अध्याय 11 / 26 पढ़ने में 9 मिनट
मामा की मुस्कान
अंदर की बात द्वारा Avni Oberoi
जलसे में रतन सिन्हा वर्धानों के बीच पूरी सहजता से घुल जाते हैं, और इशिता उनकी और खुराना की आँखों में एक ऐसी नज़र पकड़ लेती है जो अजनबी कभी नहीं बदलते। अकेले में चाचा उसे प्यार से हिदायत देते हैं कि परिवार के नाम वाला कोई भी पुराना काग़ज़ मिले तो उसे मिटा दे, 'पापा की हिफ़ाज़त के लिए', और इशिता को एहसास होता है कि उसका मिशन सबूत ढूँढना नहीं, उसे दफ़नाना था।
कमरे की हवा अभी भी बर्फ़ जैसी जमी हुई थी जब रतन सिन्हा भीड़ चीरते हुए, हँसते हुए, इशिता और आदित्य की तरफ़ बढ़े। ... निवेशक और वर्धान के पुराने साथी उन्हें रास्ता देते गए, जैसे कोई जाना-पहचाना मेहमान गुज़र रहा हो, न कि कोई अजनबी।
"अरे, ये तो मेरी गुड़िया है!" ... "इशिता बेटा, तुझे यहाँ, इस चमचमाती दुनिया में देखकर दिल भर आया। पापा को पता है तू कितनी ऊँची उड़ान भर चुकी है?"
इशिता ने अपने चेहरे पर वही मुस्कान चिपका ली, जो उसने दस साल में सबसे ज़्यादा प्रैक्टिस की थी, प्यार करने वाली भतीजी की मुस्कान। ... पर उसका दिल अभी भी उस अधूरे पल की धड़कन में अटका था, और अब यहाँ, ठीक उसी हॉल में, दोनों दुनिया टकरा रही थीं।
"चाचा... आप यहाँ?" ... "ये... ये आदित्य वर्धान हैं। मेरे साथ स्कंकवर्क्स में काम करते हैं। आदित्य, ये मेरे चाचा हैं, रतन सिन्हा।"
"सिन्हा साहब, नमस्ते।" ... "अब पता चला इशिता में ये आग कहाँ से आई। आपकी भतीजी ने इस हफ़्ते हमारा पूरा बोर्ड हिला दिया।"
"हाँ हाँ, ये तो बचपन से ही ऐसी है।" ... "वर्धान इंडस्ट्रीज़ से मेरा एक अजीब सा नाता रहा है हमेशा, जानते हैं, जैसे कोई पुराना धागा। शायद क़िस्मत का खेल हो।"
आदित्य की भौं एक पल के लिए हल्की सी उठी, 'सिन्हा' नाम कहीं भीतर एक हल्की सी घंटी बजा गया, कोई पुरानी फ़ाइल, कोई भूला हुआ केस। ... पर बेंगलुरु में हर तीसरे घर में एक सिन्हा था, और आदित्य ने उस घंटी को बिना सुने ही एक तरफ़ रख दिया।
"ख़ैर, ये तो बूढ़ों की बातें हैं।" ... "आप जैसे नौजवान इस कंपनी को चला रहे हैं, ये देखकर अच्छा लगता है। आपके वालिद साहब को बड़ा फ़ख़्र होगा।"
तभी एक कर्मचारी आदित्य के कान में कुछ फुसफुसाया, चेयरमैन साहब निवेशकों के एक अहम गुट के साथ उसे बुला रहे थे, अभी, इसी वक़्त। ... आदित्य ने माफ़ी माँगते हुए एक आख़िरी नज़र इशिता पर डाली, वही नज़र जो थोड़ी देर पहले उसके चेहरे पर ठहरी थी।
"मैं जल्दी लौटूँगा।" ... "आज की बात... अभी ख़त्म नहीं हुई, इशिता।"
आदित्य भीड़ में खो गया, और उसके जाते ही इशिता के चेहरे की गर्माहट एक पल में बर्फ़ हो गई। ... अब हॉल के इस कोने में बस दो लोग बचे थे, जिनके बीच दस साल का एक झूठ खड़ा था, और उसे दोनों तरफ़ से बड़ी सफ़ाई से ढोया जा रहा था।
रतन ने अपना गिलास उठाया और हॉल में यूँ घूमने लगे जैसे हर चेहरा एक पुराना दोस्त हो, हर हाथ मिलाना एक हक़, कोई एहसान नहीं। ... इशिता तीन क़दम पीछे खड़ी, अपनी मुस्कान थामे, अपने चाचा को देखती रही, वो हुनर देखती रही जिसने उसे भी दस साल तक धोखा दिया था।
तभी हॉल के उस पार से खुराना, अपने हाथ में व्हिस्की का गिलास थामे, धीमे पर तय क़दमों से रतन की तरफ़ बढ़े। ... खुराना कभी बेवजह किसी की तरफ़ नहीं चलते थे, इशिता ने इतने हफ़्तों में इतना तो सीख ही लिया था।
"सिन्हा साहब, कितने अरसे बाद।" ... "बेंगलुरु आना कैसे हुआ? सुना है भतीजी यहीं हमारे साथ काम कर रही हैं।"
"अरे खुराना साहब, आप तो भूल ही गए थे मुझे।" ... "पुराने दिन याद आते हैं। कुछ हिसाब वक़्त के साथ पक जाते हैं, है ना?"
"आपकी भतीजी बड़ी तेज़ निकली, सिन्हा साहब।" ... "हमारे यहाँ ऐसी होशियारी कभी-कभी ग़लत जगह ज़्यादा दिलचस्पी दिखाने लगती है। आप तो जानते ही हैं, ऐसी बातों का अंजाम क्या होता है।"
"फ़िक्र मत कीजिए, खुराना साहब।" ... "मेरी भतीजी की हर दिलचस्पी मेरी नज़र में है। वो ठीक वहीं देखेगी, जहाँ मैं चाहूँगा। और कहीं नहीं।"
और ठीक उसी पल इशिता ने वो देखा जिसे देखने के लिए किसी अजनबी की आँख काफ़ी नहीं होती। दोनों के बीच एक नज़र गुज़री, बस एक पल के लिए, ऐसी नज़र जो दो लोग तभी बदलते हैं जब उनके बीच कोई पुराना, दफ़न किया हुआ राज़ हो। ... अजनबी ऐसे नहीं देखते। पार्टनर देखते हैं, या अपराधी।
"'कुछ हिसाब पक जाते हैं'..." ... "किसका हिसाब, चाचा? और खुराना से आपका पुराना नाता किस बात का है, जिसका ज़िक़्र आपने कभी घर पर नहीं किया?"
खुराना ने एक शाइस्ता सी मुस्कान के साथ इजाज़त ली और भीड़ में गुम हो गए, अपनी बात पीछे छोड़ते हुए, अधूरी, ख़तरनाक। ... और हॉल के दूसरे किनारे से देविका मलिक की नज़र, जो अब तक आदित्य और इशिता पर टिकी थी, धीरे से रतन और खुराना की तरफ़ मुड़ गई, हर तार को जोड़ती हुई एक ख़ामोश तमाशबीन।
रतन ने मुड़कर इशिता को देखा, मुस्कुराए, और अपने हाथ के इशारे से उसे क़रीब बुलाया, एक ऐसी बालकनी की तरफ़ जहाँ संगीत की आवाज़ हल्की पड़ जाती थी। ... "आ, बेटा, दो मिनट अकेले में बात करनी है," उन्होंने कहा, और इशिता के पैर उसके दिमाग़ से पहले उस तरफ़ मुड़ गए।
बालकनी पर रात की हवा ठंडी थी, और नीचे बेंगलुरु की रोशनियाँ किसी बिछे हुए क़ालीन जैसी फैली थीं। संगीत की आवाज़ भीतर से धीमी होकर आ रही थी, जैसे किसी और दुनिया से। ... रतन ने दरवाज़ा हल्का सा भेड़ दिया, और अब बस वो दोनों थे।
"बेटा, तू यहाँ इतनी अच्छी कर रही है, मुझे यक़ीन ही नहीं होता।" ... "तेरे पापा को अगर पता चले कि तू किस मुक़ाम पर पहुँच गई है... वो रो पड़ेंगे, अच्छे आँसू।"
"चाचा, मैं वही कर रही हूँ जो आप और पापा ने भेजा था।" ... "आर्काइव तक अभी पूरी पहुँच नहीं बनी, पर बन जाएगी। बस थोड़ा और वक़्त।"
रतन के चेहरे पर मुस्कान वैसी ही रही, पर उनकी आँखों में कुछ एक पल के लिए तेज़ हो गया, जैसे कोई शिकारी अपने निशाने के पास पहुँच कर साँस रोक ले। ... "आर्काइव की बात छोड़, बेटा। एक और काम है, ज़्यादा ज़रूरी।"
"अगर तुझे वहाँ कोई पुराना काग़ज़ मिले, कोई भी कॉन्ट्रैक्ट, जिस पर हमारे घर का नाम हो, सिन्हा नाम..." ... "...तो उसे पढ़ना मत, बचाना मत। बस मिटा देना, बेटा। जला देना, फाड़ देना, जो भी बन पड़े। अपने पापा की हिफ़ाज़त के लिए।"
"पर चाचा... अगर वो काग़ज़ मिल जाए, तो वही तो हमारा सबूत होगा।" ... "अगर पापा की तकनीक चुराई गई थी, तो एक पुराना कॉन्ट्रैक्ट हमारे ख़िलाफ़ कैसे जा सकता है? वो तो हमें बचाएगा।"
"क़ानून अजीब चीज़ है, बेटा।" ... "पुराने काग़ज़ात को ग़लत हाथ ग़लत तरीक़े से मोड़ सकते हैं। कोई वकील, कोई अख़बार, कोई भी उसे उलटा पढ़ ले तो तेरे पापा को ही फिर अदालत में घसीट सकता है। मैं बस... मैं बस उन्हें दोबारा उस तकलीफ़ से बचाना चाहता हूँ।"
इशिता ने सिर हिलाया, हामी भरी, पर भीतर कहीं एक कील गड़ गई। ... एक आविष्कारक की बेटी की तरह, वो सोचे बिना नहीं रह सकी: अगर कोई काग़ज़ बेगुनाही का सबूत है, तो उसे छुपाया नहीं, दिखाया जाता है। छुपाया वो जाता है जो गुनाह कहे।
"और एक बात और, बेटा।" ... "उस कंपनी में किसी वर्धान के बहुत क़रीब मत जाना। न दोस्ती में, न किसी और चीज़ में। वो लोग अपने फ़ायदे के लिए किसी को भी अपना बना लेते हैं, फिर निचोड़ कर फेंक देते हैं। मैंने अपनी आँखों से देखा है।"
उन्होंने उसे गले लगाया, वही गर्मजोशी, वही पुरानी ख़ुशबू जो इशिता को बचपन से जानी-पहचानी थी, और फिर मुस्कुराते हुए वापस भीड़ में चल दिए, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
इशिता बालकनी की रेलिंग पर अकेली खड़ी रह गई, हॉल का शोर पीछे कहीं दूर, धुँधला पड़ता हुआ। ... उसका दिमाग़, जो कभी बंद नहीं होता, उस एक निर्देश को बार-बार खोल कर देखने लगा।
और तभी आदित्य की वो आख़िरी फुसफुसाहट, "आज की बात अभी ख़त्म नहीं हुई," उसके कानों में फिर से गूँज उठी, ठीक उसी लम्हे जब उसके चाचा का हुक्म अभी भी उसकी हथेली पर जल रहा था। ... एक तरफ़ वो आदमी जिसका भरोसा वो हर रोज़ चुराती थी, दूसरी तरफ़ वो ख़ून जिसका हुक्म वो हर रोज़ मानती आई थी, और आज पहली बार दोनों तराज़ू के दो अलग पलड़ों पर जा बैठे।
"मैं दोनों की बात नहीं मान सकती।" ... "एक तरफ़ इंसाफ़ है, दूसरी तरफ़ ख़ामोशी। और चाचा अब मुझसे ख़ामोशी माँग रहे हैं।"
"मिटा देना... जला देना..." ... "बचाना नहीं, मिटाना। इंसाफ़ का सबूत बचाया जाता है, चाचा। मिटाया वो जाता है जो किसी को फंसाए।"
और तभी वो अधूरा नाम उसकी आँखों के आगे फिर से जल उठा, वो आधा फटा हुआ दस्तख़त जो उसने सीलबंद तहख़ाने से चुराया था, जिसके बचे हुए अक्षर उसके अपने ख़ानदान के थे। ... अब तक वो सोचती थी वो नाम कोई खोया हुआ सुराग़ है। पर अगर चाचा ही उसे मिटाना चाहते हैं, तो शायद वो सुराग़ नहीं, वो पर्दाफ़ाश है।
"चाचा नहीं चाहते कि वो काग़ज़ मिले।" ... "चाचा चाहते हैं कि वो कभी न मिले। कभी किसी को न दिखे।"
और उसी पल इशिता को समझ आया, ठंडे, बर्फ़ीले साफ़ में, कि जिस मिशन पर उसे भेजा गया था, वो मिशन कभी वो मिशन था ही नहीं। ... उसे भेजा नहीं गया था सबूत ढूँढने। उसे भेजा गया था ये पक्का करने कि कोई और उसे न ढूँढे, कि वो ख़ुद अपने हाथों से आख़िरी निशान मिटा दे।
"मैं जासूस नहीं थी, चाचा।" ... "मैं आपकी सफ़ाई-कर्मी थी।"
नीचे शहर की रोशनियाँ वैसे ही जगमगा रही थीं, बेख़बर, ख़ूबसूरत। ... और इशिता की जेब में, उसके फ़ोन में, वो अधूरा फटा हुआ नाम अब एक सुराग़ नहीं रहा था। वो एक बम था, जिसका फ़्यूज़ किसी और ने नहीं, ख़ुद उसके अपने घर वाले ने जलाया था।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।