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Chapter 1 of 26 13 min read

टूटी नींव

अंदर की बात by Avni Oberoi

कुछ चोरियाँ रात के अँधेरे में होती हैं। ... और कुछ, हज़ारों लोगों के सामने, तालियों की गड़गड़ाहट में।

दस साल पहले। बेंगलुरु।

वर्धान इंडस्ट्रीज़ के काँच के टावर के नीचे, एक विशाल स्क्रीन जगमगा उठी। हज़ारों लोग, सैकड़ों कैमरे, और हवा में गूँजता एक ही नाम। वर्धान। वर्धान। वर्धान।

और उसी भीड़ के किनारे, अपने पापा का हाथ कस कर थामे, एक बारह साल की लड़की खड़ी थी। इशिता। मुँह खुला हुआ, पर हैरत से नहीं। ... पहचान से।

"पापा... वो स्क्रीन पर जो मशीन है ना... वो तो आपकी है। आपकी वाली। ... वो यहाँ कैसे आई?"

किशोर सिन्हा ने कुछ नहीं कहा। उसकी आँखें उस स्क्रीन पर जमी थीं, जहाँ उसकी दस साल की मेहनत, उसका आविष्कार, किसी और के नाम के नीचे जगमगा रहा था।

स्टेज पर खड़े एक चमकते सूट वाले आदमी ने माइक पर ऐलान किया, कि ये चमत्कार वर्धान के इंजीनियरों की सालों की मेहनत का फल है। भीड़ खड़ी हो कर तालियाँ बजाने लगी। ... और किसी ने भी उस अकेले इंसान की तरफ़ नहीं देखा, जो उसी भीड़ में खड़ा टूट रहा था।

"पापा, इन्हें रोकिए! सबको बताइए ना कि ये आपने बनाया है! चलिए स्टेज पर, अभी! मैं भी आपके साथ चलूँगी!"

"बता दिया, बेटा। ... अदालत को बताया। जज को बताया। पूरी दुनिया को चिल्ला-चिल्ला कर बताया।"

"आज ही सुबह फ़ैसला आया, इशिता। ... जज ने कहा, सबूत नाकाफ़ी है। पेटेंट अब वर्धान का है। काग़ज़ पर। क़ानून पर। ... और मैं? मैं अब कोई नहीं।"

और उसी सुबह, शहर के दूसरे कोने में, किशोर सिन्हा की लैब पर ताला जड़ा जा रहा था। जिस कमरे में उसने अपनी पूरी ज़िंदगी बिताई थी, उसकी खिड़कियों पर वर्धान के आदमी सफ़ेद काग़ज़ चिपका रहे थे। ज़ब्त। सील। ख़त्म।

किशोर से रहा नहीं गया। उसने इशिता का हाथ छोड़ा, और भीड़ को चीरता हुआ स्टेज की तरफ़ बढ़ा, चिल्लाते हुए।

"ये मेरा है! ये तकनीक मैंने बनाई है, अपने हाथों से! किशोर सिन्हा! मेरा नाम है किशोर सिन्हा! ये चोरी है! सुन लो सब, ये चोरी है!"

दो गार्ड बिजली की तेज़ी से आए। भीड़ हँसने लगी, किसी ने कहा पागल है, किसी ने फ़ोन उठा कर वीडियो बनाना शुरू कर दिया। ... और जो कभी इस देश का सबसे चमकता आविष्कारक था, वो अपनी ही खोज के जश्न से घसीट कर बाहर फेंक दिया गया, घुटनों के बल, सबके सामने।

बारह साल की इशिता ने ये सब अपनी आँखों से देखा। अपने पापा को ज़मीन पर गिरते देखा। लोगों की हँसी सुनी। और उस एक पल में उसके अंदर कुछ टूटा, जो फिर उम्र भर नहीं जुड़ा।

उस रात, अपने ख़ाली पड़ चुके घर में, जहाँ अब बिजली भी कट चुकी थी, इशिता ने अपने पापा को पहली बार रोते देखा। ... और वो ख़ुद नहीं रोई।

बस उसने एक मोमबत्ती की काँपती रोशनी में अपने पापा के बिखरे काग़ज़ समेटे, उन ब्लूप्रिंट्स को सीने से लगाया, और बहुत धीरे, किसी से नहीं, सिर्फ़ अपने आप से, उसने कहा।

"उन्होंने आपका नाम चुराया है, पापा। सबके सामने। ... मैं वो नाम वापस लाऊँगी। जहाँ से गया है, ठीक वहीं से। उनके अपने घर के अंदर से। ... मेरा वादा।"

उस रात बत्तियाँ बुझ गईं। पर एक बच्ची के अंदर एक चिंगारी जल उठी। एक ऐसी चिंगारी, जिसे शोला बनने में पूरे दस साल लगने वाले थे।


दस साल बाद।

एक छोटे से घर का पिछला कमरा। परदे कस कर खिंचे हुए। मेज़ पर बिखरे काग़ज़, अख़बारों की पीली कतरनें, और बीचोंबीच वर्धान के टावर का एक नक़्शा, जिस पर लाल पेन से एक जगह घेरी हुई थी।

उस घेरे के नीचे लिखा था। लीगल आर्काइव। सीलबंद तहख़ाना।

और उस मेज़ के तीन ओर तीन लोग। एक टूटा हुआ बूढ़ा। एक चौड़ी मुस्कान वाला आदमी। और एक चौबीस साल की लड़की, जिसकी आँखों में अब वो सहमी बच्ची नहीं थी। ... अब वहाँ एक जासूस बैठा था।

"ज़रा देख इसे, किशोर! ... पूरी क्लास में अव्वल। और अब वर्धान की सबसे कठिन इंटर्नशिप में चुनी गई। दस हज़ार बच्चों में से सिर्फ़ चालीस चुने गए। और उन चालीस में हमारी बिटिया।"

"और सुन ले अभी से। वहाँ बड़े लोगों के बीच जा कर हमें भूल मत जाना। ... वरना मैं ख़ुद वर्धान के दफ़्तर आ कर तेरे बॉस से तेरी शिकायत कर दूँगा।"

"चाचा, आप ना...! ... आप जैसा चाचा सिर पर हो, तो कोई किसी को कैसे भूल सकता है।"

रतन चाचा। जिसने बर्बादी के बाद इस टूटे परिवार को अपने कंधों पर उठा लिया था। इशिता की पढ़ाई, उसके पापा की दवाइयाँ, इस घर का किराया, सब। ... उनके लिए वो किसी भगवान से कम नहीं थे, उस अँधेरे वक़्त की अकेली रोशनी। और अभी, इस पल, वो यही समझती थी।

"मुझे... मुझे ये सब अच्छा नहीं लग रहा, रतन। ... वो शेर के मुँह में जा रही है। अगर उन्हें ज़रा भी भनक लग गई कि ये किसकी बेटी है..."

"किसी को कुछ पता नहीं चलेगा, भाई। ... सरनेम बदल दिया है, बैकग्राउंड साफ़ है। वर्धान की फ़ाइलों में किसी आविष्कारक की बेटी है ही नहीं, बस एक होनहार इंटर्न है। ... भरोसा रख। मैंने हर चीज़ पहले से सँभाल ली है।"

"चाचा, आप बस मुझे इतना बता दीजिए कि मुझे अंदर जा कर ठीक क्या ढूँढना है।"

किशोर ने अपने काँपते हाथ से नक़्शे पर घेरी हुई उस जगह पर उँगली रखी। उसकी आवाज़ अचानक तेज़, जुनूनी हो गई।

"वर्धान का लीगल आर्काइव। सबसे निचली मंज़िल। एक सीलबंद कमरा। ... वहीं वो असली काग़ज़ बंद हैं, इशिता। वो अधिग्रहण का दस्तावेज़, जो अदालत में कभी पेश ही नहीं हुआ। वो सबूत, कि मेरी तकनीक चुराई गई थी।"

"बस वो एक फ़ाइल ढूँढनी है तुझे। उसकी तस्वीर खींचनी है। और वहाँ से निकल आना है। ... बस वो एक काग़ज़, और तेरे बाप का नाम फिर से साफ़ हो जाएगा।"

"बस वही एक फ़ाइल, इशिता। ... और उसके सिवा कुछ मत छेड़ना। कोई और फ़ाइल नहीं, कोई और नाम नहीं। जितना कम हाथ लगाएगी, उतनी सुरक्षित रहेगी। समझ रही है ना?"

इशिता ने सिर हिलाया। उसे रतन चाचा की बात में कोई खोट नहीं दिखी, बस सावधानी दिखी, बस प्यार। ... अभी उसे नहीं पता था कि 'कोई और नाम मत छेड़ना' कहने की एक और वजह भी हो सकती है।

"पापा। ... दस साल पहले उन्होंने भरी भीड़ में, तालियों के बीच, आपसे आपका नाम छीना था। ... मैं वो नाम वापस लाऊँगी। उन्हीं के घर के अंदर से।"

वही शब्द, जो एक बारह साल की बच्ची ने कभी मोमबत्ती की रोशनी में कहे थे। ... बस अब वो बच्ची एक हथियार बन चुकी थी।

"मेरी बच्ची जासूस बनने जा रही है। अपने बाप के लिए झूठ की ज़िंदगी जीने जा रही है। ... मैं भी कैसा बाप हूँ।"

"आप दुनिया के सबसे अच्छे बाप हैं। ... और यही मैं उस पूरी कंपनी को साबित करूँगी। चाहे इसके लिए मुझे उनकी हर ईंट से, हर इंसान से झूठ बोलना पड़े।"

उसे नहीं पता था कि उस कमरे में झूठ अकेली वो नहीं बोल रही थी। ... सबसे पुराना, सबसे गहरा झूठ तो ठीक उसके सामने बैठा था। मुस्कुराता हुआ। चाय की चुस्की लेता हुआ।


और फिर आया वर्धान इंडस्ट्रीज़ का वो काँच का दरवाज़ा।

एक ऐसा टावर, जो सुबह की धूप में किसी तनी हुई तलवार की तरह चमकता था। अंदर, इंटर्नशिप का आख़िरी दौर चल रहा था। चालीस बच्चे, एक ही कुर्सी के लिए लड़ते हुए।

और उन सबके बीच, इशिता सिन्हा। सबसे शांत। सबसे मीठी। ... और सबसे ख़तरनाक।

तीन दिन की अग्निपरीक्षा। टेस्ट, पहेलियाँ, रात-रात भर के प्रोजेक्ट, और एक-एक कर के बाहर होते बच्चे। ... दूसरे दिन एक पहेली ने बड़े-बड़ों को हरा दिया। एक पुरानी, आधी-अधूरी मशीन का डिज़ाइन, जिसमें कहीं एक ख़राबी छिपी थी।

इशिता ने एक ही नज़र में उसे ताड़ लिया। क्योंकि वो डिज़ाइन उसने पहले भी देखा था। बरसों पहले। अपने पापा की मेज़ पर।

"ये सर्किट यहाँ से जुड़ना चाहिए, वरना पूरा सिस्टम गरम हो कर बैठ जाएगा...! ... मेरा... मेरा मतलब, शायद। मुझे... मुझे लगता है शायद यहीं कुछ गड़बड़ है।"

एक पल को उसका दिल हलक़ में आ गया। वो ज़रूरत से ज़्यादा जानती हुई बोल गई थी। ... उसने फ़ौरन अपने चेहरे पर वही मासूम, हैरान इंटर्न वाली सूरत ओढ़ ली।

पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। सबको बस इतना दिखा कि एक इंटर्न ने वो पहेली सुलझा दी, जो बाक़ी सब नहीं सुलझा पाए। ... इशिता ने एक लंबी साँस ली। कवर, अभी बचा हुआ था।

आख़िरी दिन, इंटरव्यू पैनल के सामने, एक आख़िरी सवाल आया। ... 'इतनी सारी कंपनियाँ हैं। तुमने वर्धान को ही क्यों चुना?'

"क्योंकि वर्धान ने जो बनाया है, मैं उसे बाहर से देखना नहीं चाहती। ... मैं उसे अंदर से समझना चाहती हूँ। एक-एक पुर्ज़ा, एक-एक फ़ाइल। ठीक वहाँ से, जहाँ से सब कुछ शुरू हुआ था।"

पैनल एक-दूसरे को देख कर मुस्कुराया। उन्हें लगा, कितनी जुनूनी, कितनी वफ़ादार लड़की है। ... उन्हें क्या पता कि वो एक भी झूठ नहीं बोल रही थी। हर शब्द सच था। बस उसका मतलब कोई और था।

उसी शाम, उसी टावर की सबसे ऊपरी मंज़िल पर, एक आदमी उसकी फ़ाइल पढ़ रहा था। चेहरा अँधेरे में डूबा हुआ। बस एक स्क्रीन की नीली रोशनी उस पर पड़ रही थी।

उसने इशिता के जवाब दोबारा पढ़े, फिर तीसरी बार। उसके टेस्ट के नंबर देखे, वो पहेली वाली रिपोर्ट देखी। और फिर, बहुत सोच कर, उसकी फ़ाइल पर एक छोटा सा नोट लिखा।

बस दो शब्द। 'इस पर नज़र रखो।' ... और उसके नीचे, अलग से, उसने इशिता का नाम लिख लिया। जैसे बरसों से किसी को ढूँढते-ढूँढते, आख़िरकार वो मिल गया हो।

और अगली सुबह, इशिता सिन्हा उन चालीस में से उन दस में थी, जिन्हें वर्धान ने अपने घर के अंदर बुला लिया।

एक चमचमाते कॉन्फ्रेंस रूम में, उसके सामने एक काग़ज़ रखा गया। सबसे ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था। गोपनीयता अनुबंध। एन. डी. ए.।

एक ऐसा वादा, कि वो कंपनी का कोई राज़ इन दीवारों के बाहर नहीं ले जाएगी। ... उससे कहा गया, दिल से पढ़ो, और फिर दस्तख़त करो।

इशिता ने वो पूरा काग़ज़ पढ़ा, हर एक लाइन। राज़ चुराना मना था। धोखा देना मना था। जासूसी मना थी। ... और उन सब लाइनों को एक-एक कर के तोड़ने के लिए ही तो वो यहाँ आई थी।

उसने पेन उठाया। और फिर, एक चमकती, गर्म, भरोसे से भरी मुस्कान के साथ, वो मुस्कान जिस पर आगे चल कर पूरी कंपनी आँख मूँद कर यक़ीन करने वाली थी, उसने अपने दस्तख़त कर दिए।

इशिता सिन्हा। इंटर्न। ... और उस एक दस्तख़त के साथ, वर्धान इंडस्ट्रीज़ ने अपने सबसे बड़े दुश्मन को, अपने ही हाथों, अपने घर के सबसे अंदर तक बुला लिया था।


पहला दिन।

गले में लटकता एक नया बैज। दिल ज़ोर से धड़कता हुआ, पर चेहरा झील की तरह शांत। इशिता वर्धान की लॉबी के उन विशाल काँच के दरवाज़ों की तरफ़ बढ़ी।

उसने ख़ुद से कहा, आज से हर मुस्कान एक हथियार है। हर 'जी सर' एक ढाल। ... किसी वर्धान पर भरोसा मत करना, इशिता। किसी वर्धान से मत जुड़ना। वो दुश्मन हैं। बस दुश्मन।

वो उन दरवाज़ों से बस कुछ ही क़दम दूर थी, जब पीछे से एक शांत, गर्म आवाज़ ने उसे रोका।

"एक मिनट। ... हाँ, तुम्हीं। नई इंटर्न।"

इशिता रुकी। धीरे से पलटी। सामने एक आदमी खड़ा था। तीस के आसपास। कपड़े महँगे, पर सादे। आँखों में वो अजीब सुकून, जो सिर्फ़ उनके पास होता है जिन्हें कभी किसी चीज़ के लिए लड़ना नहीं पड़ा।

एक वर्धान। उसे बिना कुछ पूछे पता चल गया। ये इसी ख़ानदान का कोई था। दुश्मन के उसी ख़ून का।

"तुम इशिता हो ना? इस साल की नई इंटर्न बैच में। ... मैंने तुम्हारी फ़ाइल पढ़ी है। एक बार नहीं। कई बार।"

इशिता के अंदर एक ठंडी लहर दौड़ गई। मेरी फ़ाइल? ये कौन है, जो उसे कई बार पढ़ चुका है? ... पर उसके चेहरे पर वही इंटर्न वाली मुस्कान टिकी रही, एक इंच भी नहीं हिली।

"जी, इशिता ही हूँ। ... और... आप?"

उस आदमी ने हाथ आगे बढ़ाया। और मुस्कुराया। एक ऐसी मुस्कान, जिसमें कोई चाल नहीं थी, कोई घमंड नहीं। सिर्फ़ सच्ची, सीधी दिलचस्पी।

"आदित्य। ... आदित्य वर्धान।"

वो नाम इशिता के कानों में किसी घंटे की तरह गूँजा। वर्धान। वही नाम, जिससे वो पूरे दस साल नफ़रत करती आई थी। और अब उसी ख़ानदान का एक हाथ, खुला, उसकी तरफ़ बढ़ा हुआ था।

एक पल की हिचक। फिर इशिता ने वो हाथ थाम लिया। गर्म। मज़बूत। भरोसे से भरा। ... और उसका अपना हाथ, बर्फ़ की तरह ठंडा।

"पिछले दो साल से, इशिता, मैं एक ख़ास टीम के लिए किसी को ढूँढ रहा हूँ। कोई ऐसा, जो वो देख सके, जो बाक़ी सबकी नज़रों से छूट जाता है।"

"और तुम्हारी फ़ाइल पढ़ने के बाद... तीन बार पढ़ने के बाद...! ... मुझे लगता है, मैं पिछले दो साल से ठीक तुम्हारे जैसे किसी को ही ढूँढ रहा था।"

इशिता की मुस्कान अपनी जगह जमी रही। पर उसके अंदर, हर एक चीज़ एक पल को थम गई।

क्योंकि उसे पता था कि इन शब्दों का असली मतलब क्या है। वर्धान का वारिस। इस पूरी कंपनी में शायद वो अकेला इंसान, जो उस पर सच में यक़ीन करता। और उसने अभी-अभी, अपने ही हाथों, अपनी सबसे बड़ी दुश्मन को अपने सबसे क़रीब खींच लिया था।

और ठीक यही एक चीज़ थी, जो इशिता सिन्हा किसी भी क़ीमत पर नहीं चाहती थी। कि इस पूरे घर में से कोई एक, उसे सच में देख ले।

जंग अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुई थी। ... और दुश्मन पहले ही, मुस्कुराते हुए, उसका हाथ थाम चुका था।

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