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Chapter 20 of 26 8 min read

छीना हुआ क़ुबूलनामा

अंदर की बात by Avni Oberoi

सुबह की पहली धूप वर्धान के काँच के टावर पर पड़ी, तब तक इशिता अंदर पहुँच चुकी थी, रातभर की नींद की जगह बस एक फ़ैसला लिए हुए। ... उसने रात भर सोचा था, आदित्य से क्या कहेगी, कहाँ से शुरू करेगी, कैसे उसकी आँखों में देख कर आख़िरकार सच कहेगी।

लिफ़्ट के पास जुगनू अपनी ट्रॉली लिए खड़ा मिला, पर आज उसकी मुस्कान में रोज़ वाली शरारत नहीं थी। ... उसने अपनी आवाज़ धीमी कर ली, जैसे दीवारों को भी कान लगे हों।

"मैडम जी... आज माहौल ठीक नहीं लग रहा। ख़ुराना साहब सुबह छह बजे ही आ गए, नकुल सर के साथ केबिन में बंद हैं। ... कोई बड़ी मीटिंग बुलाई है सबकी, नौ बजे। आप संभल के रहिएगा, ठीक है?"

"अरे, ऐसा कुछ नहीं होगा जुगनू। तुम भी ना, हर छोटी बात को तूफ़ान बना देते हो।" ... मन ही मन उसने सोचा, आज मीटिंग हो या तूफ़ान, पहले आदित्य। सबसे पहले आदित्य।

वो स्कंकवर्क्स लैब की तरफ़ बढ़ी, जहाँ आदित्य सुबह-सुबह अक्सर अकेला मिलता था, कॉफ़ी और डिज़ाइन शीट्स के बीच। ... उसे लगा था ये पल भारी होगा, नाटकीय होगा। पर वो बस एक गलियारा था, और एक दरवाज़ा, और उसके पीछे वो आदमी जिससे उसे सच कहना था।

"आदित्य... मुझे तुमसे कुछ कहना है। कुछ ज़रूरी।" ... "कल रात मुझे अपने बारे में कुछ पता चला, और मुझे लगता है तुम्हें ये जानना ज़रूरी है, आज, अभी, इससे पहले कि कोई और..."

"अरे, क्या हुआ, इतनी गंभीर क्यों दिख रही हो सुबह-सुबह?" ... "बताओ, मैं सुन रहा हूँ। जो भी है, हम साथ मिलकर..."

तभी आदित्य की जेब में फ़ोन काँपा। उसने स्क्रीन देखी, और उसका चेहरा एक पल में बदल गया। ... "सॉरी, इशिता, रुको। ख़ुराना ने अभी पूरी टीम को कॉन्फ़्रेंस रूम में बुलाया है, अभी, नौ बजे। कुछ बड़ा लग रहा है।"

और उसी पल इशिता की रातभर की तैयारी हवा हो गई। जो सच वो अपनी शर्तों पर कहना चाहती थी, उसे कहने का मौक़ा एक मीटिंग की घंटी ने छीन लिया, बिना ये बताए कि वो मीटिंग किसके बारे में है। ... वो आदित्य के पीछे कॉन्फ़्रेंस रूम की तरफ़ चली, ये न जानते हुए कि वो अपने आख़िरी झूठ का दरवाज़ा नहीं, अपने बेनक़ाब होने का दरवाज़ा खोलने जा रही है।

कॉन्फ़्रेंस रूम में पूरी स्कंकवर्क्स टीम बैठी थी, पर आज कुर्सियाँ किसी अनोखी तरतीब में लगी थीं, मानो कोई मीटिंग नहीं, कोई सुनवाई हो। ख़ुराना मेज़ के सिरे पर खड़े थे, नकुल उनके बग़ल में, दोनों के चेहरे किसी फ़ैसले की तरह सपाट। ... इशिता ने अंदर क़दम रखते ही भाँप लिया, ये मीटिंग किसी प्रोजेक्ट के बारे में नहीं थी।

"माफ़ी चाहूँगा इतनी सुबह-सुबह बुलाने के लिए, पर ये इंतज़ार नहीं कर सकता था।" ... "पिछले कुछ हफ़्तों से मैं एक सुरक्षा जाँच चला रहा हूँ, आर्काइव सेंध, लीक, सब कुछ। आज वो जाँच पूरी हुई। और आज हम एक नाम लेंगे।"

इशिता का पेट अंदर तक धँस गया, पर उसका चेहरा वैसा ही रहा जैसा उसने दस महीनों में तराशा था, शांत, उत्सुक, बेगुनाह। ... उसने आदित्य की तरफ़ देखा, वो भी सचेत हो गया था, आगे झुका हुआ, अनजान कि अगला नाम उसका सबसे भरोसेमंद हाथ होगा।

"हमने तुझे बहुत पहले आगाह किया था, आदित्य, कि तेरी ये 'ख़ुफ़िया टीम' का दरवाज़ा बहुत खुला है।" ... "अब देख, किसने तेरे प्यारे फ़ीनिक्स के अंदर सेंध लगाई। और तेरे ही नाक के नीचे बैठी है।"

"सीधे मुद्दे पर आओ, नकुल। इल्ज़ाम नहीं, सबूत चाहिए मुझे।" ... "और अगर ये किसी टीम मेंबर के बारे में है, तो मैं उन्हें उतना ही जानता हूँ जितना तुम कभी नहीं जान पाओगे।"

"ठीक है। पहला काग़ज़।" ... उन्होंने एक फ़ाइल खोली। "जब इशिता सिन्हा ने इंटर्नशिप के लिए अप्लाई किया था, इनकी पिछली पढ़ाई में दो साल का एक ऐसा ख़ाली अंतराल था जिसकी कोई सफ़ाई फ़ाइल में दर्ज नहीं। नकुल ने ये सबसे पहले पकड़ा था, महीनों पहले, और उस वक़्त हमने इसे नज़रअंदाज़ कर दिया था।"

इशिता को वो पल याद आया, दूसरे एपिसोड की वो लाल स्याही, अपनी ही फ़ाइल पर एक घेरा। तब वो एक धमकी लगी थी। आज वो पहली ईंट बन रही थी। ... उसने अपनी साँस को बराबर रखा, अपने हाथों को मेज़ पर स्थिर।

"दूसरा। बैज लॉग्स।" ... उन्होंने स्क्रीन पर तारीख़ें दिखाईं। "लीगल फ़्लोर पर, दफ़्तर के घंटों के बाद, कई बार। एक रात तो सुरक्षा गश्त से बाल-बाल बची थीं, जिसे कवर ख़ुद आदित्य ने दिया था, बिना जाने असल वजह।"

कमरे में हर सिर धीरे-धीरे इशिता की तरफ़ घूमने लगा। ... उसने कुछ नहीं कहा। अभी बोलना ख़ुद पर शक की मुहर लगाना होता।

"और तीसरा। सबसे ज़रूरी।" ... "निवेशक जलसे की रात, आर्काइव का एक पुराना, भुला हुआ अलार्म बजा था, सिर्फ़ मेरे फ़ोन पर। हमने महीनों उस सेंध को खुला केस रखा था। आज सुबह मैंने उस अलार्म का टाइमस्टैम्प इनके बैज की एंट्री से मिलाया। एक सेकंड का फ़र्क़ नहीं।"

कमरे में एक साँस भर की ख़ामोशी छाई, फिर धीमी फुसफुसाहट की लहर। ... आदित्य की आँखें इशिता से हटी नहीं, पर उनमें वो गर्माहट नहीं रही जो उसने आज सुबह दी थी। उसकी जगह कुछ और उतर रहा था, धीरे धीरे, जैसे कोई इमारत भीतर से गिरती है, बाहर से बिना आवाज़ किए।

"इशिता।" ... "मैंने तुम्हें अपना सबसे भरोसेमंद हाथ बनाया। मैंने तुम्हें वो चाबी दी जो किसी और को नहीं दी। और जिस लीक से मैं तुम्हारे साथ लड़ रहा था... वो लीक तुम थीं?"

"आदित्य, इसकी एक वजह है। एक पूरी कहानी है, जो मैं तुम्हें बताना ही चाहती थी, आज, इसीलिए तो मैं सुबह..." ... "पर यहाँ नहीं। इनके सामने नहीं।"

"'पर यहाँ नहीं'? कैसी दिलचस्प सफ़ाई है, भाई।" ... "सच बोलने वालों को कमरा नहीं चुनना पड़ता, इंटर्न। सिर्फ़ झूठ बोलने वालों को समय और जगह चाहिए होती है।"

इशिता का दिमाग़ बिजली की रफ़्तार से दौड़ा। अगर उसने अभी सच कहा, पापा का नाम, रतन चाचा का नाम, ख़ुराना का असली गुनाह, तो वो सारा सबूत जो अभी पकने के लिए वक़्त माँगता था, इसी कमरे में, इसी पल जल जाता। ... ख़ुराना ख़ुद उसके सामने बैठे थे, वही आदमी जिसका असली गुनाह वो हफ़्तों से जोड़ रही थी। एक ग़लत लफ़्ज़ और वो सतर्क हो जाते, हमेशा के लिए।

"मैं यहाँ सब कुछ नहीं बता सकती, आदित्य। अभी नहीं। इस कमरे में नहीं।" ... "पर मुझ पर भरोसा करो, जो तुमने अभी तक देखा, वो पूरी कहानी नहीं है।"

"एक जासूस से यही तो उम्मीद होती है, ना? हर सबूत को मानना, पर हर सफ़ाई को 'यहाँ नहीं, अभी नहीं' पर टाल देना।" ... "मुझे नहीं लगता अब हमें इससे ज़्यादा सबूत चाहिए, आदित्य।"

और तभी आदित्य के भीतर कहीं वो पहला दिन लौट आया, काँच के दरवाज़े पर कही वो एक पंक्ति जो उसने ख़ुद उससे कही थी, "मैं ठीक तुम्हारे जैसे किसी को ही ढूँढ रहा था।" ... उस वक़्त वो एक तारीफ़ थी। आज वो एक सवाल बन गई, कि वो किसे ढूँढ रहा था, और किसे उसने अपने ही घर में पाल लिया।

"मैंने तुम्हें टीम के सामने खड़ा किया, इशिता। मैंने बोर्ड के सामने तुम्हारा नाम लिया, जब कोई और लेता।" ... "और मुझे लगा मैंने वो देखा, जो बाक़ी सबने नहीं देखा। शायद मैंने सिर्फ़ वही देखा, जो तुमने मुझे दिखाया।"

कमरे में हर आवाज़ थम गई। किसी ने कुछ नहीं कहा, ना नकुल ने, ना ख़ुराना ने। सबकी नज़रें अब सिर्फ़ एक आदमी पर टिकी थीं। ... आदित्य वर्धान का फ़ैसला।

आदित्य उठा, धीरे, मेज़ के इस पार आया, नकुल और ख़ुराना की बातें जैसे कमरे से बाहर छूट गई हों। ... उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था। कुछ और था, कुछ ज़्यादा भारी, जो इशिता ने उसमें पहले कभी नहीं देखा।

"सबको छोड़ो। नकुल को छोड़ो, ख़ुराना को छोड़ो, इन काग़ज़ों को छोड़ो।" ... "बस मुझे इतना बता दो, इशिता। सीधे, मेरी आँखों में देख कर।"

"बता दो कि ये सच नहीं है।" ... "बस इतना कह दो, इशिता, कि ये सच नहीं है।"

इशिता ने अपना मुँह खोला। ... कोई सफ़ाई नहीं आई, कोई इनकार नहीं आया, सिर्फ़ एक ख़ामोशी, इतनी लंबी कि पूरे कमरे में हर किसी ने, आदित्य ने सबसे पहले, वो जवाब सुन लिया जो उसने कभी ज़ुबान से नहीं दिया।

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