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Chapter 9 of 13 6 min read

सबूत और साया

सो मत जाना by Avni Oberoi

"मुझे आपसे मिलना है।"

लाइन पर एक लंबी चुप्पी छाई। सितारा ने महीनों में पहली बार ये माँगा था, और वो जानती थी कि वो क्या माँग रही है। महीनों से अजनबी एक आवाज़ था, बिना चेहरे के, बिना नाम के, और उसकी पूरी सुरक्षा इसी में थी।

"नहीं," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में डर था। "आप नहीं समझतीं। जिस पल आप मुझे देखेंगी, जिस पल कोई मुझे आपके साथ देखेगा, मैं मर जाऊँगा। और शायद आप भी।"

"वो आख़िरी रात वाली recording। मेहक की मौत का सबूत। वो आपके पास है।"

चुप्पी।

"है ना?"

"हाँ," उसने आख़िरकार कहा। "मेरे पास है। पिछले सात महीने से मैं उसे लेकर भाग रहा हूँ। एक शहर से दूसरे, एक कमरे से दूसरे। वो मेरे पास है, और वही मुझे ज़िंदा रखे हुए है, क्योंकि वो जानते हैं कि जब तक वो मेरे पास है, मैं उसे कहीं भी भेज सकता हूँ।"

"तो उसे मुझे दे दीजिए। मैं उसे पूरे शहर के सामने बजा दूँगी। फिर वो आपको मारकर कुछ हासिल नहीं करेंगे, क्योंकि सच पहले ही बाहर होगा। ये आपको बचाने का इकलौता तरीक़ा है। और मेहक को इंसाफ़ देने का भी।"

लाइन पर सिर्फ़ उसकी साँस थी, टूटी हुई।

"वो मुझे फ़ोन पर नहीं भेज सकता," सितारा ने नरमी से कहा। "ये मैं जानती हूँ। वो लोग हर line tap कर रहे होंगे। आपको वो मुझे हाथों में देना होगा। एक बार। बस एक बार हमें मिलना होगा। और फिर ये ख़त्म हो जाएगा।"

एक लंबी, काँपती हुई साँस।

"कल रात," उसने आख़िरकार कहा। "मैं अपनी अगली कॉल पर एक जगह और एक वक़्त कहूँगा, पर उल्टा, एक पहेली में, जो सिर्फ़ आप समझेंगी। उन्हें नहीं। अकेले आना, सितारा। उस आदमी के बिना।"

"मैं कबीर के बिना नहीं..."

"उस आदमी के बिना," उसने दोहराया, और लाइन कट गई।

उस रात, मुलाक़ात से पहले, सितारा और कबीर स्टूडियो में अकेले थे।

बाहर भोपाल सो रहा था। अंदर सिर्फ़ बोर्ड की मद्धम रोशनी थी, और दो लोग, जो जानते थे कि कल रात जो होने वाला है, वो ख़तरनाक है, और शायद कुछ टूटेगा, और शायद हर चीज़ टूटेगी।

"वो कहता है मैं अकेली आऊँ," सितारा ने कहा।

"वो जो भी कहता है," कबीर ने कहा, उसके पास आते हुए, "मैं उस अँधेरे में आपको अकेले नहीं भेज रहा। मैं दूर रहूँगा। वो मुझे नहीं देखेगा। पर मैं वहाँ रहूँगा।"

"और अगर कुछ हो गया?"

"तो हम दोनों के साथ होगा।"

वो उसके बहुत क़रीब खड़ा था अब, और महीनों का सारा खिंचाव, सारी अधूरी बातें, सारी झिझक, उस छोटे से कमरे में उनके बीच खड़ी थी, और इस बार किसी ने अपना हाथ नहीं हटाया।

"मैं डरी हुई हूँ, कबीर," सितारा ने कहा, बहुत धीरे, और ये उसने पहली बार किसी से कहा था, असली डर, बिना मज़ाक की चादर के।

"मैं भी," कबीर ने कहा।

और फिर, बहुत धीरे, जैसे कोई बहुत क़ीमती चीज़ उठाता है, उसने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया, और सितारा ने इस बार अपनी आँखें बंद कर लीं, और उसने उसे चूम लिया।

ये कोई जल्दबाज़ी वाला चुंबन नहीं था। ये सात महीने का चुंबन था, दो टूटे हुए लोगों का, जो एक ही दुख के नीचे मिले थे, और जिन्होंने एक दूसरे में वो चीज़ पाई थी जो दुनिया ने उनसे छीन ली थी। एक हाथ थामने के लिए। एक आवाज़ जो कहती, मैं यहाँ हूँ। तुम अकेले नहीं हो।

जब वो अलग हुए, तो दोनों की साँसें तेज़ थीं, और कबीर ने अपना माथा उसके माथे से टिका दिया।

"जो भी कल हो, नैना," उसने फुसफुसाया, उसका असली नाम, वो नाम जो on air कभी नहीं आता था, "मुझे ख़ुशी है कि इस सब के बीच, मुझे आप मिलीं।"

"ये बहुत रोमांटिक है," सितारा ने कहा, और उसकी आँखों में आँसू और हँसी दोनों थे, "पर बहुत मनहूस भी। ऐसे बोल रहे हो जैसे हम कल मरने वाले हैं।"

"बस एहतियातन," कबीर हँसा, और उसने उसे फिर अपनी बाँहों में खींच लिया, और कुछ देर के लिए, सिर्फ़ कुछ देर के लिए, उस ख़तरे और उस दुख के बीच, दो लोग बस खड़े रहे, एक दूसरे को थामे, और दुनिया को बाहर रहने दिया।

अगली रात आई, जैसे हर रात आती है, चाहे आप उसे चाहें या न चाहें।

पहेली सरल थी, उन दोनों के लिए जो मेहक को जानने लगे थे। एक बंद मिल, शहर के किनारे, वो जगह जहाँ मेहक अकेले जाकर बैठती थी जब उसे सोचना होता था। अजनबी जानता था कि सितारा अब वो जगह पहचान लेगी, क्योंकि उसी मिल का ज़िक्र मेहक की डायरी में था, उसी डायरी में जिसे कबीर हफ़्तों से रात रात भर पढ़ रहा था। दो बजे। अकेले।

सितारा वहाँ गई, अपनी गाड़ी में, हाथ काँपते हुए। कबीर पीछे था, बहुत पीछे, बिना हेडलाइट के, एक साया जो उस पर नज़र रखे था। उसके कान में एक छोटा सा earpiece था, और कबीर की आवाज़, धीमी, स्थिर। "मैं यहाँ हूँ। मैं देख रहा हूँ। डरो मत।"

मिल खंडहर थी, टूटी हुई दीवारें, ज़ंग लगी मशीनें, और चाँद की रोशनी टूटी हुई छत से छन कर अंदर आ रही थी। सितारा अंदर गई, और रुकी, और इंतज़ार किया।

"मैं यहाँ हूँ," उसने अँधेरे में कहा। "जैसा आपने कहा। अकेली। अब आप सामने आइए। मुझे आपका चेहरा देखने दीजिए।"

कुछ देर कुछ नहीं हुआ। सिर्फ़ हवा, और कहीं दूर एक कुत्ते का भौंकना।

फिर, मशीनों के पीछे के अँधेरे से, एक आहट हुई। धीमी। लड़खड़ाती हुई।

और सितारा ने महीनों से जिस आवाज़ की कल्पना की थी, उस चेहरे की कल्पना की थी, उसने अपने मन में एक तस्वीर बनाई थी। कोई रहस्यमय आदमी। कोई गहरा, ताक़तवर साया।

जो अँधेरे से निकला, वो वैसा कुछ नहीं था।

वो एक लड़का था। मुश्किल से बाईस, तेईस का। दुबला, थका हुआ, हफ़्तों की दाढ़ी, फटे कपड़े। और उसकी कमीज़ के एक तरफ़, पेट के पास, एक गहरा, गीला, काला दाग़ फैल रहा था, जो चाँद की रोशनी में चमक रहा था।

ख़ून।

वो एक हाथ से दीवार पकड़े था, और दूसरे हाथ में, ज़ोर से भींचा हुआ, एक पुराना फ़ोन था।

"सितारा जी," उसने कहा, और वो आवाज़, वो आवाज़ जो हर रात दो बजे आती थी, अब एक टूटे हुए चेहरे से निकल रही थी। "मैं अर्जुन हूँ।"

सितारा उसकी तरफ़ दौड़ी, उसे थामने के लिए, क्योंकि वो गिरने वाला था।

"मेहक का," उसने कहा, उसकी बाँहों में लड़खड़ाते हुए, फ़ोन को अपनी छाती से लगाए, जैसे वही उसकी जान हो। "मैं मेहक का था।"

और फिर, उसकी आँखों में एक दर्द जो ख़ून के दर्द से कहीं गहरा था:

"वो मुझ तक पहले पहुँच गए।"

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