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Chapter 15 of 26 8 min read

ख़रीदा हुआ मसीहा

अंदर की बात by Avni Oberoi

सुबह की रोशनी में भी इशिता की आँखों के आगे अब भी वही एक तस्वीर घूम रही थी, चाचा का नाम एक शेल कंपनी के काग़ज़ों के बीच, ख़ुराना का दस्तख़त उसके ठीक नीचे। ... पर उसने ख़ुद को याद दिलाया, एक जासूस की तरह नहीं, एक इंजीनियर की तरह, पैसा सिर्फ़ ये साबित करता है कि किसी को भुगतान मिला, ये नहीं कि दोनों ने मिलकर पापा की तकनीक बेचने की साज़िश रची थी।

जो सबूत उसे चाहिए था, वो एक ऐसा काग़ज़ या एक ऐसी चिट्ठी थी जो सीधे चाचा और ख़ुराना को दस साल पहले उसी सौदे में एक साथ बाँधे, और वो काग़ज़ पैसे में नहीं, ख़ुराना के अपने रिकॉर्ड में कहीं दबा पड़ा होगा। ... उसने तय कर लिया, अब वो चाचा का पीछा छोड़कर ख़ुराना का पीछा करेगी, उस आदमी का जो अब तक उसके लिए सिर्फ़ एक परछाईं था।

"पैसे का सुराग़ काफ़ी नहीं है।" ... "मुझे वो काग़ज़ चाहिए जो चाचा और ख़ुराना को एक साथ बाँधे, वरना ये सिर्फ़ एक शक रह जाएगा, सबूत नहीं।"

और इशिता को साफ़ पता था कि ये अब चाचा वाला मामला नहीं रहा, चाचा प्यार में अंधा हो सकता है, माफ़ी माँग सकता है, टूट सकता है, पर ख़ुराना एक अलग जानवर था, वो आदमी जिसके पास सबसे ज़्यादा खोने को था और सबसे कम रहम था। ... एक पल के लिए उसने सोचा कि पीछे हट जाए, पापा के लिए जितना सबूत मिल चुका था वो भी काफ़ी हो सकता था, पर फिर उसे वो आधा हस्ताक्षर याद आया जिसने उसे यहाँ तक पहुँचाया था, और वो पीछे नहीं हट सकी।

लैब में आदित्य ने उसे देखकर वही मुस्कान दी जो अब उसकी हर सुबह का हिस्सा बन चुकी थी, और पूछा कि रात ठीक से सोई या नहीं, और इशिता ने हँसकर टाल दिया, "बस काम का बोझ है," एक झूठ जितना छोटा उतना ही भारी।

दोपहर में स्कंकवर्क्स और लीगल के बीच एक फ़ाइल-हैंडओवर का बहाना मिला, कुछ पुराने पेटेंट फ़ॉर्म जो ख़ुराना के दफ़्तर की पुरानी अलमारी से आने थे, और आदित्य ने पूछा कि क्या वो ये काम संभाल लेगी।

"तुम जाओगी? ख़ुराना सर थोड़े सख़्त हैं, पर तुम तो सबको सँभाल लेती हो।" ... "मुझे तुम पर पूरा भरोसा है, इशिता। हमेशा की तरह।"

"चिंता मत करो, आदित्य। मैं संभाल लूँगी।"

क्योंकि जिस भरोसे की बुनियाद पर वो आज ख़ुराना के गलियारे तक पहुँचने वाली थी, वो भरोसा भी उसी आदमी का दिया हुआ था जिसे वो हर रोज़ धोखा दे रही थी। ... ख़ुराना का केबिन तीसवीं मंज़िल के सबसे शांत कोने में था, भारी लकड़ी का दरवाज़ा, पुरानी किताबों की महक, और एक अलमारी जो दस साल से किसी ने ठीक से खँगाली नहीं थी।

ख़ुराना ख़ुद एक मीटिंग में थे, उनकी सहायिका चाय के लिए निकल चुकी थी, और इशिता के पास मुश्किल से सात-आठ मिनट थे। उसने अलमारी की पुरानी फ़ाइलें तेज़ी से पलटीं, ज़्यादातर पेटेंट फ़ॉर्म, कुछ पुराने मेमो, कुछ बेमानी काग़ज़। ... और तभी एक पुरानी डायरी के आख़िरी पन्नों में, दस साल पुरानी तारीख़ों के बीच, उसे बार-बार दोहराते दो अक्षर मिले, 'आर.एस.', हर महीने लगभग उसी तारीख़ के आसपास, एक मुलाक़ात का इशारा।

"आर.एस... रतन सिन्हा।" ... "पर सिर्फ़ शुरुआती अक्षर काफ़ी नहीं, ये कोई भी हो सकता है। मुझे पूरा नाम चाहिए, या कोई तारीख़ जो सौदे की तारीख़ से मिले।"

उसने डायरी की उन तारीख़ों को अपने दिमाग़ में उस एक तारीख़ से मिलाया जो अब उसे ज़बानी याद थी, विक्रय-पत्र की तारीख़, और एक एंट्री ठीक उसी हफ़्ते की निकली, दो लाइनों में सिमटी हुई, 'आर.एस. के साथ मुलाक़ात, अंतिम बात तय।' ... इतना क़रीब, फिर भी इतना दूर, क्योंकि 'अंतिम बात' किस बात की थी, ये डायरी में कहीं नहीं लिखा था, और पूरा नाम अब भी एक पहेली था।

उसने डायरी के उन पन्नों की जल्दी-जल्दी तस्वीरें खींचीं, ठीक तभी जब गलियारे में क़दमों की आहट सुनाई दी, भारी, नपे-तुले, किसी अफ़सर की चाल। ... इशिता ने अलमारी बंद की, फ़ाइल उठाई और दरवाज़े से बाहर निकली, ठीक उसी पल जब ख़ुराना ख़ुद कोने से मुड़े, अपनी सहायिका के पीछे-पीछे चाय का कप लिए।

"आप... स्कंकवर्क्स की इंटर्न हैं ना? यहाँ कैसे?" ... "कोई काम था मेरे केबिन में?"

"जी सर, पुराने पेटेंट फ़ॉर्म लेने आई थी, लीगल हैंडओवर के लिए। आपकी सहायिका ने ही बताया था कहाँ मिलेंगे।"

ख़ुराना ने सिर हिलाया और रास्ता दे दिया, पर उनकी नज़र एक पल के लिए ज़्यादा देर टिकी रही, उस तरह जैसे कोई शिकारी हवा में एक अजनबी गंध पकड़ लेता है। ... इशिता सीधी चाल से गलियारे के मोड़ तक चली गई, बिना पीछे देखे, दिल धड़कनों में पूरा तूफ़ान समेटे हुए।

दोपहर से पहले देविका मलिक ख़ुद नकुल के केबिन में आई थी, हाथ में एक टैबलेट लिए, वही तराशी हुई मुस्कान जो अब उसकी जासूसी का सबसे तेज़ हथियार बन चुकी थी।

"मैंने सिक्योरिटी टीम से थोड़ी मदद ले ली, नकुल। लगता है तुम्हें जो चाहिए था, वो मिल गया।" ... "आदित्य को उस इंटर्न से दूर करने का इससे साफ़ रास्ता नहीं मिलेगा। इस्तेमाल करो इसे।"

"देविका, तुम भी ना... कभी-कभी मुझे लगता है तुम मुझसे ज़्यादा होशियार हो।"

उसी दोपहर, इमारत के दूसरे कोने में, नकुल वर्धान अपनी स्क्रीन पर बैज-लॉग की एक नई फ़ेहरिस्त खँगाल रहा था, देविका की दी हुई एक अंदरूनी रिपोर्ट के सहारे, जो अब खुलेआम उसकी जाँच में शामिल हो चुकी थी। ... हफ़्तों की एंट्री, दर्जनों नाम, पर एक पैटर्न बार-बार उभर रहा था, वही एक बैज नंबर, हर बार लीगल फ़्लोर के क़रीब, हर बार ठीक उसी वक़्त जब कुछ ग़ायब हुआ या कुछ लीक हुआ।

"यही है... हर बार यही एक बैज।" ... "बहुत दिनों से जिस इंटर्न का नाम इस टावर में हर तरफ़ गूँज रहा है, अब उसी का नाम इस लिस्ट में सबसे ऊपर आ रहा है।"

नकुल ने वो फ़ेहरिस्त प्रिंट की और सीधे ख़ुराना के केबिन की तरफ़ चल पड़ा, अपनी सबसे बड़ी हार के बाद पहली बार किसी जीत की बू सूँघते हुए। ... ख़ुराना अभी-अभी अपनी कुर्सी पर बैठे ही थे, चाय का कप हाथ में, जब नकुल बिना दस्तक दिए भीतर आ गया, काग़ज़ों का पुलिंदा हाथ में लहराते हुए।

"सर, मुझे लगता है मुझे मिल गया।" ... "बैज-लॉग का पूरा पैटर्न, हफ़्तों का। हर बार एक ही इंटर्न, लीगल फ़्लोर के आस-पास, हर बार ग़लत वक़्त पर।"

"कौन?"

उन्होंने कप मेज़ पर रख दिया, चाय की भाप के बीच से उनकी आँखें अचानक बहुत साफ़ हो गईं।

"वही स्कंकवर्क्स वाली, इशिता सिन्हा।" ... "जो अभी कुछ ही मिनट पहले, सर, आपके ही केबिन से निकलती दिखी थी।"

और ख़ुराना के दिमाग़ में दो धागे एक साथ जुड़ गए, वो लड़की जो अभी उनके केबिन में मिली थी, और वो पुराना अलार्म जो जलसे की रात बजा था, टर्मिनल सात पर। ... दस साल तक सोया हुआ एक राज़ अब करवट ले रहा था, और ख़ुराना को अचानक साफ़ दिखने लगा कि ये कोई मामूली मोल-हंट नहीं था।

"नकुल, ये मामला अब सिर्फ़ एक लीक का नहीं रहा।" ... "अब से इस जाँच को मैं ख़ुद संभालूँगा। तुम बस मेरे लिए एक काम करो।"

"जी सर, बताइए।" ... "मैं जो भी चाहिए, अभी करवा दूँगा।"

"हर इंटर्न का पूरा एक्सेस लॉग, पिछले तीन महीनों का, हर बैज, हर दरवाज़ा, हर मिनट। आज शाम तक मेरी मेज़ पर चाहिए।" ... "और उस इशिता सिन्हा की फ़ाइल सबसे ऊपर रखना। मैं ख़ुद उससे मिलना चाहता हूँ।"

"सर, अगर सिर्फ़ लीक की बात है, तो मैं ख़ुद इंटर्न से पूछताछ कर सकता हूँ..." ... "...माफ़ी, सर। आज शाम तक लॉग आपकी मेज़ पर होंगे।"

"ये सिर्फ़ लीक की बात नहीं है, नकुल।" ... "बस वो लाओ जो मैंने कहा, और इस बातचीत को इसी कमरे में छोड़ दो।"

खिड़की के बाहर वर्धान टावर हमेशा की तरह चमक रहा था, बेख़बर, जबकि तीसवीं मंज़िल के इस एक केबिन में, वो आदमी जिसके पास सबसे ज़्यादा खोने को था, अब ख़ुद उस जासूस का शिकार करने निकल पड़ा था जो अब तक सिर्फ़ एक शक थी। ... दस साल पहले जिस चुप्पी ने ख़ुराना को बचाया था, वही चुप्पी अब हथियार बनकर एक बार फिर सक्रिय हो रही थी, और इस बार निशाने पर एक कंपनी नहीं, एक इंटर्न की शक्ल में एक जान थी। ... तीस मंज़िल नीचे, अपनी मेज़ पर बैठी इशिता को अभी ये पता नहीं था कि उसका नाम, ठीक इसी पल, वर्धान इंडस्ट्रीज़ के सबसे ख़तरनाक आदमी की ज़ुबान पर, एक शिकार की तरह गूँज उठा था।

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