मसीहा को फ़ोन किया था। और मसीहा ने उसे hold पर डाल दिया था।
"ठीक है," सितारा ने कहा, बहुत धीरे, और उसकी आवाज़ में अब कुछ बदल गया था। नरमी नहीं। कुछ सख़्त। "तो अब हम वो करेंगे जो मेहक चाहती थी। हम पूछेंगे।"
"कैसे? पुलिस तो..."
"पुलिस नहीं।" सितारा ने हेडफ़ोन उठाया। "शहर।"
उस रात का सेहर तक शहर ने पहले कभी नहीं सुना था।
सितारा ने कोई नाम नहीं लिया। कोई institute नहीं, कोई मेहक नहीं, कोई आरोप नहीं। वो बहुत होशियार थी। उसने सिर्फ़ कहानियाँ सुनाईं। उसने एक लड़की की बात की, बिना नाम के, जो डरी हुई थी, जिसने कुछ देखा था, जिस पर किसी ने यक़ीन नहीं किया। और फिर उसने वो किया जो वो हर रात करती थी। उसने पूछा।
"तो आज रात, मैं सिर्फ़ ये जानना चाहती हूँ," उसने माइक में कहा। "उन सबसे जो इस वक़्त किसी हॉस्टल में, किसी PG में, किसी कोचिंग के कमरे में जाग रहे हैं, अपनी किताबों के बीच, अपने डर के बीच। क्या आप सुरक्षित हैं? कोई आपको सुन रहा है? आज की रात, ये लाइन आपकी है।"
और लाइनें भर गईं।
पहले एक लड़का, जिसकी आवाज़ काँप रही थी, जिसने कहा कि उसे रोज़ लगता है कि वो पहाड़ के नीचे दबा है, और कोई नहीं समझता। फिर एक लड़की जो सिर्फ़ रोई, बिना कुछ कहे, दो मिनट, और फिर बोली "थैंक यू" और रख दिया। फिर एक माँ, जो किसी दूसरे शहर से सुन रही थी, जिसकी बेटी कोटा में थी, जिसने कहा कि वो हर रात डरती है कि कहीं फ़ोन न आ जाए।
ये उसका शहर था। और अब सितारा देख रही थी कि ये कितना डरा हुआ था।
और फिर एक लाइन जली, और एक लड़की की आवाज़ आई, जो दूसरों से अलग थी, क्योंकि उसमें रोना नहीं था। उसमें ग़ुस्सा था।
"दीदी, आप जिस institute की बात नहीं कर रहीं ना," उसने कहा, "मुझे पता है आप किसकी बात कर रही हैं।"
स्टूडियो में चिंटू सीधा हो गया।
"वहाँ एक लड़की थी पिछले साल। सब जानते हैं। पर कोई बोलता नहीं। क्योंकि वहाँ result आता है, और result के सामने एक लड़की की क्या कीमत है? वो कहते हैं उसने ख़ुदकुशी की। पर मेरी रूममेट उसे जानती थी। और वो कहती है कि मेहक डरी हुई थी, हाँ, पर वो हारी हुई नहीं थी। वो लड़ रही थी किसी चीज़ से। उसने कुछ ढूँढ लिया था। कुछ ऐसा जो..."
लाइन में अचानक खड़खड़ाहट हुई।
"हैलो?" सितारा ने कहा। "आप वहाँ हैं?"
लाइन कट गई।
सितारा बोर्ड को देखती रही। चिंटू ने काँच के पार उसकी तरफ़ देखा। दोनों जानते थे कि वो कॉल अपने आप नहीं कटी थी।
और तभी, स्टूडियो का दरवाज़ा खुला।
कबीर मेहरा गीला था। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी, भोपाल की वो पहली तूफ़ानी बारिश जो बिना चेतावनी के आती है, और उसकी क़ीमती जैकेट कंधों पर भीगी हुई थी, और उसके चेहरे पर वो ठंडक नहीं थी। उसकी जगह कुछ और था। ग़ुस्सा।
"बाहर निकलो," उसने चिंटू से कहा, बहुत शांति से, जो उसके ग़ुस्से से ज़्यादा डरावनी थी।
चिंटू ने सितारा की तरफ़ देखा। सितारा ने सिर हिलाया। चिंटू चला गया, दरवाज़ा बंद करते हुए।
"आप जानती हैं मैं पिछले बीस मिनट से ये सुन रहा हूँ?" कबीर ने कहा। "अपनी गाड़ी में, बारिश में फँसा हुआ?"
"और TRP कैसा है?" सितारा ने कहा।
"ये मज़ाक नहीं है।" कबीर की आवाज़ चढ़ी, पहली बार। "आपको पता है आप क्या कर रही हैं? आप एक बंद पुलिस केस को on air खोल रही हैं। आप एक ऐसे institute की तरफ़ इशारा कर रही हैं, जिसका मालिक इस शहर के हर बड़े आदमी के साथ डिनर करता है। आप समझती हैं कि अगर वो लोग चाहें, तो वो इस station को कल सुबह तक बंद करवा सकते हैं? आपकी नौकरी, मेरी नौकरी, चिंटू की नौकरी? और ये तो सबसे अच्छा होने वाला है जो हो सकता है।"
"तो आपको station की चिंता है। समझ गई।"
"मुझे आपकी चिंता है!" वो शब्द कबीर के मुँह से ऐसे निकले जैसे उसका इरादा नहीं था, और एक पल के लिए दोनों चुप हो गए, और सिर्फ़ बाहर बारिश की आवाज़ रही।
वो बीस मिनट अपनी गाड़ी में बैठा, बारिश में फँसा, उसे सुनता रहा था। उसने सुना था कि कैसे उसने पूरे डरे हुए शहर का हाथ थामा था, एक एक करके, बिना किसी को गिरने दिए। शायद यही वजह थी कि वो शब्द निकल गए, जो उसने शायद कभी किसी से नहीं कहे थे।
कबीर ने ख़ुद को सँभाला। "आप किसी मरी हुई लड़की के लिए अपनी ज़िंदगी जोखिम में डाल रही हैं। एक ऐसी लड़की जिसे आप जानती तक नहीं थीं।"
और सितारा थक गई थी, और डरी हुई थी, और उसके अंदर कुछ टूट गया।
"उसका नाम मेहक था," उसने कहा।
और कुछ हुआ।
कबीर मेहरा की पूरी देह जम गई। उसके चेहरे से वो ग़ुस्सा, वो corporate ठंडक, सब एक झटके में बह गया, और उसकी जगह कुछ आया जो सितारा ने उस आदमी में कभी नहीं देखा था। डर। और उससे भी गहरा कुछ, कुछ जो डर से भी पुराना था।
"क्या नाम कहा आपने?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ अचानक बहुत धीमी थी।
"मेहक," सितारा ने दोहराया, उसे ध्यान से देखते हुए। "मेहक तोमर। क्यों? आप उसे जानते हैं?"
और एक लंबे पल के लिए, कबीर मेहरा ने कुछ नहीं कहा। बाहर बिजली कड़की, और स्टूडियो की बत्तियाँ एक बार झपकीं, और बुझ गईं।
पूरा स्टेशन अँधेरे में डूब गया।
सिर्फ़ बोर्ड की आपातकालीन लाल बत्ती बची, और उसकी मद्धम रोशनी में, दो लोग एक छोटे से कमरे में खड़े थे, और बाहर तूफ़ान था, और किसी ने कई पलों तक कुछ नहीं कहा।
"Generator दो मिनट लेगा," सितारा ने आख़िरकार कहा, सिर्फ़ चुप्पी तोड़ने के लिए।
"मुझे अँधेरा ठीक लगता है," कबीर ने कहा।
"पहली बार आपकी कोई बात मुझे अच्छी लगी।"
और कबीर हँसा।
ये एक छोटी सी आवाज़ थी, हैरान सी, जैसे उसे ख़ुद यक़ीन न हो कि वो आवाज़ उसी की थी। और सितारा ने सोचा कि शायद इस आदमी को हँसते हुए बहुत वक़्त हो गया था। अँधेरे में, उस लाल रोशनी में, बिना उस जैकेट के, बिना उस laptop के, वो अचानक पैंतीस साल का एक थका हुआ इंसान लग रहा था।
वो एक दूसरे के बहुत क़रीब खड़े थे। सितारा को पता नहीं चला कब। बारिश छत पर बरस रही थी, और कमरा छोटा था, और कुछ था, उस गर्म लाल अँधेरे में, कुछ जो खींच रहा था।
"सितारा," कबीर ने कहा, और पहली बार उसने उसका असली नाम लिया, सितारा नहीं, नैना नहीं, बस एक नाम जो उसने ख़ुद चुना था, "कुछ है जो मुझे आपको बताना..."
बत्तियाँ वापस आ गईं।
स्टूडियो अचानक रोशनी से भर गया, सफ़ेद, तेज़, बेरहम, और वो पल, जो भी था, टूट गया। कबीर एक क़दम पीछे हटा। उसके चेहरे पर वो ठंडक वापस आ गई, दीवार की तरह।
"मुझे जाना चाहिए," उसने कहा।
और वो चला गया, अपनी भीगी जैकेट के साथ, बिना वो बात पूरी किए जो वो कहने वाला था।
सितारा बहुत देर तक वहीं खड़ी रही।
फिर वो बोर्ड के सामने बैठी, और स्टेशन के पुराने रिकॉर्ड खोले, वो फ़ाइलें जहाँ हर intern, हर कर्मचारी का ब्यौरा रहता था। उसने टाइप किया। मेहक तोमर।
फ़ाइल खुली। एक छोटी सी तस्वीर, एक मुस्कुराती हुई लड़की, उन्नीस साल की, जिसे ये नहीं पता था कि उसके पास कितना कम वक़्त बचा है। नाम, पता, कॉलेज। और सबसे नीचे, एक लाइन।
Emergency Contact।
सितारा की आँखें उस लाइन पर रुकीं, और रुकी रहीं, और कमरा उसके चारों ओर बहुत दूर चला गया।
Emergency Contact: के. मेहरा।
मेहरा।
जो आदमी अभी अभी इस कमरे से गया था। जो आदमी उसका शो बंद करने आया था। जिसके इतने क़रीब वो अभी अभी खड़ी थी, उस लाल अँधेरे में, कि वो उसकी साँस सुन सकती थी।
के. मेहरा।
कबीर मेहरा।
Comments
No comments yet. Be the first to share your thoughts.