Chapter 6 of 26 12 min read
काग़ज़ों का जाल
अपनी टूटती दुनिया को थामने के लिए इशिता ख़ुद को यक़ीन दिलाती है कि वो विक्रय-पत्र वर्धान का गढ़ा हुआ नक़ली सौदा है, चोरी को क़ानूनी दिखाने की एक चाल, और असली दस्तख़त तक पहुँचने के लिए उसे तहख़ाने में उतरना है। उधर स्कंकवर्क्स का एक डिज़ाइन बाहर लीक हो जाता है, नकुल एक औपचारिक जाँच बैठा देता है और मोल-हंट सीधे इशिता की तरफ़ मुड़ने लगता है, जबकि वो भाँप लेती है कि ये लीक दरअसल आदित्य को फँसाने की साज़िश है। जुगनू अनजाने में बता देता है कि हर बैज की एंट्री का हिसाब निकल रहा है, और आख़िरी खिड़की समझकर इशिता उसी रात फिर लीगल माले पर उतरती है, जहाँ नकुल के गश्त में लगभग पकड़ी जाती है और आदित्य बिना
सारी रात वो एक ही शब्द इशिता की छाती पर पत्थर बनकर बैठा रहा। ... विक्रय। ... भोर की पहली सफ़ेदी खिड़की पर उतर आई, पर इशिता की आँखें अब भी फ़ोन की उसी नीली रोशनी में गड़ी थीं, उसी अधूरे टुकड़े पर, जिसने उसकी दस साल पुरानी दुनिया को एक ही झटके में हिला दिया था।
"नहीं। ... ये हो ही नहीं सकता। ... पापा झूठ नहीं बोल सकते। दस साल से एक ही बात कहते आए हैं। अगर उन्होंने कहा चोरी, तो चोरी ही थी। ज़रूर कुछ और है इसमें।"
और फिर, अपनी ही ढहती दुनिया को थामने के लिए, इशिता ने एक कहानी गढ़ ली, ठीक वैसे जैसे डूबता आदमी हवा को मुट्ठी में भरना चाहता है। ... अगर वर्धान को चोरी को क़ानूनी दिखाना हो, तो? अगर उन्होंने एक नक़ली विक्रय-पत्र बनाया हो, एक झूठा सौदा, ताकि डाके को एक साफ़-सुथरे कारोबार का चेहरा दिया जा सके? ... हाँ, यही होगा। ये विक्रय असली नहीं, वर्धान का गढ़ा हुआ झूठ है। पापा सच्चे हैं। बस इतनी सी बात है।
"यही है। ... वर्धान ने चोरी को इस नक़ली काग़ज़ से धोया है। ... और मुझे बस यही साबित करना है, कि ये विक्रय-पत्र जाली है। असली दस्तख़त, असली नाम, वो सब उसी तहख़ाने में बंद है। मुझे किसी भी तरह वहाँ पहुँचना है।"
पर जैसे ही उसने ख़ुद को समझाया, एक बारीक सी आवाज़ फिर उसके भीतर काँपी, चाचा की आवाज़। ... 'किसी और नाम को मत छेड़ना।' ... अगर सब कुछ वर्धान का किया-धरा है, तो चाचा को किसी और नाम का इतना डर क्यों? किस नाम से? ... इशिता ने आँखें भींच लीं और उस सवाल को फिर उसी तहख़ाने में धकेल दिया, जहाँ वो बाक़ी हर सवाल दफ़न करती आई थी।
उस सुबह वर्धान का टावर किसी छेड़े हुए छत्ते की तरह भिनभिना रहा था। ... लिफ़्ट से निकलते ही इशिता को हवा में वो तनाव छू गया, वो सरगोशियाँ, वो झट से बंद होते दरवाज़े। कुछ हुआ था, कुछ बड़ा।
"इशिता! सुना तुमने? ... हमारी लैब का एक डिज़ाइन बाहर निकल गया है। स्कंकवर्क्स का एक हिस्सा, किसी ग़ैर के हाथ लग गया। ... और नकुल सर आग-बबूला हैं। कह रहे हैं, लीक हमारी अपनी टीम के अंदर से हुआ है।"
"लीक?" ... "पर हमारी टीम तो इतनी छोटी है, रीमा। ... कौन करेगा ऐसा? और... कौन सा डिज़ाइन बाहर गया?"
इशिता का दिल पसलियों से टकरा रहा था। ... एक जासूस के लिए इससे भयानक कोई शब्द नहीं होता, लीक। ... पर जो हिस्सा बाहर गया था, उसे तो इशिता ने छुआ तक नहीं था। ये किसी और का किया था, और यही बात उसे राहत नहीं, एक और गहरा डर दे रही थी।
तभी लैब का दरवाज़ा खुला और नकुल वर्धान अंदर आया, पीछे सिक्योरिटी के दो आदमी। ... उसकी नज़र पूरे कमरे पर यूँ फिरी, जैसे क़साई की छुरी माँस पर फिरती है।
"तो ये है आदित्य की मशहूर 'ख़ुफ़िया' टीम। ... इतनी ख़ुफ़िया कि इसके डिज़ाइन आधे शहर की जेबों तक पहुँच गए। ... आज से इस लैब में एक औपचारिक जाँच बैठ रही है। हर बैज, हर एंट्री, हर फ़ाइल का हिसाब निकलेगा। और जिसने भी ये किया है, मैं उसे इसी इमारत में, सबके सामने बेनक़ाब करूँगा।"
"नकुल। ... मेरी टीम पर उँगली उठाने से पहले ज़रा ये भी तो सोचो कि ये डिज़ाइन बाहर गया कैसे। ... मेरी लैब की फ़ाइलें इस पूरी इमारत में सिर्फ़ दो लोगों की पहुँच में हैं। और उन दो में से एक तुम ख़ुद हो।"
एक पल को कमरे की हवा जम गई। ... जिस आदित्य को बोर्ड नरम दिल दिवास्वप्नी कहकर हँसता आया था, उसने अभी-अभी नकुल पर सीधा एक तीर छोड़ा था। ... और इशिता ने पहली बार देखा कि इस नरम आदमी के भीतर एक धार भी थी, जो सिर्फ़ अपनों की ढाल बनने पर बाहर आती थी।
"बड़ी हिम्मत आ गई है तुझमें, आदित्य। ... कोई नई ताक़त मिली है क्या? कोई नई... इंटर्न?" ... और नकुल की नज़र सीधी इशिता पर आकर रुक गई, उसी नज़र में वो लाल घेरा तैर रहा था, जो उसने हफ़्तों पहले उसकी फ़ाइल पर अपने हाथों खींचा था।
उस एक नज़र ने इशिता को सिर से पैर तक नाप लिया। ... मोल-हंट शुरू हो चुका था, और जाल का पहला धागा सीधे उसी की तरफ़ खिंच रहा था।
फिर भी एक बात इशिता के दिमाग़ में खटकती रही। ... जो हिस्सा 'लीक' हुआ था, वो तो लैब में बस दो दिन पहले आया था, और नकुल ने ऐन उसी हिस्से का नाम लिया, जैसे उसे पहले से मालूम हो कि क्या बाहर गया है। ... ये लीक किसी इंटर्न की भूल नहीं लग रही थी। ये किसी का बिछाया हुआ जाल लग रहा था, और उसका असली निशाना इंटर्न नहीं, आदित्य था।
दोपहर को, जब पूरी इमारत जाँच की दहशत में डूबी थी, इशिता को गलियारे में जुगनू टकरा गया, अपनी चाय की ट्रॉली के साथ, हमेशा की तरह हर ख़बर से लबालब भरा हुआ।
"अरे मैडम जी! क्या तूफ़ान मचा है ऊपर, हे राम! ... सुना है नकुल साहब ने क़सम खाई है कि लीक करने वाले को हथकड़ी लगवा के रहेंगे। ... और पता है सबसे मज़े की बात? मुझसे कहा है, हर बैज का पूरा हिसाब निकालो। कौन कब अंदर गया, कौन कब निकला, कौन किस माले पर घूमा। पूरा चिट्ठा।"
इशिता के पैरों तले ज़मीन खिसक गई, पर होंठों पर मुस्कान वैसी ही टँगी रही। ... बैज का हिसाब। हर एंट्री। ... और कल रात, उसी नीले बैज से, वो लीगल माले पर गई थी। उसकी वो देर रात वाली एंट्री कहीं न कहीं, किसी न किसी काग़ज़ पर, स्याही में छपी पड़ी थी।
"अच्छा? पूरा हिसाब? ... तो जुगनू जी अब जासूस बन गए हैं। ... और ये हिसाब कब तक तैयार होगा? नकुल साहब को इतनी जल्दी भी क्या है?"
"जल्दी? मैडम जी, आज शाम तक मँगवाया है। ... मेरी तो कमर टूट गई पुराने रजिस्टर और कम्प्यूटर के प्रिंट खींचते-खींचते। ... पर आप अपनी चिंता मत करो, आप तो सीधी-सादी इंटर्न हो। इन बड़े लोगों की लड़ाई में आप जैसे मासूम लोगों का क्या काम? आप तो बस अपनी चाय पियो।"
और इशिता ने वो चाय ले ली, उसी आदमी के हाथों से जो अनजाने में उसकी क़ब्र खोद रहा था। ... उसकी आँखों के सामने रीमा का डरा हुआ चेहरा तैरा, जुगनू की भोली हँसी। ... इस इमारत में जितने लोग उसे अपना समझ रहे थे, उतने ही धागे थे उस जाल के, जिसमें एक दिन ख़ुद इशिता को फँसना था।
इशिता समझ गई कि कल से पूरी इमारत तालों में जकड़ दी जाएगी, हर दरवाज़ा, हर बैज, हर पहुँच। ... अगर उसे उस तहख़ाने तक, उस असली दस्तख़त तक पहुँचना है, तो आज रात, इसी आख़िरी खिड़की में। कल के बाद शायद कभी नहीं। ... डर एक तरफ़, दस साल का वादा दूसरी तरफ़। इशिता ने वादे को चुन लिया।
रात के साढ़े नौ बजे लीगल माला फिर उसी क़ब्रिस्तान जैसी ख़ामोशी में डूबा था। ... पर आज कुछ और था हवा में। आज गार्ड अकेला नहीं था। जाँच की वजह से पूरी मंज़िल पर सिक्योरिटी के गश्त बढ़ा दिए गए थे। ... और उस भारी सीलबंद दरवाज़े के उस पार, तहख़ाने में, वो नाम बंद पड़ा था, जिसकी एक झलक इशिता की पूरी दुनिया का फ़ैसला कर सकती थी।
उसने वही रिकॉर्ड्स टर्मिनल जगाया, बैज छुआया, उँगलियाँ काँप रही थीं पर तेज़ थीं। ... वो उस विक्रय-पत्र के बाक़ी हिस्से तक पहुँचना चाहती थी, उस धुंधले दस्तख़त तक, जिसे 'जाली' साबित करना उसकी आख़िरी उम्मीद थी। ... पर फ़ाइल हर बार एक ही दीवार पर जाकर ठिठक जाती, तहख़ाने की मुहर, जिसके पार टर्मिनल की पहुँच ख़त्म हो जाती थी।
तभी गलियारे में क़दमों की आहट उभरी, धीमी नहीं, तेज़, और दो लोगों की। ... इशिता ने झट से स्क्रीन बुझा दी और छाया में सिमट गई, पर भागने का कोई रास्ता नहीं था। आवाज़ें पास आती जा रही थीं। ... और उन दो आवाज़ों में एक आवाज़ नकुल की थी।
दरवाज़ा खुला, रोशनी अंदर फैली, और इशिता ठीक बीच गलियारे में खड़ी थी, बेनक़ाब, बेबस। ... उसके पास न कोई बहाना था, न कोई रास्ता। दस साल का खेल यहीं, इसी पल ख़त्म होने वाला था।
"आ, यहीं तो है वो फ़ाइल। ... इशिता, मिल गई तुम्हें? मैंने कहा था ना, आर्काइव की तरफ़ वाले रैक में देखो। ... अरे नकुल, तुम भी यहाँ? मैंने इशिता को ख़ास तौर पर लैब की पुरानी पेटेंट रेफ़रेंस निकालने भेजा है, इसी जाँच के लिए, ताकि हम साबित कर सकें कि लीक हमारी तरफ़ से नहीं हुआ।"
"इतनी रात को? ... तुम्हारी इंटर्न आधी रात को लीगल आर्काइव में अकेली घूम रही है, और तुम कहते हो ये जाँच के लिए है? ... ठीक है, आदित्य। पर याद रखना, इस मंज़िल पर अब हर क़दम गिना जा रहा है। हर एक।"
नकुल एक पल इशिता को घूरता रहा, फिर पलट कर चला गया, अपने आदमी के साथ। ... इशिता ने साँस छोड़ी, पर वो साँस राहत की नहीं थी। क्योंकि वो जानती थी, नकुल गया नहीं था, वो बस अपना अगला वार तैयार करने गया था।
और अब वो अकेली खड़ी थी, उस आदमी के सामने जिसने अभी-अभी झूठ बोलकर उसे बचाया था, ये जाने बिना कि वो उसे किससे बचा रहा है। ... इशिता के पेट में कुछ मरोड़ उठा, गले तक चढ़ आया। ये अपराधबोध अब सिर्फ़ एक ख़याल नहीं रह गया था, वो उसके जिस्म में उतर आया था, किसी मितली की तरह।
"तुम काँप रही हो। ... इशिता, क्या बात है? तुम आजकल जैसे किसी और ही दुनिया में खोई रहती हो। ... मुझे नहीं पता तुम अंदर किस चीज़ से लड़ रही हो, पर इतना जानता हूँ, जो भी है वो, तुम्हें उससे अकेले लड़ने की ज़रूरत नहीं।"
उसकी नरमी इशिता को किसी सज़ा से ज़्यादा चुभी। ... और उसी पल, न जाने कहाँ से, वो शब्द उसके गले तक चढ़ आए जो सबसे ख़तरनाक थे, कि आदित्य, मैं यहाँ आपको धोखा देने आई हूँ, मैं एक जासूस हूँ, और मेरे पापा, मेरे पापा को आपके घर ने...
"आदित्य, मैं... ... मुझे माफ़ कर दीजिए, मैं बस... मेरे पा..." ... शब्द उसके होंठों पर आकर टूट गया। उसने उसे वहीं दबा दिया, वहीं, जहाँ बाक़ी सब कुछ दबा पड़ा था। ... "मैं बस थक गई हूँ, सर। कई रातों से ठीक से सो नहीं पाई, बस इतनी सी बात है।"
आदित्य ने एक क़दम और बढ़ाया, और अपना हाथ बहुत हौले से उसके काँधे पर रख दिया। ... वो इतने पास था कि इशिता उसकी साँसों की गरमाहट महसूस कर सकती थी। दस साल में पहली बार, किसी दुश्मन के इतने क़रीब खड़ी, उसका भागने का नहीं, ठहरने का मन हुआ। ... 'ये दुश्मन का बेटा है,' उसने ख़ुद को याद दिलाया। पर आज वो सबक़ राख की तरह हवा में बिखर गया।
"मैं... मैं ठीक हूँ, सर। ... मुझे जाना होगा। बहुत देर हो गई।" ... और इशिता लगभग भागती हुई उस मंज़िल से निकल गई, अपनी बची-खुची सारी ताक़त बटोर कर, ये सोचती हुई कि आज की रात, किसी तरह, वो बच निकली।
उधर, कुछ मंज़िल ऊपर, नकुल वर्धान के दफ़्तर की रोशनी अब भी जल रही थी। ... मेज़ पर काग़ज़ों का एक मोटा पुलिंदा पड़ा था, जुगनू का बनाया वही बैज का चिट्ठा, काली स्याही में छपा हुआ।
"मासूम इंटर्न। ... हुंह। आदित्य को लगता है वो बड़ा होशियार है, इस लड़की को अपनी ढाल बनाकर। ... पर काग़ज़ झूठ नहीं बोलते, आदित्य। हर दरवाज़ा जो खुला, हर बैज जो छुआ गया, सब यहीं है, इन्हीं पन्नों में दबा हुआ।"
नकुल की उँगली पन्नों पर नीचे सरकती रही, एक-एक नाम, एक-एक वक़्त को चीरती हुई। ... लीगल माला। देर रात की एंट्रियाँ। बड़े साहबों के नाम, गार्ड के नाम, सब जाने-पहचाने। ... और फिर, अचानक, उसकी वो उँगली एक लाइन पर आकर जम गई।
वहाँ, उसी सीलबंद तहख़ाने वाले माले पर, देर रात के वक़्त एक एंट्री छपी थी। एक बैज, एक घंटा। ... जिस रात इशिता ने भागते हुए सोचा था कि वो बच गई, उस रात का हर क़दम इस पन्ने पर, काली स्याही में जमा, उसका इंतज़ार कर रहा था।
"अच्छा... ... तो लीगल आर्काइव में, आधी रात को, अकेली... ... इशिता सिन्हा।"
जिस जाल से इशिता आज रात भागती हुई निकली थी, ये यक़ीन करके कि वो बच गई, वो जाल कभी उसके पीछे था ही नहीं। ... वो जाल तो यहाँ था, इस मेज़ पर, एक काग़ज़ पर छपा हुआ, नकुल वर्धान की उँगली के ठीक नीचे। ... और वो उँगली, अब उसके नाम पर आकर, रुक चुकी थी।
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