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Chapter 10 of 13

ख़ामोश गवाह

सो मत जाना by Avni Oberoi

सितारा ने उसे ज़मीन पर लिटाया, उसके सिर को अपनी गोद में, और अपनी जैकेट से उसके घाव को दबाया, पर ख़ून रुक नहीं रहा था।

"बात मत करो," उसने कहा। "हम तुम्हें अस्पताल ले जाएँगे।"

"नहीं।" अर्जुन ने उसकी कलाई पकड़ी, उसकी पकड़ कमज़ोर पर ज़िद्दी। "अस्पताल नहीं। वो वहाँ भी पहुँच जाएँगे। पहले सुनिए। आपको पता होना चाहिए। किसी को तो पता होना चाहिए, मेरे मरने से पहले।"

और मिल के उस टूटे हुए अँधेरे में, चाँद की छनती रोशनी में, अर्जुन ने वो कहानी सुनाई जो वो सात महीने से अपने सीने में लिए घूम रहा था।

"हम प्यार करते थे," उसने कहा, और उसके होंठ एक हल्की, दर्द भरी मुस्कान में हिले। "मैं और मेहक। किसी को पता नहीं था। उसके घर वाले बहुत सख़्त थे, और कोचिंग का माहौल... वहाँ प्यार करना मना था, सिर्फ़ रैंक लाना था। तो हम छुपकर मिलते थे। यहीं, इसी मिल में। ये हमारी जगह थी।"

सितारा की आँखें भर आईं। तो इसीलिए। ये जगह।

"एक दिन मेहक ने office में कुछ देख लिया। वो वहाँ part-time काम करती थी, फ़ीस भरने के लिए। उसने पेपर लीक के बारे में जान लिया। उसने मुझे बताया, और हमने मिलकर सबूत इकट्ठा किया। मैं उससे कहता रहा, मेहक, छोड़ दो, ये लोग बहुत बड़े हैं। पर वो..." उसकी आवाज़ टूटी। "वो डरती नहीं थी। वो कहती थी, अगर मैं चुप रही, तो मेरे जैसे हज़ार बच्चे लुटते रहेंगे। वो बहादुर थी, सितारा जी। मुझसे कहीं ज़्यादा बहादुर।"

"फिर क्या हुआ?" सितारा ने धीरे से पूछा, हालाँकि वो जानती थी कि जवाब उसे तोड़ देगा।

"उसने उन्हें चेतावनी दी। सीधे डीडी सर को। उसने सोचा कि वो डर जाएँगे, पीछे हट जाएँगे।" अर्जुन की आँखों से आँसू बहने लगे, चुपचाप। "उस रात हमें यहाँ मिलना था। मैं देर से आया। पंद्रह मिनट। बस पंद्रह मिनट। और जब मैं हॉस्टल के पास पहुँचा, तो मैंने ऊपर देखा। छत पर। दो आदमी, और उनके बीच, वो। और मैंने... मैंने उसकी एक चीख़ सुनी, बहुत छोटी, और फिर..."

वो रुक गया, और सितारा ने महसूस किया कि उसका पूरा शरीर काँप रहा था।

"और फिर कुछ नहीं। फिर बस नीचे, ज़मीन पर। और वो आदमी ऊपर छत पर खड़े, नीचे देखते हुए, बहुत शांति से, जैसे उन्होंने कूड़ा फेंका हो।" उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट बन गई। "मैं भागा नहीं क्योंकि मैं बहादुर नहीं था। मैं भागा क्योंकि मैं डर गया। मैंने अपनी मेहक को मरते देखा, और मैं छुप गया, एक कुत्ते की तरह, और भाग गया। और तब से हर रात, मैं उसकी वो चीख़ सुनता हूँ। हर रात।"

"तुमने भागकर सही किया," सितारा ने कहा, उसके आँसू उसके चेहरे पर बहते हुए। "अगर तुम रुकते, तो वो तुम्हें भी मार देते, और फिर ये सच कभी बाहर न आता। तुम सात महीने से उसके लिए लड़ रहे हो। तुमने उसे नहीं छोड़ा, अर्जुन। तुम मेरे शो पर आए। तुमने उसे जिलाए रखा।"

अर्जुन ने वो पुराना फ़ोन उसकी तरफ़ बढ़ाया, उसका हाथ काँपते हुए। "इसमें... इसमें उस रात की recording है। मेहक ने जब उन्हें चेतावनी दी, उसने सब record कर लिया था, अपने फ़ोन से, और मुझे भेज दिया था, बस सुरक्षा के लिए। उसमें डीडी सर की आवाज़ है, साफ़, कह रहे हैं कि अगर उसने मुँह खोला तो उसका क्या होगा। ये... ये क़त्ल का सबूत है। इसे ले लीजिए। इसे..."

और तभी, बाहर, हेडलाइट की रोशनी मिल की टूटी दीवारों पर पड़ी।

गाड़ियाँ। तीन। दरवाज़े खुलने की आवाज़। क़दम।

"नहीं," अर्जुन ने फुसफुसाया, उसका चेहरा डर से सफ़ेद। "वो आ गए। वो मेरे पीछे आ गए।"

"नैना!" earpiece में कबीर की आवाज़ फटी। "बाहर निकलो! अभी! पीछे की तरफ़!"

पर बहुत देर हो चुकी थी। साये अंदर आ गए, टॉर्च की रोशनी अँधेरे को चीरती हुई, और सबसे आगे वो था, फ़िक्सर, अपनी शहद वाली मुस्कान के बिना।

"अरे अरे," उसने कहा, अर्जुन को ज़मीन पर देखते हुए, सितारा की गोद में। "हमारा भागने वाला चूहा। सात महीने से ढूँढ रहे थे तुझे, बेटा।"

जो आगे हुआ वो तेज़ और बेरहम था। कबीर अँधेरे से निकला, सितारा की तरफ़ झपटा, उसे खींचा। एक आदमी ने अर्जुन को बालों से पकड़ा। फ़ोन सितारा के हाथ से छूटा, ज़मीन पर गिरा, और किसी के पैर के नीचे आ गया। चीख़ें। धक्के। कबीर सितारा को पीछे के टूटे दरवाज़े की तरफ़ धकेल रहा था, और सितारा चिल्ला रही थी, अर्जुन को छोड़ो, पर दो आदमी उसे घसीट रहे थे, अँधेरे की तरफ़, बाहर की तरफ़।

"सितारा जी!" अर्जुन चिल्लाया, अपने आख़िरी दम से, जब वो उसे खींच रहे थे। "recording! स्टेशन! मेहक ने एक copy स्टेशन के archive में डाल दी थी! वो intern थी, उसे system पता था! ढूँढिए उसे! वो उनके हाथ नहीं लगी! आर्काइव में..."

और फिर उसकी आवाज़ अँधेरे में खो गई, एक गाड़ी के दरवाज़े के बंद होने की आवाज़ में, और टायरों की चीख़ में, और सितारा की अपनी चीख़ में।

कबीर ने उसे गाड़ी में खींचा, और वो भाग निकले, और पीछे, मिल के अँधेरे में, फ़िक्सर खड़ा उन्हें जाते देखता रहा, और उसने जाने की कोई कोशिश नहीं की, क्योंकि उसे जल्दी नहीं थी। उसके पास वो था जो वो चाहता था। और बाक़ी सब, उसका चेहरा कह रहा था, बस वक़्त की बात थी।

गाड़ी में, सितारा रो रही थी, काँप रही थी, और कबीर एक हाथ से steering, दूसरा उसके हाथ पर।

"आर्काइव," सितारा ने कहा, अपने आँसुओं के बीच। "उसने कहा recording स्टेशन के archive में है। मेहक ने एक copy वहाँ छुपाई थी।" उसने कबीर को देखा, और उसकी आँखों में, दुख के बीच, उम्मीद की एक चिंगारी जली। "अभी भी एक copy है, कबीर। वो उसे नहीं मिली। हम अभी भी जीत सकते हैं।"

वो सीधे स्टेशन गए, उस रात, सुबह होने से पहले। सितारा बोर्ड के सामने बैठी, और स्टेशन के archive system में घुसी, उन गहरे फ़ोल्डरों में जहाँ सालों का डेटा पड़ा था। उसने मेहक का intern ID ढूँढा। और उसके नीचे, एक छुपा हुआ फ़ोल्डर, बिना नाम का, सात महीने पुराना।

वो वहाँ थी। मेहक की आख़िरी recording। क़त्ल का सबूत। ठीक वहाँ, उसी सिस्टम में जिसे सितारा हर रात इस्तेमाल करती थी।

सितारा की साँस तेज़ हो गई। उन्होंने जीत लिया था। उनके पास सबूत था।

उसका हाथ उस फ़ाइल को खोलने के लिए बढ़ा। और तभी, स्क्रीन के कोने में, एक छोटी सी लाइन ने उसकी नज़र पकड़ी। access log। सिस्टम हर बार रिकॉर्ड करता था कि वो फ़ाइल किसने, कब खोली।

और उस फ़ाइल को आख़िरी बार खोला गया था, आज ही रात। कुछ घंटे पहले। उन्हीं घंटों में जब वो मिल पर थी, और कबीर उसके बग़ल में, उस अँधेरे में, उसका हाथ थामे।

एक keycard से।

सितारा की आँखें उस नाम पर रुकीं। उसके दिमाग़ के बहुत पीछे, एक छोटी सी आवाज़ ने कहा कि ये नामुमकिन है, कि वो तो उसी वक़्त उसके साथ था, कि कुछ और बात है, कुछ ज़रूर छूट रहा है। पर वो आवाज़ बहुत दूर थी, और सदमा बहुत पास, और सितारा बहुत थकी हुई, बहुत डरी हुई, और एक बार फिर एक ऐसे आदमी से धोखा खाई हुई जिस पर उसने भरोसा किया था। उसने वो छोटी आवाज़ नहीं सुनी। उसने बस वो नाम देखा, और उसके अंदर कुछ, जो अभी अभी जुड़ा था, जो अभी अभी पूरा हुआ था, बहुत धीरे धीरे, टुकड़ों में टूटने लगा।

Keycard holder: कबीर मेहरा।

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