DesiHub

अध्याय 2 / 26 पढ़ने में 11 मिनट

पहला दिन

अंदर की बात द्वारा Avni Oberoi

काँच के दरवाज़े। सुबह की धूप। और आदित्य वर्धान के वो शब्द, अभी भी इशिता के कानों में तैरते हुए। ... 'मैं ठीक तुम्हारे जैसे किसी को ही ढूँढ रहा था।'

उसके दिमाग़ में एक ही घंटी बज रही थी। ख़तरा। ये आदमी उसे देख रहा था, सच में देख रहा था। ... और एक जासूस के लिए दुनिया की सबसे ख़तरनाक चीज़ यही होती है, कोई जो उसे सच में देख ले।

"सर, आप शर्मिंदा कर रहे हैं। ... मैं तो बस एक इंटर्न हूँ। पहला दिन भी पूरा नहीं हुआ, और आप इतनी बड़ी बातें..."

"इंटर्न। ... हाँ, फ़िलहाल। कागज़ पर तो तुम अभी बस एक नई इंटर्न हो, फ़ाइल नंबर सत्ताईस।"

"पर मैंने बहुत सी फ़ाइलें पढ़ी हैं, इशिता। हज़ारों। ... और उनमें से कुछ ही होती हैं, जो पढ़ने के बाद भी ज़हन से नहीं उतरतीं। तुम्हारी वाली उतर नहीं रही।"

तभी लॉबी के उस पार से किसी ने आदित्य को पुकारा। बोर्ड मीटिंग। दस मिनट पहले शुरू हो चुकी थी। ... और आदित्य के चेहरे पर वो थकी हुई मुस्कान आई, जो उस इंसान की होती है जिसे उसके अपने घर में ही मज़ाक समझा जाता हो।

"जाना पड़ेगा। ... वो लोग मेरे बिना भी सारे फ़ैसले ले लेंगे। बस मेरे सामने लेना उन्हें ज़्यादा अच्छा लगता है।"

"पहला दिन बचा लो, इशिता। ... फिर बात करेंगे। तुम्हारे और मेरे जैसे लोगों को यहाँ ढूँढते-ढूँढते मुझे कई साल लग गए हैं।"

इशिता ने सिर झुका कर 'जी सर' कहा। पर अंदर, उसने एक नोट बना लिया। ... आदित्य वर्धान से दूर रहना है। जितना हो सके, उतना दूर। ये आदमी भरोसा करता है, और भरोसा करने वाले लोग बहुत ग़ौर से देखते हैं।

और फिर वो नीचे उतरी। ऊपर की उन चमकती मंज़िलों से नहीं, जहाँ आदित्य जैसे लोग रहते थे। ... बल्कि नीचे, बहुत नीचे, जहाँ से इंटर्नों की दुनिया शुरू होती थी।


इंटर्न बे। एक्ज़ीक्यूटिव सुइट्स के ठीक नीचे की मंज़िल। ट्यूबलाइट की सफ़ेद रोशनी, कतार में लगी छोटी-छोटी डेस्क, और दस नए इंटर्न, हर एक अपने सपने के बोझ तले दबा हुआ।

यहाँ का नियम पहले ही घंटे में साफ़ हो गया। ऊपर मालिक। बीच में मैनेजर। और सबसे नीचे, ज़मीन पर रेंगता हुआ, इंटर्न। ... इस पूरे टावर में एक इंटर्न से कम शायद सिर्फ़ वो कुर्सी थी, जिस पर वो बैठा था।

ओरिएंटेशन अभी शुरू ही हुआ था, जब बे का दरवाज़ा खुला और एक ख़ुशबू अंदर आई। महँगी। तेज़। ... उसके पीछे-पीछे एक आदमी। इस्त्री की हुई क़मीज़, चमकती घड़ी, और आँखों में वो नज़र जो लोगों को इंसान नहीं, सामान समझती है।

नकुल वर्धान। आदित्य का चचेरा भाई। कंपनी का वो चहेता वारिस, जिसे बोर्ड आदित्य से कहीं ज़्यादा गंभीरता से लेता था।

"तो ये है इस साल का माल। ... दस बच्चे। छह महीने। और मुझे यक़ीन है, इनमें से नौ को साल के आख़िर तक अपना नाम भी ठीक से याद नहीं रहेगा।"

"एक बात आज ही समझ लो। ... तुम यहाँ सीखने नहीं आए हो। तुम यहाँ काम आने आए हो। और जिस दिन तुम काम के नहीं रहे... उस दिन वो दरवाज़ा तुम्हें याद भी नहीं रखेगा।"

इशिता ने उसे चुपचाप पढ़ा। ये आदमी ख़तरनाक था, पर उस तरह नहीं जिस तरह आदित्य। ... आदित्य देखता था। नकुल सिर्फ़ ख़ुद को देखता था। और ख़ुद में डूबे लोग अक्सर बाक़ी सब से चूक जाते हैं। ऐसे लोगों के बीच छिपना आसान होता है।

"तुम। ... हाँ, तुम। फ़ाइल में लिखा है टॉपर हो। यहाँ टॉपर वग़ैरह कुछ नहीं होता। यहाँ बस दो तरह के लोग होते हैं। वर्धान, और बाक़ी सब। ... तुम बाक़ी सब हो।"

"जी सर। ... मैं याद रखूँगी।"

उसने सिर झुकाए रखा। पर मन ही मन उसने कहा, याद तो मैं रखूँगी, नकुल वर्धान। ... हर वो दरवाज़ा जो तुम मेरे मुँह पर बंद कर रहे हो, मैं उसकी चाबी ढूँढ लूँगी। और तुम्हें भनक तक नहीं लगेगी।

नकुल के जाते ही बे में फिर से जान लौटी। और उसी वक़्त, एक ट्रॉली की घड़घड़ाहट के साथ, इस टावर का सबसे ज़रूरी आदमी अंदर आया। ... जिसे इस पूरी इमारत में शायद ही कोई गंभीरता से लेता था, और जो, सच पूछो तो, इस पूरी इमारत को चलाता था।

जुगनू। फ़ैसिलिटीज़ और मेलरूम का आदमी। हर मंज़िल की चाबी उसकी जेब में, हर दफ़्तर की ख़बर उसकी ज़ुबान पर, और हर किसी के लिए एक कप चाय उसकी ट्रॉली पर।

"नए बच्चे! ... आहा! हर साल आते हो, चमकती आँखें ले कर, और छह महीने में सूख कर काग़ज़ हो जाते हो। ... चाय? अदरक वाली? ले लो, ले लो, पैसे नहीं लगते, नकुल सर के नाम पर चढ़ा दूँगा।"

बाक़ी इंटर्नों ने उसे यूँ अनदेखा किया जैसे वो कोई फ़र्नीचर हो। ... पर इशिता ने उसकी तरफ़ देखा, और मुस्कुराई। सच्ची लगने वाली मुस्कान। क्योंकि जुगनू के हाथ में इस पूरे टावर की सबसे कीमती चीज़ थी। चाबियाँ।

"ज़रूर, भैया। अदरक वाली ही। ... और अगर आप बता दें कि इस भूलभुलैया में क्या कहाँ है, तो उम्र भर का एहसान रहेगा। मैं तो अभी वॉशरूम भी नहीं ढूँढ पा रही।"

"अरे इसमें एहसान कैसा! ... सुनो, ध्यान से सुनो। ये टावर बयालीस मंज़िलों का है, पर तुम्हारे लिए बस तीन मायने रखती हैं। ये वाली, इंटर्न बे। ऊपर पाँचवीं, कैंटीन, जहाँ सस्ती इडली मिलती है। और... बस।"

"और बाक़ी मंज़िलें? ... मतलब, जाना तो कभी नहीं है, पर इतना बड़ा टावर है... ऊपर क्या-क्या है?"

"ऊपर? ऊपर तो देवता रहते हैं, बेटा। ... बड़े मालिक की मंज़िल सबसे ऊपर। उसके नीचे लीगल, कानूनी काग़ज़ों वाले, बड़े ख़तरनाक लोग। और नकुल सर की टीम बीच में कहीं। ... और सबसे नीचे? तहख़ाना। पर वहाँ तुम्हारा बैज नहीं चलेगा।"

तहख़ाना। ... इशिता के दिल ने एक धड़कन छोड़ दी। वही जगह। वो सीलबंद कमरा, जो उसके पापा के नक़्शे पर लाल पेन से घेरा हुआ था। जुगनू ने अभी-अभी, चाय की चुस्की के बीच, उसे इस भूलभुलैया का सबसे गहरा राज़ थमा दिया था।

"सबसे नीचे तहख़ाना? ... वहाँ रखते क्या हैं? भूत?"

"भूत से भी बदतर। ... पुराने काग़ज़। कंपनी के सारे पुराने राज़। ... उस कमरे में पूरे टावर के बस दो-तीन बैज जाते हैं। खुराना सर का, बड़े मालिक का, और... बस। मेरा भी नहीं जाता, और मेरे पास तो हर ताले की चाबी है!"

खुराना। एक नया नाम। इशिता ने उसे चुपचाप कहीं दर्ज कर लिया, बिना एक भी सवाल पूछे। ... और उसी पल उसे रतन चाचा की बात याद आई। 'बस वही एक फ़ाइल। कोई और नाम मत छेड़ना।' ... उसने ख़ुद को रोका। एक फ़ाइल। एक कमरा। बस उतना ही।


दोपहर तक इशिता ने बे की हर डेस्क, हर चेहरा, हर बैज-ज़ोन अपने दिमाग़ में उतार लिया था। ... और फिर, ऊपर से, अफ़रा-तफ़री की एक लहर नीचे तक बह आई।

पाँचवीं मंज़िल के बड़े हॉल में एक लाइव डेमो चल रहा था। निवेशक। करोड़ों के सौदे उस एक प्रेज़ेंटेशन पर टिके थे। और वो प्रेज़ेंटेशन, ठीक स्टेज पर, दम तोड़ रहा था।

नकुल की टीम के इंजीनियर स्क्रीन के पीछे पसीने में नहा रहे थे। बड़ी स्क्रीन पर बस एक लाल एरर, बार-बार टिमटिमाता हुआ। और सामने बैठे निवेशक, घड़ियाँ देखते हुए, आपस में फुसफुसाते हुए।

"इशिता! इधर आओ, जल्दी! ... पानी की बोतलें ऊपर पहुँचानी हैं, और वहाँ तो क़यामत आई हुई है। नकुल सर का मुँह इस वक़्त देखने लायक़ है!"

और इस तरह, पानी की एक ट्रे थामे, इशिता उस हॉल के फ़र्श पर जा पहुँची। ठीक उसी स्क्रीन के नीचे, जिस पर वर्धान का करोड़ों का सौदा दम तोड़ रहा था।

उसने एक नज़र स्क्रीन पर डाली। बस एक नज़र। ... और उसे दिख गया। वो एरर कोई बड़ी ख़राबी नहीं थी। बस एक सेंसर का डेटा उलटी दिशा में पढ़ा जा रहा था। एक बच्चों जैसी ग़लती, जिसे घबराहट में कोई पकड़ ही नहीं पा रहा था।

और यहीं, उसके अंदर वो पुरानी जंग फिर छिड़ गई। ... अगर वो चुप रही, तो कवर सलामत रहेगा। और अगर बोली, तो पूरा हॉल एक इंटर्न की तरफ़ पलट जाएगा। ... पर वो स्क्रीन। वो मशीन। वो उसके पापा की दुनिया थी। और वो चुप नहीं रह पाई।

"सुनिए... माफ़ कीजिए। ... मुझे शायद कुछ पता नहीं, पर... वो सेंसर वाला नंबर, कहीं वो उल्टा तो नहीं आ रहा? माइनस और प्लस?"

इंजीनियर ने पहले उसे यूँ देखा जैसे किसी दीवार ने बात कर दी हो। फिर, हताशा में, उसने बस वो एक चीज़ जाँच ली। ... और स्क्रीन पर वो लाल एरर बुझ गया। हरे नंबर दौड़ पड़े। डेमो, अचानक, ज़िंदा हो उठा।

एक पल की ख़ामोशी। फिर पूरे हॉल में तालियाँ। निवेशक मुस्कुराए, नोट्स लिखने लगे। और नकुल वर्धान, स्टेज पर, राहत में मुस्कुराता हुआ, सारा श्रेय अपनी टीम को देता हुआ।

पर कुछ नज़रें उस स्टेज पर नहीं थीं। वो उस लड़की पर टिकी थीं, जो पानी की ट्रे थामे चुपचाप पीछे हटने की कोशिश कर रही थी। ... और ऊपर, मेज़ानाइन की रेलिंग पर झुका एक आदमी, जिसकी फ़ाइल में उसका नाम पहले से लिखा था, उसे बहुत ग़ौर से देख रहा था।

इशिता को वो नज़र गर्दन पर महसूस हुई, जैसे किसी ने उँगली फिरा दी हो। ... उसने ट्रे नीची की, आँखें झुकाईं, और भीड़ में घुल गई। एक अच्छी इंटर्न की तरह। एक अदृश्य इंटर्न की तरह। ... पर बहुत देर हो चुकी थी। कमरे ने उसे देख लिया था।


उसी शाम, ऊपर, नकुल वर्धान के दफ़्तर में एक अलग तरह की आग जल रही थी। ... डेमो बच गया था, सौदा हो गया था, पर वो जीत उसकी नहीं थी। और नकुल वर्धान के लिए इससे बड़ी कोई तौहीन नहीं थी, कि उसकी जीत कोई और चुरा ले जाए। एक इंटर्न। एक नौकर से भी छोटी चीज़।

"एक इंटर्न। ... पानी पिलाने आई थी, और मेरे इंजीनियरों को भरे हॉल में, निवेशकों के सामने, मूर्ख बना गई।"

"ज़रा देखें तो तुम हो कौन, मिस टॉपर। ... कहाँ से आई हो, और किसने भेजा है।"

उसने कंपनी के सिस्टम में उसका नाम डाला। इशिता सिन्हा। और उसकी पूरी फ़ाइल स्क्रीन पर खुल गई। ... डिग्री, नंबर, सिफ़ारिशें, सब चमकदार, सब बेदाग़। रतन चाचा का बड़ी मेहनत से बनाया हुआ बेदाग़ अतीत।

पर नकुल उन चमकदार नंबरों को नहीं पढ़ रहा था। वो उनके बीच की ख़ाली जगहों को पढ़ रहा था। ... और तभी उसकी उँगली रुकी। स्कूल के बाद, कॉलेज से पहले। दो साल। जहाँ बाक़ी सब कुछ ठसाठस भरा था, वहाँ बस एक धुँधली, गोल-मोल लाइन। जैसे किसी ने जल्दबाज़ी में एक सूराख़ को काग़ज़ से ढँक दिया हो।

"ये दो साल कहाँ गए, इशिता सिन्हा? ... इतनी होशियार लड़की, और अपने ही अतीत में एक छेद छोड़ गई?"

उसने दराज़ से एक लाल पेन निकाला। और अपनी स्क्रीन पर नहीं, बल्कि उस फ़ाइल के एक छपे हुए पन्ने पर, उन दो ग़ायब सालों के इर्द-गिर्द उसने एक गोला खींचा। ... धीरे। गहरा। लाल।

नीचे, इंटर्न बे में, इशिता को लगा कि उसने आज का दिन जीत लिया है। बे भी नाप ली थी, तहख़ाने का पता भी चल गया था, और कवर भी सलामत था। ... उसे नहीं पता था कि ठीक उसी वक़्त, दो मंज़िल ऊपर, उसके झूठ के सबसे कमज़ोर धागे पर एक लाल घेरा खिंच चुका था।

जंग का पहला दिन ख़त्म हुआ। ... इशिता ने वर्धान के घर का नक़्शा बना लिया था। ... और वर्धान के एक बेटे ने, ठीक उसी दिन, उसके झूठ का पहला सिरा पकड़ लिया था।

टिप्पणियाँ

बातचीत में शामिल होने के लिए साइन इन करें।

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।

अंदर की बात