अध्याय 14 / 26 पढ़ने में 9 मिनट
अपना ही ख़ून
अंदर की बात द्वारा Avni Oberoi
फ़ोन पर चाचा रतन की गर्मजोशी सुनते हुए इशिता को पहली बार उनकी आवाज़ में एक झूठ की तह दिखती है, और एक HR फ़ॉर्म की आड़ में वो उन्हें पुराने लोन के बारे में परखती है। पापा से बात करते हुए मिले एक अकाउंटेंट के नाम का पीछा करते हुए वो एक शेल कंपनी तक पहुँचती है, जिसकी आख़िरी परत के नीचे ख़ुराना का दस्तख़त छिपा निकलता है।
फ़ोन तीसरी बार बज उठा, स्क्रीन पर वही नाम एक बार फिर जगमगाया जो अभी-अभी एक दस्तख़त के नीचे उसकी पूरी दुनिया तोड़ चुका था, रतन सिन्हा। इशिता का अंगूठा हरे बटन के ऐन ऊपर ठहर गया, ना उठाने की हिम्मत, ना काटने की। ... आख़िर उसने साँस भींची और बटन दबा दिया, आवाज़ को उसी पुरानी, प्यारी बच्ची की शक्ल में ढालते हुए जो चाचा हमेशा सुनना चाहते थे।
"हाँ चाचा, जागी हूँ... आज ऑफ़िस में एक बड़ा डेमो था, अभी-अभी फ़्री हुई।" ... "आप बताओ, इतनी रात को नींद क्यों नहीं आ रही?"
"बस तेरी याद आ गई, बेटा। तेरी आवाज़ सुने कई दिन हो गए थे।" ... "कैसा रहा डेमो? तू तो कहती थी वो लड़का, आदित्य, बस सपने देखता है। चला मशीन?"
और वहाँ था वो, आदित्य का नाम, चाचा की ज़ुबान पर, उसी हल्केपन से जिससे वो हमेशा बोलते थे, जैसे दुनिया में कोई बदलाव आया ही ना हो। ... इशिता ने आँखें मूँद लीं और ख़ुद को याद दिलाया, अभी नहीं, अभी कुछ मत कहना।
"चल गई, चाचा। सबने तालियाँ बजाईं।" ... "अच्छा चाचा, याद है वो पुराना केस, पापा वाला? कभी-कभी सोचती हूँ, इतने बड़े केस में इतने साल कैसे निकल गए बिना किसी ठोस सबूत के... आपने उस वक़्त कुछ नहीं देखा था क्या?"
"अरे बेटा, इतनी रात को ये सब बातें क्यों? सो जा, आराम कर।" ... "पुरानी बातें कुरेदने से कुछ नहीं मिलता, बस दर्द मिलता है। तू बस अपने काम पर ध्यान दे, बाक़ी मैं देख लूँगा, हमेशा की तरह।"
और तभी इशिता ने वो सुन लिया जो शब्दों में नहीं था, वो सहूलियत, वो इतनी मुलायम टाल-मटोल जो सिर्फ़ वही आदमी बोल सकता है जिसे डरने की कोई वजह ही ना हो। ... दस साल से जिस आवाज़ को उसने हिफ़ाज़त समझा था, आज पहली बार उसी आवाज़ में उसे एक झूठ की तह दिखी, इतनी पुरानी, इतनी मँजी हुई, कि झूठ भी अब सच जैसा लगने लगा था।
"ठीक है चाचा... आप भी सो जाओ। लव यू।"
कॉल कटते ही फ़ोन उसके हाथ से गिर पड़ा, जैसे उसने अभी-अभी किसी अंगारे को छुआ हो। ... कमरे में अकेली, इशिता ने पहली बार पूरा हिसाब लगाया, दुश्मन जिसे मारने वो आई थी, वो कंपनी, वो दैत्य, उस चाचा से कम गुनहगार निकला जिसने उसे पाला था। ... और पापा? क्या वो जानते थे? या ये सच उन्हें दोबारा तोड़ देगा, उसी तरह जैसे दस साल पहले टूटे थे? इशिता को दोनों जवाबों से डर लगा।
अगली सुबह वर्धान टावर हमेशा की तरह जगमगा रहा था, काँच की लिफ़्टें, कॉफ़ी की महक, जुगनू का हल्ला जो हर गलियारे में एक नई ख़बर बाँट रहा था, मानो रात कुछ हुआ ही ना हो। ... एक कोने में नकुल अब भी कल के डेमो की हार चबा रहा था, चुप, पर उसकी आँखें पहले से किसी नई कमज़ोरी की तलाश में घूम रही थीं। ... इशिता ने अपना बैज गले में डाला और वही मुस्कान चेहरे पर चढ़ाई जो हर सुबह उसकी वर्दी बन जाती थी, भले अंदर कुछ भी बचा ना हो।
"अरे मैडम इशिता! सुना है कल रात लैब में बड़ा जश्न हुआ, आज हर कोई मुस्कुरा रहा है!" ... "जुगनू भाई से कुछ नहीं छुपता, समझी? बस इतना बताओ, ख़ुशी की वजह सिर्फ़ वो मशीन थी, या कुछ और भी?"
"जुगनू भैया, आपका काम चाबियाँ बाँटना है, गप्प नहीं!" ... "अच्छा बताओ, आज लीगल फ़्लोर पर कोई हलचल है क्या?"
ख़ुफ़िया लैब के दरवाज़े पर आदित्य उसका इंतज़ार कर रहा था, कल रात की गरमाहट अब भी उसकी आँखों में बाक़ी, और उसने उसे देखते ही वैसे मुस्कुराया जैसे कोई आदमी सिर्फ़ एक रात में पूरी तरह बदल जाता है। ... इशिता ने भी मुस्कुरा कर जवाब दिया, और उस एक मुस्कान की क़ीमत उसने अंदर ही अंदर किसी और चीज़ से चुकाई, एक ऐसी क़ीमत जिसका हिसाब आदित्य को कभी पता नहीं चलेगा।
दोपहर के एक छोटे ब्रेक में इशिता कैफ़ेटेरिया की तरफ़ नहीं, छत की सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ी, जहाँ कोई नहीं सुनता था, और उसने फिर वही नंबर घुमाया जिसे कल रात उसने काँपते हुए काटा था। ... इस बार सवाल हिफ़ाज़त के लिए नहीं था, एक जाल के लिए था, दफ़्तर की ज़बान में लपेटा हुआ।
"चाचा, एक बात पूछनी थी। ऑफ़िस में एक फ़ॉर्म भरना है, फ़ाइनेंशियल बैकग्राउंड का, सबको सब कुछ चाहिए।" ... "वो जो पैसा उस साल आया था, जब पापा का केस चल रहा था, घर चलाने के लिए, मेरी फ़ीस के लिए... वो लोन किस बैंक से था, चाचा? नाम याद है?"
"अरे बेटा, इतने साल पुरानी बात, मुझे भी ठीक से याद नहीं। किसी दोस्त से मदद ली थी, नाम... नाम भूल गया।" ... "तू फ़ॉर्म में लिख दे, 'पारिवारिक मित्र से क़र्ज़'। बाक़ी मैं संभाल लूँगा, हमेशा की तरह। तू टेंशन मत ले।"
"पर चाचा, इतना बड़ा एहसान... आपने कभी पापा को उस दोस्त से मिलवाया क्यों नहीं? मैं भी शुक्रिया कहना चाहती हूँ किसी दिन।"
"वो लोग परदे के पीछे रहना पसंद करते हैं, बेटा, एहसान जताना नहीं। तू बस इतना जान, जिसने भी मदद की, वो हमारे भले के लिए ही की।" ... "अब सो जा, कल फिर बात करेंगे। रात बहुत हो गई।"
वही जवाब, इतना तैयार, इतना सहज, जैसे उसने ये सवाल सालों पहले ख़ुद से पूछ कर रटा हो। इशिता ने कॉल काटी और समझ गई, अगर चाचा सच में बेगुनाह होते, तो एक दोस्त का नाम भूल जाना मुमकिन था, पर एक झूठ को इतनी सफ़ाई से बोलना, वो सिर्फ़ प्रैक्टिस से आता है। ... उसने तय कर लिया, अब वो चाचा से कुछ नहीं पूछेगी। अब वो सीधे पैसे का पीछा करेगी।
शाम को इशिता ने पापा को फ़ोन किया, उसी पुरानी, हल्की आवाज़ में, जिसमें ना कोई शक झलके, ना कोई सवाल भारी लगे। ... उसने बात हल्की रखी, मौसम, खाना, कॉलेज के पुराने दोस्त, और आख़िर में, जैसे इत्तेफ़ाक़न, वो सवाल पूछ लिया जो उसे असल में चाहिए था।
"पापा, याद है, जब आपका केस चल रहा था, तब हम इतने तंग हो गए थे... चाचा ने ही तो हमें उस वक़्त संभाला था ना?" ... "वो पैसा कहाँ से आया था, पापा? कभी सोचा है?"
"हाँ बेटा, रतन ना होता तो हम सड़क पर होते।" ... "उसने किसी अकाउंटेंट के ज़रिए इंतज़ाम किया था, मेहता नाम था शायद, बड़ी गर्मजोशी से मिला था मुझे उस दिन।"
और वहाँ था, बिना किसी शक के, एक नाम, मेहता, जो पापा की ज़ुबान से इतनी सहजता से गिरा जैसे उसकी कोई अहमियत ही ना हो। ... इशिता ने वो नाम अपने दिमाग़ में लिख लिया, और फिर ख़ुद से नफ़रत हुई, क्योंकि वो अभी अपने ही टूटे हुए पापा की चोट को खोद कर एक सुराग़ निकाल रही थी।
"अच्छा बता, तू ख़ुश तो है ना वहाँ? खाना ठीक से खाती है?" ... "मुझे बस इतना पता है, तू वहाँ किसी और मक़सद से गई है, बेटा। मेरे लिए। भूल मत जाना।"
और वही एक लाइन, 'मेरे लिए', इशिता के सीने में उतरते हुए एक चाकू बन गई, क्योंकि पापा को अब भी यक़ीन था कि उनकी बेटी एक दुश्मन के घर में लड़ रही है, जबकि असली जंग उनके अपने घर के अंदर छिड़ी थी। ... इशिता ने बस "हाँ पापा" कहा और फ़ोन रख दिया, क्योंकि सच बोलने का मतलब था उन्हें दूसरी बार तोड़ना, और वो अभी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाई।
आधी रात को इशिता ने अपना लैपटॉप खोला, वही जासूसी आदत जो अब उसकी दूसरी जान बन चुकी थी, और मेहता नाम को कंपनी रजिस्ट्री के पुराने रिकॉर्ड में खोजना शुरू किया। ... कुछ ही मिनटों में मेहता एक असली आदमी निकला, एक चार्टर्ड अकाउंटेंट, जिसका नाम दस साल पुराने एक लोन एग्रीमेंट पर दर्ज था, वही लोन जिसने उसके टूटे घर को बचाया था।
पर पैसा मेहता का नहीं था, वो सिर्फ़ बिचौलिया था, एक हस्ताक्षर करने वाला हाथ। असली पैसा एक कंपनी से आया था जिसका नाम इशिता ने पहले कभी नहीं सुना था, 'सर्वोदय ट्रेडिंग', काग़ज़ों पर एक मामूली सी सप्लाई फ़र्म। ... उस कंपनी का पता, उसका रजिस्ट्रेशन, उसके डायरेक्टर का नाम, सब कुछ इतना साफ़ था कि इशिता को शक हुआ, कोई असली सप्लाई फ़र्म इतनी ख़ाली नहीं होती।
"इतनी सफ़ाई... ये कंपनी सिर्फ़ काग़ज़ पर है।"
उसने डायरेक्टर के नाम को अगले रजिस्ट्री रिकॉर्ड से जोड़ा, फिर उस रिकॉर्ड को एक और कंपनी से, परत दर परत, जैसे कोई प्याज़ छील रही हो। ... और आख़िरी परत के नीचे, एक बोर्ड रिज़ोल्यूशन के हाशिए पर, एक हस्ताक्षर था जिसे इशिता ने अभी हफ़्तों पहले वर्धान के किसी काग़ज़ पर देखा था, वर्धान इंडस्ट्रीज़ के चीफ़ टेक्नोलॉजी ऑफ़िसर का दस्तख़त, ख़ुराना का।
"ये लोन... ये लोन चाचा ने नहीं दिया था।" ... "ये पैसा ख़ुराना ने भेजा था। चाचा ने हमें बचाया नहीं... चाचा को इसके लिए पैसे मिले थे।"
और उसी पल इशिता को समझ आया, चाचा ने उसके टूटे घर को कभी बचाया ही नहीं था, उसे तो बस इस बात की तनख़्वाह मिलती रही थी कि वो घर टूटा ही रहे, ख़ामोश रहे, कभी सवाल ना पूछे। ... जिस मसीहा को उसने प्यार किया, जिसे उसने अपना दूसरा बाप माना, वो कभी उसका उद्धारक था ही नहीं, वो सिर्फ़ एक चोर का तनख़्वाहदार नौकर था, जिसे हर साल उसकी ख़ामोशी की क़ीमत चुकाई जाती रही।
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