अध्याय 10 / 26 पढ़ने में 12 मिनट
जाल में मछली
अंदर की बात द्वारा Avni Oberoi
नकुल के हनीपॉट का सामना करने पर इशिता जाल से भागने के बजाय उसे पलट देती है: एक आविष्कारक की बेटी की नज़र से वो पकड़ लेती है कि आदित्य को सौंपा गया 'सबसे गहरा राज़' असल में एक नक़ली चारा है जो असली प्रोजेक्ट में कभी था ही नहीं, और जुगनू की चाय-ख़बर उसे उसका सिरा नकुल की अपनी कमेटी तक पहुँचा देती है। निवेशक-जलसे में जब नकुल इशिता को लीक का ज़िम्मेदार ठहराने खड़ा होता है, तो वो उसी की जाँच में शामिल एक ईमानदार जासूस बनकर सबके सामने साबित कर देती है कि वो राज़ कभी था ही नहीं, और शिकारी ख़ुद अपने गढ़े हुए झूठ पर नंगा खड़ा रह जाता है, जिससे आदित्य और पूरी टीम का भरोसा उसके साथ आ खड़ा होता है। इसी बी
बेंगलुरु की भोर परदों से छनकर राख जैसी रोशनी बनकर कमरे में उतरी। ... इशिता रात भर वहीं बैठी थी, ठीक वहीं, जहाँ नौवीं रात का फंदा उसके गले में उतरा था। ... पर रात के सबसे लंबे पहर में कुछ बदल गया था। जो मछली सारी रात जाल में तड़पती रही थी, वो अब शांत थी। और शांत मछली को जाल पहली बार साफ़ दिखता है।
वो उठी, लैपटॉप खोला, और स्क्रीन पर वो 'सबसे गहरा राज़' दोबारा खड़ा किया, जो आदित्य ने उसके कान में फुसफुसाया था। ... और फिर उसने वो किया जो सुबह पाँच बजे सिर्फ़ एक आविष्कारक की बेटी ही कर सकती थी। उसने जाँचना शुरू किया कि वो राज़ सच भी है या नहीं।
"अगर ये सच है... तो यहाँ ये आँकड़ा टिकना चाहिए।" ... "...ये नहीं टिकता।" ... "ये टिकता ही नहीं। ये चल ही नहीं सकता।"
आँकड़ा नहीं बैठा। डिज़ाइन ख़ूबसूरत थी, बेदाग़, और नामुमकिन। ... असली ईजाद ज़िद्दी होती है, उलझी हुई। ये वाली सच होने के लिए बहुत ज़्यादा साफ़ थी। ... ये राज़ नहीं था। ये चारा था।
"ये प्रोजेक्ट का दिल नहीं है।" ... "ये एक चमकता हुआ झूठ है। और आदित्य को भी नहीं पता... कि जिसे वो अपना सबसे बड़ा हीरा समझे बैठा है, वो किसी और के हाथों उसकी जेब में डाला हुआ नक़ली मोती है।"
और उसी पल पूरा जाल उसके दिमाग़ में उलटा हो गया। ... अगर वो राज़ नक़ली था, तो असली प्रोजेक्ट में कभी था ही नहीं, और आदित्य का देने वाला भी नहीं। ... किसी ने उसे गढ़ा था, और आदित्य के मुँह में डाल दिया था। उस 'किसी' को ढूँढ लो, और जो जाल उस पर बंद हो रहा था, वही उस पर पलट जाता।
"मछली जाल में है।" ... "पर जाल डालने वाला एक बात भूल गया... कि ये मछली सिर्फ़ फँसना नहीं, काटना भी जानती है।"
वर्धान के टावर में न कोई कागज़ सरकता था, न कोई मेमो एक मेज़ से दूसरी तक जाता था, बिना एक आदमी की नज़र से गुज़रे। ... और वो आदमी था जुगनू, जिसकी चाय की ट्रॉली हर मंज़िल की धड़कन सुनती थी।
"जुगनू भैया, एक पहेली सुलझा दो।" ... "पिछले हफ़्ते जो सिक्योरिटी वाली समीक्षा हुई थी, वो जिसमें प्रोजेक्ट के 'सबसे नाज़ुक राज़' पर लाल निशान लगा था... वो कागज़ पहली बार किसकी मेज़ से उठे थे?"
"अरे मैडम!" ... "आप जासूस बनेंगी तो पहला जासूस मैं बनूँगा, आपका ख़ास ख़बरी!" ... "वो कागज़ नकुल सर की उसी 'मोल-हंट' वाली कमेटी से निकले थे। लाल निशान भी उन्हीं ने अपने हाथ से लगवाया था, 'ये है वो चीज़, जो लीक हुई तो पूरी कंपनी डूब जाएगी।'"
"और सबसे मज़े की बात सुनिए, मैडम।" ... "जिस टीम की रिसर्च बता कर उस राज़ पर इतना हल्ला मचा, उस टीम ने वो कागज़ कभी देखा ही नहीं! रीमा मैडम हँस रही थीं, बोलीं, 'ये हमारा है ही नहीं!' ... भला बताइए, किसी की तिजोरी का हीरा, और तिजोरी वाले को ही पता नहीं!"
और आख़िरी टुकड़ा अपनी जगह बैठ गया। वो नक़ली हीरा नकुल की अपनी कमेटी में पैदा हुआ था, और टीम का सबसे क़ीमती नगीना बता कर सजा दिया गया था। ... नकुल ने मोल ढूँढा नहीं था। उसने हवा से एक मोल गढ़ा था, और पूरी कंपनी का निशाना उस पर तान दिया था जिसे वो हटाना चाहता था।
"नकुल ने मुझे अपनी जाँच में इसलिए शामिल किया, ताकि मुझ पर नज़र रख सके।" ... "तो ठीक है। मैं उसकी जाँच करूँगी, पूरी ईमानदारी से। और अपनी रिपोर्ट में बस एक बात लिखूँगी... कि जिस राज़ की रखवाली में ये तमाशा खड़ा है, वो इस दुनिया में है ही नहीं।"
"मतलब... मतलब हम जीत गए, मैडम?" ... "देखा? मैंने कहा था ना, जुगनू का सुराग़ कभी ख़ाली नहीं जाता! आप बस मेरा नाम याद रखना, जब इनाम बँटे।"
उस रात ख़ुफ़िया लैब में सिर्फ़ एक मेज़ की बत्ती जल रही थी, और आदित्य अकेला उस पर झुका बैठा था। ... इशिता को उससे बस एक बात की तसदीक़ चाहिए थी, वो भी इस तरह कि उसे अभी पूरा जाल न दिखे।
"तुम अभी तक गई नहीं?" ... "पूरी टीम में बस तुम हो जो मुझसे भी ज़्यादा देर यहाँ रुकती हो। बैठो। इस मनहूस हफ़्ते में तुम्हारा चेहरा ही एक अच्छी ख़बर है।"
"आदित्य, एक बात पूछनी थी।" ... "वो जो आपने मुझे बताया था, प्रोजेक्ट का सबसे गहरा राज़, वो जो सिर्फ़ हम दोनों जानते हैं... वो आपको सबसे पहले मिला कहाँ से था? किसने कहा था कि यही हमारी सबसे नाज़ुक चीज़ है?"
"क्यों?" ... "वो सिक्योरिटी समीक्षा में लाल निशान लगा आया था। लिखा था, 'ये एक चीज़ बाहर गई, तो प्रोजेक्ट ख़त्म।' मैंने सोचा टीम ने ही पकड़ा होगा, तो दायरा छोटा कर दिया, बस दो लोगों तक। तुम और मैं।" ... "क्योंकि तुम्हीं पर मैं इतना भरोसा कर सकता था।"
"और अगर मैं कहूँ..." ... "...कि वो राज़ सच ही नहीं है? कि वो चीज़ जिसकी रखवाली में आप रातें काट रहे हैं, आपके प्रोजेक्ट में कभी थी ही नहीं?"
"ये नामुमकिन है।" ... "मैंने ख़ुद वो दायरा अपने हाथों छोटा किया था।" ... "तुमने... तुमने इसे सच में जाँचा है?"
इशिता ने चुपचाप लैपटॉप उसकी तरफ़ घुमा दिया, और आदित्य ने ख़ुद देखा। ... वो आँकड़ा जो टिकता नहीं था, वो ख़ूबसूरत, नामुमकिन झूठ। ... और उसके चेहरे का रंग धीरे-धीरे उतर गया, जैसे किसी ने पैरों तले की ज़मीन खींच ली हो।
"किसी ने मुझे एक झूठ थमाया।" ... "एक नक़ली राज़, ताकि मैं उसे सीने से लगाऊँ, और देखा जाए कि वो किसके ज़रिए बाहर जाता है। ये चारा था।" ... "और इसे डालने वाला मेरे अपने घर का कोई है।"
और उसी पल इशिता के भीतर कुछ हुआ, जिसने उसे किसी भी जाल से ज़्यादा डरा दिया। ... दस साल से वो हर इंसान को इस्तेमाल की एक सीढ़ी समझती आई थी। आदित्य भी वही था, एक दरवाज़ा। ... पर आज रात उसने ख़ुद को उसे बचाते हुए पकड़ा, हिसाब से नहीं, उसके लिए डर से। और ये खोज उसे किसी भी सज़ा से ज़्यादा काँपा गई।
"तुमने वो देख लिया..." ... "...जो मेरी पूरी टीम से, ख़ुद मुझसे भी छूट गया। मैंने तुम्हें इसीलिए चुना था, इशिता। क्योंकि तुम वो देखती हो, जो कोई नहीं देखता।"
वो एक-दूसरे के इतने पास थे कि बत्ती की रोशनी में उनकी परछाइयाँ एक हो रही थीं। ... उसकी नज़र इशिता के चेहरे पर ठहरी, फिर होंठों पर, और कमरे की हवा बिजली जैसी भारी हो गई। इशिता का दिल एक पल के लिए मिशन, जाल, नाम, सब भूल गया। ... फिर उसने हल्के से पीछे हटकर एक काँपती मुस्कान ओढ़ ली, और वो पल अधूरा रह गया।
"अभी नहीं।" ... "अभी हमें ये सबके सामने साबित करना है। नकुल कल के निवेशक-जलसे में इस 'लीक' का ऐलान करेगा, अपनी जीत की तरह। तभी हम दिखाएँगे कि उसके हाथ में जो सबूत है, वो सिर्फ़ हवा है।"
अगली शाम वर्धान का निवेशक-जलसा शीशे और रोशनी में नहा रहा था। झिलमिलाते झाड़-फ़ानूस, महँगी हँसी, और शहर के सबसे बड़े नाम। ... एक कोने से खुराना की ठंडी नज़र पूरे हॉल पर फिर रही थी, और नकुल की बाँह पर हाथ रखे देविका खड़ी थी, अपने घोड़े पर लगाया अपना दाँव।
और जैसे ही निवेशकों की भीड़ जुड़ी, नकुल ने शैम्पेन का गिलास बजाकर सबका ध्यान अपनी तरफ़ खींच लिया। ... उसके चेहरे पर वही शाइस्ता मुस्कान थी, जो इशिता को सबसे ज़्यादा डराती थी। और उसकी नज़र, मीठी और ज़हरीली, सीधे इशिता पर टिक गई।
"दोस्तों, आज एक ख़ुशख़बरी है।" ... "हफ़्तों से हमारी लैब में एक लीक थी, कोई अपना ही, जो हमारे राज़ बाहर बेच रहा था। और आज मैं बता सकता हूँ कि उसका रास्ता सीधा हमारी एक होनहार नई इंटर्न से होकर जाता है।" ... "मुझे दुख है, इशिता जी। पर सच तो सच है।"
पूरे हॉल की नज़रें इशिता पर घूम गईं, और एक पल सन्नाटा छा गया। देविका के होंठों पर एक हल्की, जीती हुई मुस्कान तैर गई। ... पर तभी आदित्य भीड़ को चीरता हुआ आगे बढ़ा, और उसकी आवाज़ शांत थी, पर उसमें फ़ौलाद उतर आया था।
"एक सवाल, नकुल।" ... "जो राज़ 'लीक' हुआ है, हमारी वो सबसे नाज़ुक चीज़, उस पर लाल निशान तुम्हीं ने लगवाया था। तो पूरे हॉल के सामने बता दो, वो राज़ है क्या? क्योंकि मैं उस प्रोजेक्ट का बनाने वाला हूँ, और मैं गवाही देता हूँ... कि वो चीज़ मेरे प्रोजेक्ट में कभी थी ही नहीं।"
"ये... ये बचाव है, आदित्य।" ... "अपनी इंटर्न को बचाने के लिए तुम अपने ही प्रोजेक्ट को झुठला रहे हो, पूरे हॉल के सामने?"
"नहीं, सर। झुठला तो मैं रही हूँ।" ... "आपने ही तो मुझे अपनी जाँच में शामिल किया था, याद है? तो मैंने वो राज़ हमारी असली फ़ाइलों में ढूँढा, हर एक फ़ाइल में।" ... "वो कहीं नहीं है, सर। वो कभी लिखा ही नहीं गया, सिवाय आपकी अपनी कमेटी के एक कागज़ के। तो जो चीज़ कंपनी में कभी थी ही नहीं, वो लीक कैसे हो गई?"
और पूरे हॉल की हवा पलट गई, और सारी नज़रें नकुल पर आ गिरीं। ... सबकी आँखों में अब एक ही सवाल था। जो राज़ कभी था ही नहीं, उसे गढ़ा किसने? और वो कागज़ किसकी कमेटी से निकला था?
आदित्य इशिता के पास आकर खड़ा हो गया, कंधे से कंधा मिलाकर। और लैब की पूरी टीम, रीमा समेत, चुपचाप उनके पीछे एक दीवार बनकर आ खड़ी हुई। ... नकुल का पूरा 'मोल-हंट' उसी की गढ़ी हुई हवा पर ढह गया, और शिकारी ख़ुद सबके सामने नंगा खड़ा रह गया।
"वाह।" ... "बहुत ख़ूब, इशिता जी। एक इंटर्न ने आज पूरा खेल पलट दिया।" ... "पर याद रखना, जो इतनी सफ़ाई से जाल पलटना जानता है... वो ख़ुद भी किसी न किसी का मोहरा ज़रूर होता है। मैं तुम्हारा असली रंग पता लगाकर रहूँगा।"
"हट जाइए, हट जाइए, ख़बरी आ रहा है!" ... "मैंने कहा था ना! ये पूरा सुराग़ किसने दिया था? जुगनू ने! मैडम तो बस दिमाग़ लगाती हैं, असली ख़बर तो इसी चाय की ट्रॉली से निकलती है, हुज़ूर!" ... "साहब, याद रखिएगा, आधा इनाम मेरा!"
जलसे की भीड़ छँटने लगी, और आदित्य इशिता को एक शांत कोने में ले गया। ... जीत की गरमाहट अब भी उनकी नसों में दौड़ रही थी, और आदित्य की आँखों में वो चमक थी, जो इशिता ने पहले कभी नहीं देखी थी।
"आज तुमने सिर्फ़ मुझे नहीं बचाया, इशिता।" ... "तुमने वो कर दिखाया, जो मैं सालों से नहीं कर पाया, इस पूरे परिवार के सामने नकुल का असली चेहरा दिखा दिया। मैं नहीं जानता तुम असल में कौन हो। पर जानना चाहता हूँ... सब कुछ।"
और वो फिर उतने ही पास थे। उसका हाथ धीरे से इशिता के गाल पर गिरी एक लट के पास आया, और इस बार किसी ने पीछे हटने की जल्दी नहीं की। ... हॉल का शोर दूर किसी और ही दुनिया का लगने लगा। दस साल की तपस्या, हर झूठ, हर छिपा नाम, एक पल के लिए पिघलने लगा, और इशिता की आँखें मुँदने लगीं।
और तभी, हॉल के उस पार से, एक हँसी उभरी। ... एक गरम, जानी-पहचानी हँसी, जिसे इशिता ने पालने से सुना था, जो उसके लिए दुनिया की सबसे महफ़ूज़ आवाज़ थी। ... उसका पूरा जिस्म बर्फ़ हो गया। आदित्य का हाथ हवा में रुक गया, और इशिता की आँखें झटके से खुल गईं।
उसने मुड़कर देखा, और उसकी साँस गले में ही अटक गई। ... हॉल के बीचोंबीच, वर्धानों की भीड़ में, शैम्पेन का गिलास थामे, बिल्कुल घर जैसा सहज... उसके चाचा खड़े थे। रतन सिन्हा। उन्हीं वर्धानों से हँस-हँस कर बातें करते, जिन्होंने उसके पापा को बर्बाद किया था।
"वाह, कमाल की शाम है!" ... "इतने बरसों में वर्धान परिवार की मेहमाननवाज़ी का कोई जवाब नहीं। सच कहूँ, यहाँ आकर तो लगता ही नहीं कि मैं कोई मेहमान हूँ। ... जैसे अपने ही घर आ गया हूँ।"
इशिता वहीं जम गई, आदित्य के इतने पास, और अपने दो जहानों के बीच फटती हुई। ... एक तरफ़ वो आदमी जिसे वो धोखा दे रही थी, और दूसरी तरफ़ वो जिसने उसे धोखा देना सिखाया था, दोनों एक ही छत के नीचे साँस लेते हुए। ... और उसके सीने में सिर्फ़ एक सवाल बर्फ़ की तरह जम गया, जिसका जवाब उसे अभी नहीं मिलना था... जिन दैत्यों ने उसके पापा को निगल लिया था, उनके घर में उसके चाचा इतने सहज, इतने 'अपने' कैसे थे?
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