अध्याय 12 / 26 पढ़ने में 9 मिनट
दो आक़ा
अंदर की बात द्वारा Avni Oberoi
इशिता चाचा की बात मानने का नाटक करते हुए, असल में वही सबूत बचाने में जुट जाती है जिसे रतन मिटाना चाहते हैं, और अब वो अपने ही ख़ेमे के ख़िलाफ़ एक दोहरी जासूस बन जाती है। आदित्य के साथ उसकी नज़दीकी और गहरी होती है, दो सच्चे लोगों के बीच वो झूठ अब चुभन नहीं, अज़ाब बन जाता है, जबकि खुराना पुरानी फ़ाइलों में हलचल भाँपकर चुपचाप अपनी अलग तलाश शुरू कर देता है। हर सीन में वो दो हिस्सों में बँटी रहती है। रात को इशिता किसी पर भरोसा न करने का फ़ैसला ले लेती है और पूरी फ़ाइल एक ऐसी ड्राइव पर उतार लेती है जिस पर सिर्फ़ उसका क़ाबू है, और जैसे ही आख़िरी फ़ाइल उतरती है, खुराना के फ़ोन पर एक ऐसा आर्काइव अलार्म
इशिता ने अपने चेहरे को फिर से जोड़ा, टुकड़ा दर टुकड़ा, जैसे कोई मैकेनिक टूटी मशीन को कस के दोबारा खड़ा करता है, और हॉल की तरफ़ वापस चल दी। ... पर आज रात की मुस्कान पहले से अलग थी। अब उसके नीचे सिर्फ़ एक जासूस नहीं बैठी थी, एक ऐसी लड़की बैठी थी जो अपने ही हैंडलर को धोखा देने का फ़ैसला कर चुकी थी।
जलसा ख़त्म होने लगा था, और रतन गाड़ी की तरफ़ बढ़ते हुए वर्धानों से आख़िरी बार हाथ मिला रहे थे, वही मुस्कान, वही गर्मजोशी, जिससे पूरा हॉल अब तक बेख़बर था। ... गेट के पास उन्होंने इशिता को देखा और उसकी तरफ़ मुड़ गए, एक आख़िरी नसीहत देने।
"याद रखना, बेटा, जो कहा।" ... "जो पन्ना दिखे, बचा मत लेना। मिटा देना। तेरे पापा की ख़ातिर।"
"जी चाचा, मैं ध्यान रखूँगी।" ... "आप बेफ़िक्र रहिए। मैं वही करूँगी, जो सही होगा।"
"और एक बात, बेटा..." ... "क्या तुम्हें लगता है किसी को शक हुआ है? किसी वर्धान को, या... खुराना को?"
"नहीं चाचा, बिलकुल नहीं।" ... "मैं बहुत सावधान रहती हूँ। कोई शक नहीं करेगा।"
और वो जानती थी कि उसका वाक्य पूरा सच था, बस उस सच का मतलब वो नहीं था जो चाचा ने समझा। ... सही वो होगा जो उसने ख़ुद तय किया था, मिटाना नहीं, बचाना, हर काग़ज़, हर सुराग़, हर आधा नाम।
और खड़े-खड़े इशिता को साफ़ दिख गया कि वो अब दो आक़ाओं की नौकर बन चुकी थी, एक चाचा जो मिटाना चाहता था, एक पापा जो सच जानना चाहते थे बिना ये जाने कि सच किसे डुबाएगा। ... और एक नौकर जो दो मालिकों की सुने, वो आख़िर में किसी का वफ़ादार नहीं रहता, सिर्फ़ अपने ज़मीर का रहता है, अगर उसमें इतनी हिम्मत बचे।
रतन की गाड़ी रात की सड़क में घुल गई, और इशिता वहीं खड़ी उसे तब तक देखती रही जब तक उसकी बत्तियाँ भी दिखनी बंद नहीं हो गईं। ... आज पहली बार वो अपने ही चाचा को वैसे देख रही थी जैसे वो अब तक सिर्फ़ वर्धानों को देखती आई थी, एक मिशन के दुश्मन की तरह।
तभी पीछे से एक जाना-पहचाना क़दमों की आवाज़ आई, और इशिता को याद आया कि आज की बात अभी ख़त्म नहीं हुई थी, आदित्य ने ख़ुद ऐसा कहा था। ... वो अपने काम से लौट आया था, और उसकी आँखों में अब भी वही अधूरा पल तैर रहा था।
"मैं कहा था ना, लौटूँगा।" ... "तुम्हारे चाचा से मिलकर अच्छा लगा। पर सच पूछो तो मुझे तुम्हारे बारे में जानने की ज़्यादा जल्दी है, तुम्हारे परिवार के बारे में नहीं।"
"मेरे बारे में जानने को है ही क्या, आदित्य।" ... "एक इंटर्न, जो हर वक़्त काम में डूबी रहती है, बस।"
"मुझे लगता है सब मुझसे कुछ ना कुछ चाहते हैं, इशिता। बोर्ड, नकुल, देविका, यहाँ तक कि मेरे अपने पापा भी, वर्धान का नाम आगे बढ़े, बस इतना।" ... "पर तुम... तुम मुझसे कुछ नहीं माँगती। और यही मुझे सबसे ज़्यादा डराता है, कि शायद मैं तुम्हें ठीक से समझ ही नहीं पाया।"
"अगर सब तुमसे कुछ ना कुछ माँगते हैं, आदित्य..." ... "तो तुम मुझसे क्या माँगते हो?"
"सच? कुछ नहीं।" ... "बस ये कि जब तुम मेरे सामने खड़ी हो, मुझे लगे कि मैं भी उतना ही असली हूँ, जितना तुम मुझे बनाती हो।"
और उन्हीं शब्दों ने इशिता के भीतर कुछ तोड़ दिया, क्योंकि सच तो ये था कि वो उससे सबसे बड़ी चीज़ माँग रही थी, उसका भरोसा, उसकी ख़ुफ़िया लैब, उसका पूरा भविष्य, बस उसे पता नहीं था। ... यही सबसे भारी झूठ था, दुनिया का सबसे ईमानदार आदमी उसके सामने खड़ा था, और वो उसे धोखा दे रही थी।
"आदित्य, अगर कभी तुम्हें पता चले कि मैं... कि मेरे पास कुछ ऐसा है जो..." ... "...छोड़ो। बस इतना जान लो कि मैं तुम्हें कभी वो नुक़सान नहीं पहुँचाना चाहती जो मुझे डर है कि मैं पहुँचा सकती हूँ।"
वो दोनों बिना जाने कब एक-दूसरे के इतने पास आ गए कि उनकी उँगलियाँ छू गईं, और आदित्य ने उन्हें हटाया नहीं। ... उसका माथा हल्के से इशिता के माथे से छू गया, दोनों की आँखें बंद, दोनों की साँसें एक ताल में।
"जो भी है, इशिता..." ... "मैं डरता नहीं। मुझे बस तुम पूरी चाहिए, वो हिस्सा भी जो तुम छुपाती हो।"
इशिता ने आँखें खोलीं, और अपने आप को हल्के से पीछे खींच लिया, इस बार नज़दीकी से नहीं, अपने ही डर से। ... वो पल फिर अधूरा रह गया, पर इस बार अधूरा छोड़ना उसका अपना फ़ैसला था, ना कि क़िस्मत का।
"मुझे आज रात कुछ करना है, आदित्य। कुछ ज़रूरी।" ... "पर वादा करती हूँ, जब मैं तैयार होऊँगी, तुम सबसे पहले जानोगे।"
उधर वर्धान टावर की छब्बीसवीं मंज़िल पर, खुराना अब भी अपने दफ़्तर में बैठे थे, एक टैबलेट की नीली रोशनी में, आर्काइव के एक्सेस लॉग को बार-बार पलटते हुए। ... जलसे की रात, जब पूरी इमारत निवेशकों में उलझी थी, आर्काइव विंग के एक टर्मिनल पर एक बेवजह की हलचल दर्ज हुई थी, बस कुछ सेकंड, इतनी छोटी कि किसी और की नज़र में न आती।
"दस साल में इस टर्मिनल को किसी ने नहीं छुआ।" ... "और अब, ठीक उसी हफ़्ते जब सिन्हा साहब लौटे हैं, कोई इसे छूता है? ये इत्तेफ़ाक़ नहीं है।"
और उसी पल खुराना को गाला में रतन की वो बात याद आई, 'कुछ हिसाब वक़्त के साथ पक जाते हैं', और उसके भीतर एक पुराना, दफ़न डर सर उठाने लगा। ... अगर सिन्हा की भतीजी सच में इसी कंपनी में बैठी है, तो रतन ने अपनी सबसे पुरानी साझेदारी को अपने ही घर के पास ला बिठाया था, और खुराना को ये ग़लती पसंद नहीं आई।
"नकुल का शोर मचाना अपनी जगह है।" ... "पर मैं अपने तरीक़े से देखूँगा कि उस आर्काइव में किसका पैर पड़ा। चुपचाप। बिना किसी को बताए, बिना बोर्ड को, बिना नकुल को भी।"
उन्होंने अपने पुराने बैज-लॉग भी दोबारा खँगाले, वही हफ़्तों पुराने रिकॉर्ड जिन पर नकुल की जाँच पहले ही एक बार उँगली रख चुकी थी, और एक पैटर्न धीरे-धीरे उभरने लगा, कुछ रातें, कुछ नाम, एक ही गलियारे के आस-पास। ... अभी सबूत नहीं था, पर एक शक्ल बनने लगी थी, और खुराना शक्लों पर भरोसा करते थे।
"जल्दी नहीं करूँगा।" ... "नकुल शोर मचाए, बोर्ड परेशान हो। मैं बस देखूँगा, चुपचाप, कि ये नाम फिर कहाँ-कहाँ दिखता है।"
खुराना ने अपने टैबलेट पर कुछ टाइप किया, वो सिस्टम जो सालों से बंद पड़ा था, एक पुराना, भुला हुआ सिक्योरिटी लेयर, जिसे दस साल पहले उन्होंने ख़ुद, अपने हाथों से, आर्काइव के उस एक कोने पर लगाया था। ... उन्होंने उसे फिर से जगा दिया, चुपचाप, कोई फ़ाइल एक्सेस हो, तो सीधे उनके अपने फ़ोन पर ख़बर आए, किसी लॉग में दर्ज हुए बिना।
देर रात, अपने छोटे से कमरे में, इशिता ने दरवाज़ा भीतर से बंद किया, लैपटॉप खोला, और अपने फ़ोन से वो सारी तस्वीरें निकालनी शुरू कीं जो उसने इतने हफ़्तों में चुराई थीं। ... आधा फटा हस्ताक्षर, हनीपॉट का सबूत, बिक्री वाला पन्ना, हर टुकड़ा एक साथ, पहली बार पूरी तस्वीर की तरह।
"आज रात के बाद, मैं किसी पर भरोसा नहीं करूँगी।" ... "ना चाचा पर, ना पापा की हर बात पर, ना नकुल की जाँच पर, किसी पर नहीं। सिर्फ़ इस सबूत पर, जो अब सिर्फ़ मेरा है।"
उसने एक नई, कोरी ड्राइव निकाली, ऐसी जिसका पता ना चाचा को था, ना पापा को, ना वर्धान के किसी नेटवर्क को, और एक-एक करके हर फ़ाइल उस पर उतारने लगी, एक ऐसा तिजोरी जिसकी चाबी अब सिर्फ़ उसके हाथ में थी। ... प्रोग्रेस बार धीरे-धीरे भरता गया, दस प्रतिशत, चालीस, सत्तर, और हर फ़ाइल के साथ इशिता का दिल थोड़ा और शांत होता गया, जैसे कोई बोझ आख़िरकार सही जगह पर टिक रहा हो।
"अब कोई दूसरा आक़ा नहीं।" ... "अब बस एक ही सच है जिसकी मैं मालिक हूँ, और वो मेरे पापा की सच्ची कहानी है, चाहे वो जिसे भी डुबो दे।"
सबसे आख़िर में बची वो एक तस्वीर, आठवीं रात का वो आधा फटा हस्ताक्षर, सिन्हा नाम का बचा हुआ टुकड़ा, जो अब तक उसकी सबसे बड़ी पहेली था और आज रात उसकी सबसे बड़ी क़सम बन रहा था। ... उसकी उँगली बिना काँपे उस फ़ाइल पर गई, और उसे भी उसी तिजोरी में डाल दिया, जहाँ से अब कोई चाचा, कोई खुराना, कोई वर्धान उसे छीन नहीं सकता था।
प्रोग्रेस बार निन्यानवे प्रतिशत पर पहुँचा, फिर रुका, फिर आख़िरी फ़ाइल की छोटी सी हरकत के साथ आगे बढ़ा। ... और ठीक उसी सेकंड जब आख़िरी फ़ाइल पूरी तरह उतर चुकी थी, स्क्रीन पर एक हरा निशान चमका, पूरा। मुकम्मल। अब वो सबूत किसी और की मर्ज़ी पर नहीं था।
और ठीक उसी पल, वर्धान टावर की छब्बीसवीं मंज़िल पर, खुराना की मेज़ पर रखा फ़ोन एक बार भन्नाया, फिर बेतरतीब ढंग से बजता ही चला गया। ... स्क्रीन पर एक ऐसा नाम जगमगा रहा था जिसे उन्होंने दस साल में कभी नहीं देखा था, आर्काइव एक्सेस, टर्मिनल सात, अभी। और खुराना की उँगलियाँ फ़ोन तक पहुँचने से पहले ही रुक गईं, क्योंकि वो अलार्म आज रात नहीं, कल रात नहीं, बल्कि ठीक इसी लम्हे बजा था।
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