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Chapter 13 of 13 9 min read

नई सेहर

सो मत जाना by Avni Oberoi

गोली कबीर के कंधे में लगी थी।

सितारा को ये बात अस्पताल की उस ठंडी, सफ़ेद रोशनी में समझ आई, जब डॉक्टर ने कहा कि वो ठीक हो जाएगा। कुछ इंच नीचे, कुछ इंच अंदर, और कहानी अलग होती। पर वो ठीक हो जाएगा।

उस आख़िरी पल में, उस अँधेरे स्टूडियो में, जब फ़िक्सर ने उसकी तरफ़ हाथ उठाया था, कबीर बीच में आ गया था। उसके और गोली के बीच। और सितारा, जो महीनों से इस आदमी से डरती आई थी, इस आदमी पर शक करती आई थी, इस आदमी को अभी कुछ घंटे पहले अपने स्टूडियो से निकाल चुकी थी, उसे समझ आया कि एक इंसान की असलियत उसके लफ़्ज़ों में नहीं होती। वो उन पलों में होती है जब उसके पास सोचने का वक़्त नहीं होता।

वो उसके बिस्तर के पास बैठी रही, सेहर तक।

बाहर, शहर सो नहीं रहा था।

वो आवाज़, जो रात दो बजे एक स्टूडियो से निकली थी, अब हर जगह थी। हर फ़ोन में, हर अख़बार के पहले पन्ने पर, हर चाय की दुकान पर। एक मरी हुई लड़की की आवाज़, और उसके क़ातिल का अपना इक़बाल, अपनी ही ज़बान से, पूरे शहर के सामने।

और इस बार, कोई इसे दबा नहीं सका।

वर्धन के दोस्त, वो ताक़तवर लोग जो सात महीने पहले एक फ़ोन पर सब ठीक कर देते थे, अब उसका फ़ोन नहीं उठा रहे थे। क्योंकि एक चीज़ हर ताक़त से बड़ी होती है, एक ऐसा सच जिसे बहुत सारे लोग एक साथ जान लें। उसे दबाने के लिए आपको पूरे शहर का गला दबाना पड़ेगा, और भोपाल ने उस रात बोलना सीख लिया था।

उस स्टूडियो में गोली चलाने वाला आदमी, वर्धन का वो फ़िक्सर, सुबह होने से पहले हिरासत में था, चिंटू के बचाए हुए उसी backup footage के दम पर। और कुछ ही दिनों में, पहली बार, भोपाल ने वो देखा जो उसने कभी सोचा भी नहीं था। वर्धन क्लासेस का वो बड़ा सा गेट, जिसके नीचे से हर साल हज़ारों बच्चे गुज़रते थे, अब बंद था, उस पर पुलिस की मुहर लगी थी। डीडी सर, जिनकी तस्वीर कभी शहर की हर दीवार पर थी, अब एक FIR में सिर्फ़ एक नाम थे, क़त्ल के एक मुक़दमे में। जिन नेताओं के साथ वो कभी मंच पर बैठते थे, वो अब उन्हें पहचानने से इनकार कर रहे थे। एक भगवान, जिसे शहर ने ख़ुद गढ़ा था, शहर ने ही गिरा दिया।

मेहक तोमर का केस फिर से खुला। इस बार ख़ुदकुशी की फ़ाइल पर नहीं, क़त्ल की फ़ाइल पर। और इस बार, एक गवाह था।

मिश्रा जी ख़ुद थाने गए। किसी ने उन्हें मजबूर नहीं किया। तीस साल की चुप्पी के बाद, उस बूढ़े आदमी ने वो सब बताया जो वो जानते थे, हर कटी कॉल, हर लीक, हर पैसा। उन्होंने कहा कि वो अपनी बेटी की ज़िंदगी के लिए डरते रहे, पर अब वो उस डर के साथ और नहीं जी सकते थे। सितारा को पता चला कि स्टेशन ने, और शहर के कुछ लोगों ने, मिलकर उनकी बेटी के इलाज का ख़र्च उठा लिया था। ताकि सच बोलने की क़ीमत किसी मासूम को न चुकानी पड़े।

ये भी उसी आवाज़ का असर था। जिस शहर ने सुना, वो सिर्फ़ ग़ुस्सा नहीं हुआ। वो जागा।

दो दिन बाद, अर्जुन ने फ़ोन किया।

सितारा उस आवाज़ को कहीं भी पहचान लेती। वही नीची, भारी, थकी हुई आवाज़, जो उसे रात दो बजे एक अजनबी की तरह मिली थी, जिसे उसने साया कहा था, जिससे वो आधी रातों में बात करते करते आधी मोहब्बत कर बैठी थी, एक चेहरे से नहीं, एक आवाज़ से।

"वो सुरक्षित है अब," अर्जुन ने कहा। "तुमने कर दिखाया। जो मैं सात महीने में नहीं कर पाया, तुमने कर दिखाया।"

"हमने," सितारा ने कहा। "तुमने वो पहला फ़ोन किया था। बाक़ी सब उसी से शुरू हुआ।"

एक चुप्पी। और सितारा को एहसास हुआ कि वो चुप्पी कैसी थी। एक अलविदा की।

"मैं भोपाल छोड़ रहा हूँ," अर्जुन ने कहा। "बहुत हो गया छुपना। मेहक चाहती थी कि मैं जिऊँ। तो मैं जीने जा रहा हूँ। उसके लिए।" वो रुका। "नैना, उन रातों में, तुम्हारी आवाज़ अकेली चीज़ थी जो मुझे पागल होने से बचाती थी। मैं ये कभी नहीं भूलूँगा।"

और सितारा ने वो महसूस किया जो वो जानती थी कि आएगा। वो आवाज़, वो साया, जिसके पीछे वो इतने महीने भागी थी, असल में एक टूटे हुए आदमी का दुख था, अपनी खोई मोहब्बत के लिए। वो साया कभी उसका नहीं था। वो हमेशा मेहक का था।

"जाओ, अर्जुन," उसने नरमी से कहा। "जियो। उसके लिए। और अपने लिए भी।"

"तुम्हारा वो प्रोग्रामिंग हेड," अर्जुन ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार एक हल्की मुस्कान थी। "जिसने गोली खाई। वो अच्छा आदमी लगता है।"

सितारा कुछ नहीं बोली। पर उसके चेहरे ने जवाब दे दिया, उस ख़ाली कमरे में भी।

"अलविदा, सितारा।"

"अलविदा, साया।"

और फ़ोन कट गया, और उसके साथ वो सपना भी, जो एक आवाज़ का था। और उसकी जगह कुछ असली रह गया।

वो असली अस्पताल के एक कमरे में था, एक पट्टी बँधे कंधे के साथ, उसका इंतज़ार करता हुआ।

"तो," कबीर ने कहा, जब वो अंदर आई। उसकी आवाज़ अभी भी कमज़ोर थी, पर उसकी आँखों में वो पुरानी सूखी शरारत लौट आई थी। "साया का फ़ोन था?"

"था।"

"और?"

सितारा उसके बिस्तर के पास बैठी। बहुत क़रीब। "और वो अलविदा था।"

कबीर ने उसकी तरफ़ देखा, और उस पल में उसकी सारी अकड़, सारी कॉर्पोरेट दीवार, सब गिर गई, और पीछे सिर्फ़ एक आदमी रह गया जो डरते डरते उम्मीद कर रहा था।

"नैना," उसने कहा। "मैंने तुमसे बहुत कुछ छुपाया। मैं तुम्हें मेहक के बारे में सच नहीं बता पाया, अपने बारे में सच नहीं बता पाया। मैं समझूँगा अगर तुम..."

"कबीर।"

"हाँ?"

"चुप करो।"

और वो झुकी, और उसने उसे चूम लिया, उस सफ़ेद कमरे में, सेहर की पहली रोशनी में, बहुत एहतियात से, उसके ज़ख़्मी कंधे का ध्यान रखते हुए, पर बाक़ी हर चीज़ को छोड़ते हुए। और कबीर ने, उस एक पल के लिए, अपना सारा दर्द भूलकर, उसे वापस चूमा, जैसे वो महीनों से इसी एक पल का इंतज़ार कर रहा हो।

जब वो अलग हुए, तो कबीर मुस्कुरा रहा था।

"मुझे एक बात बताओ," उसने कहा। "क्या ये इसलिए हुआ क्योंकि मैंने गोली खाई? क्योंकि अगर हाँ, तो मैं चिंटू से कहता हूँ कि वो भी एक खा ले।"

सितारा हँस पड़ी, और उस हँसी में सात महीने का सारा बोझ बह गया।

रेडियो सेहर ने नाइट शो बंद नहीं किया।

वो करना चाहते थे, उस रात से पहले। एक नई, सुरक्षित, जवान आवाज़ लाना चाहते थे, कुछ ऐसा जो किसी को परेशान न करे। पर उस रात के बाद, शहर ने फ़ैसला कर लिया। हज़ारों चिट्ठियाँ, लाखों messages, एक ही माँग। आरजे सितारा को मत हटाओ। वो आवाज़ हमारी है।

और management के पास उस शहर के सामने झुकने के अलावा कोई चारा नहीं था जिसने उन्हें फिर से सुनना शुरू किया था।

कुछ हफ़्ते बाद, एक रात, सितारा वापस अपनी कुर्सी पर थी। वही स्टूडियो। वही हेडफ़ोन। वही माइक। पर कुछ बदल गया था। डर की जगह कुछ और था अब। एक मक़सद।

कबीर बाहर काँच के पीछे खड़ा था, उसका कंधा अब ठीक हो रहा था, उसके हाथ में दो कप चाय। चिंटू बोर्ड पर, हमेशा की तरह, कुछ बड़बड़ाता हुआ कि उसकी playlist को कोई इज़्ज़त नहीं देता, उस रात की एक हल्की सी खरोंच अभी भी उसकी कोहनी पर थी, जिसे वो बड़े फ़ख़्र से हर किसी को दिखाता फिरता था।

घड़ी ने रात के दो बजाए।

on air की लाल बत्ती जली, और खिड़की के बाहर, आसमान के किनारे पर, अँधेरा अभी से थोड़ा पतला होने लगा था। सेहर दूर नहीं थी।

और तभी, एक कॉल आई।

सितारा ने उसे उठाया, जैसे उसने हज़ार बार उठाया था। "सेहर तक, मैं सितारा। बोलिए। मैं सुन रही हूँ।"

एक पल की चुप्पी। और फिर एक आवाज़, जवान, काँपती हुई, डरी हुई। एक ऐसी आवाज़ जो सितारा ने पहले भी सुनी थी, बहुत पहले, एक और लड़की में जिसे वो नहीं बचा पाई थी।

"हैलो? दीदी?" लड़की की आवाज़ लड़खड़ाई। "मुझे... मुझे नहीं पता मैं किसे फ़ोन करूँ। मैं बहुत डरी हुई हूँ। कोई है जो... जो मेरा पीछा कर रहा है। और किसी को यक़ीन नहीं हो रहा।"

और सितारा, जो एक बार ऐसी ही एक कॉल को अनसुना कर चुकी थी, इस बार सीधी होकर बैठ गई, और माइक के और क़रीब झुकी, और उसकी आवाज़ नरम और मज़बूत हो गई, एक साथ।

"मैं यहीं हूँ," उसने कहा। "मैं कहीं नहीं जा रही। तुम बस बोलती रहो। पूरी रात, अगर ज़रूरत हो। मैं सुन रही हूँ।"

काँच के पीछे, कबीर ने उसे देखा। और उसने कुछ नहीं कहा, बस अपने होंठ हिलाए, बहुत धीरे, सिर्फ़ उसके लिए, उन दो शब्दों में जो अब उन दोनों के बीच एक वादा बन चुके थे।

सो मत जाना।

सितारा मुस्कुराई।

और सेहर तक, शहर जागता रहा।

1 comment

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Avni Oberoi Verified author · about 2 months ago

Hi, if anyone completed this story please comment!

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