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अध्याय 24 / 26 पढ़ने में 9 मिनट

चाचा का असली चेहरा

अंदर की बात द्वारा Avni Oberoi

टावर की पार्किंग में सूरज की पहली किरण उतर रही थी, पर इशिता के फ़ोन पर अब भी वही ईमेल खुला पड़ा था, "सह-साज़िशकर्ता", पापा का नाम एक अपराध की तरह लिखा हुआ। ... जुगनू की आवाज़ अब भी उसके कान में गूँज रही थी, नीचे लॉबी में कोई आया है, ख़ुद रतन सिन्हा।

"चलो।" ... "अगर तुम्हारा चाचा नीचे खड़ा है, तो मैं तुम्हारे साथ नीचे जाऊँगा। आज रात के बाद, तुम अकेली किसी दरवाज़े के पीछे नहीं जाओगी।"

"आदित्य, ये तुम्हारी लड़ाई नहीं है।" ... "चाचा को जितना पता है, उससे ज़्यादा दिखाना मुझे ठीक नहीं लगता।"

"मेरे फ़ीनिक्स के लिए जिस आदमी ने साज़िश रची, वो अभी मेरी बिल्डिंग की लॉबी में खड़ा है।" ... "ये मेरी लड़ाई कब से नहीं है?"

लिफ़्ट नीचे उतरते हुए दोनों ख़ामोश रहे, इशिता के हाथ में फ़ोन, आदित्य का हाथ उसकी कोहनी के पास, न पकड़ता हुआ, बस वहाँ, एक वादे की तरह। ... काँच के दरवाज़ों के उस पार, सुबह की धुंधली रौशनी में, चाचा रतन खड़े थे, वही पुरानी मुस्कान लिए, जैसे किसी अपने की शादी में जल्दी पहुँच गए हों।

"चाचा।" ... "इस बार असली नाम से बात होगी।"

सुबह की पहली शिफ़्ट का गार्ड उलझन में उन तीनों को देख रहा था, ना जाने कैसे बर्ताव करे एक ऐसे बूढ़े रिश्तेदार के साथ जो ख़ुद को घर जैसा बता रहा था, जबकि जुगनू दूर रिसेप्शन के पीछे से बस देखता रह गया, अपनी आँखों में वही डर लिए जो उसने रात भर पाल रखा था।

रतन ने गार्डों की तरफ़ एक शांत नज़र फेंकी, हाथ जोड़े, और अपनी आवाज़ उतनी ही नरम रखी जितनी सिर्फ़ वही रख सकते थे। ... "बेटा, यहाँ लॉबी में नहीं। चलो अंदर बैठते हैं, परिवार की बात है।" ... तीनों पास के छोटे कॉन्फ़्रेंस रूम में चले गए, दरवाज़ा बंद हुआ, और उसी पल रतन के चेहरे पर से मुस्कान धीरे-धीरे उतरने लगी।

"ठीक है। अब कोई नाटक नहीं, इशिता। तुम बड़ी हो गई हो, और मैं थक गया हूँ नाटक करते-करते।" ... "हाँ, मैंने ही पेटेंट खुराना को बेचे थे। हाँ, मैंने ही तुम्हारे पापा की कहानी गढ़ी, ताकि वो कभी अपने ही भाई पर शक न करें।"

"आपने मुझे यहाँ भेजा... जानते हुए कि मैं कभी सच तक नहीं पहुँचूँगी।" ... "और अब, चाचा? खुराना ने रुकना कब सीखा? या आप ये भी जानते हैं कि वो आदित्य का फ़ीनिक्स भी उसी तरह बेचने की तैयारी में है?"

"जानता हूँ। खुराना कभी नहीं रुका, बेटा, ऐसे आदमी रुकते नहीं। और नकुल ने ख़ुद अपने चचेरे भाई को उसी थाली में परोसा, ठीक वैसे ही जैसे मैंने अपने भाई को बेचा।" ... "फ़र्क़ बस इतना है, मैं अपनी ग़लती मानने से नहीं डरता। नकुल अभी भी झूठ बोल रहा है।" ... "मैंने तुम्हें भेजा क्योंकि एक भेजी हुई बेटी, जो ख़ुद खोज रही है, किसी जासूस से कहीं ज़्यादा भरोसेमंद दिखती है। मुझे बस इतना चाहिए था कि तुम खोजती रहो, और कभी इतनी गहराई तक न पहुँचो कि आधा फटा हुआ नाम पूरा हो जाए।" ... "मेरा अंदाज़ा ग़लत निकला, इशिता। तुम मेरी बेटी से ज़्यादा निकली। तुम इंजीनियर निकली।"

रतन ने अपनी जेब से कुछ नहीं निकाला, उसकी ज़रूरत ही नहीं थी, उसकी आवाज़ ही काफ़ी थी एक क़ीमत बोलने के लिए।

"तो चलो, इंजीनियर की तरह ही बात करते हैं। बता दो, कितना चाहिए। एक नई ज़िंदगी, विदेश में, तुम्हारे पापा का पूरा इलाज, सब कुछ, बस वो फ़ाइल मुझे दे दो, और आज के बाद कभी वापस मत देखना।"

रतन ने एक रक़म बोली, इतनी बड़ी कि कमरे में एक पल के लिए हवा भी रुक गई, फिर उतनी ही सहजता से जोड़ा कि एक निजी जहाज़ आज शाम ही तैयार खड़ा है, कहीं भी, जहाँ इशिता कहे।

"आप ग़लत कमरे में ग़लत लोगों को ख़रीदने की कोशिश कर रहे हैं, रतन जी।" ... "ये दोनों वो लोग हैं जो एक जलती हुई फ़ाइल के लिए आधी रात मशीन के सामने खड़े हो गए। एक जहाज़ इन्हें नहीं ख़रीद पाएगा।"

"आपने मुझे बेचना सिखाया, चाचा। यही मेरी सबसे बड़ी ग़लती थी, कि मैं इतने साल आपको बाप जैसा मानती रही।"

रतन की आँखों में एक पल के लिए असली तकलीफ़ चमकी, या शायद उसका भी एक और मुखौटा था, इशिता अब फ़र्क़ नहीं कर पा रही थी। ... उनकी आवाज़ में वही हल्की कंपन आई जो कभी उसे बचपन में सुला देती थी, ठीक उन रातों की तरह जब पापा टूट चुके थे और अम्मा जा चुकी थीं, और घर में सिर्फ़ यही एक आवाज़ बची थी जो उसे सुरक्षित लगती थी।

"बेटा, तुम्हारे पापा के टूटने के बाद, जब वो हफ़्तों बिस्तर से नहीं उठे, तुम्हारी फ़ीस भरता रहा मैं। तुम्हारी यूनिफ़ॉर्म, तुम्हारी दवाइयाँ, तुम्हारी अम्मा जो सपना देखकर गईं, वो सब मैंने संभाला। और आज तुम मुझे यूँ..."

"आप मेरी फ़ीस अपने पैसों से नहीं, ख़ुराना के पैसों से भरते रहे, चाचा। मैंने सर्वोदय ट्रेडिंग का हर काग़ज़ देखा है। आप मेरे मसीहा नहीं थे, आप मेरी तनख़्वाह देने वाले मालिक थे।"

रतन का चेहरा एक पल के लिए और सख़्त हुआ, फिर उन्होंने आवाज़ को जान-बूझकर नरम किया, वैसे ही जैसे कोई डॉक्टर बुरी ख़बर देने से पहले करता है।

"ठीक है, मान लिया, सब सच है। पर एक बार सोचो, अगर ये सब बाहर गया, तो सबसे पहले किसकी जान जाएगी? तुम्हारे पापा का दिल इतना कमज़ोर हो चुका है कि डॉक्टर ने उन्हें ज़रा सा भी सदमा लेने से मना किया है।" ... "एक पुलिस की चिट्ठी, एक अख़बार की सुर्ख़ी, बस इतना काफ़ी है। तुम अपने हाथों अपने पापा को मार दोगी, सिर्फ़ अपनी ज़िद के लिए।"

"आपने दस साल पापा को एक झूठे दुश्मन से लड़ाया, चाचा। उनका दिल हर उस दिन थोड़ा टूटा जब वो वर्धान को कोसते रहे, जबकि असली चोर उनके साथ बैठकर चाय पीता रहा।" ... "अगर सच उनका दिल तोड़ेगा, तो कम से कम वो सही वजह से टूटेगा। झूठ से नहीं।"

आदित्य दरवाज़े के पास अब तक ख़ामोश खड़ा रहा था, हर लफ़्ज़ को तौलते हुए, और जो उसने देखा वो कोई जासूस नहीं थी। ... उसने एक बेटी को देखा जो अपने पापा को बचाने के लिए उस आदमी से लड़ रही थी जिसे उसने कभी बाप जैसा माना था, और वो लड़ाई किसी भी जासूसी मिशन से कहीं ज़्यादा भारी थी।

"इशिता जो है, वो जासूस नहीं है, रतन जी। वो वो बेटी है जिसने अपने बाप को बचाने के लिए अपना घर छोड़ा, अपना नाम छोड़ा, और आज अपने चाचा को भी छोड़ने को तैयार खड़ी है।" ... "मैं उसे पूरा देख चुका हूँ, जासूस भी, बेटी भी, और सबसे वफ़ादार इंसान जो मैंने कभी देखा। और मैं उसके साथ खड़ा हूँ।"

"तुम सच में मेरे साथ खड़े हो? इस सबके बाद भी?"

"मैं तुम्हारे झूठ के साथ कभी खड़ा नहीं था, इशिता। मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूँ।" ... "फ़र्क़ है।"

रतन का चेहरा फिर बदला, और इस बार वो गर्मजोशी, जो कभी असली नहीं थी, आख़िरकार पूरी तरह उतर गई, उसकी जगह वो ठंडा हिसाब आ गया जो शुरू से नीचे छिपा हुआ था।

"ठीक है। तुम दोनों ने अपना फ़ैसला कर लिया।" ... "तो सुन लो मेरा फ़ैसला। जो शिकायत ख़ुराना ने दर्ज कराई है, वो तो बस शुरुआत है। मेरे पास काग़ज़ हैं, इशिता, ऐसे काग़ज़ जो साबित करते हैं कि पूरी जासूसी की साज़िश, आर्काइव में हर सेंध, हर चोरी, तुमने और तुम्हारे पापा ने मिलकर रची, मेरी मर्ज़ी के बिना, मेरी जानकारी के बिना।"

रतन ने अपने बैग से एक पतली फ़ाइल निकाली, उसे मेज़ पर रख दिया, खोला नहीं, बस एक कोना दिखाया, इतना ही काफ़ी था ये जताने के लिए कि अंदर कुछ है, कुछ जो असली दिखने के लिए बरसों से बहुत ही सलीक़े से बनाया गया था।

"वो काग़ज़ झूठे होंगे। कोई नहीं मानेगा।"

"झूठे काग़ज़ों को ही तो मैं दस साल से असली बनाता आया हूँ, बेटा। जाकर पूछ लो अपने पापा से, वो जानते हैं मेरे दस्तख़त कितने असली लगते हैं।" ... "एक हफ़्ते में, तुम और किशोर, दोनों जेल में होंगे, कॉर्पोरेट जासूसी और धोखाधड़ी के इल्ज़ाम में, और मैं, ठीक जैसे दस साल पहले, परिवार का इकलौता बचा हुआ आदमी बनकर बाहर खड़ा रहूँगा।" ... "सोच लो, इशिता। अभी भी वक़्त है सही तरफ़ चुनने का।"

"अगर आपके पास जाली काग़ज़ हैं, रतन जी, तो हमारे पास सच है।" ... "और सच, आख़िर में, काग़ज़ों से भारी पड़ता है।"

रतन ने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराए, वही पुरानी, गर्मजोश मुस्कान, जैसे उन्हें पूरा यक़ीन हो कि सच कभी काग़ज़ों से तेज़ नहीं दौड़ता।

इशिता ने चाचा की आँखों में झाँका, और पहली बार उसे यक़ीन नहीं आया कि जिस आदमी ने उसे पाला था, वो सच में अपने ही ख़ून को जेल की सलाखों के पीछे धकेल सकता है, सिर्फ़ ख़ुद को बचाने के लिए। ... बाहर सुबह पूरी तरह खिल चुकी थी, पर कमरे के अंदर, वक़्त फिर से पंद्रह मिनट पर नहीं, एक हफ़्ते पर आ अटका था, और इस बार बचाने के लिए कोई फ़ाइल नहीं थी, सिर्फ़ दो ज़िंदगियाँ, उसकी अपनी और उसके पापा की।

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