अध्याय 13 / 26 पढ़ने में 11 मिनट
पहली दहलीज़
अंदर की बात द्वारा Avni Oberoi
आदित्य की ख़ुफ़िया लैब का डेमो पूरे बोर्ड के सामने कामयाब हो जाता है और जीत की गरमाहट में इशिता और आदित्य पहली बार चूमते हैं। पर उसी रात अपना सबूत जोड़ते हुए इशिता उस आधे फटे नाम को पहचान लेती है, वो हस्ताक्षर उसके अपने चाचा रतन सिन्हा का है, और ठीक तभी फ़ोन पर वही नाम पुकारता हुआ चमक उठता है।
वर्धान टावर की सबसे सुनसान घड़ी में, जब पूरी इमारत सो रही थी, छब्बीसवीं मंज़िल से एक आदमी अकेला नीचे उतर रहा था, हाथ में वही टैबलेट जिस पर घंटे भर पहले एक भूला हुआ अलार्म बजा था। ... खुराना उस दरवाज़े की तरफ़ बढ़े जिसे उन्होंने दस साल से नहीं खोला था, सीलबंद आर्काइव, टर्मिनल सात।
पर आर्काइव में कोई नहीं था। कमरा ठंडा, अँधेरा, हर फ़ाइल अपनी जगह, कोई पैर नहीं, कोई परछाईं नहीं। टर्मिनल सात पर दर्ज एक्सेस आज रात का नहीं, हफ़्तों पुराना था, जलसे की उसी रात का, और उनका नया लगाया जाल एक पुरानी सेंध की गूँज देर से पकड़ लाया था। ... खुराना को कोई नाम नहीं मिला, पर उससे ख़तरनाक चीज़ मिली, यक़ीन, कि कोई इस सीलबंद कमरे में सचमुच उतरा था, और आज ही के दिन पूरा बोर्ड आदित्य की उसी लैब का डेमो देखने जुटने वाला था। खुराना ने तय कर लिया कि वो उस हॉल में हर चेहरा पढ़ेंगे।
उधर शहर के दूसरे कोने में सुबह हो चुकी थी, और इशिता वर्धान के गेट में दाख़िल हो रही थी, पूरी रात की जागी, आँखों में नींद नहीं, बस एक अजीब सी सिहरन। ... कल रात उतारा हुआ पूरा सबूत उसके कमरे में एक छुपी ड्राइव में, ताले के पीछे बंद था, पर उसका बोझ आज उसके साथ-साथ इस इमारत में चल रहा था, क्योंकि आज वो दिन था जिसका बोर्ड बरसों से इंतज़ार कर रहा था, आदित्य की 'बेकार' ख़ुफ़िया लैब आख़िरकार सबके सामने अपना काम दिखाने वाली थी।
डेमो से ठीक एक घंटा पहले इशिता ख़ुफ़िया लैब पहुँची, जहाँ आदित्य अपने प्रोटोटाइप के सामने खड़ा था, वही मशीन जिसे बोर्ड नामुमकिन कह चुका था, और उसके हाथ हल्के से काँप रहे थे।
"अगर आज ये चल गया, इशिता, तो पहली बार वो लोग मेरी बात सुनेंगे।" ... "और अगर नहीं चला... तो वो कहेंगे, देखो, हमने कहा था ना, आदित्य सिर्फ़ सपने देखता है, बनाता कुछ नहीं।"
"चलेगा, आदित्य। मैंने ख़ुद इसका हर हिस्सा जोड़ा है।" ... "और आज मैं वहीं, उसी हॉल में, फ़र्श पर खड़ी रहूँगी। कुछ भी गड़बड़ हुई, तो सबसे पहले मैं पकड़ लूँगी।"
"पता है मैंने तुम्हें क्यों चुना था?" ... "क्योंकि तुम वो देख लेती हो जो बाक़ी सबसे छूट जाता है। इस पूरी कंपनी में, सिर्फ़ तुम।"
और इशिता मुस्कुरा दी, पर उस मुस्कान के नीचे एक चाकू उतर रहा था, क्योंकि जो लैब वो आज बचाने जा रही थी, वही तो उसके पापा की चुराई तकनीक की बुनियाद पर खड़ी थी। ... उसे बचाना और उसे धोखा देना, आज ये दोनों एक ही काम बन चुके थे।
बोर्ड रूम भर चुका था, लंबी काँच की मेज़ के इर्द-गिर्द वही चेहरे जो आदित्य को बरसों से कम आँकते आए थे, सिरे पर उसके पापा, चेयरमैन कैलाश वर्धान, ठंडे और चुप। ... और एक कोने में नकुल, कुर्सी पर आराम से पसरा, होंठों पर वो मुस्कान जो पहले से जीत का जश्न मना रही थी।
"शुरू करो, आदित्य भाई। हम सब बहुत उत्सुक हैं।" ... "आख़िर देखें तो सही, कंपनी के इतने पैसे और इतने महीने आख़िर किस जादू पर ख़र्च हुए हैं।"
आदित्य ने प्रोटोटाइप चालू किया, और मशीन धीमे-धीमे जागी, स्क्रीन पर आँकड़े दौड़ने लगे, पूरे हॉल की साँस थम गई। ... और तभी, ठीक जब सब कुछ सही चल रहा था, एक रीडिंग लड़खड़ाई, एक ग्राफ़ बेतरतीब काँपने लगा, और नकुल की मुस्कान चौड़ी हो गई।
पर हॉल के फ़र्श पर खड़ी इशिता ने एक पल में पकड़ लिया कि ख़राबी मशीन में नहीं, एक ढीले कनेक्शन में थी, वही छोटी सी चीज़ जो सिर्फ़ वही देख सकती थी जिसने इसे अपने हाथों से जोड़ा हो। ... उसने चुपचाप आगे बढ़कर आदित्य के कान में दो लफ़्ज़ कहे, और उसकी उँगली एक कोने की तरफ़ इशारा कर के हट गई।
"माफ़ कीजिए... एक ज़िंदा सिस्टम अपनी ग़लतियाँ ख़ुद ठीक करता है। देखिए।"
और आदित्य ने वो ढीला कनेक्शन कसा, ग्राफ़ सीधा हुआ, आँकड़े फिर से क़ायदे से दौड़ने लगे, और नकुल की मुस्कान हौले से मुरझाने लगी। ... फिर प्रोटोटाइप ने वो कर दिखाया जिसे बोर्ड सालों से नामुमकिन कहता आया था, ख़ुद को थामे रखना, ख़ुद को सँभालना, बिना किसी बाहरी सहारे के, और पूरे हॉल में एक भारी ख़ामोशी छा गई।
"ये... ये सच में चल रहा है?" ... "आदित्य, ये तुमने बनाया? इसी इमारत में, हमारी नाक के नीचे?"
"जी, पापा। मैंने और मेरी टीम ने।" ... "और अगर आज ये आपके सामने चल पाया, तो उसकी एक बड़ी वजह वहाँ खड़ी है, वो इंटर्न जिसे आप सब एक मामूली नाम समझते रहे।"
"एक इंटर्न?" ... "आदित्य भाई, अपनी कामयाबी का सेहरा किसी बच्ची के सिर मत बाँधो। बोर्ड को नतीजे चाहिए, कहानियाँ नहीं।"
पर हॉल पलट चुका था। वही चेहरे जो घंटे भर पहले आदित्य का मज़ाक उड़ाने आए थे, अब झुककर स्क्रीन पर उसकी मशीन को देख रहे थे, और नकुल का तंज़ हवा में अकेला लटक कर रह गया। ... दस साल की कम-आँकनी दस मिनट में ढह गई, और आदित्य वर्धान पहली बार अपने ही घर में सचमुच देखा गया।
"नकुल, बस।" ... "जो मशीन अभी मेरी आँखों के सामने ख़ुद को थामे खड़ी रही, वो किसने बनाई, ये मैं अब अपनी आँखों से देख रहा हूँ। शाबाश, आदित्य। पहली बार, सच में, शाबाश।"
और फ़र्श पर खड़ी इशिता की आँखें भर आईं, एक अजीब, दोतरफ़ा गर्व से, क्योंकि उसे इस आदमी की जीत पर सच में ख़ुशी हो रही थी, और यही उसका सबसे बड़ा गुनाह था। ... वो इस घर को गिराने आई थी, और अभी-अभी उसने इसी घर के वारिस को खड़ा कर दिया था, अपने पापा की चुराई तकनीक पर, अपने ही हाथों से।
देर शाम, जब बोर्ड जा चुका था और हॉल की बत्तियाँ आधी बुझ चुकी थीं, आदित्य और इशिता ख़ुफ़िया लैब में अकेले रह गए, जीत की उस बची हुई गरमाहट में जो अभी तक हवा में तैर रही थी। ... आदित्य उसकी तरफ़ मुड़ा, उसकी आँखों में अब वो थका हुआ वारिस नहीं, एक खुला हुआ इंसान था।
"तुमने आज मुझे बचा लिया, इशिता। उस हॉल में, सबके सामने।" ... "और मुझे नहीं पता ये कैसे कहूँ, पर पिछले कुछ हफ़्तों से... तुम मेरी हर सोच का हिस्सा बन गई हो। मैं तुमसे भाग नहीं पा रहा।"
"आदित्य, मत कहो..." ... "तुम नहीं जानते मैं कौन हूँ। अगर जानते, तो शायद इतने पास खड़े ही ना होते।"
"तो बता दो, आज, अभी।" ... "पर मुझे यक़ीन है, तुम जो भी हो, मैं उसे भी चाहूँगा। मैं थक गया हूँ डरते-डरते जीने से, इशिता।"
और उसी पल, जो दीवार तेरह हफ़्तों से दोनों के बीच खड़ी थी, वो टूट गई। किसने पहला क़दम बढ़ाया, ये कोई नहीं जानता, पर अगले ही लम्हे आदित्य के होंठ इशिता के होंठों पर थे। ... और पहली बार, बरसों में पहली बार, इशिता ने चूमते हुए कोई हिसाब नहीं लगाया, कोई मिशन नहीं सोचा, कोई मुखौटा नहीं पहना, बस चूमा, एक लड़की की तरह, जासूस की तरह नहीं।
लैब की आधी रोशनी में वक़्त रुक सा गया, दो साँसें, एक धड़कन, और वो पूरा झूठ जो उन्हें घेरे खड़ा था, कुछ पल के लिए मौजूद ही नहीं रहा। ... और फिर इशिता ने हौले से अपने आप को पीछे किया, माथा उसके माथे से टिका, साँसें उलझी हुईं, दहलीज़ पर आकर ठहरी हुई।
"आज रात के लिए..." ... "आज रात के लिए मैं सिर्फ़ इशिता रहना चाहती हूँ। और कुछ नहीं। बस तुम्हारे सामने खड़ी एक लड़की।"
"तो रहो।" ... "आज रात, बस तुम और मैं। बाक़ी सब कल।"
"ठीक है।" ... "बस आज की रात, कोई कल नहीं, कोई मिशन नहीं, कोई और नाम नहीं। सिर्फ़ ये, सिर्फ़ हम।"
और उस एक रात, इशिता ने सचमुच अपना मुखौटा पूरी तरह उतार दिया, बिना ये जाने कि ज़िंदगी उसे ये सुकून सिर्फ़ इसलिए दे रही है ताकि अगला वार और गहरा उतरे। ... उसने आज रात दुश्मन के बेटे को चूमा था, और उसे अभी ये जानना बाक़ी था कि आज की रात उसे एक और सच भी मिलनी थी, वो सच जो उसकी पूरी दुनिया उलट देगा।
आधी रात बीत चुकी थी जब इशिता अपने कमरे लौटी, होंठों पर अब भी उस चुंबन की गरमाहट, सीने में एक अजीब, ख़तरनाक हल्कापन। ... वो सोना चाहती थी, पर नींद नहीं आई, और उसका हाथ अपने आप उस छुपी ड्राइव तक पहुँच गया, बस एक आख़िरी बार अपने सबूत को पूरा देखने के लिए।
उसने लैपटॉप खोला और कल रात उतारी हर फ़ाइल एक साथ खोल दी, पहली बार पूरी साफ़ तस्वीर में, हर पन्ना, हर हस्ताक्षर, हर तारीख़। ... आठवीं रात का वो आधा फटा नाम, जो अब तक वो सिर्फ़ 'सिन्हा' पढ़ पाई थी, आज उसके बग़ल में उसी सौदे का दूसरा पन्ना भी खुला था, वो पन्ना जो उस रात जल्दबाज़ी में उसने बस ऊपर-ऊपर खींच लिया था।
"बस एक टुकड़ा और... पहला नाम कहीं तो लिखा होगा।" ... उसने दोनों पन्नों को स्क्रीन पर आमने-सामने रखा, फटे किनारे को दूसरे पन्ने के पूरे हस्ताक्षर से मिलाया, और साँस रोक ली।
और तभी उसकी नज़र उस दस्तख़त की बनावट पर पड़ी, वो घुमाव, वो झुका हुआ आख़िरी अक्षर, नाम के नीचे खिंची वो एक ख़ास लकीर जो उसने अपनी पूरी ज़िंदगी देखी थी। ... जन्मदिन के कार्डों पर, स्कूल के फ़ॉर्मों पर, हर तंगी में आए उन चेकों पर जिन्होंने उसके टूटे घर को बचाया था, यही लिखावट थी, हूबहू यही।
"ये... ये तो..." ... "रतन... रतन सिन्हा। चाचा।"
और उसी एक पल में दस साल की हर कहानी उलट गई। वो चोरी जो वर्धान ने की थी, वो अदालत जो हारी थी, वो दैत्य जिसकी तस्वीर पापा ने गढ़ी थी, सब झूठ, क्योंकि पेटेंट किसी ने छीने नहीं थे, बेचे गए थे, और बेचने वाला हस्ताक्षर उसके अपने चाचा का था। ... और अब चाचा की हर बात एक नए अर्थ में गूँजी, 'किसी और नाम को मत छेड़ना', 'जो पन्ना दिखे, मिटा देना', खुराना के साथ वो एक चुपचाप नज़र, ये कोई हिफ़ाज़त नहीं थी, ये एक क़ातिल अपनी क़ब्र पर मिट्टी डाल रहा था।
"चाचा... आपने? ... तुमने ही?" ... "जिसे मैं मसीहा समझती रही, जिसने मुझे पाला, मेरी फ़ीस भरी, मेरे आँसू पोंछे... वही? वही चोर था जिसने मेरे पापा को तोड़ा?"
और इशिता के हाथ काँप उठे, क्योंकि आज ही की रात, कुछ ही घंटे पहले, उसने दुश्मन के बेटे को चूमा था, उस घर के वारिस को जिसे वो दस साल से क़ातिल समझती आई थी, और ठीक उसी रात उसे पता चला कि असली क़ातिल उसका अपना ख़ून था, वो आदमी जिसने उसे पाला था। ... और ठीक उसी लम्हे, जब उसकी उँगली अब भी उस दस्तख़त पर जमी थी, मेज़ पर पड़ा उसका फ़ोन काँपते हुए जगमगा उठा, और स्क्रीन पर वही नाम चमका जो अभी-अभी उस पन्ने पर उसकी पूरी दुनिया तोड़ चुका था। रतन सिन्हा। चाचा। कॉल कर रहे थे।
"बेटा? सो गई क्या?" ... "मुझे नींद नहीं आ रही थी, सोचा तुझसे बात कर लूँ। सब ठीक तो है ना, मेरी बच्ची?"
और इशिता वहीं जम गई, एक तरफ़ वो फ़ोन जिस पर उसे पालने वाले की आवाज़ थमी थी, और स्क्रीन पर वो दस्तख़त जो कहता था कि उसी आवाज़ ने उसके पापा को बर्बाद किया था। ... उसका अंगूठा हरे बटन पर आकर काँपता हुआ ठहर गया, और उस एक फटे नाम और उस एक गर्म पुकार के बीच, इशिता सिन्हा की पूरी दुनिया दो टुकड़ों में बँट कर बिखर गई।
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