Chapter 22 of 26 9 min read
मालिक का पाप
कैलाश वर्धान के फ़ार्महाउस में इशिता सबूत सामने रखकर उन्हें उनकी दस साल की ख़ामोशी का आईना दिखाती है, और कैलाश आख़िरकार मान लेते हैं कि वो हमेशा से जानते थे। एक परखने वाली फ़ोन-कॉल पर ख़ुराना की एक फिसलन से पता चलता है कि आख़िरी सबूत आज रात ही जलाया जाना है।
दरवाज़ा उसके पीछे बंद हो गया, और भीतर की हवा बाहर की ठंड से अलग थी, भारी, पुरानी, किसी अनकहे गुनाह की गंध लिए हुए। ... लकड़ी की पुरानी अलमारियाँ, ट्रॉफ़ियाँ, एक शतरंज की मेज़ जिस पर बरसों से कोई चाल नहीं चली गई थी, हर चीज़ एक साम्राज्य के इत्मीनान की गवाही दे रही थी। ... बरामदे से होते हुए भीतर के कमरे में वो दीवार आई, जहाँ वर्धान ख़ानदान की तीन पीढ़ियाँ तस्वीरों में मुस्कुरा रही थीं, और उन तस्वीरों के बीच कहीं किशोर सिन्हा का नाम नहीं था।
"बैठो। इस वक़्त, इस काग़ज़ में जो कुछ भी है, वो खड़े होकर नहीं सुना जाता।" ... "बोलो, बेटा। जो कहने आई हो, कहो। मैं सुनने के लिए ही जागा बैठा हूँ।"
"मैं बैठने नहीं आई, सर।" ... "मैं इशिता सिन्हा हूँ। किशोर सिन्हा की बेटी। जिस आविष्कारक को दस साल पहले आपकी कंपनी ने बर्बाद किया, उन्हीं की बेटी, जो एक जासूस बनकर आपकी कंपनी में घुसी थी।" ... "और मैं आज रात आपके दरवाज़े पर इसलिए हूँ क्योंकि मेरे पापा का दिल अब पहले जैसा मज़बूत नहीं रहा, सर। हर साल का झूठ उन्हें थोड़ा और तोड़ता गया है। मेरे पास वक़्त नहीं है कि मैं दस साल और इंतज़ार करूँ।"
कैलाश के चेहरे पर हैरानी नहीं आई, सिर्फ़ एक थकी हुई पुष्टि जैसी कोई चीज़, जैसे उन्हें ये बात कब से पता थी और सिर्फ़ ज़ुबान से सुनने का इंतज़ार था। ... उन्होंने "किशोर सिन्हा" नाम सुनते ही आँखें बंद कर लीं, एक पल के लिए, जैसे कोई पुराना दर्द अचानक ताज़ा हो गया हो।
"सिन्हा... वो नाम मैंने दस साल में एक बार भी भूलने नहीं दिया, भले ना चाहते हुए।" ... "तुम्हारे पापा की तबीयत के लिए मुझे अफ़सोस है, सच में। पर बेटा, अदालत ने फ़ैसला दिया था। मैंने कोई चोरी नहीं की। क़ानून मेरे साथ था।"
इशिता ने वो लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रख दिया, धीरे से, जैसे कोई फ़ैसला रखा जा रहा हो। "क़ानून आपके साथ था, सर, क्योंकि क़ानून तक वही काग़ज़ पहुँचे थे जो आपने पहुँचने दिए।" ... "असली काग़ज़ इस लिफ़ाफ़े में है। सह-मालिकाना दस्तावेज़, मेरे पापा और उनके अपने भाई रतन सिन्हा के बीच का। आपके पेटेंट किसी चोरी से नहीं आए, सर। वो एक बिकवाली से आए, जिसे आपकी कंपनी ने चोरी की तरह सजाया।"
कैलाश ने काँपते हाथों से वो काग़ज़ उठाया, चश्मा ठीक किया, और उसे दो बार पढ़ा। ... उनकी उँगलियाँ उस दस्तख़त पर रुक गईं, रतन सिन्हा के दस्तख़त पर, और उनका चेहरा कुछ देर के लिए पूरी तरह ख़ाली हो गया।
"मुझे... मुझे ये दस्तख़त पहचानने की ज़रूरत नहीं थी।" ... "क्योंकि दस साल पहले जब खुराना ये डील मेरे सामने लाया था, मैंने पूछा था, 'ये सारे हक़ साफ़ हैं ना।' उसने कहा था, 'हाँ, सर।' और मैंने आगे नहीं पूछा। क्योंकि मुझे जवाब पता होता, तो मैं वो पेटेंट ले ही नहीं पाता।"
कमरे में एक भारी ख़ामोशी उतर आई, वो ख़ामोशी जो किसी झूठ से ज़्यादा भारी होती है, क्योंकि इसमें कोई झूठ था ही नहीं, सिर्फ़ एक चुनाव था, ना पूछने का चुनाव।
"आपने ना पूछ कर मेरे पापा को बर्बाद होने दिया, सर।" ... "और आज, ठीक इसी वक़्त, वही खुराना आपके अपने बेटे का सपना, फ़ीनिक्स, उसी तरह चुराने की तैयारी में है। आप फिर वही चुनाव कर रहे हैं, ना पूछने का चुनाव। बस इस बार जो बर्बाद होगा, वो कोई अजनबी इंजीनियर नहीं, आपका अपना ख़ून है।"
कैलाश की आँखों में कुछ टूटा, गर्व नहीं, कुछ उससे पुराना, कोई ऐसी चीज़ जो उन्होंने ख़ुद से भी दशकों तक छुपाई थी। ... उन्होंने वो काग़ज़ मेज़ पर रख दिया, अपने हाथ को स्थिर करने की कोशिश करते हुए, नाकाम रहे।
"तुम्हें लगता है मैं नहीं जानता था, बेटा?" ... "मैं जानता था। शायद पूरी तरह नहीं, पर काफ़ी। जब कोई अकेला आविष्कारक अचानक अपने सारे हक़ किसी दूसरे नाम पर बेच देता है, और वो नाम ग़ायब हो जाता है, तो एक चेयरमैन को पूछना चाहिए था। मैंने नहीं पूछा, क्योंकि उन्हीं पेटेंट्स ने वर्धान इंडस्ट्रीज़ को अगले दस साल में तीन गुना कर दिया।" ... "उस रात मैंने ख़ुद से एक वादा किया था कि एक दिन, अगर कोई कभी सवाल पूछने आया, तो मैं झूठ नहीं बोलूँगा। दस साल हो गए, बेटा। मुझे नहीं पता था वो सवाल एक बेटी के मुँह से आएगा।"
खिड़की के बाहर फ़ार्महाउस का बग़ीचा अंधेरे में डूबा हुआ था, और कैलाश की आवाज़ में पहली बार वो थकान थी जो पैसे या ताक़त से कभी नहीं मिटती।
"सिर्फ़ मान लेना काफ़ी नहीं है, सर।" ... "पर आज तक आपने जो एक भी सच नहीं बोला था, वो आज बोला। इतना तो मानती हूँ।"
"और आदित्य को मैंने कभी वो भरोसा नहीं दिया जो एक बाप को बेटे को देना चाहिए, क्योंकि मैं डरता था कि वो कभी पूछ ले वो सवाल जो मैंने ख़ुद से कभी नहीं पूछा।" ... "आज रात, तुम्हारी वजह से, मुझे वो सवाल पूछना पड़ रहा है जो मैंने दस साल टाला। इसके लिए... शुक्रिया, और माफ़ी, दोनों।"
"वो आपसे इतना डरता है कि दुनिया पर हँस भी नहीं पाता खुल कर, सर, पर वो सबसे भरोसेमंद आदमी है जिससे मैं कभी मिली।" ... "आज दोपहर उसने मुझे निकाल दिया, क्योंकि मैंने उससे झूठ बोला, और वो सही था। पर उसका भरोसा असली था, सर, हर एक बार। सिर्फ़ मेरा झूठ नक़ली था।"
कैलाश कुछ देर चुप बैठे रहे, फिर धीरे से उठे और दीवार की तरफ़ बढ़े, जहाँ एक पुराना लैंडलाइन फ़ोन रखा था, दफ़्तर की सीधी लाइन। ... उन्होंने रिसीवर उठाया, नंबर घुमाना शुरू किया, और इशिता को इशारे से चुप रहने को कहा।
"चुप रहना। मैं देखना चाहता हूँ, वो अभी क्या कहता है, जब उसे नहीं पता कि कोई सुन रहा है।"
दूसरी तरफ़ फ़ोन दो बार बजा, फिर उठा। आवाज़ आई, चौंकी हुई, पर तुरंत ख़ुद को सँभालती हुई, वो आवाज़ जो हर हाल में इत्मीनान ओढ़ना जानती थी।
"सर? इस वक़्त? सब ठीक तो है?" ... "मैं अभी दफ़्तर में ही हूँ, बस कुछ पुरानी फ़ाइलों का हिसाब निपटा रहा था, महीने के आख़िर का रूटीन काम।" ... "आप इतनी रात को जागे हुए क्यों हैं, सर? तबीयत तो ठीक है ना आपकी?"
कैलाश की आवाज़ इत्मीनान से भरी रही, बिल्कुल वैसी जैसी वो चालीस साल से बोर्ड मीटिंगों में इस्तेमाल करते आए थे।
"अच्छा। कौन सी फ़ाइलें, खुराना? इतनी रात को कौन सा रूटीन काम इतना ज़रूरी हो जाता है कि तुम घर नहीं गए?" ... "और सह-मालिकाना वाली पुरानी फ़ाइलें भी उसी हिसाब में हैं क्या?"
दूसरी तरफ़ एक पल की ख़ामोशी आई, बहुत छोटी, पर इशिता ने कैलाश की आँखों में देखा, उन्होंने वो पल पकड़ लिया था।
"सर, आप जानते हैं, रिकॉर्ड रिटेंशन पॉलिसी। दस साल पुरानी फ़ाइलें, जिनका अब कोई क़ानूनी इस्तेमाल नहीं, उन्हें साफ़ करना ही ठीक रहता है।" ... "वैसे भी, आज रात तक आर्काइव का ये हिस्सा पूरी तरह ख़ाली हो जाएगा। कल सुबह से नया ऑडिट शुरू होना है, सब कुछ साफ़ चाहिए।"
कैलाश ने फ़ोन धीरे से रख दिया, बिना कुछ और कहे, उनका चेहरा किसी बुझे हुए दीये जैसा पड़ गया। ... उन्होंने इशिता की तरफ़ देखा, और पहली बार उस रात उनकी आवाज़ में डर था, अपनी कंपनी के लिए नहीं, अपने बेटे के लिए।
"सर... क्या कहा उसने? आर्काइव ख़ाली हो जाएगा, मतलब क्या?"
"मतलब वो आज रात, अभी, उसी सीलबंद तहख़ाने की आख़िरी हार्ड कॉपी जला रहा है, जहाँ तुम पकड़ी गई थीं।" ... "जो काग़ज़ इस पूरे सच को अदालत में साबित कर सकता है, असली अधिग्रहण फ़ाइल, वो अभी भी वहीं है। और अगर आज रात वो जल गई, तो कल सुबह कोई सबूत नहीं बचेगा, ना तुम्हारे पापा के लिए, ना आदित्य के लिए।"
"सर, अगर वो अभी जला रहा है, तो एक-एक मिनट मायने रखता है। मुझे मदद चाहिए।"
"मैं तुम्हें भेज नहीं सकता, बेटा, मैं ख़ुद अब भी वर्धान इंडस्ट्रीज़ हूँ, चोर नहीं।" ... "पर मैं इतना कर सकता हूँ, अभी खुराना को फिर फ़ोन करके किसी बहाने से पंद्रह मिनट के लिए रोक सकता हूँ। उसके बाद, वो दरवाज़ा और उसके पीछे का सच, दोनों तुम्हारे हाथ में हैं, मेरे नहीं।"
इशिता ने सोचा, पंद्रह मिनट में अकेले वो तहख़ाने तक पहुँच भी जाए, तो अंदर उसका साथ कौन देगा, आदित्य ने तो उसे टीम से ही निकाल दिया था, बैज मेज़ पर रखवा कर। ... उसे पापा का भी ख़याल आया, अस्पताल की उस आख़िरी रिपोर्ट का, डॉक्टर की उस चेतावनी का कि अब कोई झटका उनका दिल बर्दाश्त नहीं कर पाएगा, और उसे एहसास हुआ कि आज रात वो सिर्फ़ एक फ़ाइल नहीं बचा रही, वो अपने पापा को ज़िंदा सच के साथ लौटाने की आख़िरी उम्मीद बचा रही है। ... दीवार पर टँगी घड़ी ने रात के डेढ़ बजे का इशारा दिया, और इशिता को एहसास हुआ कि उसके पास अब घंटे नहीं, मिनट बचे हैं, कोई टीम नहीं, कोई बैज नहीं, बस एक जलता हुआ तहख़ाना और एक ख़ाली सड़क।
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