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Chapter 3 of 4

आख़िरी कॉल

सो मत जाना by Aarohi Malhotra

स्क्रीन पर वो तारीख़ जल रही थी, और सितारा उसे बंद नहीं कर पा रही थी।

रात के दो बजकर सत्रह मिनट। सात महीने पहले। चिंटू कब का जा चुका था, उसे ज़बरदस्ती भेज दिया था उसने। स्टेशन ख़ाली था, बस मशीनों की हल्की गुनगुनाहट, और बोर्ड की वो छोटी छोटी रोशनियाँ, जो रात भर बिना सोए जागती रहती हैं, उसकी तरह।

वो उस फ़ाइल पर कर्सर ले जाती, और हटा लेती। फिर ले जाती। फिर हटा लेती।

क्योंकि उसे ये तारीख़ याद थी।

ये वो रात थी जब उसके फ़ोन में, हर गाने के बीच, अस्पताल से कॉल आ रहे थे। ये वो रात थी जब उसकी माँ शहर के दूसरे कोने में एक सफ़ेद कमरे में लेटी थी, और मशीनें उनके लिए साँसें गिन रही थीं। और सितारा, उनकी इकलौती बेटी, अस्पताल में नहीं थी। वो यहाँ थी, इस कुर्सी पर, माइक के सामने, क्योंकि वो बैठकर इंतज़ार नहीं कर सकती थी। क्योंकि अगर वो रुकती, तो टूट जाती।

वक़्त नहीं रुका। माँ भी नहीं रुकीं। सुबह चार बजे, जब शो ख़त्म हुआ, और वो भागते हुए अस्पताल पहुँची, तब तक देर हो चुकी थी।

और उस पूरी रात, उस सबसे बुरी रात में, उसके शो पर एक लड़की ने फ़ोन किया था।

सितारा ने आँखें बंद कीं, और कर्सर दबा दिया।

रिकॉर्डिंग चली।

पहले उसकी अपनी आवाज़ आई, और उसे पहचानना मुश्किल था, क्योंकि उस रात उसकी आवाज़ में वो गर्मी नहीं थी जो हमेशा होती है। वो थकी हुई थी, दूर थी, जैसे किसी और कमरे से बोल रही हो।

"हाँ, अगली लाइन। हैलो, सेहर तक।"

और फिर वो आवाज़ आई।

एक लड़की। बहुत छोटी, बहुत डरी हुई। उन्नीस, बीस साल से ज़्यादा की नहीं।

"दीदी... मेरा नाम मत पूछिएगा। प्लीज़।"

"कोई बात नहीं," रिकॉर्डिंग में सितारा ने कहा। "नाम ज़रूरी नहीं। मैं तुम्हें क्या कहकर बुलाऊँ?"

लाइन पर एक पल की चुप्पी, और फिर, इतनी धीमी कि सितारा को आज, सात महीने बाद, अपने कान बोर्ड के और क़रीब करने पड़े।

"गुड़िया बुला लो। घर में... घर में मुझे गुड़िया बुलाते थे।"

सितारा का दिल किसी ने मुट्ठी में पकड़ लिया। बुलाते थे। भूतकाल। जैसे वो घर अब उसका नहीं रहा था। जैसे वो ख़ुद अब वो लड़की नहीं रही थी।

"ठीक है, गुड़िया," रिकॉर्डिंग वाली सितारा ने कहा, और उस आवाज़ में थोड़ी जल्दी थी, थोड़ी दूरी, और आज की सितारा को वो सुनकर अपने आप से नफ़रत हुई। "बता, क्या हुआ?"

"दीदी, मैंने... मैंने कुछ देख लिया है। अपने institute में। कुछ ऐसा जो मुझे नहीं देखना चाहिए था।" लड़की की साँस तेज़ थी, टूटी हुई। "और अब मुझे डर लग रहा है। बहुत डर। मैंने एक टीचर को बताने की कोशिश की, तो उन्होंने कहा कि मैं पागल हूँ, कि मैं झूठ बोल रही हूँ, कि अगर मैंने किसी और से कहा तो... मेरा career ख़त्म, मेरा admission ख़त्म, सब ख़त्म।"

"कौन से institute की बात कर रही हो, बेटा?"

"मैं नाम नहीं ले सकती। आप समझ नहीं रहीं। ये बहुत बड़े लोग हैं। पूरा शहर इन्हें भगवान मानता है। सर को... सर को सब जानते हैं। अगर मैंने मुँह खोला, तो वो मुझे..." उसकी आवाज़ काँपी। "दीदी, मुझे बस किसी से बात करनी थी। किसी एक इंसान से जो मुझे पागल न समझे। मैं तीन रात से सोई नहीं हूँ। मुझे लगता है कोई मेरा पीछा कर रहा है। मुझे..."

और तभी, रिकॉर्डिंग में, सितारा के फ़ोन की एक धीमी सी घंटी सुनाई दी। अस्पताल की घंटी। और रिकॉर्डिंग वाली सितारा की आवाज़ अचानक और दूर हो गई, और कहीं और चली गई।

"गुड़िया, सुन... तू बहुत बहादुर है, ये जो तूने बताया। एक मिनट रुक मेरे साथ, हम बस एक छोटा सा break लेते हैं, और मैं वापस आती हूँ, ठीक है? तू लाइन पर रहना। मैं अभी आई।"

और फिर music चढ़ा।

और सितारा, आज, सात महीने बाद, उस ख़ाली स्टूडियो में, जानती थी कि आगे क्या होने वाला है। उसे पता था, क्योंकि वो उस रात वहाँ थी। उसने वो break लिया था। और उस break में अस्पताल से वो आख़िरी कॉल आई थी, वो कॉल जिसके बाद कुछ भी मायने नहीं रखा था। और वो उठकर भाग गई थी। और वो कभी वापस लाइन पर नहीं आई।

रिकॉर्डिंग चलती रही। music के पीछे, किसी ने call hold पर छोड़ दी थी। और गुड़िया वहाँ थी, लाइन पर, इंतज़ार करती हुई। एक मिनट। दो मिनट। पाँच।

कोई वापस नहीं आया।

और फिर, होल्ड music के बीच, बहुत धीमे, इतना धीमे कि शायद उस रात के board operator ने भी न सुना हो, गुड़िया की आवाज़ एक आख़िरी बार आई, ख़ुद से, या शायद उस ख़ाली लाइन से जो अब किसी की नहीं थी।

"...आप भी नहीं आईं।"

और लाइन कट गई। रिकॉर्डिंग ख़त्म हो गई, और स्टूडियो की चुप्पी लौट आई।

सितारा बहुत देर तक उस अँधेरे स्टूडियो में बैठी रही, बिना हिले।

बाहर शहर सो रहा था, वही शहर जिसके लिए वो हर रात जागती थी, जिसके अकेले दिलों को वो हर रात पकड़ती थी, ताकि कोई अँधेरे में अकेला न गिरे। और इस सबके बीच, एक रात, एक लड़की ने उसका हाथ पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया था। शहर की हज़ार आवाज़ों में से, उसने ये एक आवाज़ चुनी थी। उसने सोचा था कि सेहर तक वाली सितारा उसे नहीं गिरने देगी।

और सितारा ने उसका हाथ छोड़ दिया था।

उसे पता था कि उसकी अपनी माँ उस रात जा रही थीं। उसे पता था कि वो ख़ुद टूट रही थी। और एक हिस्से ने, एक थका हुआ, इंसानी हिस्से ने कहा, तू क्या करती? तू अपनी माँ के पास जाना चाहती थी। तेरा दिल टूट रहा था।

पर एक दूसरे, ज़्यादा सच्चे हिस्से ने जवाब दिया, तूने उससे कहा था, मैं अभी आई। तूने वादा किया था। और वो लड़की उस वादे पर रुकी रही। पाँच मिनट। पूरी ज़िंदगी।

सुबह कब हुई, सितारा को पता नहीं चला।

जब चिंटू आया, साढ़े ग्यारह बजे, अपने बैग में दो समोसे और एक मनगढ़ंत बहाना लिए कि वो जल्दी क्यों आ गया, तो उसने सितारा को वहीं बैठा पाया, उसी कुर्सी पर, कल रात वाले कपड़ों में।

"दीदी।" वो रुक गया। समोसे वाला हाथ नीचे आ गया। "आप घर गई ही नहीं?"

"चिंटू," सितारा ने कहा, और उसकी आवाज़ भर्राई हुई थी, पर शांत। "मुझे उसका नाम चाहिए।"

"किसका?"

"गुड़िया का।" उसने स्क्रीन की तरफ़ इशारा किया। "उसका असली नाम। वो किस कॉलेज में थी, किस coaching में थी, उसका घर कहाँ था। मुझे सब चाहिए।" उसने चिंटू की तरफ़ देखा, और चिंटू ने उन आँखों में कुछ ऐसा देखा जो उसने पहले कभी नहीं देखा था। "वो सात महीने पहले मरी, चिंटू। और इस पूरे शहर में, उसकी आख़िरी कॉल मेरे पास थी। मेरे पास। और मैंने उसे सुना तक नहीं।"

चिंटू ने बहुत धीरे से समोसे मेज़ पर रखे। वो बाईस साल का था, और उसे नहीं पता था कि इस तरह की चीज़ में क्या कहते हैं। तो उसने वही कहा जो सच था।

"ये आपकी ग़लती नहीं थी, दीदी।"

"पता है।" सितारा उठ खड़ी हुई। "पर ये मेरी ज़िम्मेदारी है। फ़र्क़ होता है दोनों में।"

उस रात, सेहर तक एक अलग शो था।

कोई नहीं बता सकता था, सुनने वालों में से कोई नहीं, कि कुछ बदल गया है। सितारा वैसी ही थी, गर्म, मज़ाकिया, अपनी। उसने फ़ोन लिए, गाने बजाए, एक लड़के को उसकी पहली नौकरी की मुबारकबाद दी, एक बुज़ुर्ग को उनकी दवाई याद दिलाई।

पर शो के आख़िर में, ठीक तीन बजने से पहले, उसने एक काम किया जो उसने पहले कभी नहीं किया था।

"जाने से पहले," उसने माइक के क़रीब होकर कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई, सिर्फ़ उस एक इंसान के लिए जिसके लिए ये था, "आज एक छोटी सी बात। किसी ख़ास के लिए। कुछ रातें पहले, इसी शो पर, एक... मेहमान आए थे। उन्होंने मुझसे एक सवाल पूछा था। एक लड़की के बारे में। और मैंने तब उन्हें टाल दिया था। मैंने वो सवाल सुना नहीं था, सच में सुना नहीं था।"

स्टूडियो में सिर्फ़ उसकी आवाज़ थी, और शहर की चुप्पी।

"तो अगर वो मेहमान आज रात सुन रहे हैं, तो मैं बस इतना कहना चाहती हूँ। मैंने उसे ढूँढ लिया है। उस आख़िरी कॉल को। मैंने उसकी आवाज़ सुन ली है।" उसने एक साँस ली। "गुड़िया। मैंने उसे सुन लिया है। और मैं उसे यूँ ही जाने नहीं दूँगी। अगर आप मुझसे बात करना चाहते हैं, तो आप जानते हैं मैं कहाँ हूँ। मैं हर रात यहीं हूँ। दो बजे।"

उसने गाना चढ़ाया, आख़िरी गाना, और अपनी कुर्सी पर पीछे टिक गई, और इंतज़ार करने लगी, ये जानते हुए भी कि शायद कुछ न हो। शायद वो आदमी डर के कहीं ग़ायब हो गया हो। शायद उसने जो कहा वो हवा में खो जाए।

ठीक दो बजे, एक लाइन जली।

सितारा ने काँच के पार चिंटू को देखा। चिंटू ने सिर हिलाया, धीरे से। उसने बटन दबाया।

"हैलो," उसने कहा।

पहले वही चुप्पी। वही साँस। और फिर वो आवाज़, भारी, नीची, पर आज उसमें कुछ और था। कुछ जो पहली रात नहीं था। राहत। और उसके नीचे, डर।

"अच्छा हुआ," उसने कहा, बहुत धीरे। "अच्छा हुआ आपने आख़िरकार सुन लिया, सितारा।"

"मैंने सुन लिया," सितारा ने कहा। "अब आप मुझे सब बताइए। वो कौन थी। उसने क्या देखा। और वो 'सर' कौन है।"

"रुकिए।" आदमी की आवाज़ अचानक बदल गई, धीमी से और धीमी, सतर्क। "इतनी जल्दी नहीं। आपको लगता है ये इतना आसान है? आपको लगता है हम बस फ़ोन पर सब कह देंगे?"

"तो फिर कैसे?"

लाइन पर एक लंबी चुप्पी। और जब वो आवाज़ वापस आई, तो उसमें वो राहत ख़त्म हो चुकी थी। सिर्फ़ डर बचा था, ठंडा और सीधा।

"आपने आज जो on air कहा," उसने कहा। "गुड़िया वाली बात। पूरे शहर के सामने।"

"हाँ।"

"तो आपने एक काम कर दिया, सितारा।" वो रुका। "आपने उन्हें बता दिया कि आप जानती हैं।"

सितारा के पेट में कुछ गिरा। "मतलब?"

"मतलब अब आप अकेली नहीं सुन रहीं।" आदमी की आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई। "जब आपने आज वो नाम लिया ना, गुड़िया... मैं अकेला नहीं था जो चौंका। मैं अकेला नहीं था जिसने वो शो सुना।" एक साँस। "अब वो भी सुन रहे हैं।"

और लाइन कट गई।

सितारा कुछ देर बैठी रही, रिसीवर अब भी कान पर, डायल टोन की सपाट आवाज़ सुनती हुई।

फिर, धीरे से, वो उठी और स्टूडियो की खिड़की के पास गई, उस खिड़की के जिससे नीचे स्टेशन का गेट दिखता था, और सड़क का वो टुकड़ा जो रात में पीली रोशनी में नहाया रहता था।

गेट के ठीक बाहर, एक गाड़ी खड़ी थी।

उसकी बत्तियाँ बुझी थीं। पर सितारा ने ध्यान से देखा, और बहुत हल्का, exhaust pipe से धुएँ की एक पतली लकीर उठ रही थी, ठंडी रात की हवा में घुलती हुई।

इंजन चालू था।

कोई बैठा था, अँधेरे में, इंतज़ार करता हुआ।

और इस बार, सितारा ने उसे देख लिया।

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