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Chapter 5 of 13

नाम में क्या रखा है

सो मत जाना by Aarohi Malhotra

सुबह कबीर मेहरा स्टेशन आया, तो सितारा पहले से उसके केबिन के बाहर खड़ी थी, दो चाय लिए।

"शांति प्रस्ताव," उसने कहा, एक कप आगे बढ़ाते हुए। "कल रात के लिए। हम दोनों थोड़े ज़्यादा बोल गए।"

कबीर ने चाय ली। उसने सितारा को ध्यान से देखा, और सितारा ने अपने चेहरे को बिल्कुल सीधा रखा, क्योंकि उसने पूरी रात अभ्यास किया था इस पल का। वो उससे सीधे नहीं पूछ सकती थी। अगर वो पूछती, "आप मेहक को कैसे जानते हैं," तो कबीर बस इनकार कर देता, और दीवार और मोटी हो जाती। उसे उसे बात करने देना था। उसे इंतज़ार करना था।

"आप चाय बनाना नहीं जानतीं," कबीर ने एक घूँट लेकर कहा। "ये गरम पानी में दूध है।"

"ये भोपाल है, मिस्टर मेहरा, मुंबई का café नहीं। यहाँ चाय प्यार से बनती है, बारिस्ता से नहीं।"

उसके होंठ के कोने में कुछ हिला, लगभग मुस्कान। फिर वो वापस अंदर चला गया।

पर जाते जाते वो रुका, और बिना घूमे बोला, "कल रात... जो बत्तियाँ गईं। मैं जो कहने वाला था।"

सितारा की साँस रुक गई।

"वो ज़रूरी नहीं था," उसने कहा। "भूल जाइए।"

और दरवाज़ा बंद हो गया।

सितारा बहुत देर तक उस बंद दरवाज़े को देखती रही। वो आदमी एक तिजोरी था, और उसके अंदर मेहक का नाम बंद था, और सितारा को उसकी चाबी ढूँढनी थी, बिना ताला तोड़े।

उस रात, ठीक दो बजे, उसे चाबी ढूँढनी ही नहीं पड़ी।

"आपने institute को छेड़ा," अजनबी की आवाज़ आई, बिना किसी भूमिका के। "अच्छा किया। अब मैं आपको एक नाम दूँगा। एक ही नाम। और आप देखिएगा कि कैसे एक नाम पूरी इमारत गिरा सकता है।"

"बोलिए।"

"जो मैं अब आपको दूँगा ना," उसने कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में फिर वही पुरानी सतर्कता लौट आई, "वो मुझ तक पहुँच सकता है। इसलिए एक ही बार कहूँगा, ध्यान से सुनिए।" एक साँस। "आकाश राठौर।" वो रुका। "वर्धन क्लासेस का सबसे बड़ा सितारा। पिछले साल का AIR फ़र्स्ट। हर hoarding पर उसका चेहरा है, हर ad में उसकी मुस्कान। 'वर्धन ने बनाया देश का टॉपर।' पूरे शहर के माँ बाप अपने बच्चों को वर्धन में इसलिए डालते हैं, क्योंकि वो आकाश राठौर बनना चाहते हैं।"

"तो?"

"तो," अजनबी ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई, "आकाश राठौर नाम का कोई लड़का उस साल उस परीक्षा में बैठा ही नहीं। उसका रोल नंबर existing नहीं करता। वो रैंक किसी और की थी, एक ग़रीब लड़के की, जिसे पैसे देकर ख़रीदा गया और फिर भुला दिया गया। और जो चेहरा hoarding पर है, वो एक मॉडल का है, मुंबई का। मेहक ने ये पता लगाया था। उसने सबूत ढूँढ लिया था। और इसीलिए..."

लाइन पर खड़खड़ाहट।

"इसीलिए वो मर गई," अजनबी ने जल्दी से कहा। "ढूँढिए आकाश राठौर को, सितारा। आप उसे नहीं पाएँगी। और वही आपका सबूत है।"

लाइन कट गई।

अगले दो दिन सितारा और चिंटू ने एक अजीब सी जासूसी की।

"दीदी, ये देखो," चिंटू ने अपना लैपटॉप घुमाया, आँखें चमकती हुईं, क्योंकि एक बाईस साल के लड़के के लिए असली जासूसी YouTube की किसी भी चीज़ से बेहतर थी। "आकाश राठौर, AIR 1। वर्धन की website पर पूरा interview है। बंदा बात कर रहा है, 'सर की वजह से मैं ये कर पाया।' पर..."

"पर क्या?"

"पर मैंने उसका चेहरा reverse image search में डाला।" चिंटू ने एक और tab खोला। "ये बंदा एक stock photo है, दीदी। 'Confident Indian Student' करके बिकता है। नौ सौ रुपये में। इसकी फ़ोटो एक dental clinic के ad में भी है, और एक protein powder के packet पर भी।" उसने हाथ हवा में उठाए। "देश का टॉपर, और बेचारा दाँत के डॉक्टर और protein powder दोनों का भी मॉडल है। बंदा multitasking कर रहा है।"

बावजूद हर चीज़ के, सितारा हँस पड़ी। पर हँसी जल्दी मर गई, क्योंकि इसके पीछे जो था, वो हँसने वाली बात नहीं थी।

उन्होंने उस साल के असली toppers की list निकाली, जो हर अख़बार में छपती है। उसमें आकाश राठौर नाम का कोई नहीं था। उन्होंने वर्धन के पुराने batch के बच्चों को ढूँढा। कोई आकाश राठौर को नहीं जानता था। एक लड़की ने, फ़ोन पर, बहुत डरते हुए कहा कि "हाँ, वो नाम तो बस posters पर ही दिखता है, असल में कभी क्लास में नहीं आया," और फिर फ़ोन रख दिया।

एक पूरा झूठ। एक पूरी इमारत, एक ऐसे लड़के की नींव पर खड़ी जो था ही नहीं। हज़ारों बच्चे, हज़ारों माँ बाप, अपनी ज़िंदगी की जमा पूँजी एक मॉडल की मुस्कान के पीछे लगा रहे थे।

और मेहक ने ये देख लिया था।

उस रात, स्टेशन पर, बहुत देर हो चुकी थी। चिंटू घर जा चुका था। सितारा बोर्ड के सामने बैठी थी, थकी हुई, जब केबिन की बत्ती जली, और कबीर बाहर आया। वो भी गया नहीं था।

"आप अभी तक यहाँ?" उसने पूछा।

"आप भी तो हैं," उसने कहा। वो उसके पास आया, और सितारा की मेज़ के कोने पर टिक गया, जो उसके लिए असामान्य था, ये पास आना। "नैना।"

उसका असली नाम। फिर से।

"घर पर कोई इंतज़ार नहीं करता आपका?" उसने पूछा।

"नहीं," सितारा ने कहा। "माँ थीं। अब नहीं हैं।" उसने ये पहली बार किसी को ऐसे कहा था, बिना सजावट के। "आपका?"

कबीर कुछ देर चुप रहा। बाहर रात गहरी थी, और स्टूडियो की रोशनी उन दोनों पर नरम पड़ रही थी।

"मेरे पास एक बहन थी," उसने आख़िरकार कहा, बहुत धीरे, उस तरह जैसे कोई बहुत भारी चीज़ बहुत संभालकर रखता है। "छोटी। अलग माँ से, पर मेरी बहन। हमारे बीच... सब अच्छा नहीं था। मेरी ग़लती थी ज़्यादातर। मैं अपने काम में, अपने शहर में खो गया, और सोचता रहा कि वक़्त है, बाद में ठीक कर लूँगा। फिर एक दिन..." वो रुका, और उसका जबड़ा कसा।

"फिर एक दिन वक़्त ख़त्म हो गया," सितारा ने पूरा किया, धीरे से।

कबीर ने उसकी तरफ़ देखा, और उस नज़र में कुछ ऐसा था जो सितारा को अंदर तक छू गया, क्योंकि वो उसे पहचानती थी। वो वही चीज़ थी जो आईने में हर रोज़ उसे दिखती थी।

वो दोनों बहुत क़रीब थे। कबीर का हाथ मेज़ पर था, सितारा के हाथ से बस कुछ इंच दूर, और वो दूरी अचानक बहुत बड़ी और बहुत छोटी दोनों लग रही थी।

"नैना," कबीर ने कहा, और उसकी आवाज़ अब भर्राई हुई थी। "मैं भोपाल इस station के लिए नहीं आया। मैं यहाँ इसलिए आया क्योंकि..."

उसका हाथ हिला, सितारा के हाथ की तरफ़।

और सितारा का मन चीख़ा कि रुक जाओ, उसे कहने दो, बस एक सेकंड और। पर एक दूसरे हिस्से ने, उस हिस्से ने जो मेहक के लिए लड़ रहा था, सोचा, अगर ये आदमी मेहक का भाई है, अगर ये वो आदमी है जिसका नाम उसकी फ़ाइल में था, तो मुझे ये उसके मुँह से चाहिए, उसके वक़्त पर, सच की तरह, इस पल की गर्मी में नहीं।

उसने अपना हाथ हटा लिया, बहुत हल्के से।

कबीर रुक गया। कुछ बंद हो गया उसके चेहरे पर, फिर से वो परिचित दीवार। वो सीधा खड़ा हुआ।

"देर हो गई है," उसने कहा। "आपको घर जाना चाहिए।"

और सितारा वहाँ बैठी रही, एक अधूरे वाक्य के साथ, और एक हाथ के साथ जो अभी भी उस जगह को महसूस कर रहा था जहाँ कबीर का हाथ लगभग था, और सोचती रही कि उसने अभी अभी एक सच को टाला था या एक दिल को।

अगली सुबह, सब कुछ बदल गया।

सितारा स्टेशन पहुँची तो रिसेप्शन पर एक आदमी बैठा था, जो वहाँ का नहीं लगता था। महँगा कुर्ता, सोने की घड़ी, और एक मुस्कान जो चेहरे पर ऐसे टिकी थी जैसे किसी ने पेंट कर दी हो। उसके सामने मेज़ पर मिठाई का एक बड़ा डिब्बा था।

"आरजे सितारा!" वो खड़ा हुआ, दोनों हाथ जोड़कर, बहुत गर्मजोशी से। "या नैना जी कहूँ? वाह। आपका शो... क्या बात है। पूरा शहर सुनता है। मैं वर्धन ग्रुप से हूँ। हमारे डीडी सर आपके बहुत बड़े प्रशंसक हैं।"

सितारा का पेट जम गया, पर उसने मुस्कुराकर हाथ जोड़े।

"डीडी सर चाहते हैं कि वर्धन क्लासेस आपके शो को sponsor करे," आदमी ने कहा, और एक काग़ज़ आगे बढ़ाया, जिस पर एक नंबर लिखा था जो इतना बड़ा था कि सितारा को दो बार देखना पड़ा। "रात बारह से तीन। पूरे साल का। आपके slot की सारी चिंता ख़त्म। आपकी नौकरी पक्की। बस..."

"बस?"

आदमी की मुस्कान ज़रा भी नहीं हिली। पर उसकी आँखें हिलीं।

"बस, डीडी सर का मानना है कि एक अच्छे शो को positive रहना चाहिए। उम्मीद की बातें, प्यार की बातें। ये पुरानी, उदास कहानियाँ... मरी हुई लड़कियाँ, बंद केस... इनसे किसी का भला नहीं होता। और कभी कभी," उसने मिठाई का डिब्बा सितारा की तरफ़ सरकाया, और उसकी आवाज़ शहद की तरह धीमी और मीठी हो गई, "कभी कभी ये कहानियाँ ख़तरनाक भी होती हैं। आप समझ रही हैं ना? कुछ कहानियाँ adult नहीं होतीं, नैना जी। बस... ख़तरनाक होती हैं।"

स्टेशन की उस सुबह की चहल पहल के बीच, उस मिठाई के डिब्बे के ऊपर, उस आदमी की पेंट की हुई मुस्कान के पीछे, सितारा ने पहली बार उस चीज़ का चेहरा देखा जिससे मेहक डरी थी।

और वो मुस्कुरा रहा था।

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