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अध्याय 16 / 26 पढ़ने में 9 मिनट

पुरानी फ़ाइल

अंदर की बात द्वारा Avni Oberoi

इंटर्न बे का दरवाज़ा लगभग टूटते-टूटते बचा, जब जुगनू भागते हुए अंदर घुसा, हाथ में चाय की ट्रे डगमगाती, साँस फूली हुई। ... उसकी आँखों में वो चमक थी जो हमेशा किसी बड़ी ख़बर से पहले आती थी, आधी घबराई, आधी रोमांचित।

"इशिता, तुमने सुना? मुझे तो लगा था शायद तुमने कैंटीन से एक्स्ट्रा समोसे उठाए होंगे, पर नहीं, बात उससे कहीं बड़ी है।" ... "ख़ुराना सर ने ख़ुद नकुल भैया को बुलाकर हर इंटर्न की पूरी फ़ाइल माँगी है, तीन महीने का हर बैज, हर दरवाज़ा।"

"मेरा नाम इसमें कहाँ से आया, जुगनू भैया? मैंने क्या किया, चाय के पैसे नहीं दिए?" ... "शायद कोई बजट का मामला होगा, हम इंटर्न लोग तो रोज़ काग़ज़ बर्बाद करते हैं।"

"बजट का मामला होता तो अकाउंट्स वाले पूछते, इशिता, ये ख़ुद ख़ुराना सर ने कहा है। और... तुम्हारा नाम सबसे ऊपर रखा गया है।" ... "आज शाम ख़ुद मिलना चाहते हैं तुमसे। मुझे नहीं पता क्या चल रहा है, पर मुझे अच्छा नहीं लग रहा। सम्भल के रहना, हाँ?"

इशिता ने जुगनू को मुस्कुरा कर टाल दिया, चाय की ट्रे से एक कप उठाते हुए, जैसे ये कोई मामूली बात हो। ... पर अंदर ही अंदर उसने हिसाब लगा लिया, ख़ुराना ने कोई आम जाँच नहीं बिठाई थी, उसने अपने ही केबिन से निकलती एक इंटर्न को देखा था, और अब पूरी जाँच अपने हाथ में ले चुका था। कल तक वो एक शक थी, आज शाम से वो एक तलाश बन चुकी थी।

लैब में आदित्य को उसकी घबराहट पहली नज़र में ही दिख गई, वो घबराहट जो वो हर सुबह मुस्कान के पीछे छुपाना सीख चुकी थी, पर आज मुस्कान थोड़ी देर से आई, और थोड़ी कम टिकी। ... उसने अपना लैपटॉप बंद किया और उसकी मेज़ की तरफ़ खिंचा चला आया।

"तुम आज सुबह से कहीं और हो, इशिता। लैब में हो, पर हो नहीं।" ... "जो भी चल रहा है, मुझे नहीं बताना चाहती तो मत बताओ, पर अगर मैं कुछ कर सकता हूँ, कुछ भी, तो बताना। वादा है।"

"बस... मेरे पापा..." ... "...मेरे पेपर्स, आदित्य। पेटेंट फ़ॉर्म का काम अटका पड़ा है, और ख़ुराना सर की टीम आज शाम मुझसे मिलना चाहती है। बस थोड़ा थका हुआ महसूस कर रही हूँ।"

आदित्य को नहीं पता था कि वो शब्द कितने पास से गुज़रा था, उसे बस इतना दिखा कि उसकी आँखों में कुछ टूटा और तुरंत सम्भल गया। ... उसने बिना सोचे वही किया जो वो हमेशा करता था।

"ख़ुराना सर से मिलना है? मैं साथ चलूँ? स्कंकवर्क्स की कोई भी बात हो, वो मेरी टीम है, मेरी ज़िम्मेदारी।" ... "तुम्हें अकेले उस कमरे में जाने की ज़रूरत नहीं, इशिता। कभी नहीं।"

"नहीं आदित्य, ये मेरा काम है, मुझे ख़ुद सम्भालना है।" ... "तुम्हारा वहाँ आना उल्टा शक पैदा करेगा। भरोसा रखो, मैं ठीक निकल आऊँगी।"

"ठीक है... पर वादा करो, अगर कभी ये बोझ बहुत भारी हो जाए, तो मुझे बताओगी सबसे पहले, मुझे नहीं तो कम से कम ख़ुद को।" ... "जब भी कोई मुझे कम आँकता था, बस एक भरोसे ने मुझे खड़ा रखा। तुम्हारा भी कोई ऐसा भरोसा हो, बस यही चाहता हूँ।"

"है, आदित्य। एक भरोसा है।" ... "बस... कभी-कभी उसे कहना उतना आसान नहीं होता जितना उसे महसूस करना।"

और उसे पता था कि ये इनकार भी एक तरह का झूठ था, क्योंकि जिस भरोसे की बुनियाद पर वो आज ख़ुद उस कमरे में जाने वाली थी, वो भरोसा भी उसी आदमी का दिया हुआ था जिसे वो हर रोज़ धोखा दे रही थी। ... शाम धीरे-धीरे उतरी, और साढ़े छह बजते-बजते इशिता तीसवीं मंज़िल के उसी भारी दरवाज़े के सामने खड़ी थी, जिससे वो कुछ घंटे पहले चोरी-चोरी बाहर निकली थी।

अंदर ख़ुराना अपनी मेज़ के पीछे बैठे थे, दो कप चाय पहले से रखी हुई, मानो ये कोई पूछताछ नहीं, एक शाम की गुफ़्तगू हो। ... उन्होंने कुर्सी की तरफ़ इशारा किया, मुस्कुराते हुए, वो मुस्कान जो कभी आँखों तक नहीं पहुँचती थी।

"बैठिए, इशिता जी। मैंने सुना है आप बहुत होशियार हैं, आदित्य की टीम की जान।" ... "बस एक छोटी सी बात पूछनी थी, आज दोपहर आप मेरे केबिन में क्या ढूँढ रही थीं?"

"जी सर, मैं आपकी सहायिका से बताई गई अलमारी से पुराने पेटेंट फ़ॉर्म ले रही थी, लीगल हैंडओवर के लिए। आदित्य सर ने ही भेजा था।"

"दिलचस्प बात ये है कि पिछले तीन महीनों में आपका बैज लीगल फ़्लोर के आस-पास बारह बार दर्ज हुआ है, ज़्यादातर उन घंटों में जब कोई सहायक मौजूद नहीं होता।" ... "पेटेंट फ़ॉर्म के लिए बारह बार, इशिता जी? आप में बहुत लगन है।"

"स्कंकवर्क्स पुरानी तकनीक की नींव पर बना है, सर, हर पुराना पेटेंट फ़ॉर्म काम आता है। आदित्य सर से पूछ लीजिए, हर बार का काम रिकॉर्ड में दर्ज है।" ... "अगर कोई शक है तो बताइए क्या ढूँढ रहे हैं, मैं ख़ुद मदद कर दूँगी।"

"मदद... दिलचस्प शब्द है। ज़्यादातर लोग जो कुछ छुपा रहे होते हैं, वो मदद की पेशकश नहीं करते, इशिता जी।" ... "आप घबराई हुई नहीं लगतीं। ये अच्छी बात है, या बुरी, मैं अभी तय नहीं कर पाया।"

"मुझे नहीं पता आपको क्या दिखेगा, सर। मैं बस अपना काम करती हूँ, और उसमें घबराने लायक कुछ नहीं है।"

तभी ख़ुराना की मेज़ पर फ़ोन बज उठा, स्क्रीन पर एक नाम जो उन्हें तुरंत खड़ा कर गया, और वो माफ़ी माँगते हुए बालकनी की तरफ़ कुछ क़दम बढ़ गए, फ़ोन कान से लगाए, आवाज़ धीमी करते हुए। ... उनकी मेज़ पर लैपटॉप की स्क्रीन खुली पड़ी थी, एक ईमेल विंडो पर, और इशिता की नज़र, एक जासूस की तरह प्रशिक्षित, एक पल में पूरा पन्ना पढ़ गई।

पहली लाइन में एक कोड जैसा नाम था, 'आर.एस., मासिक क़िस्त, जुलाई', वही दो अक्षर जो डायरी में दस बरस तक दोहराए गए थे, अब भी हर महीने एक भुगतान की तरह ज़िंदा। ... और उसके ठीक नीचे एक दूसरी लाइन, इसी हफ़्ते की तारीख़ लिए हुए, एक कोडनाम जो इशिता ने पहले कभी नहीं देखा था, 'प्रोजेक्ट फ़ीनिक्स, अंदरूनी साझेदार से पुष्टि, डिलीवरी अगले महीने।'

"प्रोजेक्ट फ़ीनिक्स..." ... "ये नाम... मैंने ये कहीं देखा है।"

उसने फ़ोन झुकाया और एक तस्वीर खींच ली, ठीक उसी सेकंड जब बालकनी में ख़ुराना की आवाज़ ऊँची होकर वापस शांत हुई, फ़ोन जेब में गया, क़दम मेज़ की तरफ़ मुड़े। ... इशिता ने लैपटॉप से नज़र हटाई और चाय का कप उठा लिया, जैसे वो कब से बस वही कर रही थी।

"माफ़ी, इशिता जी, कहाँ थे हम, हाँ, पेटेंट फ़ॉर्म।" ... "आप बहुत होशियार हैं। पर याद रखिए, इस टावर में हर दरवाज़े के पीछे कोई ना कोई नज़र रखता है। कोई भी दरवाज़ा अकेला नहीं होता।"

इशिता ने शुक्रिया कहा और दरवाज़ा पार किया, गलियारे के मोड़ तक पहुँचते-पहुँचते ख़ुद को दीवार से टिका लिया, फ़ोन जेब में जल रहे उस एक स्क्रीनशॉट के साथ, जिसका वज़न उसकी जेब से कहीं ज़्यादा भारी था। ... तभी फ़ोन पर जुगनू का एक मैसेज चमका, 'ख़ुराना सर से मिल के आई? सब ठीक? मेरे पास चाय रखी है, आ जाना।' उसने जवाब में सिर्फ़ एक मुस्कुराता हुआ इमोजी भेजा, क्योंकि सच लिखने के लिए उसके पास ना वक़्त था ना हिम्मत।

रात को अपने कमरे में, दरवाज़ा बंद, इशिता ने वो तस्वीर फिर से खोली, ज़ूम करके, हर शब्द को अलग से पढ़ते हुए, जैसे कोई कोड तोड़ती हो। ... 'आर.एस., मासिक क़िस्त' का मतलब अब उसे साफ़ पता था, चाचा रतन आज भी हर महीने ख़ुराना से पैसे ले रहे थे, दस साल पुराना सौदा अब भी किसी ना किसी शक्ल में ज़िंदा था।

पर 'प्रोजेक्ट फ़ीनिक्स' वाली लाइन कोई पुरानी बात नहीं थी, वो इसी हफ़्ते की तारीख़ लिए हुए थी, 'अंदरूनी साझेदार से पुष्टि, डिलीवरी अगले महीने', और इशिता को एक-एक करके टुकड़े जुड़ते महसूस हुए, जैसे किसी ने उसके पेट में बर्फ़ उँडेल दी हो।

"दस साल पहले जो हुआ, वो कोई एक बार का हादसा नहीं था..." ... "...ख़ुराना ने कभी चोरी करना बंद ही नहीं किया।"

और फिर उसे वो लम्हा याद आया, हफ़्ते भर पहले का, जब स्कंकवर्क्स की एक अंदरूनी रिपोर्ट में उसने वही नाम सरसरी तौर पर देखा था और भूल गई थी, 'फ़ीनिक्स', आदित्य की टीम का अपना गुप्त कोडनाम, उसकी सबसे बड़ी उम्मीद, उसका बग़ावती सपना। ... जो प्रोजेक्ट अगले महीने 'डिलीवर' होने वाला था, वो कोई पुरानी फ़ाइल नहीं थी, वो ख़ुद आदित्य का सपना था, अभी, इसी इमारत में, बिकने के लिए तैयार खड़ा।

"उन्होंने दस साल पहले मेरे पापा को नहीं लूटा था, सर..." ... "...वो अब आदित्य को लूटने वाले हैं।"

खिड़की के बाहर वर्धान टावर की बत्तियाँ एक-एक करके बुझ रही थीं, बेख़बर, जबकि इशिता के कमरे में सिर्फ़ स्क्रीन की रोशनी में, एक जासूस अब यह जान चुकी थी कि आने वाला ख़तरा उसके पापा के अतीत का नहीं, आदित्य के भविष्य का था। ... और डिलीवरी की तारीख़ के हिसाब से, उसके पास उसे बचाने के लिए बस एक महीने से भी कम वक़्त बचा था।

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