अध्याय 2 / 13
दो बजे वाला
सो मत जाना द्वारा Aarohi Malhotra
उस रात सितारा सो नहीं पाई। सुबह स्टेशन पर पता चलता है कि दो बजे वाली कॉल का क्लिप शहर में फैल रहा है, और चिंटू उस नंबर को ट्रेस करने की नाकाम कोशिश करता है। तभी मुंबई से नया Programming Head कबीर मेहरा आ जाता है, एक महीने में नाइट शो बंद करने का फ़रमान लेकर। उनकी पहली टक्कर तीखी और मज़ेदार है। शो बचाने के लिए सितारा चुपके से उस अजनबी के दावे को ढूँढने का फ़ैसला करती है, पर असली वजह उसका अपना अपराधबोध है। अंत में वो स्टेशन का कॉल आर्काइव खोलती है, और आख़िरी रोने वाली लड़की का वक़्त उस रात से मिल जाता है जिसे वो महीनों से याद नहीं करना चाहती।
उस रात सितारा सो नहीं पाई।
वो घर पहुँची, बत्ती बुझाई, और बिस्तर पर लेट गई। और छत को देखती रही। पंखा घूमता रहा, धीरे धीरे, और हर चक्कर के साथ वो आवाज़ लौट आती। भारी, नीची, इत्मीनान वाली।
सो मत जाना, सितारा।
उसने करवट बदली। फिर दूसरी। दो बजे की वो कॉल अब उसके अपने कमरे में थी, उसके साथ लेटी हुई। उसने ख़ुद से कहा कि ये बस एक सनकी आदमी था। शहर में सनकियों की कमी नहीं। रात को रेडियो पर फ़ोन करने वाले आधे लोग या तो अकेले होते हैं, या थोड़े टूटे हुए, या दोनों। ये भी वैसा ही होगा।
पर सनकी लोग धमकी नहीं देते कि उसे ढूँढो। सनकी लोग ये नहीं कहते कि वो ख़ुदकुशी नहीं थी, इस यक़ीन के साथ, जैसे उन्होंने वो रात अपनी आँखों से देखी हो।
सुबह के पाँच बजे, जब खिड़की के पर्दे के पीछे आसमान स्याही से थोड़ा हल्का हुआ, सितारा ने हार मान ली। उसने आँखें बंद नहीं कीं इसलिए कि नींद आ गई थी, बल्कि इसलिए कि थक गई थी जागते जागते।
और फिर भी, सात बजे, वो स्टेशन पहुँच गई।
नाइट शो की होस्ट को सुबह सात बजे स्टेशन पर नहीं होना चाहिए। ये कुछ ऐसा था जैसे उल्लू को दिन में बाज़ार में देख लेना। पर उसे घर में नहीं रहना था। घर में वो आवाज़ थी।
रिसेप्शन पर सिर्फ़ मिश्रा जी थे, स्टेशन के सबसे पुराने आदमी, जो तीस साल से यहाँ थे और हर सुबह सबसे पहले आते थे। उन्होंने चश्मे के ऊपर से सितारा को देखा, एक हल्की मुस्कान दी, और बिना पूछे चाय चढ़ा दी। क्योंकि मिश्रा जी सब जानते थे, हर किसी की चाय, हर किसी का दुख, इस पूरी इमारत की हर साँस।
स्टूडियो की लाइट बंद थी, बोर्ड सोया हुआ। और कोने में, हेडफ़ोन एक कान पर लटकाए, मोबाइल में घुसा हुआ चिंटू बैठा था, जिसकी आँखें सुर्ख़ थीं।
"तू सोया नहीं?" सितारा ने पूछा।
"दीदी, आप सोईं?" उसने बिना देखे कहा। फिर उसने नज़र उठाई, और उसका चेहरा अजीब था, उत्साह और डर के बीच कहीं। "ये देखो।"
उसने फ़ोन घुमाया। एक छोटी सी वीडियो क्लिप, काली स्क्रीन पर बस ऑडियो की लहरें हिलती हुईं, और नीचे कैप्शन: "भोपाल की RJ को रात 2 बजे आया डरावना फ़ोन।"
सितारा की अपनी आवाज़ चली। फिर वो आवाज़। वो ख़ुदकुशी नहीं थी, सितारा।
"चालीस हज़ार व्यूज़," चिंटू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो किसी बाईस साल के लड़के में सबसे ख़तरनाक होती है, उम्मीद। "रात भर में। दीदी, अपने पूरे शो के एक हफ़्ते के व्यूज़ इतने नहीं होते। किसी ने स्ट्रीम से रिकॉर्ड कर के डाल दिया, और अब सब शेयर कर रहे हैं। कमेंट्स पढ़ो, लोग पूछ रहे हैं वो लड़की कौन थी।"
सितारा वीडियो को देखती रही। उसे ये अच्छा नहीं लग रहा था, और वो बता नहीं पा रही थी कि क्यों। एक मरी हुई लड़की, जिसका नाम किसी को नहीं पता, चालीस हज़ार लोगों का मनोरंजन बन गई थी, रात भर में। और इस सब के बीच एक छोटी सी, शर्मनाक आवाज़ उसके अंदर कह रही थी, अच्छा है। शो बच सकता है।
उसे उस आवाज़ से नफ़रत हुई।
"नंबर ट्रेस हुआ?" उसने पूछा।
चिंटू का चेहरा उतर गया। "वही तो problem है।" उसने अपनी कुर्सी घुमाई। "मैंने स्टेशन के सिस्टम में कॉल लॉग खोला। नंबर आया है, पर वो किसी मोबाइल का नहीं है। PCO है। मतलब... वो लाल पीला STD booth, जो अब बचे ही नहीं हैं ज़्यादा।"
"तो कौन सा booth?"
"पुराने शहर में, इतवारा के पास। मैंने सुबह छह बजे उस नंबर पे call back किया।" वो रुका।
"और?"
"एक चचा ने उठाया। चाय वाले। बोले booth तो दो साल से बंद है, बस फ़ोन कनेक्शन चालू है क्योंकि लाइन कटवाना भूल गए। बोले रात को कोई आता होगा, उन्हें नहीं पता। फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं अमरूद मंगवाना चाहता हूँ क्या, उनके भतीजे की ठेली है।" चिंटू ने थके हुए हाथ हवा में उठाए। "मैंने मना कर दिया, दीदी। अमरूद के सीज़न में भी नहीं था मेरा मन।"
बावजूद सब कुछ के, सितारा हँस पड़ी। एक छोटी, थकी हुई हँसी, पर हँसी।
मतलब वो आदमी होशियार था। उसने एक बंद booth का फ़ोन इस्तेमाल किया, जिसका कोई मालिक नहीं, जिसका कोई पता नहीं चलेगा। उसने ये कॉल इस तरह की थी कि कोई उसे ढूँढ न सके। बिल्कुल वैसे जैसे उसने कहा था। कोई उसे ढूँढ नहीं सकता।
ये राहत की बात होनी चाहिए थी। एक अजनबी जो ढूँढा नहीं जा सकता, मतलब एक अजनबी जो ख़तरनाक नहीं। पर सितारा को ये राहत नहीं लगी। ये किसी ऐसे इंसान की तैयारी लगी जो डरा हुआ था, और जिसने डर के साथ जीना सीख लिया था।
"दीदी," चिंटू ने धीरे से कहा। "हम इसे छोड़ दें? पुलिस वाली बात है। हमारा काम गाने बजाना और रात को लोगों को हँसाना है।"
सितारा ने जवाब नहीं दिया, क्योंकि तभी दरवाज़ा खुला।
और जो अंदर आया, वो उस सुबह की हर चीज़ के बिल्कुल उलट था।
सुबह सात बजे का स्टेशन एक नींद से उठा, बिखरा हुआ, चाय की गंध वाला जगह होता है। ये आदमी ऐसा था जैसे किसी और शहर से, किसी और मौसम से सीधे यहाँ रख दिया गया हो। गहरे नीले रंग की क़ीमती जैकेट, बाल करीने से सेट, हाथ में एक पतला सा laptop bag और एक paper cup जिस पर किसी ऐसे cafe का नाम था जो भोपाल में नहीं था। वो शायद पैंतीस का था, पर उसकी आँखों में वो ठंडक थी जो उम्र से नहीं, आदत से आती है।
उसने कमरे पर एक नज़र डाली, जैसे कोई खरीदार किसी पुरानी दुकान पर डालता है। हिसाब लगाती हुई नज़र।
"Radio Sehar?" उसने पूछा, और 'सेहर' को ऐसे बोला जैसे शब्द उसकी जीभ पर ठीक से बैठा ही नहीं।
"जी, और आप?" सितारा ने कहा। वो थकी हुई थी, बिना सोई, बिना चाय के, और अभी अभी एक मरी हुई लड़की और एक बंद booth के बारे में सोच रही थी। उसके पास इस वक़्त नई corporate शक्लों के लिए धैर्य नहीं था।
"कबीर मेहरा।" उसने अपना paper cup मेज़ पर रखा, ठीक उस जगह जहाँ कोई गोल निशान छोड़ता है, और सितारा को बेवजह बुरा लगा। "Programming Head. Head office से।"
चिंटू अपनी कुर्सी पर थोड़ा सीधा हो गया, जैसे कोई बच्चा principal के आने पर होता है।
"आप तो कल आने वाले थे," सितारा ने कहा।
"मैं कभी कभी एक दिन पहले आता हूँ।" कबीर ने हल्की सी, बिना गर्मी वाली मुस्कान दी। "जब चीज़ों को उनके... natural हाल में देखना हो। बिना तैयारी के।" उसने फिर कमरे पर नज़र दौड़ाई, बंद बोर्ड, चाय के गिलास, दीवार पर लगा एक पुराना, मुड़ा हुआ पोस्टर। "और ये काफ़ी natural है।"
सितारा को समझ आ गया कि ये आदमी क्या था। वो उन लोगों में से था जो किसी जगह आते हैं ये तय करने के लिए कि उसे बंद करना है, और फिर ख़ुद को यक़ीन दिलाते हैं कि फ़ैसला उन्होंने नहीं, आँकड़ों ने लिया।
"आप RJ सितारा हैं," उसने कहा। सवाल नहीं था।
"नैना वर्मा," उसने कहा। "सितारा on air के लिए है।"
"मुझे पता है। सेहर तक। रात बारह से तीन।" उसने अपना laptop निकाला, खोला, और कुछ देर तक स्क्रीन को देखता रहा, उँगली से नीचे स्क्रॉल करते हुए, और सितारा को ये देखकर अजीब लगा कि कोई उसके बारह साल के काम को एक स्प्रेडशीट की पंक्तियों में पढ़ रहा था। "आपका slot... मैं सीधी बात करूँ?"
"मैं किसी और तरह की बात की उम्मीद नहीं कर रही।"
"आपका slot station की सबसे महँगी और सबसे कम कमाने वाली जगह है। रात के तीन घंटे, एक RJ, एक board operator, बिजली, और लगभग शून्य ad revenue। हर महीने ये शो station का पैसा खाता है। Head office को ये अच्छा नहीं लगता।" उसने laptop बंद किया। "मेरे पास एक महीना है। एक महीने में या तो ये slot मुनाफ़ा दिखाएगा, या मैं इसे बंद कर दूँगा और इस वक़्त automated music चलाऊँगा। कोई तनख़्वाह नहीं, कोई बिजली का सवाल नहीं, कोई... भावनाएँ नहीं।"
कमरे में कुछ देर के लिए सिर्फ़ पंखे की आवाज़ रही।
"भावनाएँ," सितारा ने दोहराया।
"मेरे data में एक column नहीं है उसका।"
और तब सितारा के अंदर वो थकान, वो बिना सोई रात, वो मरी हुई लड़की, सब मिलकर एक चीज़ बन गई जिसे वो रोक नहीं पाई।
"आपके data में," उसने कहा, अपनी कुर्सी से उठते हुए, "एक column नहीं है उस लड़के का जो कल रात फ़ोन करके रोया क्योंकि उसे लगता है कि अगर उसका पेपर ख़राब हुआ तो उसकी ज़िंदगी ख़त्म है। उसका भी नहीं है जो हर रात फ़ोन करता है सिर्फ़ इसलिए कि उसकी पत्नी मर गई और घर में अब कोई आवाज़ नहीं। और उस औरत का भी नहीं जो रात को इसलिए जागती है क्योंकि उसका बेटा सात समंदर पार है और रात ही वो वक़्त है जब उनका दिन और उसकी रात एक हो जाती है।" उसने साँस ली। "ये लोग ad नहीं देते, मिस्टर मेहरा। पर ये वो लोग हैं जिनके लिए कोई और जागता नहीं। रात बारह से तीन। आपके लिए ये एक महँगा slot है। उनके लिए ये इकलौती जगह है जहाँ कोई सुन रहा है।"
कबीर ने उसे देखा। पहली बार, उसकी नज़र स्क्रीन से हटकर पूरी तरह उस पर थी। और एक पल के लिए, सितारा को लगा कि उस ठंडक के पीछे कुछ हिला।
"ये अच्छा भाषण था," उसने कहा। "सच में। पर भाषण revenue नहीं हैं।" वो दरवाज़े की तरफ़ मुड़ा, फिर रुका, और बिना घूमे बोला। "वैसे... रात दो बजे वाली वो कॉल। जो internet पर चल रही है।"
सितारा का दिल एक धड़कन के लिए रुका।
"पैंतालीस हज़ार व्यूज़, आख़िरी बार जब मैंने देखा," कबीर ने कहा। अब वो घूमा। और उसकी आँखों में वो हिसाब वाली नज़र वापस थी, पर उसके नीचे कुछ और भी था, कुछ जो सितारा पढ़ नहीं पाई। "एक रात में आपके शो ने उतने लोगों तक पहुँच बनाई, जितने आप एक महीने में नहीं बनातीं। तो शायद... भावनाएँ नहीं। पर एक रहस्य? रहस्य चलता है।"
"मतलब?" सितारा ने कहा।
"मतलब," कबीर ने अपना paper cup उठाया, और मेज़ पर वो गोल गीला निशान छोड़कर, "अगर वो आदमी फिर फ़ोन करे, और अगर आपकी ये 'मरी हुई लड़की' वाली कहानी ऐसे ही व्यूज़ लाती रहे, तो मुझे अपने slot वाले फ़ैसले पर... दोबारा सोचना पड़ सकता है। मैं तीस दिन बाद आँकड़े देखूँगा। बस आँकड़े।" वो दरवाज़े पर पहुँचा। "Welcome to the new Radio Sehar, मिस वर्मा।"
और वो चला गया।
चिंटू ने एक लंबी साँस छोड़ी, जैसे वो भी अब तक रुकी हुई थी। "दीदी, ये आदमी... इसके फ़्रिज में भी spreadsheet होगी।"
पर सितारा सुन नहीं रही थी।
वो उस गोल गीले निशान को देख रही थी जो कबीर मेहरा अपने पीछे छोड़ गया था, और सोच रही थी एक ऐसी बात जो उसे डरा रही थी, इसलिए नहीं कि वो ग़लत थी, बल्कि इसलिए कि वो उसे बहुत अच्छी लग रही थी।
कबीर मेहरा ने अभी अभी उसे, बिना जाने, ठीक वो चीज़ दे दी थी जो वो चाहती थी। एक बहाना।
अगर वो उस अजनबी की 'मरी हुई लड़की' को ढूँढती, अगर वो इस कहानी को अपने शो पर चलाती, तो वो दो काम एक साथ करती। वो अपना शो बचाती। और वो जान पाती कि वो लड़की कौन थी।
उसने ख़ुद से कहा कि पहला काम असली था। शो बचाना। बाक़ी सब बाद में।
वो ख़ुद से झूठ बोल रही थी, और उसे ये पता था।
"चिंटू," उसने कहा। "स्टेशन का कॉल आर्काइव कितना पुराना है?"
चिंटू ने पलक झपकाई। "आर्काइव? मतलब recordings? सब save होती हैं, दीदी, सिस्टम में, automatic। पाँच साल पुरानी तक मिल जाएँगी। पर वो कहाँ... आप क्यों...?"
"उसने कहा वो लड़की मेरे शो पे रोई थी। आख़िरी बार। कुछ महीने पहले।" सितारा बोर्ड के सामने बैठ गई, और स्क्रीन जगाई। नीली रोशनी उसके थके हुए चेहरे पर पड़ी। "अगर ये सच है, तो वो कॉल इस सिस्टम में होगी। कहीं न कहीं। उसकी आवाज़ अभी भी यहाँ होगी।"
"दीदी, पिछले कितने महीनों में पता है कितनी लड़कियाँ रोई होंगी आपके शो पे? सैकड़ों।"
"रोई होंगी।" सितारा ने टाइप करना शुरू किया। "पर 'आख़िरी बार' रोने वाली एक ही होगी। जो उसके बाद फिर कभी फ़ोन न करे। जिसकी कोई दूसरी कॉल न हो।"
स्क्रीन पर तारीख़ों की एक लंबी सूची खुली। महीने, दिन, वक़्त, हर कॉल का एक छोटा सा रिकॉर्ड। सितारा ने सात महीने पीछे जाना शुरू किया, धीरे धीरे, रात दर रात स्क्रॉल करते हुए, उन सब रातों से गुज़रते हुए जिनमें उसने हँसाया था, बहलाया था, सुना था।
और फिर उसका हाथ रुक गया।
स्क्रीन पर एक तारीख़ थी। एक वक़्त था। रात के दो बजकर सत्रह मिनट।
सितारा उस तारीख़ को जानती थी। वो उसे बहुत अच्छी तरह जानती थी। ये वो रात नहीं थी जिसे वो भूल गई थी।
ये वो रात थी जिसे वो याद नहीं करना चाहती थी।