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Chapter 8 of 13 8 min read

साये के क़रीब

सो मत जाना by Avni Oberoi

आप उसके कौन थे।

वो सवाल अगले दो दिन सितारा के साथ रहा, हर वक़्त, जैसे कोई गाना जो दिमाग़ में फँस जाता है। क्योंकि जवाब वो जानती थी। उसने उसे आवाज़ में सुना था। वो दर्द किसी भाई का नहीं था, किसी दोस्त का नहीं था। वो किसी ऐसे इंसान का था जिसने मेहक से प्यार किया था।

और इसने सब कुछ बदल दिया।

एक हफ़्ता पहले, अजनबी एक रहस्य था, एक डरावनी आवाज़ रात के दो बजे। अब वो एक टूटा हुआ दिल था। और सितारा को, अपनी पूरी कोशिश के बावजूद, उस आवाज़ का इंतज़ार रहने लगा, उस तरह जैसे आपको किसी ऐसे का इंतज़ार रहता है जिसे आप जानते नहीं, पर महसूस करते हैं।

"आप फिर से वो कर रही हैं," चिंटू ने एक दिन कहा, उसे देखते हुए।

"क्या?"

"घड़ी देखना। दो बजने से पहले।" चिंटू ने कंधे उचकाए, बहुत मासूमियत से। "दीदी, ये अजीब है ना? आप एक ऐसे आदमी का इंतज़ार करती हैं जिसका चेहरा आपने कभी नहीं देखा, और एक ऐसा आदमी जिसका चेहरा आप हर रोज़ देखती हैं, उसको देखकर लाल हो जाती हैं। आपकी love life एक physics का problem है, दीदी। दो बल, अलग अलग दिशाओं में।"

"चिंटू, बोर्ड पर ध्यान दे।"

पर वो सही था, और यही सबसे बुरी बात थी। क्योंकि कबीर अब हर वक़्त साथ था, असली, गर्म, पास। और अजनबी एक आवाज़ थी, एक साया, जो रात के अँधेरे में आता था और सुबह से पहले चला जाता था। एक को वो छू सकती थी। दूसरे को कभी नहीं छू पाएगी। और उसका मन दोनों की तरफ़ खिंचता था, और उसे ख़ुद पर शर्म आती थी।

उस रात, अजनबी ने उन्हें एक पहेली दी।

"मेहक होशियार थी," उसने कहा, उसकी आवाज़ अब ज़्यादा खुली हुई थी, ज़्यादा थकी हुई, जैसे उस रात के बाद उसने सितारा से छुपाना छोड़ दिया हो। "वो जानती थी कि अगर उन्होंने उसे पकड़ा, तो सबूत भी जाएगा। तो उसने उसे एक जगह नहीं रखा। उसने उसे तोड़ दिया, टुकड़ों में, और हर टुकड़ा एक अलग जगह छुपाया, और एक नक़्शा बनाया जो सिर्फ़ वो समझती थी।"

"और आप वो नक़्शा जानते हैं," सितारा ने कहा।

"मैं उसका एक हिस्सा जानता हूँ।" एक चुप्पी। "वो मुझ पर पूरा भरोसा नहीं करती थी। शायद उसने ठीक ही किया। पहला टुकड़ा, सितारा। वो जगह जहाँ वो हर रविवार जाती थी, जहाँ कोई उसे ढूँढता नहीं था। जहाँ शोर इतना था कि कोई फुसफुसाहट सुन नहीं सकता था।"

लाइन कट गई।

अगली सुबह, कबीर के साथ, सितारा ने वो पहेली सुलझाई।

"हर रविवार," कबीर ने कहा, मेहक की एक पुरानी डायरी के पन्ने पलटते हुए, जो उसके पिता ने उसे दी थी, और जिसे वो हफ़्तों से रात रात भर पढ़ रहा था, किसी सुराग़ की तलाश में। "शोर वाली जगह।" उसने रुककर एक entry पर उँगली रखी। "न्यू मार्केट का पुराना किताबों वाला बाज़ार। इतवारी हाट। वहाँ हर रविवार पुरानी किताबें बिकती हैं, सेकंड हैंड। मेहक को किताबें... वो किताबें ख़रीदती थी।"

वो वहाँ गए, उस भीड़ भरे बाज़ार में, जहाँ हज़ारों पुरानी किताबें धूल में पड़ी थीं, और एक किताब वाले बूढ़े ने, जब उन्होंने मेहक की तस्वीर दिखाई, धीरे से सिर हिलाया।

"वो बिटिया," उसने कहा। "हाँ। आती थी। एक किताब हमारे पास छोड़ गई थी, बहुत पहले। कहा था कोई आएगा, तब देना। पर कोई नहीं आया, तो मैंने रख ली।" उसने एक पुरानी, मोटी किताब निकाली, organic chemistry की, और उसके अंदर से एक pen drive गिरी।

सितारा का दिल ज़ोर से धड़का।

उस रात, स्टूडियो में, उन्होंने वो pen drive खोली। और जो उसमें था, उसने उन्हें ठंडा कर दिया।

ये सिर्फ़ एक झूठा टॉपर नहीं था। ये एक पूरा साम्राज्य था, झूठ पर बना। scanned दस्तावेज़, screenshots, recordings। एक screenshot में एक चैट थी, एक पेपर की धुँधली तस्वीर के नीचे लिखा, पच्चीस लाख, आधा advance। नीचे एक मंत्री के बेटे का नाम। वर्धन क्लासेस सालों से परीक्षा के पेपर लीक कर रहा था, उन्हें अमीर बच्चों को बेच रहा था, करोड़ों में। और जो रैंक वो दिखाते थे, "देश के टॉपर," उनमें से आधे झूठे थे, ख़रीदे हुए, बनाए हुए।

पर सबसे नीचे, एक फ़ोल्डर में, कुछ और था।

एक लड़के का नाम। रोहित। दो साल पहले। एक और स्टूडेंट, जिसने यही सब पता लगाया था। जिसकी एक "सड़क हादसे" में मौत हो गई थी। फ़ाइल बंद।

मेहक पहली नहीं थी।

"हे भगवान," कबीर ने धीरे से कहा, स्क्रीन को देखते हुए, और उसका चेहरा सफ़ेद था। "ये एक बार नहीं हुआ। ये... ये इनका तरीक़ा है। कोई पता लगाता है, और फिर वो एक हादसा बन जाता है।"

"और अब हम पता लगा रहे हैं," सितारा ने कहा।

दोनों ने एक दूसरे को देखा, और उस पल में, उनके बीच का खिंचाव और डर एक हो गए, क्योंकि अब ये सिर्फ़ मेहक की कहानी नहीं थी। ये उनकी भी हो सकती थी।

"इसमें सब है," सितारा ने कहा, स्क्रीन की तरफ़ इशारा करते हुए। "धोखा, पैसा, सब। ये वर्धन को जेल भेजने के लिए काफ़ी है।"

"नहीं।" कबीर ने सिर हिलाया, और उसकी आवाज़ भारी थी। "ये धोखे के लिए काफ़ी है। fraud के लिए। पर ये साबित नहीं करता कि उन्होंने मेहक को मारा। ये साबित नहीं करता कि वो ख़ुदकुशी नहीं थी। एक अच्छा वकील कहेगा कि मेहक ने ये सब देखा, और दबाव में आकर ख़ुद... नहीं। हमें वो चाहिए जो उस रात हुआ। हमें क़त्ल का सबूत चाहिए।"

और सितारा को एहसास हुआ कि कबीर सही था। और उसे ये भी एहसास हुआ कि वो आख़िरी सबूत, वो टुकड़ा जो सब कुछ बदल देगा, उनके पास नहीं था।

वो अजनबी के पास था।

अगले दिन, अजनबी ने उन्हें आख़िरी जगह बताई। मेहक के हॉस्टल का एक पुराना स्टोर रूम, जहाँ वो अपना सामान रखती थी।

"वहाँ एक लोहे की अलमारी है," उसने कहा। "सबसे पीछे। उसमें मेहक ने वो रखा था जो उसने उस आख़िरी रात रिकॉर्ड किया। जाइए। पर सावधान रहिएगा।"

रात को, कबीर के साथ, सितारा उस सुनसान हॉस्टल के पिछले हिस्से में गई। स्टोर रूम का ताला टूटा हुआ था। अंदर अँधेरा था, धूल और पुराने काग़ज़ की गंध। और सबसे पीछे, वो लोहे की अलमारी थी।

सितारा ने उसे खोला।

ख़ाली।

बिल्कुल ख़ाली, सिवाय एक चीज़ के। अलमारी के अंदर, एक काग़ज़ चिपका था, और उस पर एक ही लाइन लिखी थी, साफ़, छपी हुई, मेहक की लिखावट में नहीं।

"हमें पता था आप आएँगी।"

और तभी, पीछे, स्टोर रूम का दरवाज़ा बंद हुआ।

सितारा घूमी। दरवाज़े पर वो आदमी खड़ा था, वही चिकना PR वाला, फ़िक्सर, पर अब उसकी मुस्कान नहीं थी। उसके पीछे दो और साये थे, बड़े, चुप।

"नैना जी," उसने कहा, उसी शहद वाली आवाज़ में। "डीडी सर ने कहा था आप होशियार हैं। पर इतनी भी नहीं।"

"कबीर," सितारा ने धीरे से कहा।

"पीछे खिड़की," कबीर ने उतनी ही धीरे से जवाब दिया, उसका हाथ पहले से सितारा की कलाई पर।

जो अगले तीस सेकंड में हुआ, वो सितारा को बाद में टुकड़ों में याद रहा। कबीर का उसे खींचना। एक पुरानी खिड़की का टूटना। काँच। दौड़। पीछे क़दमों की आवाज़, चीख़ें। एक गली, फिर दूसरी, फिर कबीर की गाड़ी, और टायरों की चीख़, और भोपाल की रात उनके पीछे भागती हुई।

जब वो रुके, बहुत दूर, झील के किनारे, तो दोनों हाँफ रहे थे, और सितारा के हाथ से ख़ून बह रहा था जहाँ काँच लगा था, और कबीर ने उसका हाथ अपने हाथों में लिया, काँपते हुए, और उस पल में दोनों को एक ही बात समझ आई।

वो जानते थे। वर्धन के लोग जानते थे कि वो आएँगे। उन्होंने इंतज़ार किया था।

कोई उन्हें बता रहा था।

पर किसने? वो जगह सिर्फ़ तीन लोग जानते थे। सितारा, कबीर, और वो आवाज़ फ़ोन पर। और झील के उस ठंडे किनारे पर, अपने काँपते हाथ को कबीर के हाथों में रखे, सितारा को एक ऐसा ख़याल आया जिसने उसे सबसे ज़्यादा डराया। इन तीन में से, उसे सबसे कम भरोसा किस पर होना चाहिए?

और वो आख़िरी सबूत, क़त्ल का इकलौता सबूत, अब भी एक ऐसे आदमी के पास था जिसका चेहरा सितारा ने कभी नहीं देखा था, जो हर रात ग़ायब हो जाता था, और जिसे वर्धन के लोग ढूँढ रहे थे, उन्हीं की तरह।

और अगर वो उसे पहले ढूँढ लेते, तो सच मेहक के साथ ही दफ़न हो जाता।

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