Chapter 21 of 26 9 min read
टूटा भरोसा
आदित्य इशिता को टीम और लैब से बेदख़ल कर देता है, नकुल उसी दोपहर स्कंकवर्क्स को बंद कराने और आदित्य को बदनाम करने की चाल चला देता है, और देविका उसकी जगह चुपचाप भर लेती है। भाग जाने के पापा के अनुरोध को ठुकरा कर इशिता तय करती है कि अगर आदित्य उसकी बात नहीं सुनेगा, तो वो अपना सबूत सीधे चेयरमैन कैलाश वर्धान के पास ले जाएगी, और रात के उस पहर उनके फ़ार्महाउस के दरवाज़े पर दस्तक देती है।
कमरे में वो ख़ामोशी अब भी लटकी हुई थी, जो किसी भी शब्द से ज़्यादा साफ़ बोल चुकी थी। ... आदित्य वहीं खड़ा रहा, उसकी आँखें इशिता पर टिकी, इंतज़ार करता हुआ कि शायद अभी, इसी पल, वो कह दे कि ये सब ग़लत है।
"आदित्य... मैं ये बता सकती हूँ, पर..." ... "पर तुम्हें अभी पूरी बात नहीं बता सकती। यहाँ नहीं।"
उस "अभी नहीं" ने वो काम कर दिया, जो घंटे भर का सबूत नहीं कर पाया था। ... आदित्य का चेहरा किसी और चीज़ में बदल गया, ठंडा, सपाट, वो चेहरा जो बोर्ड मीटिंगों में उसने कभी नहीं दिखाया था, आज इशिता के लिए बचा कर रखा था।
"आदित्य, प्लीज़, मुझे बस थोड़ा वक़्त चाहिए, बस एक शाम, मैं सब समझा दूँगी..." ... "तुम मुझे जानते हो। तुमने मुझे नौ महीने से देखा है।"
"मैंने जिसे नौ महीने देखा, वो शायद कभी थी ही नहीं।" ... "बाहर जाओ, इशिता। अपना बैज मेज़ पर रखो। अभी। और इस लैब में, इस टीम में, दोबारा मत आना।"
इशिता ने वो बैज उतारा, जो आदित्य ने उसे भरोसे की निशानी की तरह पहनाया था, महीनों पहले, एक और कमरे में, एक और आदित्य के हाथों। ... उसने उसे मेज़ पर रखा, और वो हल्की सी आवाज़ पूरे कमरे में उससे भी ज़्यादा ज़ोर से गूँजी, जितना किसी चीख़ से गूँजती।
"आख़िरकार। मुझे लगने लगा था कि इस कंपनी में सच बोलने वाला कोई बचा ही नहीं।" ... "उम्मीद है अब स्कंकवर्क्स नाम की ये मज़ाक़ भी बंद हो जाएगी, आदित्य। तेरी शर्मिंदगी बहुत हो चुकी।"
"चुप रह, नकुल।" ... "तेरी जीत का जश्न बाद में मनाना। अभी मुझे बस ये कमरा ख़ाली चाहिए।"
इशिता ने कमरे से बाहर निकलते हुए एक बार पीछे मुड़कर देखा। आदित्य ने नज़रें नहीं मिलाईं। ... उसने सोचा था पकड़े जाने का डर सबसे बुरा होगा। उसे नहीं पता था कि उससे बुरा एक ऐसे आदमी की आँखों में देखना है, जिसने कभी उसे पूरी तरह देखा था, और अब देखना बंद कर दिया है।
टीम धीरे-धीरे कमरे से निकल गई, नकुल भी आख़िरकार जीत का स्वाद लिए हुए बाहर चला गया, और आदित्य अकेला रह गया एक ख़ाली कॉन्फ़्रेंस रूम में, मेज़ पर पड़े उस बैज के सामने। ... उसने वो बैज उठाया, हाथ में तौला, और उसे वही पुराना दर्द याद आया, रोहन का, वो भाई जिसे वो कभी बचा नहीं पाया था। इस बार भी उसने किसी को बचाने की कोशिश की थी, अपनी टीम में, अपने भरोसे में जगह देकर, और इस बार भी वो नाकाम रहा था।
दोपहर होते होते नकुल ने बोर्ड को एक इमरजेंसी मीटिंग के लिए बुला लिया था, "सुरक्षा उल्लंघन" के नाम पर, फ़ीनिक्स प्रोजेक्ट को फ़ौरन बंद करने और आदित्य की निगरानी सीधे अपने हाथ में लेने की माँग के साथ। ... जो काम नकुल दो साल में नहीं कर पाया था, एक जासूस के एक झूठ ने उसे एक दोपहर में दे दिया।
"आदित्य ने अपनी मर्ज़ी से एक अनवेरिफ़ाइड इंटर्न को कंपनी के सबसे संवेदनशील प्रोजेक्ट में डाला, बिना बोर्ड को बताए।" ... "अगर बोर्ड आज फ़ैसला नहीं लेता, तो अगली बार जो सेंध लगेगी, वो शायद फ़ीनिक्स से भी महँगी पड़ेगी।"
बोर्ड ने फ़ीनिक्स को फ़ौरन बंद तो नहीं किया, पर उसे "अनिश्चितकालीन समीक्षा" पर डाल दिया, जो असल में वही बात थी, बस धीमी मौत। ... आदित्य अपने केबिन में अकेला बैठा रहा, दरवाज़ा बंद, फ़ोन साइलेंट, उस दिन की सबसे बड़ी जीत और सबसे बड़ी हार एक ही सुबह में समेटे हुए।
उसी शाम देविका मलिक आदित्य के केबिन में दाख़िल हुई, वैसे ही जैसे वो हमेशा से वहाँ की हो, इशिता की जगह पर नहीं बैठी, पर उस जगह के बिल्कुल क़रीब। ... उसने आदित्य के कंधे पर हाथ रखा, नरमी से, "मैं जानती थी वो लड़की ठीक नहीं लगती थी शुरू से। तुम अकेले नहीं हो, आदित्य। मैं यहीं हूँ।"
उसी इमारत में, एक और केबिन में, ख़ुराना ने बंद दरवाज़े के पीछे एक गहरी साँस ली, वो पहली साँस जो उसने हफ़्तों में चैन से ली थी। ... जिस जाँच से उसका अपना दस साल पुराना गुनाह खुलने का डर था, वो जाँच आज एक इंटर्न के नाम पर बंद हो गई थी, और इससे बेहतर कोई ख़बर उसे इस हफ़्ते नहीं मिल सकती थी।
गलियारों में स्कंकवर्क्स टीम इशिता की चर्चा करती रही, कोई हैरान, कोई ग़ुस्से में, और रीमा, जिसने उसे अपनी पहली सच्ची दोस्त माना था, चुपचाप एक तरफ़ खड़ी रही, ये समझ न पाते हुए कि दोस्ती में यक़ीन करे या सबूतों में। ... इशिता ने वो देखा नहीं, पर उसे पता था, वो देखे बिना भी।
नीचे इंटर्न बे की खिड़की से, अपना पुराना बैज-लेस पहचान-पत्र हाथ में लिए, इशिता ने वो सब दूर से देखा। एक दोपहर में उसने प्रेमी खोया, टीम खोई, और वो जगह भी जिसे वो महीनों से घर कहने लगी थी। ... पर उसके बैग में अब भी वो लिफ़ाफ़ा था, सह-मालिकाना दस्तावेज़, सर्वोदय ट्रेडिंग के काग़ज़, और वो सच जो अब भी दबा हुआ था।
उस रात किशोर का फ़ोन आया, काँपती आवाज़ में वही पुरानी गुहार। ... "बेटा, भाग आ, अब बहुत हो गया, अब जान बचा।" इशिता ने फ़ोन कान से लगाए रखा, और एक पल के लिए, सच में, भागने का ख़याल मीठा लगा।
"पापा... अगर मैं अभी भाग गई, तो जो सच हमने इतनी मुश्किल से पाया, वो हमेशा के लिए दब जाएगा।" ... "आपने मुझे इसलिए नहीं भेजा था कि मैं डर कर भाग जाऊँ, पापा। आपने मुझे इसलिए भेजा था कि मैं सच को घर वापस लाऊँ। मैं अब आधे रास्ते से नहीं लौटूँगी।"
फ़ोन रखने के बाद इशिता ने वो लिफ़ाफ़ा फिर से खोला, सह-मालिकाना दस्तावेज़, दो दस्तख़त, एक तारीख़। ... आदित्य ने उसे निकाल दिया था, टीम ने उसे बाहर कर दिया था, पर ये काग़ज़ अब भी उसके हाथ में था, और ये काग़ज़ झूठ नहीं बोलता था।
उसके फ़ोन में आदित्य का एक पुराना मैसेज अब भी पड़ा था, हफ़्तों पहले भेजा गया, "मैंने तुम्हें इसलिए चुना क्योंकि तुम वो देखती हो जो बाक़ी सब मिस कर देते हैं।" ... उसने वो मैसेज मिटाया नहीं। उसने बस फ़ोन बंद किया, और उठ खड़ी हुई।
देर रात जुगनू चुपचाप उसके पुराने इंटर्न बे में आया, कोई चाय नहीं, कोई गप नहीं, बस एक पर्ची। ... "मैडम जी, मुझे नहीं पता आपने क्या किया, क्या नहीं किया। मुझे बस इतना पता है, आप वो नहीं जो नकुल सर बता रहे हैं।"
"बड़े साहब, कैलाश जी, आज बोर्ड मीटिंग में नहीं आए। तबीयत का बहाना बना कर अपने फ़ार्महाउस चले गए, अकेले, कोई गार्ड नहीं, सिर्फ़ ड्राइवर।" ... "पता चाहिए तो बता दूँ, पर मैडम जी... वहाँ जाना ठीक होगा?"
इशिता ने वो पता ले लिया। आदित्य ने उसे सुनने से मना कर दिया था, टीम ने उसे बाहर कर दिया था, बोर्ड नकुल की मुट्ठी में जा रहा था। ... पर एक आदमी अब भी बचा था जो ख़ुराना के ऊपर खड़ा था, जिसके एक फ़ैसले से पूरी कंपनी हिल सकती थी, वही आदमी जिसने तीस साल पहले उस पहली चोरी से मुनाफ़ा कमाया था। कैलाश वर्धान।
उसने वो लिफ़ाफ़ा बैग में सँभाल कर रखा, अपना कोट उठाया, और उस रात पहली बार बिना किसी योजना के, सिर्फ़ एक ठान के साथ बाहर निकली। ... अगर आदित्य उसकी बात नहीं सुनेगा, तो वो उस आदमी के पास जाएगी जो उसकी बात सुनने से इनकार नहीं कर सकता, चाहे वो उसे पसंद करे या नहीं।
शहर के बाहर, पेड़ों में छुपा वर्धान परिवार का पुराना फ़ार्महाउस रात के उस पहर सुनसान पड़ा था, सिर्फ़ एक खिड़की में बत्ती जल रही थी। ... इशिता गेट के बाहर उतरी, लिफ़ाफ़ा सीने से लगाए, बिना किसी योजना के कि अंदर क्या कहेगी, बस ये जानते हुए कि अब पीछे मुड़ना उसे मंज़ूर नहीं।
उसने गेट की घंटी बजाई। एक बूढ़ा चौकीदार उसे देखकर हिचकिचाया, फिर अंदर ख़बर करने चला गया। ... कुछ पल बाद बरामदे की बत्ती जली, और भीतर से क़दमों की आवाज़ आई, धीमी, भारी, किसी बुज़ुर्ग आदमी की चाल।
दरवाज़ा खुला। सामने कैलाश वर्धान खड़े थे, ड्रेसिंग गाउन में, चेहरे पर नींद नहीं, कुछ और था, जैसे वो किसी का इंतज़ार ही कर रहे हों। ... उन्होंने इशिता को ऊपर से नीचे तक देखा, उसके हाथ में दबे उस पुराने, पीले पड़ चुके लिफ़ाफ़े पर नज़र टिकी रही एक पल ज़्यादा, फिर उनके चेहरे पर कुछ ऐसा उतरा जो डर नहीं था, राहत जैसा कुछ था।
उनके कंधे के पीछे, भीतर के गलियारे की दीवार पर, इशिता को वर्धान ख़ानदान की तीन पीढ़ियों की तस्वीरें दिखीं, हर चेहरा गर्व से भरा, हर चेहरा कुछ छुपाए हुए। ... उन तस्वीरों के बीच कहीं किशोर सिन्हा का नाम नहीं था, पर उन्हीं की वजह से वो नाम मिट गया था।
"इतनी रात को वर्धान परिवार के दरवाज़े पर... और वो भी वही इंटर्न, जिसे आज दोपहर मेरे बेटे ने कंपनी से निकाला।" ... "अंदर आ जाओ, बेटा। मुझे लगता है मैं तीस साल से किसी के इस दरवाज़े पर आने का इंतज़ार कर रहा था।"
इशिता ने उस दरवाज़े के अंदर क़दम रखा, ये न जानते हुए कि वो किसी उद्धारकर्ता के घर में जा रही है, या किसी और, गहरे जाल में। ... दरवाज़ा उसके पीछे बंद हो गया, और रात उसी तरह ख़ामोश रही, जैसे उसे भी जवाब का इंतज़ार हो।
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