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अध्याय 7 / 13

धमकी की रात

सो मत जाना द्वारा Aarohi Malhotra

सितारा घर नहीं गई।

एक पेशेवर आदमी ने, बिना किसी भावना के, उससे कहा था कि सो जाओ, हमेशा के लिए। और उसके बाद घर की चार दीवारों में अकेले बैठना, उस अँधेरे में जिसमें वो गाड़ी कहीं इंतज़ार कर रही थी, सितारा के बस की बात नहीं थी। तो वो स्टूडियो में ही रही, सारी बत्तियाँ जलाकर, और बोर्ड के सामने बैठी रही, और अपने हाथों को काँपने से रोकने की कोशिश करती रही।

उसने चिंटू को नहीं बुलाया। उसने किसी को नहीं बुलाया।

पर सुबह होने से पहले, दरवाज़ा खुला, और कबीर अंदर आया, और वो ऐसे आया जैसे वो दौड़कर आया हो।

"आप ठीक हैं?" उसकी आवाज़ टूटी हुई थी। "चिंटू ने मुझे फ़ोन किया। उसने stream सुनी थी। वो आख़िरी कॉल। उसने मुझे..."

वो रुक गया, सितारा को देखते हुए, उस ख़ाली रोशन कमरे में अकेली बैठी, और उसके चेहरे पर कुछ ऐसा टूट गया जो सितारा ने पहले कभी नहीं देखा था। वो corporate ठंडक, वो दीवार, सब चला गया, और उसकी जगह सिर्फ़ एक आदमी था जो डरा हुआ था।

"मैंने आपसे कहा था," उसने कहा, उसके पास आते हुए। "मैंने आपसे कहा था कि ये लोग कैसे हैं।"

"हाँ, कहा था।" सितारा ने उसे देखा। "और मैंने आपसे एक सवाल पूछा था, मिस्टर मेहरा। दो बार। और आपने दोनों बार जवाब नहीं दिया। तो अब, इस वक़्त, जब एक आदमी मुझे फ़ोन पर मरने को कह चुका है, मैं तीसरी बार पूछ रही हूँ। और इस बार आप मुझे जवाब देंगे।"

वो उसके बहुत क़रीब खड़ी थी अब, और उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर डर से नहीं। ग़ुस्से से।

"आप मेहक को कैसे जानते हैं?"

और कबीर मेहरा ने, बहुत देर बाद, आख़िरकार दीवार गिरा दी।

"वो मेरी बहन थी," उसने कहा।

कमरा बहुत शांत हो गया।

"सौतेली। मेरे पिता की दूसरी शादी से। मैं तेरह-चौदह साल का था जब वो पैदा हुई। हम कभी एक घर में नहीं रहे, कभी ठीक से एक परिवार नहीं बने। मेरी माँ की कड़वाहट, मेरे पिता का अपराधबोध, सब हमारे बीच दीवार बनकर खड़ा रहा।" वो रुका, और उसका गला भर आया। "पर वो... मेहक... वो हार नहीं मानती थी। वो मुझे राखी भेजती थी, हर साल, मुंबई, मेरे flat पर, भले मैं जवाब न दूँ। वो फ़ोन करती थी मेरे birthday पर। मैं ज़्यादातर नहीं उठाता था। मैं busy था। मैं हमेशा busy था।"

सितारा कुछ नहीं बोली। वो जानती थी कि बीच में बोलना नहीं है। ये कहानी सालों से इस आदमी के अंदर दबी थी, और अब वो बाहर आ रही थी, और उसे सिर्फ़ बहना था।

"फिर सात महीने पहले, मुझे एक फ़ोन आया। मेरे पिता का। मेहक... चली गई थी। उन्होंने कहा ख़ुदकुशी। मैं भोपाल आया, अंतिम संस्कार के लिए, और मैंने उसे पहली बार सालों में देखा, और वो एक तस्वीर थी, एक माला के पीछे।" उसकी आवाज़ काँपी। "मैं उसके जीते जी उससे मिलने का वक़्त नहीं निकाल पाया। मैं उसके मरने पर आया।"

"मुझे अफ़सोस है," सितारा ने धीरे से कहा।

"अफ़सोस," कबीर ने दोहराया, एक कड़वी हँसी के साथ। "पर एक बात मुझे चैन नहीं लेने दे रही थी। उसके emergency contact में मेरा नाम था। मेरा। उस भाई का जिसने कभी उसका फ़ोन नहीं उठाया। इस पूरे शहर में, उस अकेली लड़की के पास, संकट में बुलाने के लिए सिर्फ़ एक नाम था, और वो मैं था। और मैं... मैं वहाँ नहीं था।"

सितारा की आँखें भर आईं, क्योंकि उसे ये दर्द पता था। ये बिल्कुल वही दर्द था। दो लोग, एक ही कमरे में, एक ही लड़की को न बचा पाने के बोझ के नीचे।

"मैंने फ़ैसला किया कि मैं सच जानूँगा," कबीर ने कहा, और अब उसकी आवाज़ में पत्थर था। "मैंने अपने connections इस्तेमाल किए। ये station वर्धन के शहर में था, और इसका मालिक मेरी कंपनी का partner था। मैंने ये Programming Head की नौकरी ख़ुद माँगी। मैं slot बंद करने नहीं आया, नैना। मैं अंदर से देखने आया कि इस शहर में मेरी बहन के साथ क्या हुआ। और फिर मैं यहाँ पहुँचा, और मैंने पाया कि एक रेडियो होस्ट पहले से वही ढूँढ रही थी जो मैं ढूँढ रहा था।"

"और आपने मुझे रोकने की कोशिश की।"

"क्योंकि वो मेरी बहन थी, पर आप एक अजनबी हैं!" वो शब्द फूट पड़े। "मेरे पास उसे खोने का हक़ था। आपके पास नहीं। और मैं... मैं ये नहीं देख सकता था कि एक और लड़की, जिसे मैं..." वो रुक गया।

कमरा बहुत छोटा हो गया।

वो दोनों एक दूसरे को देख रहे थे, और हफ़्तों का झूठ, और हफ़्तों का खिंचाव, और एक मरी हुई लड़की का बोझ, सब उस छोटे से कमरे में उनके बीच खड़ा था। कबीर का हाथ उठा, और बहुत धीरे से, उसने सितारा के चेहरे से एक लट हटाई, और उसकी उँगलियाँ उसके गाल पर रुक गईं, और सितारा ने अपनी आँखें बंद नहीं कीं।

"आपने मुझसे झूठ बोला," उसने कहा, बहुत धीरे, उसकी उँगलियों के नीचे। "हफ़्तों। जब मैं आपको अपनी माँ के बारे में बता रही थी, आप जानते थे। आप सब जानते थे, और आप चुप रहे।"

कबीर के पास इसका कोई जवाब नहीं था। कुछ देर वो बस उसे देखता रहा। फिर, बहुत धीरे, उसने कहा।

"मुझे माफ़ कर दीजिए।"

"मैं नहीं जानती कि मैं कर सकती हूँ।" सितारा ने उसका हाथ अपने चेहरे से हटाया, पर उसे छोड़ा नहीं, उसे अपने दोनों हाथों में पकड़े रखा, बीच में, उस दूरी में जो न पास थी न दूर। "पर मैं ये जानती हूँ। अब हम इसे साथ ख़त्म करेंगे। मेहक के लिए। आप और मैं।"

"आप और मैं," कबीर ने दोहराया।

और कुछ देर के लिए, सुबह के उस धुँधलके में, दो टूटे हुए लोग एक दूसरे का हाथ पकड़े खड़े रहे, और किसी ने उस चीज़ को नाम नहीं दिया जो उनके बीच उग रही थी, क्योंकि उसे नाम देना उसे असली बना देता, और असली चीज़ें इस कहानी में टूट जाती थीं।

उस रात, सितारा डरते डरते स्टूडियो आई, ये सोचते हुए कि शायद अजनबी फिर न आए। शायद वो धमकी सच थी। शायद वो जा चुका था, हमेशा के लिए।

ठीक दो बजे, लाइन जली।

"आप ज़िंदा हैं," सितारा ने कहा, और उसकी आवाज़ में इतनी राहत थी कि उसे ख़ुद हैरानी हुई।

"अभी तक," अजनबी ने कहा। उसकी आवाज़ थकी हुई थी, पहले से ज़्यादा डरी हुई। "उन्होंने कल मुझे लगभग ढूँढ लिया था। मुझे जगह बदलनी पड़ी। मैं ज़्यादा देर बात नहीं कर सकता।"

"उन्होंने मुझे धमकी दी।"

"मुझे पता है। मैं सुन रहा था।" एक चुप्पी। "इसीलिए मैं आपको एक बात कहने के लिए जोखिम उठा रहा हूँ। और आप ध्यान से सुनिएगा।"

सितारा रुकी। "बोलिए।"

"वो आदमी जो आपके दफ़्तर में है।" अजनबी की आवाज़ बदल गई, कुछ कठोर हो गई। "वो मुंबई वाला। नया boss। उस पर भरोसा मत करना, सितारा।"

सितारा का दिल ठहर गया। "आप कबीर के बारे में कैसे जानते हैं?"

"मैं बहुत कुछ जानता हूँ। मैं हर वक़्त देख रहा हूँ। और मैं आपको बता रहा हूँ, वो आदमी वो नहीं है जो वो दिखता है। वो यहाँ इस station के लिए नहीं आया।"

"मुझे पता है वो क्यों आया," सितारा ने कहा, थोड़े बचाव में, और उसे ख़ुद पर हैरानी हुई कि वो कबीर का बचाव कर रही थी। "वो मेहक का भाई है। उसने मुझे बता दिया है।"

लाइन पर एक लंबी, अजीब चुप्पी छा गई।

और जब अजनबी फिर बोला, तो उसकी आवाज़ में कुछ नया था। कुछ जो सतर्कता नहीं थी, जो डर नहीं था। कुछ जो दर्द था।

"भाई," उसने कहा, बहुत धीरे, लगभग ख़ुद से। "हाँ। वो उसका भाई था। वो भाई जो कभी नहीं आया। जिसके लिए वो हर रात रोती थी, ये सोचकर कि उसने ऐसा क्या किया कि उसका अपना ख़ून उससे बात नहीं करता।"

सितारा खड़ी रह गई, बोर्ड की रोशनी में, क्योंकि ये कोई गवाह नहीं बोल रहा था। ये कोई ऐसा बोल रहा था जिसने मेहक को रोते देखा था। जिसने उसके आँसू पोंछे थे। जिसे पता था कि वो रात को किसके लिए रोती थी।

"रुकिए," सितारा ने कहा, बहुत धीरे, उसका गला सूखता हुआ। "आपको ये कैसे पता? ये... ये इतनी निजी बात आपको कैसे पता?"

चुप्पी।

"आप उसके कौन थे?"

और लाइन कट गई।

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