अध्याय 5 / 26 पढ़ने में 12 मिनट
भरोसे की चाबी
अंदर की बात द्वारा Avni Oberoi
आदित्य की ख़ुफ़िया लैब में, अपने पिता के चुराए आविष्कार के दिल पर उसी के साथ काम करते हुए, इशिता देखती है कि आदित्य वो दैत्य नहीं जिसकी कहानी वो सुनती आई थी, और हर घंटे उसका झूठ भारी होता जाता है, जबकि एक बार 'मेरे पापा' कहते-कहते वो फिर बाल-बाल बचती है। रात के गुप्त फ़ोन पर पापा उसे उसी अदालती डाके की कहानी दोहराते हैं और रतन चाचा उसे और तेज़ चलने, सिर्फ़ वही एक फ़ाइल छूने और किसी भी वर्धान के क़रीब न जाने की चेतावनी देते हैं, एक ऐसी हिदायत जिसका अजीब सुर उसे हौले से खटकता है। अगली शाम जुगनू की अनजान मदद और बैज के सहारे वो लीगल माले के एक रिकॉर्ड्स टर्मिनल से दस साल पुरानी अधिग्रहण फ़ाइल का ए
सुबह की पहली लिफ़्ट इशिता को उन्हीं ऊपर की मंज़िलों पर ले आई, जहाँ कल रात उसकी दुनिया दो टुकड़ों में बँट गई थी। ... जेब में वही नीला बैज, सीने में वही सच, और होंठों पर वो मुस्कान, जिसे अब उसे किसी पत्थर की तरह ढोना था।
बिना नाम वाला वो दरवाज़ा फिर उसके सामने था। ... कल तक ये उसके लिए बस एक रास्ता थी। आज ये उसके पिता के आविष्कार की चमचमाती क़ब्र थी, जिस पर वर्धान का बेटा अपना भविष्य उगा रहा था। ... और इशिता को अंदर जाकर उस क़ब्र पर मुस्कुराना था, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
"आ गईं! अच्छा हुआ। ... इधर आओ, ये देखो। मैं रात भर यहीं बैठा रहा, सो ही नहीं पाया। ... कल तुमने कोर का जो हिस्सा खोला था ना, उसके आगे का रास्ता मुझे दिख ही नहीं रहा। दिमाग़ जवाब दे गया है।"
"अरे सर, आप तो सो भी नहीं पाए! ... और मैं क्या मदद करूँगी, मैं तो बस एक इंटर्न हूँ। ... पर दिखाइए तो, शायद कोई ताज़ा नज़र काम आ जाए।"
इशिता स्क्रीन पर झुकी, और एक पल को उसका दिल रुक गया। ... वो लकीरें, वो मोड़, हर घुमाव, उसे ज़बानी याद था। इसलिए नहीं कि वो कोई जीनियस थी। ... इसलिए कि बचपन में उसने यही आकार अपने पापा की वर्कशॉप की दीवार पर टँगा देखा था, बरसों।
"यहाँ... यहाँ गर्मी को दबाइए मत, सर। इसे मोड़ दीजिए, बहने का रास्ता दीजिए। ... ये डिज़ाइन ताक़त से नहीं खुलता, सब्र से खुलता है। ये तो ऐसे बना है जैसे इसे बनाने वाले ने इसे किसी बच्चे की तरह पाला हो, जैसे मेरे..."
'मेरे पापा।' ये दो शब्द उसके गले तक आकर काँप गए। ... एक बार कल, एक बार परसों, और आज तीसरी बार। ... उसने वाक्य को बीच में मोड़ दिया, 'जैसे किसी पुराने आविष्कारक ने,' और अपने पापा का नाम फिर निगल लिया, उसी तहख़ाने में जहाँ बाक़ी सब कुछ बंद पड़ा था।
"बहने का रास्ता... रुको ज़रा। ... हाँ। हाँ! हो गया, इशिता। ये तो हो गया! ... जिस गुत्थी में मेरी पूरी टीम हफ़्तों से उलझी थी, तुमने एक साँस में खोल दी। ... तुम इसे ऐसे समझती हो, जैसे तुमने इसे ख़ुद बनाया हो।"
'जैसे तुमने इसे ख़ुद बनाया हो।' ... आदित्य को कहाँ पता था कि ये बात कितनी सच थी, बस बनाने वाला वो नहीं, उसका पिता था। ... और यहीं इशिता को साफ़ दिखा कि ये आदमी वो दैत्य नहीं था, जिसकी तस्वीर उसके पापा ने दस साल से गढ़ी थी। ये चोर नहीं, बस एक बनाने वाला था, जिसे पता ही नहीं था कि उसकी नींव किसी और के ख़ून पर रखी है।
"इशिता, ये प्रोजेक्ट मेरे लिए सिर्फ़ एक प्रोजेक्ट नहीं है। ... पूरी ज़िंदगी लोगों ने यही कहा, कि आदित्य वर्धान बस मालिक का नरम दिल बेटा है, कुर्सी का हक़दार नहीं। ... ये लैब उन सबको मेरा जवाब है। और तुम जैसे लोग, जो सच में देखते हैं... तुम्हीं को देख कर लगता है कि शायद मैं ग़लत नहीं हूँ।"
"आप ग़लत नहीं हैं, सर। ... जो इस कमरे में हो रहा है ना, वो सच में... वो सच में ख़ास है।" ... कहते-कहते उसकी आवाज़ ज़रा सी काँप गई, और उसे ख़ुद पर गुस्सा आ गया। एक जासूस को यूँ नहीं काँपना चाहिए।
एक पल को उन दोनों की नज़रें उस स्क्रीन से उठ कर आपस में मिलीं, और वहीं ठहर गईं। ... इशिता को अचानक एहसास हुआ कि आदित्य कितने पास खड़ा था। ... उसने झट से नज़रें हटा लीं और वही पुराना सबक़ दोहराया, ये दुश्मन का बेटा है, इशिता। पर आज पहली बार वो सबक़ अंदर से खोखला लगा।
तभी कोने से रीमा ने एक कप चाय बढ़ाई, वही चोरी की चाय, और आँख मारते हुए फुसफुसाई कि दो ही दिन में इशिता पूरी लैब की चहेती बन गई है। ... इशिता हँस दी, पर अंदर कुछ कसक गया। ... रीमा इस इमारत में उसकी पहली सच्ची दोस्त बनती जा रही थी, और वो भी उसी जाल का एक धागा थी, जिसे उसे एक दिन अपने ही हाथों काटना था।
दिन भर, काम के बीच-बीच, इशिता की नज़र बार-बार गलियारे के उस पार जाती रही। ... वो भारी, सीलबंद दरवाज़ा। तहख़ाना। लीगल आर्काइव, खुराना का इलाक़ा, जहाँ दस साल पुराने वो काग़ज़ दफ़न थे। ... और उसकी जेब में पड़ा वो नीला बैज, आदित्य के भरोसे की वो चाबी, हर घंटे थोड़ी और गरम होती जा रही थी।
उस रात इशिता ने फिर वही दूसरा फ़ोन निकाला। ... पर आज उसके हाथ काँप रहे थे, क्योंकि आज उसके पास एक ऐसी बात थी जो वो बता ही नहीं सकती थी, कि जिस चोरी का सबूत वो ढूँढने आई थी, वो आदित्य वर्धान की मुस्कान में साँस ले रहा था।
"इशिता? बेटा, बता। कुछ हाथ लगा? उस तहख़ाने तक पहुँची? ... बैज तो तेरे पास आ गया, फिर देर किस बात की? वो सौदे के काग़ज़, वो फ़ाइल... बस वो निकाल ला, बेटा। दस साल से मैं बस इसी एक चीज़ के लिए साँस ले रहा हूँ।"
"पापा... एक बार फिर बताइए मुझे। ... वो हुआ कैसे था? उन्होंने आपका आविष्कार अदालत में छीना था ना? मुक़दमे में, ज़बरदस्ती?"
"अदालत में? हुंह। ... डाका था वो, बेटा। क़ानून के कपड़े पहने हुए डाका। ... उनके पास पचास वकील थे, मेरे पास एक टूटा हुआ आदमी। जज ने हथौड़ा मारा, और मेरी दस साल की मेहनत एक ही पल में उनके नाम हो गई, मेरे हाथों से नोच ली गई। ... यही तो साबित करना है तुझे बेटा, कि वो चोरी थी। सिर्फ़ और सिर्फ़ चोरी।"
"लाओ, फ़ोन मुझे दो। ... इशिता, बेटा, मैं हूँ, तेरा रतन चाचा। ... तेरे पापा सही कह रहे हैं, पर अब जज़्बात का वक़्त नहीं, अक़्ल का वक़्त है। ... मेरी एक बात गाँठ बाँध ले। सिर्फ़ वही एक फ़ाइल, अधिग्रहण के वो काग़ज़। उसके अलावा किसी नाम को मत छेड़ना, किसी और पुराने दस्तावेज़ में मत उलझना। समझी मेरी बात?"
"और सुन, मेरी बच्ची, ये सबसे ज़रूरी बात है। ... वहाँ किसी वर्धान के क़रीब मत जाना। कोई भी हो, चाहे कितना भी भला दिखे, कितना भी मीठा बोले। ... वो लोग ज़हर हैं, ऊपर से शहद, अंदर से क़ातिल। तेरे पापा ने उन्हें दोस्त समझा था, और देख उसका क्या हश्र हुआ। बस अपना काम कर, और वहाँ से निकल आ।"
"जी चाचा। ... पर एक बात पूछूँ? ... अगर उस फ़ाइल में पापा के अलावा किसी और का भी नाम निकल आया, किसी अपने का... तो?"
"किसी और का नाम?" ... "कोई और नाम नहीं होगा वहाँ, इशिता। ऐसी बेसिर-पैर की बातें दिमाग़ में मत ला। ... बस वही एक फ़ाइल उठा, और घर लौट आ। तेरे पापा का नाम, बस उतना ही तेरा काम है। बाक़ी सब मुझ पर छोड़ दे।"
'किसी वर्धान के क़रीब मत जाना।' ... और इशिता की आँखों के सामने बस एक ही चेहरा तैर गया, वो आदमी जो आज उसे 'जैसे तुमने ख़ुद बनाया हो' कह कर हँसा था। ... उसने कुछ नहीं कहा, बस धीरे से 'जी चाचा' कह दिया। एक और झूठ, पर ये झूठ इस बार अपने ही ख़ून से बोला गया था।
और उसी पल एक बात इशिता के मन में इतनी हौले से खटकी कि वो उसे ठीक से पकड़ भी न पाई। ... अगर चोरी वर्धान ने की है, तो चाचा उसे बाक़ी नामों से इतनी सख़्ती से क्यों रोक रहे हैं? किस नाम से? ... पर उसने वो सवाल भी बाक़ी सबकी तरह निगल लिया। अभी शक करने का वक़्त नहीं था, बस चलने का, तेज़ और तेज़।
अगली शाम इशिता को वो मौक़ा मिल गया, जिसका उसे इंतज़ार था। ... जुगनू की चाय-ख़बर के मुताबिक़, लीगल माले पर हफ़्ते में एक शाम सफ़ाई होती थी, जब बड़े साहब लोग निकल जाते और सिर्फ़ एक बूढ़ा गार्ड बचता। ... बैज उसे ऊपर तक ले जाता। और आगे का रास्ता... आगे जुगनू था।
"अरे मैडम जी, आप और लीगल माला? ... वहाँ तो बस काग़ज़ के भूत रहते हैं और खुराना साहब का गुस्सा! ... पर आपके लिए तो जुगनू के पास हर माले की चाबी है। ये लो ट्रॉली, ये फ़ाइलें रख लो ऊपर। कोई पूछे तो सीधा कह देना, आदित्य सर की फ़ाइलें पहुँचा रही हूँ। बस, किसकी हिम्मत जो रोके?"
"और सुनिए ना मैडम जी। ... वो ऊपर वाले सीनियर इंटर्न, जो कल रात आपसे दो बजे तक फ़ोटोकॉपी करवाते रहे... ... मैंने आज सुबह तीनों की चाय में दुगनी चीनी घोल दी है। अब दिन भर मुए ऊँघते रहेंगे। ... जुगनू का हिसाब एकदम सीधा है। जो मेरे अच्छे लोगों को सताएगा, उसकी चाय जुगनू ख़राब करेगा।"
"जुगनू, तुम किसी दिन मुझे सच में मुसीबत में डलवाओगे। ... दुगनी चीनी! भगवान बचाए। तुमसे बुरा दुश्मन भी कोई नहीं और तुमसे अच्छा दोस्त भी, दोनों एक ही आदमी है।"
"सच कहूँ जुगनू... तुम न होते ना, तो मैं इस इमारत में एक दिन भी न टिकती। ... इतने बड़े टावर में तुम इकलौते हो, जो बिना किसी मतलब के मदद करता है।"
और यही सच था, और यही सबसे बुरा भी था। ... जुगनू इस पूरी इमारत का इकलौता साफ़ दिल था, और इशिता उसी दिल को एक चाबी की तरह इस्तेमाल कर रही थी। ... पर जासूस का हिसाब जुगनू जितना सीधा नहीं होता, उसमें हर अच्छाई की एक क़ीमत होती है।
लीगल माला रात में किसी क़ब्रिस्तान जैसा लगता था, ठंडा और ख़ामोश। ... गलियारे के आख़िरी सिरे पर वही भारी, सीलबंद दरवाज़ा, तहख़ाना, जिसके पीछे दस साल पुराने वो काग़ज़ दफ़न थे। ... उस तक पहुँचना आज मुमकिन नहीं था। पर उसके ठीक बाहर एक रिकॉर्ड्स टर्मिनल खड़ा था। इशिता ने बैज छुआया, और स्क्रीन हरी होकर जाग उठी।
उसकी उँगलियाँ की-बोर्ड पर दौड़ने लगीं। ... वर्धान अधिग्रहण, सन दो हज़ार चौदह। सिन्हा। पेटेंट हस्तांतरण। ... ज़्यादातर फ़ाइलें ताले में थीं, सीलबंद, सिर्फ़ उस तहख़ाने में खुलने वाली। पर एक अधूरा सा टुकड़ा स्क्रीन पर खुल गया, जिसे किसी ने डिजिटल कॉपी में ग़लती से खुला छोड़ दिया था।
तभी गलियारे में एक टॉर्च की रोशनी काँपी। ... इशिता की साँस छाती में ही अटक गई, उँगली स्क्रीन पर जम गई। गार्ड। ... रोशनी दीवार पर फिसली, एक पल ठिठकी, और फिर आगे बढ़ गई। इशिता ने धीरे से साँस छोड़ी, और उस पूरे टुकड़े को अपने फ़ोन में उतार लिया, काँपते हाथों से, और वहाँ से निकल गई।
सीढ़ियों के अँधेरे में इशिता रुक गई और फ़ोन की रोशनी में वो टुकड़ा पढ़ने लगी। ... वो बस एक ही चीज़ ढूँढ रही थी, इस बात का सबूत कि ये चोरी थी। वो मुक़दमा, वो ज़ब्ती, अदालत का वो हथौड़ा, जिसकी कहानी वो ज़िंदगी भर सुनती आई थी।
पर स्क्रीन पर जो लिखा था, वो कुछ और ही कह रहा था। ... इशिता ने उसे एक बार पढ़ा। फिर दोबारा। फिर तीसरी बार, क्योंकि उसका दिमाग़ उन शब्दों को मानने से इनकार कर रहा था।
"अधिग्रहण नहीं... विक्रय। ... 'पेटेंट का हस्तांतरण, विक्रय द्वारा।' ... 'सहमत राशि के बदले।' ... राशि? पैसे? ... ये छीना नहीं गया था। ये... ये बेचा गया था। किसी ने इसे अपनी मर्ज़ी से बेच दिया था।"
इशिता के पापा ने ज़िंदगी भर एक ही बात क़सम खाकर कही थी, कि उनका आविष्कार अदालत में छीना गया, किसी डाके की तरह नोच लिया गया। ... पर ये काग़ज़ किसी डाके की बात नहीं कर रहा था। ये एक सौदे की बात कर रहा था। एक विक्रय। एक सहमति। एक तय की हुई क़ीमत। ... किसी ने इसे वर्धान को अपनी मर्ज़ी से, पैसे लेकर बेच दिया था।
और उस विक्रय-पत्र के नीचे, बेचने वाले की जगह, एक दस्तख़त था। ... पर वो हिस्सा धुंधला था, कटा हुआ, सीलबंद फ़ाइल के उस पार, जहाँ इस टुकड़े की पहुँच ख़त्म हो जाती थी। ... बस एक नाम की दूरी पर वो सच खड़ा था, जिसे इशिता आज तक सोच भी नहीं सकती थी।
दस साल से इशिता एक ही सच के सहारे जी रही थी, कि वर्धान ने उसके पिता का आविष्कार चुराया। ... पर आज, अपने ही हाथों निकाले पहले सबूत ने वो सच तोड़ दिया। ये चोरी नहीं थी। ये एक सौदा था। ... और अगर ये बेचा गया था, तो सिर्फ़ एक सवाल बचता था, जिससे इशिता की रूह तक काँप उठी। उसके पापा का आविष्कार बेचने का हक़ आख़िर था किसके पास?
जिस झूठ को तोड़ने के लिए इशिता इस इमारत में घुसी थी, आज उस झूठ में पहली दरार नहीं पड़ी थी। ... आज पहली दरार उस कहानी में पड़ी थी, जो ख़ुद उसके पापा ने उसे सुनाई थी। और उस दरार के पार, अँधेरे में, कोई और ही चेहरा छुपा बैठा था।
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