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अध्याय 19 / 26 पढ़ने में 10 मिनट

पिता का सच

अंदर की बात द्वारा Avni Oberoi

रात के उस पहर इशिता की टैक्सी वर्धान के काँच के टावर से निकल कर उस पुराने मोहल्ले की तरफ़ मुड़ी, जहाँ अब हर दीवार में एक झूठ चुना हुआ था। ... दस साल से वो इस घर को दुनिया की सबसे साफ़ जगह समझती आई थी। आज पहली बार वो उसकी तरफ़ ऐसे जा रही थी, जैसे किसी दुश्मन के दरवाज़े की तरफ़।

दरवाज़ा खुला, और अंदर सोफ़े पर पापा के साथ वही बैठे थे, रतन चाचा, वही गर्म मुस्कान, वही खुली बाँहें। ... पूरी कंपनी को छलने वाली इशिता एक पल को दरवाज़े पर जम गई, क्योंकि जिस आदमी के सामने अब उसे सबसे बड़ा मुखौटा पहनना था, वो कोई अजनबी नहीं, उसका अपना ख़ून था।

"आ गई मेरी बच्ची! देख किशोर, मैंने कहा था ना, एक फ़ोन पर दौड़ी चली आएगी।" ... "बैठ, बैठ, थक गई होगी। तेरे पापा रात भर से तेरी फ़िक्र में सो नहीं पाए।"

"चाचा... आप यहाँ, इतनी रात को?" ... "आप ना होते तो हम कहाँ होते। आपने ही तो हमें हमेशा सँभाला है।"

चाचा की बाँहों में झुकते हुए इशिता को वो सब याद आया, आधा फटा हस्ताक्षर, सर्वोदय ट्रेडिंग के काग़ज़, ख़ुराना का पैसा। ... फिर भी उसकी आवाज़ नहीं काँपी, और यही उसे सबसे ज़्यादा डरा गया।

"बेटा, बैठ। मैंने तुझे इसीलिए बुलाया... रतन ठीक कह रहा है। तुझे वो नौकरी छोड़नी होगी।" ... "वो वर्धानों का घर है, इशिता। जिस चीज़ के पीछे तू पड़ी है, वो हमें दोबारा तबाह कर देगी। इस बार मैं नहीं सह पाऊँगा।"

"सुन ले अपने पापा की, बेटी। मैंने ख़बर लगवाई है, वहाँ अंदर कुछ लोग तेरे पीछे पड़ गए हैं।" ... "जो पुरानी फ़ाइलें हैं ना, उन्हें छोड़ दे। कल इस्तीफ़ा दे दे और घर आ जा। पैसे की फ़िक्र मत कर, वो सब मैं देख लूँगा, हमेशा की तरह।"

"आप दोनों इतना घबरा क्यों रहे हैं? मैं तो बस एक इंटर्न हूँ, चाचा।" ... "और वैसे भी... दस साल पुरानी फ़ाइलों में मुझे मिलेगा भी क्या? जो होना था हो गया। वर्धान ने सब छीन लिया। है ना, चाचा?"

इशिता ने वो सवाल यूँ पूछा जैसे कोई बच्ची पूछती है, पर उसकी नज़र चाचा के चेहरे पर टिकी रही। ... और एक पल के लिए, बस एक पल, रतन की मुस्कान रुकी, आँखों में कुछ ठंडा हुआ, फिर वही गर्मी लौट आई। पर इशिता ने वो पल देख लिया, और वो पल अपने आप में एक क़ुबूलनामा था।

"बिल्कुल, बेटा। वर्धान ने सब छीना। इसीलिए तो कहता हूँ, उस जगह से जितनी दूर रहे, उतना अच्छा।" ... "अच्छा, मैं चलता हूँ, रात बहुत हो गई। किशोर, तू इसे समझा। और बेटी... कल कोई पुरानी फ़ाइल हाथ लगे, तो छेड़ना मत। मिटा देना। पापा की हिफ़ाज़त के लिए।"

दरवाज़ा बंद हुआ, चाचा की गाड़ी बाहर निकल गई, और कमरे में सिर्फ़ दो लोग बचे, एक पिता और उसकी बेटी। ... मिटा देना, पापा की हिफ़ाज़त के लिए। वही लफ़्ज़, फिर से। जो आदमी सच में लुटा हो, वो सबूत मिटाने को नहीं कहता। सिर्फ़ चोर कहता है।

इशिता पापा के पास सोफ़े पर बैठ गई, उनका काँपता हाथ अपने हाथों में ले लिया। ... उसे एक बात जाननी थी, दुनिया की सबसे भारी बात, और उसे जानने के लिए उसे अपने ही पापा को परखना था, जैसे वो अजनबियों को परखती थी। क्या पापा जानते हैं? कहीं पापा भी तो इसमें शामिल नहीं?

"पापा, एक बात पूछूँ? दस साल से आप कहते आए हैं कि वर्धान ने आपकी तकनीक चुराई, अदालत में छीन ली।" ... "पर मान लो... मान लो वो चोरी नहीं थी। मान लो वो कोई सौदा था, कोई बिकवाली। तो आप क्या करते?"

"सौदा? कैसा सौदा, बेटा?" ... "मैंने कुछ नहीं बेचा। मेरी ज़िंदगी की मेहनत थी वो, मैं उसे बेच कर जी कैसे पाता? उन्होंने काग़ज़ों में हेरफेर की, गवाह ख़रीदे, और अदालत में मुझे अकेला हरा दिया। ये सौदा नहीं था, इशिता, ये डाका था।"

"पर पापा, जो पेटेंट वर्धान के नाम हुए, उन पर एक दस्तख़त था। किसी का दस्तख़त। अगर वो आपका नहीं था... तो किसका था?" ... "उस काग़ज़ पर एक मालिक और भी था, पापा। एक सह-मालिक, जिसने वो पेटेंट आपके साथ बाँटे थे। आप जानते हैं वो कौन था?"

किशोर के चेहरे पर कोई डर नहीं आया, कोई परछाईं नहीं दौड़ी। सिर्फ़ उलझन। ... और उसी पल इशिता को अपना जवाब मिल गया। पापा नहीं जानते। दस साल से वो ग़लत दुश्मन से लड़ते आए थे। पर अगर पापा नहीं जानते, तो अब ये बताना उसे ही था, और ये बताना उन्हें दूसरी बार तोड़ देगा।

"इशिता... तू ऐसे सवाल क्यों कर रही है? तेरी आँखों में कुछ है, जो मुझे डरा रहा है।" ... "जो भी है, बेटा, साफ़ कह। मैं तेरा पिता हूँ। दस साल से हम दोनों एक ही सच के लिए लड़ रहे हैं। मुझसे मत छुपा।"

"पापा, वो सह-मालिक... जिसने आपके पेटेंट पर आपके साथ दस्तख़त किए थे... वो कोई अजनबी नहीं था।" ... "वो हमारे अपने घर का था, पापा। हमारे अपने ख़ून का।"

किशोर एक पल को चुप रहे, जैसे बात उन्हें समझ ही न आई हो। फिर धीरे-धीरे उनके चेहरे पर वो समझ उतरी, जिससे इशिता सबसे ज़्यादा डरती थी। ... "हमारे ख़ून का..." उन्होंने दोहराया, और उनकी आवाज़ अजीब सी हो गई। "इशिता, हमारे घर में तेरे और मेरे सिवा... सिर्फ़ एक और आदमी था, जिसे वो पेटेंट समझ आते थे।"

"नहीं। ना। तू रतन की बात कर रही है? नहीं, इशिता, ये नामुमकिन है।" ... "रतन ने हमें बचाया है! जब सब छोड़ गए थे, वो खड़ा रहा। तेरी पढ़ाई, ये घर, मेरी दवाइयाँ, सब उसी के पैसे से चला। वो मेरा छोटा भाई है, इशिता। वो ऐसा नहीं कर सकता।"

"उसी पैसे की बात कर रही हूँ, पापा।" ... "वो पैसा चाचा की बचत का नहीं था। वो एक कंपनी से आता था, सर्वोदय ट्रेडिंग। और उन काग़ज़ों की आख़िरी परत के नीचे एक ही नाम छिपा है, ख़ुराना। वर्धान का वही आदमी जिसने आपके पेटेंट ख़रीदे। दस साल से चाचा को उसी की तनख़्वाह मिलती आई है, पापा, हमें टूटा रखने की तनख़्वाह।"

"नहीं... नहीं, ये तू ग़लत समझ रही है, ज़रूर कोई और बात होगी..." ... "वो... वो सारे काग़ज़... रतन ही तो अदालत में मेरा वकील ढूँढ कर लाया था। रतन ही तो हर फ़ाइल सँभालता था। मैंने तो कभी ख़ुद..." उनकी आवाज़ रुक गई, जैसे बीच रास्ते किसी ने ज़मीन खींच ली हो।

इशिता ने अपने पापा को दस साल पहले टूटते देखा था, अदालत की सीढ़ियों पर, कैमरों के सामने। पर ये टूटना उससे भी गहरा था। ... पहली बार दुश्मन ने उसकी मेहनत छीनी थी। इस बार पता चला कि दुश्मन कभी बाहर था ही नहीं। वो तो उसी मेज़ पर बैठा था, उसी थाली में खाता था, उसे भाई कहता था।

"दस साल..." उन्होंने रोते हुए कहा, चेहरा हाथों में छुपाए। "दस साल मैंने एक कंपनी से नफ़रत की, अजनबियों से नफ़रत की, और वो आदमी... मेरा अपना भाई... हर रात मेरे साथ बैठ कर मेरे ही ज़ख़्म पर मरहम लगाने का नाटक करता रहा।" ... "वो मुझे दिलासा देता था, इशिता। जिस आग उसने ख़ुद लगाई थी, उसी पर वो मेरे आँसू पोंछता रहा।"

"पापा... पापा, मुझे माफ़ कर दो। मैं ये बोझ अकेले नहीं उठा पा रही थी।" ... "पर अब हम जानते हैं। अब हम सही दुश्मन को जानते हैं। दस साल से हम अँधेरे में लड़ रहे थे। पहली बार, पापा, हमें दिखाई दे रहा है।"

और तभी कुछ बदला। किशोर ने चेहरे से हाथ हटाए, और उनकी आँखों में आँसू तो थे, पर उनके नीचे दस साल बाद पहली बार वो टूटा हुआ आविष्कारक नहीं, कुछ और था। ... सच ने उसे तोड़ा ज़रूर, पर उसी सच ने उसे आज़ाद भी कर दिया।

"इशिता, रुक।" ... "एक चीज़ है जो मैंने आज तक किसी को नहीं दी। ना वकील को, ना रतन को। ख़ुद रतन ने कई बार माँगी, कहता था सँभाल कर रख देता हूँ, पर पता नहीं क्यों, मेरा दिल कभी नहीं माना।"

किशोर कमरे के कोने में रखी उस पुरानी संदूक़ की तरफ़ गए, जिसे इशिता ने बचपन से बंद ही देखा था, और उसका झूठा तल हटा कर एक पुराना, पीला पड़ चुका लिफ़ाफ़ा निकाला, किनारों से घिसा, पर अब भी सीलबंद। ... उन्होंने वो लिफ़ाफ़ा इशिता के हाथ में रखा, और उनके हाथ काँप रहे थे, पर पहली बार डर से नहीं।

"ये मेरे और रतन के पेटेंट के असली सह-मालिकाना दस्तावेज़ हैं, बेटा। मूल काग़ज़। इन पर दोनों के नाम हैं, मेरा और उसका, दोनों के दस्तख़त, तारीख़ के साथ।" ... "जिस दिन उसने वो पेटेंट वर्धान को बेचे, उसे बेचने का पूरा हक़ ही नहीं था, आधा तो मेरा था। ये काग़ज़ उस बिकवाली को सौदा नहीं, जुर्म बना देता है।"

इशिता ने वो काग़ज़ खोले, और उसकी साँस रुक गई। जिस आधे फटे नाम को वो महीनों से आर्काइव में टुकड़ों में जोड़ती आई थी, वो पूरा नाम, दोनों नाम, आज उसकी हथेली पर थे। ... शेल कंपनी, ख़ुराना का पैसा, आधा हस्ताक्षर, सब इसी एक काग़ज़ के गिर्द आकर जुड़ जाते थे। अब ये सिर्फ़ शक नहीं था, ये सबूत था।

"पापा, अब मुझे चोरी-छिपे कुछ नहीं ढूँढना।" ... "जो चाहिए था, वो मिल गया। अब मुझे जासूस नहीं रहना है, पापा। अब मुझे गवाह बनना है।"

"गवाह? नहीं, इशिता, गवाह बनने का मतलब है सबके सामने आना। तू अब तक छुप कर सुरक्षित थी।" ... "अगर तू गवाह बनी, तो तुझे सबको बताना होगा कि तू वहाँ क्यों गई, तू असल में कौन है। तेरा वो सारा झूठ खुल जाएगा।"

और यही वो पल था, जहाँ इशिता ठिठकी। गवाह बनने का मतलब था अपना नक़ाब ख़ुद अपने हाथों उतारना। सबके सामने नहीं, सबसे पहले एक ही आदमी के सामने। ... आदित्य। जिसे उसने पहले दिन से हर पल छला था। गवाह बनने के लिए उसे आदित्य को वो सच बताना होगा, जो पहले दिन काँच के दरवाज़े पर शुरू हुआ था, कि वो कौन है, और किसलिए आई थी।

"नहीं, पापा। अब और झूठ नहीं।" ... "मैं आदित्य को सब बताऊँगी। कल। शुरू से आख़िर तक, कि मैं कौन हूँ, और पहले दिन से मैं क्या करती आई हूँ। ... अगर हमें ये लड़ाई सच से जीतनी है, पापा, तो शुरुआत मुझे अपने सबसे बड़े झूठ से करनी होगी।"

दस साल की जासूसी, सैकड़ों झूठ, एक मुखौटा जो पूरी कंपनी को छल गया था, इशिता ने उन सबको उस एक फ़ैसले पर रख दिया। ... किसी ने उसका राज़ पकड़ा नहीं था। किसी ने उसे मजबूर नहीं किया था। उसने ख़ुद चुना था, कि कल सुबह वो आदित्य वर्धान की आँखों में देख कर कहेगी कि वो एक जासूस है। और उसे नहीं पता था कि उस सच के बाद, आदित्य उसका हाथ थामेगा, या उसे हमेशा के लिए छोड़ देगा।

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