Chapter 12 of 13
लाइव, दो बजे
चरमोत्कर्ष, on air। सितारा और चिंटू मिश्रा जी को आख़िरी recording मिटाने से रोक लेते हैं। फिर सितारा एक जुआ खेलती है, वो रात के दो बजे live होती है, वर्धन को फ़ोन पर उलझाए रखती है, और पूरे सोते शहर के सामने मेहक की आख़िरी कॉल और क़त्ल का सबूत बजा देती है। शहर वो गवाह बन जाता है जो मेहक को कभी नहीं मिला। वर्धन के लोग signal काटने आते हैं, स्टूडियो में हाथापाई होती है। अंत में प्रसारण शहर तक पहुँचता है, रात फट पड़ती है, और स्टूडियो के अँधेरे में एक गोली चलती है।
सितारा सीढ़ियाँ दो दो चढ़ी, चिंटू उसके पीछे, और server room का दरवाज़ा धक्का देकर खोला।
मिश्रा जी वहीं थे, एक कुर्सी पर बैठे, एक screen के सामने, उनका चश्मा नीली रोशनी में चमकता हुआ, उनकी उँगली एक button पर। इतने शांत, इतने सामान्य, जैसे वो बस एक और फ़ाइल हटा रहे हों।
"मिश्रा जी, रुकिए!"
बूढ़े आदमी ने मुड़कर देखा, और उनके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी। बस एक थकान। एक बहुत पुरानी थकान।
"बेटा," उन्होंने कहा, बहुत धीरे। "तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।"
"आपने ये क्यों किया?" सितारा की आवाज़ टूट गई। "तीस साल। हम सब आपको अपना समझते थे। आपने मेहक के साथ... आपने हम सबके साथ धोखा किया। क्यों?"
मिश्रा जी की उँगली button पर रुकी रही, पर उन्होंने दबाया नहीं। और जब वो बोले, तो उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो सबसे डरावनी थी, क्योंकि वो दानव की नहीं थी। वो एक हारे हुए आदमी की थी।
"मेरी एक बेटी है, बेटा। उसका दिल कमज़ोर है, जन्म से। उसके इलाज का ख़र्च... मेरी पूरी ज़िंदगी की तनख़्वाह उसके एक साल के इलाज के बराबर नहीं है।" उन्होंने screen की तरफ़ देखा। "वर्धन साहब ने एक दिन मुझे बुलाया। उन्होंने मेरी बेटी के इलाज का पूरा ख़र्च उठाया। बदले में, उन्हें बस... आँखें चाहिए थीं। कान चाहिए थे। इस स्टेशन के अंदर। मैंने सोचा, मैं किसी को नुक़सान नहीं पहुँचा रहा। मैं बस सुन रहा हूँ।" उनकी आवाज़ काँपी। "फिर वो लड़की मर गई। और मुझे एहसास हुआ कि मेरी बेटी की हर साँस के बदले, मैंने किसी और की बेटी की साँसें बेच दीं।"
"तो अब इसे ठीक कीजिए," सितारा ने कहा, आगे बढ़ते हुए। "वो recording मत मिटाइए। मेहक को इंसाफ़ दिलाइए। मिश्रा जी, आप अभी भी सही कर सकते हैं।"
मिश्रा जी ने बहुत देर तक उसे देखा। फिर, बहुत धीरे, उन्होंने अपनी उँगली button से हटा ली।
"मैं यहाँ इसे मिटाने आया था, बेटा," उन्होंने कहा, थककर। "पूरी रात से इस button पर उँगली रखे बैठा हूँ। पर मेरी उँगली नहीं उठी। और जो copy दूसरे server पर है, उस तक मैं पहुँच ही नहीं पाया।" उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं। "मैं बहुत थक गया हूँ, बेटा। बहुत थक गया हूँ डरते डरते।"
चिंटू पहले से ही दूसरे terminal पर था, उँगलियाँ उड़ती हुईं। "दीदी, ये वही backup server है जहाँ से मुझे CCTV वाली footage मिली थी! मेहक ने यहाँ भी एक copy छुपा रखी थी, intern को पूरे system का पता था। और दीदी, मिल गई! recording सही है! इसमें मेहक की आवाज़ है, और... और एक आदमी की आवाज़ है, साफ़, धमकी देते हुए। दीदी, ये डीडी सर हैं। ये पक्का सबूत है!"
सितारा ने वो recording सुनी, बस कुछ सेकंड, और उसके रोंगटे खड़े हो गए। मेहक की डरी हुई, बहादुर आवाज़। और उसके जवाब में, वही गर्म, पितृ-तुल्य आवाज़, जो कह रही थी, ठीक उसी शांति से जिससे उसने सितारा से बात की थी, कि अगर इस लड़की ने मुँह खोला, तो उसका हाल क्या होगा।
उनके पास सबूत था। पर सितारा जानती थी कि अगर वो इसे पुलिस के पास ले गई, तो वर्धन का कोई दोस्त उसे दबा देगा, जैसे सात महीने पहले दबाया था। काग़ज़ी सबूत ग़ायब किए जा सकते थे। गवाह ख़रीदे जा सकते थे।
पर एक चीज़ नहीं ख़रीदी जा सकती थी। एक चीज़ नहीं दबाई जा सकती थी।
एक पूरा शहर, जो एक साथ सुन रहा हो।
"चिंटू," सितारा ने कहा, और उसकी आँखों में अब डर नहीं था। कुछ और था। "हम कितनी जल्दी live जा सकते हैं?"
रात के ठीक दो बजे, सेहर तक की लाल बत्ती जली।
"नमस्ते भोपाल," सितारा ने कहा, और उसकी आवाज़ शांत थी, पत्थर की तरह। "आज मेरे पास कोई गाना नहीं है। आज सिर्फ़ एक कहानी है, और एक आवाज़, जिसे आपको सुननी होगी। पर पहले, मुझे एक फ़ोन करना है।"
उसने वो नंबर मिलाया जो डीडी सर ने उसे दिया था। on air। पर ये उन्हें नहीं पता था।
"नैना बेटा।" वही आवाज़, ख़ुश। "मुझे ख़ुशी है कि तुमने समझदारी दिखाई।"
"मैंने दिखाई, सर।" सितारा ने कहा, अपनी आवाज़ को टूटा हुआ, हारा हुआ रखते हुए, और पूरा शहर सुन रहा था। "मैं बस... मुझे समझना है। मेहक। आपने उसके साथ जो किया। आपको ज़रा भी अफ़सोस नहीं?"
"बेटा, ये पुरानी बातें..."
"बस एक बार, सर। मेरे लिए। मेहक के साथ जो हुआ... वो आपने करवाया?"
और डीडी सर, अपने घर में, अपनी जीत में सुरक्षित, ये न जानते हुए कि एक पूरा शहर लाइन पर है, हँसे, उस गर्म, बूढ़ी हँसी से।
"मैंने किसी को नहीं मारा, बेटा।" वो धीरे से बोले, जैसे किसी बच्चे को समझा रहे हों। "मैंने उस लड़की से सिर्फ़ इतना कहा था कि चुप रहो। बस इतना।"
"पर वो चुप नहीं हुई।"
"नहीं हुई।" एक हल्की चुप्पी, और उसमें कोई अफ़सोस नहीं था। "मैंने उसे मौक़ा दिया। मैंने तुम्हें भी मौक़ा दिया। जो चुप हो जाते हैं, बेटा, वो जीते हैं। जो नहीं होते, उनके साथ जो होता है, वो उनका अपना चुनाव होता है। उस लड़की ने मुझे मजबूर किया। उसकी मौत उसकी अपनी ज़िद का नतीजा थी। मेरी नहीं।"
सितारा ने आँखें बंद कीं।
"शुक्रिया, सर," उसने कहा। "पूरे भोपाल की तरफ़ से, शुक्रिया।"
एक पल की चुप्पी। और फिर, डीडी सर की आवाज़, पहली बार, बदली।
"क्या मतलब, पूरे भोपाल..."
सितारा ने वो कॉल काट दी, और recording चला दी।
और भोपाल की उस रात में, हज़ारों घरों में, छतों पर, हॉस्टलों में, एक डरी हुई लड़की की आवाज़ गूँजी, सात महीने पुरानी, राख से उठती हुई। मेहक की आवाज़। और उसके जवाब में, उस आदमी की आवाज़ जिसे पूरा शहर भगवान मानता था, उसे मारने की धमकी देते हुए।
और फिर सितारा की अपनी आवाज़, उस मरी हुई लड़की के लिए, उन सब मरी हुई और डरी हुई लड़कियों के लिए।
"ये थी मेहक तोमर," उसने कहा। "उन्नीस साल की। जिसे इस शहर ने एक हादसा मान लिया। पर वो हादसा नहीं था। ये उसकी आवाज़ है, भोपाल। आज रात, आप उसके गवाह हैं। वो गवाह जो उसे ज़िंदा रहते कभी नहीं मिला।"
और शहर जाग गया।
फ़ोन की घंटियाँ बजने लगीं, सैकड़ों, एक साथ। सोशल मीडिया फट पड़ा। लोग सड़कों पर निकलने लगे, न्यू मार्केट से लेकर पुराने शहर की तंग गलियों तक, झील के उस पार तक, उस institute के सामने जो कल तक एक मंदिर था। एक चिंगारी, जो सात महीने से राख के नीचे दबी थी, अचानक पूरे शहर में आग बन गई।
पर स्टेशन पर, सीढ़ियों पर भारी क़दमों की आवाज़ आई।
वर्धन के आदमी। वो signal काटने आ रहे थे, उस आवाज़ को रोकने जो अब रोकी नहीं जा सकती थी।
स्टूडियो का दरवाज़ा टूटा। फ़िक्सर अंदर आया, इस बार कोई मुस्कान नहीं, सिर्फ़ ग़ुस्सा, और उसके हाथ में कुछ चमका।
"बंद करो ये!" वो चिल्लाया।
"बहुत देर हो गई," सितारा ने कहा, बोर्ड के सामने खड़े होकर, उसके और उस live signal के बीच। "पूरा शहर सुन चुका है। तुम मुझे मार सकते हो। पर अब तुम सच को नहीं मार सकते।"
और तभी, टूटे दरवाज़े से, एक और साया अंदर आया।
कबीर।
ख़ून, उसके चेहरे पर, उसके कपड़ों पर, उसके हाथ बँधे होने के निशान उसकी कलाइयों पर। वो किसी तरह छूटकर भागा था, और वो सीधे यहाँ आया था, उसके पास।
"उससे दूर हटो," कबीर ने कहा, फ़िक्सर की तरफ़ बढ़ते हुए।
जो आगे हुआ, वो अँधेरे और चीख़ों में हुआ। फ़िक्सर मुड़ा। कबीर झपटा। चिंटू चिल्लाया। और सितारा बोर्ड की तरफ़ लपकी, उस signal को बचाने के लिए जो अभी भी शहर तक जा रहा था।
और उस अफ़रा तफ़री में, उस अँधेरे में, उन उलझे हुए शरीरों के बीच, एक आवाज़ आई जो बाक़ी सब आवाज़ों को चीर गई।
एक गोली।
और फिर, एक पल के लिए, सब कुछ बहुत शांत हो गया।