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Chapter 11 of 13

सबसे गहरा अंधेरा

सो मत जाना by Aarohi Malhotra

"मैंने वो फ़ाइल कभी नहीं खोली।"

कबीर की आवाज़ में कुछ ऐसा था जो सितारा ने पहले कभी नहीं सुना था। हड़बड़ाहट। बेबसी। पर सितारा अपनी ही चीख़ के पीछे, अपने ही टूटने के पीछे, उसे सुन नहीं पा रही थी।

"आपका keycard, कबीर।" उसने स्क्रीन की तरफ़ इशारा किया, उसका हाथ काँपते हुए। "आपका नाम। उसी रात, उन्हीं घंटों में। ये सिस्टम झूठ नहीं बोलता।"

"पर मैं आपके साथ था!" कबीर उसके पास आया, और सितारा एक क़दम पीछे हट गई, और वो एक क़दम सितारा को रोक नहीं पाया, उससे ज़्यादा चोट पहुँचाने वाली कोई चीज़ उस कमरे में नहीं थी। "नैना, मैं उस मिल पर था, अँधेरे में, आपका हाथ थामे। आपने ख़ुद देखा। मैं उस वक़्त इस archive को कैसे खोल सकता हूँ?"

"मुझे नहीं पता कैसे!" सितारा चिल्लाई, और महीनों का सारा डर, सारा दुख, सारा भरोसा जो उसने इस आदमी पर बहुत मुश्किल से किया था, सब एक ज़हर बनकर बाहर आ गया। "मुझे नहीं पता आपने ये कैसे किया। मुझे ये पता है कि आपने मुझसे हफ़्तों झूठ बोला। आपने मुझसे छुपाया कि आप कौन हैं। आपने मुझसे छुपाया कि आप यहाँ क्यों आए। और अब, ठीक उस रात जब वो सबूत मेरे हाथ में आने वाला था, वो आपके नाम से खुलता है। मैं और कितने झूठ पर भरोसा करूँ, कबीर?"

कबीर रुक गया। और सितारा ने देखा कि उसकी बात ने उसे कैसे मारा, एक तीर की तरह, ठीक वहाँ जहाँ वो सबसे कमज़ोर था, उसके अपराधबोध में।

"तो आपको लगता है मैंने मेहक के साथ धोखा किया," उसने कहा, बहुत धीरे। "अपनी ही बहन के साथ।"

"मुझे नहीं पता मैं क्या सोचूँ।" और यही सच था, और यही सबसे बुरा था। "मुझे बस... मुझे आपको अभी यहाँ से जाना है। प्लीज़।"

कबीर बहुत देर तक उसे देखता रहा। फिर उसने सिर हिलाया, धीरे से, और उसकी आँखों में एक ऐसा दर्द था जिसे सितारा बाद में, बहुत बाद में, पहचानेगी, क्योंकि वो किसी झूठे का दर्द नहीं था। वो किसी ऐसे का दर्द था जिसे उस इंसान ने ठुकरा दिया जिसके लिए वो सब कुछ जोखिम में डाल रहा था।

"मैं इसे साबित करूँगा," उसने कहा, दरवाज़े पर। "मैं नहीं जानता कैसे। पर मैं साबित करूँगा कि मैंने उसे, या आपको, कभी धोखा नहीं दिया। और जब आपको सच पता चलेगा, नैना, मुझे उम्मीद है कि तब बहुत देर न हुई हो।"

और वो चला गया।

सितारा अकेली रह गई, उस स्टूडियो में जो कभी सुरक्षित लगता था, और अब बस ख़ाली था।

उसने वो फ़ाइल खोली, अपने काँपते हाथों से। मेहक की आख़िरी recording। उसका इकलौता सबूत।

स्क्रीन पर एक error चमका। फ़ाइल ख़राब हो चुकी थी। चल ही नहीं सकती थी।

किसी ने उसे छुआ था। किसी ने उसे ख़राब कर दिया था, उन्हीं घंटों में।

और सितारा को समझ आया कि वो हार गई थी। अर्जुन चला गया था, शायद हमेशा के लिए। फ़ोन वाला सबूत कुचल दिया गया था। ये आख़िरी copy मर चुकी थी। और कबीर... कबीर भी जा चुका था।

उसी रात, उसका फ़ोन बजा। अनजान नंबर।

"नैना बेटा।"

वो आवाज़। गर्म, नरम, बूढ़ी। डीडी सर।

"मैंने सुना तुम्हारा आज का शो नहीं चला। तबीयत ठीक नहीं? बुरा लगा सुनकर।" एक हल्की, पितृ-तुल्य चुप्पी। "बेटा, मैं तुमसे एक आख़िरी बार बात करना चाहता था। एक बूढ़े आदमी की बात, समझदारी की बात। वो sponsorship का offer अभी भी खुला है। और मेरा वादा है, उसके बाद तुम्हें कभी कोई परेशानी नहीं होगी। एक लंबी, ख़ुशहाल ज़िंदगी। शायद शादी, बच्चे, एक घर। बस तुम्हें ये सब... भूलना होगा।"

"और अगर मैं न भूली?"

एक लंबी साँस, दुख भरी, जैसे किसी पिता को अपनी ज़िद्दी बेटी पर अफ़सोस हो।

"बेटा, उस लड़की को देखो जिसके लिए तुम ये कर रही हो। मेहक। वो भी होशियार थी। वो भी बहादुर थी। और अब वो एक तस्वीर है, एक माला के पीछे, और दो लाइन की ख़बर, जिसे कोई याद नहीं रखता।" उसकी आवाज़ बिल्कुल नहीं बदली, और यही सबसे डरावना था। "मैं नहीं चाहता तुम्हारे साथ भी ऐसा हो, बेटा। सच में नहीं चाहता। तो सो जाओ। चुपचाप। और सुबह उठकर अपनी ज़िंदगी जियो।"

लाइन कट गई।

और सितारा वहाँ बैठी रही, अँधेरे में, हारी हुई, अकेली, और पहली बार उसे लगा कि शायद वो आदमी सही था। शायद कुछ इमारतें बहुत ऊँची होती हैं। शायद कुछ लड़ाइयाँ हार के लिए ही होती हैं।

और तभी दरवाज़ा खुला, और चिंटू अंदर भागा, उसका चेहरा लाल, उसकी साँस फूली हुई, उसके हाथ में उसका laptop।

"दीदी!" वो हाँफ रहा था। "मैं... मैं घर नहीं गया। मैं ये सोचता रहा कि ये keycard वाली बात... ये जमती नहीं। तो मैंने सिस्टम को और गहराई से देखा। दीदी, security का पूरा log। और देखो।"

उसने laptop घुमाया।

"कबीर सर का keycard archive terminal पर इस्तेमाल हुआ, रात एक बजकर चालीस मिनट पर। पर दीदी, उसी वक़्त, station के बाहर वाले CCTV में, कबीर सर की गाड़ी मिल की तरफ़ जा रही थी, आपके पीछे। वो यहाँ थे ही नहीं! एक इंसान एक ही वक़्त में दो जगह नहीं हो सकता! और दीदी, उन्हें लगा होगा कि कोई इतनी जल्दी CCTV नहीं देखेगा, क्योंकि वो footage भी लगभग मिटा दिया गया था। बस एक backup server पर एक copy बची रह गई थी। मुझे मुश्किल से मिली।"

सितारा का दिल रुक गया।

"keycard clone हुआ था, दीदी।" चिंटू की आवाज़ काँप रही थी। "किसी ने कबीर सर के card की नक़ल बनाई, और उससे archive खोला, ताकि इल्ज़ाम उन पर आए। और मैंने देखा कि वो नक़ली card किस terminal से बना। एक ही जगह से। मैनेजर के office से।"

"मिश्रा जी," सितारा ने फुसफुसाया। "वही मिश्रा जी। जिन्होंने मेरे पहले शो की रात मुझे चाय पिलाई थी।"

मिश्रा जी। जो तीस साल से इस स्टेशन में थे। जो हर किसी को चाय पिलाते थे, हर किसी का जन्मदिन याद रखते थे, जो दीवार के एक हिस्से की तरह थे, इतने पुराने कि कोई उन्हें देखता ही नहीं था। और शायद इसीलिए। शायद इसीलिए वर्धन ने उन्हें चुना था। क्योंकि सबसे अच्छा जासूस वो होता है जिसे कोई जासूस समझता ही नहीं।

वही थे। हर कटी हुई कॉल, हर लीक हुई जानकारी, मिल का वो जाल। मिश्रा जी सब वर्धन को बता रहे थे, शुरू से।

और कबीर...

"दीदी," चिंटू ने कहा, अचानक बहुत डरा हुआ। "अगर कबीर सर ने ये सच ढूँढ लिया, अगर वो मिश्रा जी के पास गए..."

सितारा ने अपना फ़ोन उठाया और कबीर को फ़ोन किया। घंटी बजती रही। कोई जवाब नहीं। फिर एक यांत्रिक आवाज़। ये नंबर अभी बंद है।

उसका ख़ून ठंडा हो गया। उसने उसे भगा दिया था, सीधे उस आदमी की ओर जिसने ये सब किया था। और अब कबीर का फ़ोन बंद था, जैसे अर्जुन का चेहरा अँधेरे में खो गया था, जैसे मेहक की आवाज़ एक hold music के पीछे खो गई थी।

"और दीदी," चिंटू ने धीरे से कहा, अपनी स्क्रीन की तरफ़ देखते हुए, और उसकी आवाज़ में अब शुद्ध डर था। "मिश्रा जी अभी building में हैं। मैंने उन्हें अंदर आते देखा, अभी, security feed पर। वो ऊपर जा रहे हैं।"

सितारा खड़ी हो गई।

"archive के server room की तरफ़।"

क्योंकि एक corrupted copy काफ़ी नहीं थी। वर्धन सबूत का एक टुकड़ा भी नहीं छोड़ना चाहता था। और वो आदमी अभी, इसी वक़्त, उस आख़िरी recording को हमेशा के लिए मिटाने जा रहा था।

और सितारा के पास उसे रोकने के लिए कुछ मिनट थे।

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