अध्याय 1 / 13
सेहर तक
सो मत जाना द्वारा Aarohi Malhotra
हमारी मुलाक़ात होती है आरजे सितारा से और उसके शो से, जो शहर के जागते हुए दिलों का साथी है, गर्म, मज़ाकिया और थोड़ा अकेला। नाइट शो चुपचाप बंद होने की कगार पर है। फिर, ठीक दो बजे, एक अजनबी फ़ोन करता है, जिसकी आवाज़ भारी है और जो अपना नाम नहीं बताता। वो पूछता है कि क्या उसे वो लड़की याद है जो आख़िरी बार उसके शो पे रोई थी। अंत में वो कहता है कि वो ख़ुदकुशी नहीं थी, और फिर धीरे से, सो मत जाना सितारा।
रात के सवा बारह बजे भोपाल सोता है, पर पूरा नहीं।
ऊपर वाली बत्ती लाल हो गई। ON AIR। स्टूडियो की कांच की दीवार के पार बैठे चिंटू ने तीन उँगलियाँ दिखाईं, फिर दो, फिर एक, और रेडियो सेहर 92.3 की उस छोटी सी अँधेरी कमरे में सिर्फ़ एक चीज़ बची, एक आवाज़।
"तो जो लोग अभी तक जाग रहे हैं," उसने माइक के क़रीब होकर कहा, उसकी आवाज़ भारी और गर्म, जैसे किसी ने रजाई थोड़ी सी खोल दी हो, "उनसे एक सवाल। आप जाग क्यों रहे हैं? नींद नहीं आ रही, या आप नींद को आने ही नहीं दे रहे? क्योंकि दोनों में फ़र्क़ होता है, दोस्तों। ये है रेडियो सेहर, और मैं हूँ आपकी आरजे सितारा, और ये है सेहर तक, वो शो जो आपके साथ तब तक जागता है जब तक सुबह नहीं हो जाती।"
चिंटू ने बैकग्राउंड में धीमी सी धुन चढ़ा दी, वही पुरानी, जो हर रात बजती थी, सितार और बारिश के बीच की कोई चीज़।
भोपाल की रातें अजीब होती हैं। बड़ी झील पर हवा चलती है और पुराने शहर की गलियों में चुप्पी जम जाती है, और इस चुप्पी में, सितारा को पता था, सैकड़ों लोग छत पर, बिस्तर पर, बंद दुकान के पीछे, अपने फ़ोन से चिपके बैठे होते हैं। अकेले। उसका शहर। उसके लोग। दिन में किसी को इनकी आवाज़ सुनाई नहीं देती। रात को वो सुनती थी।
"पहली लाइन पर हैं हमारे साथ," उसने बटन दबाया। "हैलो, सेहर तक। कौन?"
एक हिचकिचाता हुआ लड़का। "सितारा दीदी... मेरा कल फ़िज़िक्स का पेपर है।"
"और तू मुझे फ़ोन कर रहा है?" वो हँसी। "बेटा, फ़िज़िक्स मुझसे नहीं होगी। मैं तो वो इंसान हूँ जिसने ग्यारहवीं में न्यूटन के तीनों नियम याद किए और तीनों भूल गई।"
"नहीं दीदी, पढ़ाई नहीं... बस... डर लग रहा है।"
और सितारा की आवाज़ नरम हो गई, उतनी ही तेज़ी से जितनी तेज़ी से वो मज़ाक करती थी। "अच्छा। ये बता, डर इस बात का है कि पेपर ख़राब होगा, या इस बात का कि अगर ख़राब हुआ तो घर में क्या होगा?"
लाइन पर ख़ामोशी।
"दूसरा वाला, ना?" उसने धीरे से कहा। "सुन। कल जो भी हो, परसों सूरज वैसे ही निकलेगा जैसे आज निकला था। तेरी क़ीमत उस पेपर के नंबरों से तय नहीं होती। ये बात आज रात तेरे अलावा शायद कोई तुझसे नहीं कहेगा, इसलिए मैं कह रही हूँ। अब जा, थोड़ा सो ले। और कल पेपर के बाद मुझे मैसेज करना कि कैसा गया।"
"थैंक यू दीदी।"
लाइन कट गई। कांच के पार चिंटू ने दिल का इशारा बनाया और फिर मुँह बनाकर रोने की एक्टिंग की। सितारा ने उसे उँगली दिखाई, ऑफ़ माइक।
"जो अभी फ़ोन पर थे," उसने सुनने वालों से कहा, "उनके लिए और उन सबके लिए जिनका कल कोई इम्तिहान है, ये गाना। और सुनो, इम्तिहान सिर्फ़ कागज़ पर नहीं होते। कुछ इम्तिहान तीन बजे रात को आते हैं, बिना सिलेबस के। उनमें भी पास हो जाओगे। मैं हूँ ना।"
गाना चढ़ा। उसने हेडफ़ोन एक कान से उतारा।
चिंटू दरवाज़ा खोलकर अंदर आया, हाथ में दो कटिंग चाय और एक काग़ज़। बीस साल का, बाल जैल से खड़े किए हुए, टी-शर्ट पर किसी अंग्रेज़ी बैंड का नाम जो शायद उसने कभी सुना नहीं था।
"दीदी, एक तो आप ना हर रात उस फ़िज़िक्स वाले को counselling दे देती हो, बंदा पास हो गया तो आपको credit देगा, फ़ेल हुआ तो बोलेगा सितारा दीदी ने distract किया।" उसने चाय रखी। "और दूसरा... ये।"
सितारा ने काग़ज़ लिया। ऊपर मैनेजमेंट का लेटरहेड। मुंबई वाले मालिकों का, जिन्होंने पिछले साल रेडियो सेहर को ख़रीदा था और तब से शहर में पैर भी नहीं रखा था।
उसने आधा पढ़ा और रख दिया।
"पूरा पढ़ो," चिंटू ने कहा।
"मुझे पता है क्या लिखा है, चिंटू।"
"लिखा है कि नया Programming Head आ रहा है। मुंबई से। और लिखा है review of non-performing slots।" उसने ये अंग्रेज़ी के शब्द ऐसे बोले जैसे मुँह में कड़वी कोई चीज़ हो। "दीदी, सेहर तक non-performing है। रात के बारह से तीन। इस वक़्त ad कौन देता है? हमारा TRP... है ही नहीं लगभग।"
"हमारा TRP वो लोग हैं जो किसी मशीन में नहीं गिने जाते," सितारा ने कहा, और फिर अपनी ही बात पर थोड़ा हँसी, क्योंकि वो जानती थी कि ये बात कितनी अच्छी सुनाई देती है और मुंबई वालों के लिए कितनी बेकार होती है। "वो फ़िज़िक्स वाला लड़का किसी रेटिंग में नहीं आता।"
"मुंबई वालों को फ़िज़िक्स वाला लड़का नहीं, फ़िज़िक्स वाले लड़के का बाप चाहिए, जो ad देगा।"
वो सही था। चिंटू अक्सर सही होता था, और ये उसकी सबसे परेशान करने वाली आदत थी।
गाना ख़त्म होने को था। सितारा ने हेडफ़ोन वापस चढ़ाया। "जा, बोर्ड पर बैठ। और हाँ, अगर आज भी शर्मा जी का फ़ोन आया ना अपनी पत्नी की शिकायत लेकर, तो आज मैं उन्हें on air बोल दूँगी कि भाई साहब, समस्या आपकी पत्नी नहीं, आपका खर्राटा है।"
"दीदी मत करना, वो हमारे सबसे loyal listener हैं।"
"वो हमारे इकलौते sponsor-able listener हैं, उनका तकिया कारख़ाना है।"
लाल बत्ती फिर जली।
अगले एक घंटे में रात अपनी रफ़्तार से बही। शर्मा जी ने सच में फ़ोन किया, और सितारा ने उन्हें on air नहीं छेड़ा, सिर्फ़ इसलिए कि उनकी आवाज़ में आज सच में थकान थी। एक लड़की ने फ़ोन किया जिसकी सगाई टूट गई थी और जो रोई नहीं, बस बहुत शांत आवाज़ में बोलती रही, और वो शांति रोने से ज़्यादा डरावनी थी। एक बुज़ुर्ग औरत ने फ़ोन किया जिसे नींद नहीं आती थी क्योंकि उसका बेटा कनाडा में था और वहाँ अभी दिन था, और वो रात को जागकर उस वक़्त को पकड़ने की कोशिश करती थी जब उसका बेटा जाग रहा होता।
ये उसका शहर था। सोता हुआ, पर पूरा नहीं।
और इस सब के बीच सितारा हँसाती रही, क्योंकि उसने बहुत पहले सीख लिया था कि लोग रात को हँसी इसलिए नहीं चाहते कि उन्हें कोई परेशानी नहीं है, बल्कि इसलिए कि होती है। हँसी वो चादर है जो आप अपने ऊपर इसलिए डालते हैं ताकि अँधेरा सीधे आप तक न पहुँचे।
शो ख़त्म होने में बीस मिनट बाक़ी थे।
ठीक दो बजे, एक लाइन जली।
चिंटू ने इशारा किया। सितारा ने वही किया जो वो हर रात करती थी, बिना देखे बटन दबाया, और मुस्कुराते हुए बोली, "हैलो, सेहर तक, इस वक़्त जो जाग रहा है वो या तो आशिक़ है या परेशान, बताइए कौन सा?"
लाइन पर ख़ामोशी थी।
ख़ामोशी, पर ख़ाली नहीं। उसमें एक साँस थी, धीमी, इत्मीनान से ली गई। किसी की मौजूदगी।
"हैलो?" उसने दोहराया। "आवाज़ आ रही है मेरी?"
"आ रही है।" आदमी की आवाज़ थी। भारी, नीची, बिना किसी जल्दबाज़ी के। उस तरह की आवाज़ जो हँसी का इंतज़ार नहीं करती। "आप अच्छा बोलती हैं, सितारा। उस लड़के से। पेपर वाले से। आपने उसे वो बात कही जो शायद उससे कोई नहीं कहता।"
सितारा थोड़ा हँसी, पर चिंटू ने कांच के पार सिर उठाया, क्योंकि वो हँसी पूरी नहीं थी। "शुक्रिया। तो आप किस categories में हैं? आशिक़ या परेशान?"
"मैं एक सवाल पूछने आया हूँ।" उसने उसकी बात को छुआ तक नहीं। "और फिर चला जाऊँगा।"
स्टूडियो में कुछ बदल गया था, जैसे हवा का दबाव। सितारा ने अपनी कलम नीचे रखी।
"पूछिए।"
"आपको वो लड़की याद है," आदमी ने कहा, "जो आपके शो पे रोई थी? आख़िरी बार। कुछ महीने पहले। देर रात।"
और एक पल के लिए सितारा का दिमाग़ बिल्कुल ख़ाली हो गया। उसके शो पर बहुत लोग रोए थे। आज रात भी एक लड़की रोई नहीं थी पर रोने से बदतर थी। कौन सी लड़की? कौन सी आख़िरी बार?
"मेरे शो पे बहुत लोग..." उसने शुरू किया।
"नहीं।" पहली बार उसकी आवाज़ में कुछ आया, हल्की सी धार। "वो नहीं। एक ख़ास लड़की। आपको पता चल जाएगा कौन, जब आप ढूँढोगी। मैं चाहता हूँ आप ढूँढो।"
"देखिए, अगर आपका कोई..."
"उन्होंने कहा उसने ख़ुदकुशी की।" आदमी ने धीरे से कहा, और हर शब्द ऐसे रखा जैसे कोई पत्थर रखता है, एक-एक करके, किसी कमज़ोर ज़मीन पर। "शहर ने मान लिया। पुलिस ने फ़ाइल बंद कर दी। सब सो गए।"
सितारा का हाथ माइक के पास रुक गया।
"वो ख़ुदकुशी नहीं थी, सितारा।"
लाइव था। पूरा शहर सुन रहा था, वो थोड़े से लोग जो जाग रहे थे। चिंटू बोर्ड पर जम गया था, उसका हाथ उस बटन पर जो किसी कॉल को काट सकता था, पर उसने काटा नहीं, क्योंकि सितारा ने इशारे से रोक दिया।
"आप कौन हैं?" उसने पूछा। इस बार कोई मज़ाक नहीं था, कोई शो नहीं था, बस उसकी अपनी आवाज़, अचानक बहुत साफ़।
"ये ज़रूरी नहीं है।"
"मेरे लिए है। आप मेरे शो पर हैं, रात के दो बजे, और एक मरी हुई लड़की के बारे में बात कर रहे हैं जिसका मुझे नाम तक नहीं पता। आप कौन हैं?"
एक लंबी साँस। पीछे, बहुत धीमे, कोई आवाज़ थी, शायद ट्रेन की, शायद हवा की, किसी खुली जगह की, सितारा बता नहीं पाई।
"मैं वो हूँ," उसने आख़िरकार कहा, "जो जानता है कि वो उस रात सोई नहीं थी।"
सितारा के रोंगटे खड़े हो गए। उसने मुड़कर चिंटू को देखा। चिंटू का चेहरा सफ़ेद था।
"सुनिए," सितारा ने कहा, और उसकी आवाज़ अब संभल नहीं रही थी पूरी तरह, "अगर आपको सच में लगता है कि कुछ ग़लत हुआ है, तो पुलिस..."
"पुलिस।" वो हँसा। पहली बार। पर उसमें हँसी नहीं थी। "पुलिस ने ही तो फ़ाइल बंद की है, सितारा। जिन लोगों के पास जाना चाहिए, वो ही तो उस दरवाज़े पर पहरा दे रहे हैं। इसीलिए मैं आपके पास आया। आप अकेली जगह हैं इस शहर में जहाँ कोई बिना नाम के, बिना चेहरे के, पूरे शहर से बात कर सकता है। और कोई उसे ढूँढ नहीं सकता।"
ये सच था, और इस सच ने सितारा को डराया, इस बात से ज़्यादा कि वो डरावना था, इस बात से कि वो सही था।
"आज के लिए बस इतना।" आदमी ने कहा। "उसे ढूँढो, सितारा। उस आख़िरी कॉल को। आपके पास होगी वो, कहीं न कहीं। वो रात आपकी याद में होगी, चाहे आप मानें या न मानें।"
"रुकिए..."
"और एक बात।" वो रुका। उसकी आवाज़ धीमी हो गई, इतनी धीमी कि सितारा को माइक के और क़रीब होना पड़ा, और बाद में उसे यही याद रहेगा, कि वो ख़ुद उस आवाज़ के क़रीब गई थी। "आज रात, जब शो ख़त्म हो जाए, और आप घर जाएँ, और बत्ती बुझाएँ..."
"क्या?"
"सो मत जाना, सितारा।"
लाइन कट गई।
डायल टोन। सपाट, लगातार, उस छोटे से कमरे में अचानक बहुत ज़ोर से। ON AIR की लाल बत्ती जल रही थी और सितारा के सामने माइक खड़ा था और पूरा शहर इंतज़ार कर रहा था कि वो कुछ कहे, कुछ भी, क्योंकि रेडियो पर ख़ामोशी सबसे डरावनी चीज़ होती है।
उसने गला साफ़ किया।
"वो थे..." उसने शुरू किया, और रुक गई, क्योंकि उसके पास कोई मज़ाक नहीं था, पहली बार किसी कॉल के बाद उसके पास कोई मज़ाक नहीं था। उसने चिंटू को देखा। चिंटू ने धीरे से गाना चढ़ा दिया, बिना पूछे, उसे बचाने के लिए।
संगीत के पीछे, ऑफ़ माइक, चिंटू ने इंटरकॉम दबाया, उसकी आवाज़ काँप रही थी। "दीदी... ये कौन था?"
सितारा ने जवाब नहीं दिया।
वो उस लाल बत्ती को देख रही थी और एक बात उसके दिमाग़ में घूम रही थी, गोल-गोल, और वो बात ये नहीं थी कि आदमी कौन था। वो बात ये थी कि उसे याद नहीं आ रहा था।
कौन सी लड़की। कौन सी आख़िरी कॉल।
उसके शो पर हर रात कोई न कोई रोता था, और वो उन सबको पकड़ती थी, हर एक को, यही तो उसका काम था, यही तो वो थी। पर कोई एक लड़की थी जो रोई थी और चली गई थी, और सितारा को याद नहीं था, और अब एक अजनबी रात के दो बजे उसे बता रहा था कि वो लड़की मर गई।
और सबसे बुरी बात ये थी, जो उसे अभी समझ आ रही थी, धीरे-धीरे, जैसे ठंडा पानी कॉलर से अंदर उतरता है, कि अगर वो उसे भूल गई थी, तो शायद वो उसे सुन नहीं पाई थी।
बाहर, स्टूडियो की खिड़की के नीचे, सड़क पर, एक गाड़ी खड़ी थी जिसकी बत्तियाँ बुझी थीं। सितारा ने उसे नहीं देखा। उसने हेडफ़ोन उतारा, दोनों हाथों में अपना चेहरा रखा, और सोने वाले शहर ने, उन थोड़े से जागते लोगों ने, उसका गाना सुना, और किसी को नहीं पता था कि सेहर तक की आरजे सितारा अपने कांच के कमरे में बैठी, पहली बार बहुत सालों में, ख़ुद डरी हुई थी।
सो मत जाना, सितारा।
उसने नहीं सोचा था कि वो उस रात सो भी नहीं पाएगी।