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Chapter 17 of 26 10 min read

अगला शिकार

अंदर की बात by Avni Oberoi

सूरज निकलने में अभी देर थी, जब इशिता वर्धान टावर के इंटर्न बे में दाख़िल हुई, आँखों में रात भर की थकन और जेब में वही स्क्रीनशॉट, जो अब तक जल रहा था। ... वो सोई नहीं थी, बस हर टुकड़े को जोड़ती रही, जब तक तस्वीर इतनी साफ़ ना हो गई कि उससे नज़र मिलाना मुश्किल हो जाए।

"इशिता, इतनी सुबह? मैंने सोचा शायद कोई भूत आ गया बे में।" ... "ऊपर कुछ बड़ा पक रहा है। नकुल भैया ने अचानक एक 'इनोवेशन रिव्यू' कमेटी बिठा दी है, और निशाने पर आदित्य सर की टीम है।"

"इनोवेशन रिव्यू? जुगनू भैया, ये तो अच्छी बात है, हमारी मेहनत किसी को दिख तो रही है।" ... "या फिर नकुल भैया को हमारी चाय के बिल पर एतराज़ है?"

"अच्छी बात नहीं है, इशिता। 'रिव्यू' नकुल भैया का प्यारा शब्द है किसी चीज़ को दफ़नाने का।" ... "कह रहे हैं फ़ीनिक्स को किसी बड़ी 'रिस्ट्रक्चरिंग' में मिला दिया जाएगा। और जो चीज़ नकुल भैया की रिस्ट्रक्चरिंग में जाती है, वो वापस नहीं लौटती।"

"तो नकुल भैया को हमारी मेहनत हज़म नहीं हो रही।" ... "चलो, मैं देखती हूँ। तुम अपनी चाय बचा के रखना, जुगनू भैया, आज दिन लंबा है।"

कल तक उसकी दुनिया दो हिस्सों में बँटी थी, एक तरफ़ पापा का पुराना ज़ख़्म, दूसरी तरफ़ आदित्य का आज का चेहरा। ... पर आज वो दोनों हिस्से एक हो गए थे। जिन हाथों ने दस साल पहले उसके पापा को लूटा था, वही हाथ अब आदित्य के सपने की तरफ़ बढ़ रहे थे। दुश्मन एक ही था।

"अगर मैं आदित्य को बचा लूँ..." ... "...तो पापा का बदला भी वहीं पूरा हो जाएगा। दोनों एक ही आदमी हैं। एक ही चोरी है।"

पर बचाने का सीधा रास्ता बंद था। वो आदित्य से ये नहीं कह सकती थी कि तुम्हारा फ़ीनिक्स बिक रहा है, क्योंकि अगला सवाल होता, तुम्हें कैसे पता, और उस एक जवाब में उसका पूरा मुखौटा उतर जाता। ... तो उसने वही चुना जो एक जासूस चुनती है, वो उसे बचाएगी, पर परछाईं से। एक गुमनाम चेतावनी, और डिलीवरी की तारीख़ को चुपचाप पीछे धकेलना।

उस सुबह इशिता ने एक ऐसा पैग़ाम तैयार किया जिसमें उसका कुछ नहीं था, कोई नाम नहीं, कोई लहजा नहीं, बस एक ठंडी चेतावनी। ... 'तुम्हारा फ़ीनिक्स अगले महीने बेचा जा रहा है, अंदर से। सम्भल जाओ।' और भेजते हुए उसे पता था, वो उस आदमी को अजनबी बनकर बचा रही थी, जिसके साथ हर रोज़ आमने-सामने बैठती थी।

एक घंटे बाद लैब का दरवाज़ा ज़ोर से खुला और आदित्य अंदर आया, हाथ में फ़ोन, स्क्रीन पर वही लफ़्ज़ जो उसने ख़ुद लिखे थे। ... उसकी नज़र सीधे इशिता पर पड़ी, जैसे पूरी इमारत में सिर्फ़ वही एक थी जिसके सामने वो टूट सकता था।

"इशिता, ये देखो। किसी ने... किसी ने मुझे ये भेजा है। कहता है फ़ीनिक्स बिक रहा है, अंदर से।" ... "मेरी अपनी टीम, मेरा अपना ख़ून... कोई अंदर का ही इसे बेच रहा है। मुझे यक़ीन नहीं हो रहा।"

"ये कोई मज़ाक भी हो सकता है, आदित्य। कोई जलने वाला, कोई नकुल का आदमी।" ... "पर अगर ये सच है... तो सवाल ये है कि अंदर से कौन? किसके पास फ़ीनिक्स को बेचने लायक पहुँच है?"

"तुम ठीक कह रही हो। ये कोई ऐसा है जिसके पास बोर्ड तक पहुँच है, और मेरी टीम तक भी।" ... "मुझे तुम्हारी मदद चाहिए, इशिता। तुम वो देख लेती हो जो बाक़ी नहीं देखते। इसीलिए तो मैंने तुम्हें चुना था।"

"मैं ढूँढूँगी, आदित्य। जो भी ये कर रहा है, मैं उसका चेहरा तुम्हारे सामने ले आऊँगी।" ... "मैं तुम्हें बिकने नहीं दूँगी। ये मेरा वादा है।"

"पता नहीं तुम मेरी ज़िंदगी में कैसे आ गईं, इशिता।" ... "जब सब पीठ दिखा रहे थे, तब तुम सामने खड़ी हो।"

आदित्य एक पल उसकी आँखों में देखता रहा, और उस देखने में वो भरोसा था जो इशिता को हर बार अंदर से काट जाता था। ... कमरे की हवा बदल गई, दो साँसों के बीच की दूरी सिमट गई, और एक पल के लिए मिशन और मुखौटा पीछे छूट गया, सिर्फ़ वो दोनों बचे।

"सारी उम्र लोगों ने मुझे कमज़ोर समझा, नरम, बस सपने देखने वाला।" ... "तुम पहली हो जिसने मुझे काबिल समझा। पर तुम्हारी नज़र में गिरना... वो मैं नहीं झेल पाऊँगा।"

"तुम नहीं हारोगे। और वो सब ग़लत थे। तुम्हें बस किसी को साबित करना है कि... कि मेरे पा..." ... "...कि मेरे पास जो भरोसा है वो सही जगह लगा है। बस काम पर ध्यान दो, बाक़ी मुझ पर छोड़ दो।"

और उस पल इशिता को एहसास हुआ कि वो अब आदित्य को इस्तेमाल नहीं कर रही थी। वो उसे बचा रही थी, अपनी जान से ज़्यादा। ... उसका मिशन और उसका दिल अब एक ही तरफ़ खड़े थे, और यही बात सबसे ज़्यादा ख़तरनाक थी।

उस दोपहर इशिता ने पहला वार किया, इतना बारीक कि किसी को दिखे भी ना। फ़ीनिक्स का जो डिलीवरी पैकेज तैयार हो रहा था, उसके दिल में एक अहम हिस्सा उसने चुपचाप एक ऐसी चाबी से बाँध दिया जो सिर्फ़ उसके पास थी। ... अब वो पैकेज उसके बिना अधूरा था, बेकार, और डिलीवरी की घड़ी कुछ हफ़्ते पीछे खिसक गई। घड़ी अब उसके हाथ में थी।

"इशिता, वो तुमने पूछा था ना, रिस्ट्रक्चरिंग वाला काग़ज़ किसने बनाया?" ... "मैंने फ़ाइल रूम में देखा। उस मेमो पर एक बोर्ड-लेवल दस्तख़त चाहिए, और वो किसी बाहर वाले का नहीं, अपने ही ख़ानदान के किसी का है। ऊँची कुर्सी वाले का।"

"ख़ानदान का कोई... मतलब कोई वर्धान।" ... "और भैया, तुमने कभी नकुल भैया को देर रात किसी बाहर वाले मेहमान से मिलते देखा है? कोई जो कर्मचारी ना हो?"

"अरे हाँ! प्राइवेट लिफ़्ट से, हफ़्ते में दो बार, एक बड़ी गाड़ी वाले साहब आते हैं, चेहरा कभी सीधा नहीं दिखता।" ... "नकुल भैया ख़ुद नीचे लेने जाते हैं। इतनी इज़्ज़त तो वो अपने बाप को भी नहीं देते।"

"तुम्हारी इसी आँख ने आज बहुत कुछ बता दिया, जुगनू भैया।" ... "जाओ, चाय ठंडी हो रही होगी। और ये बात हम दोनों के बीच ही रहे, हाँ?"

इशिता के दिमाग़ में टुकड़े जुड़ने लगे। अंदरूनी साझेदार के पास बोर्ड तक पहुँच थी, फ़ीनिक्स की टीम तक पहुँच थी, और वो हफ़्ते में दो बार किसी ख़रीदार से चोरी-छिपे मिल रहा था। ... तीनों दरवाज़े एक ही नाम पर खुल रहे थे, इतना क़रीब कि इशिता को अपने ही अंदाज़े पर यक़ीन नहीं आ रहा था।

"इशिता जी, आजकल फ़ाइल रूम में बहुत नज़र आती हैं।" ... "बताइए, इतनी होशियार लड़की एक डूबते प्रोजेक्ट में अपना वक़्त क्यों बर्बाद कर रही है? समझदार लोग सही घोड़े पर दाँव लगाते हैं।"

"मुझे डूबते और तैरते का फ़र्क़ नहीं दिखता, नकुल सर, मुझे बस अच्छा काम दिखता है।" ... "और वैसे भी, कौन सा घोड़ा डूब रहा है ये तो वही तय करते हैं जिनके हाथ में लगाम होती है, है ना?"

"होशियार। पर याद रखिए, इस टावर में लगाम हमेशा उसी के हाथ में जाती है जो उसे खींचना जानता है।" ... "अगले महीने तक तय हो जाएगा कि बड़ी कुर्सी किसकी है। और तब आपको भी नया मालिक चुनना पड़ेगा, इशिता जी।"

"अगले महीने..." ... "आप बहुत आगे की सोचते हैं, नकुल सर। मैं तो बस आज का काम देखती हूँ।"

नकुल मुस्कुरा कर चला गया, और इशिता वहीं जमी रह गई। 'अगले महीने', ठीक वही तारीख़ जो ख़ुराना के ईमेल पर 'डिलीवरी' के आगे लिखी थी। ... अंदरूनी साझेदार, ख़रीदार से मिलने वाला हाथ, बड़ी कुर्सी का सपना देखने वाला आदमी, सब एक ही निकले। नकुल। आदित्य का अपना चचेरा भाई।

उस रात इशिता को यक़ीन चाहिए था, अंदाज़ा नहीं। उसी प्राइवेट लिफ़्ट के पास, एक ख़ाली दफ़्तर की दीवार के पीछे, उसने वो सुना जिसने आख़िरी शक भी मिटा दिया। ... नकुल फ़ोन पर था, लहजा सौदे का, और दूसरी तरफ़ का नाम इशिता के कानों में किसी घंटी की तरह गूँजा, ख़ुराना।

"फ़ीनिक्स तैयार है, ख़ुराना सर। बोर्ड के सामने मैं ख़ुद इसे बंद करवाऊँगा, आदित्य को नाकाम साबित करके।" ... "जिस दिन वो गिरेगा, बड़ी कुर्सी मेरी होगी, और प्रोजेक्ट चुपचाप आपके ख़रीदार तक पहुँच जाएगा। ख़ून का रिश्ता है तो क्या हुआ, कुर्सी ख़ून से बड़ी होती है।"

इशिता की पीठ दीवार से जा लगी। ये वही कहानी थी जो वो दस साल से जी रही थी, बस चेहरे बदले हुए थे। ... जैसे रतन चाचा ने अपने भाई को बेचा था, वैसे ही नकुल अपने भाई को बेच रहा था। दोनों घर अंदर से सड़े थे, और सड़ाँध अपने ही ख़ून से शुरू होती है।

"तेरा अपना ख़ून, नकुल..." ... "...बिल्कुल मेरी तरह। हम दोनों को हमारे अपनों ने ही बेचा।"

पर जानना काफ़ी नहीं था। इशिता आदित्य के पास दौड़कर ये नहीं कह सकती थी कि नकुल गद्दार है, क्योंकि पहला सवाल फिर वही होता, तुम्हें कैसे पता। ... उसके पास जो भी सबूत था, वो सब एक जासूस के तरीक़ों से आया था, और उसे सामने रखते ही आदित्य को दिख जाता कि इशिता ख़ुद क्या है। सच उसके हाथ में था, और वही उसके गले की फाँस भी।

अगली दोपहर इनोवेशन रिव्यू की बैठक बुलाई गई, और नकुल ने इंतज़ार नहीं किया। पूरे बोर्ड के सामने, उसने वही चाल चली जो रात को फ़ोन पर तय की थी। ... इशिता दीवार के पास खड़ी थी, मुट्ठियाँ भिंची हुई, और उसके सिवा उस कमरे में कोई नहीं जानता था कि आगे क्या होने वाला है।

"मुझे बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि फ़ीनिक्स एक नाकाम प्रोजेक्ट है, और उससे भी बुरा, उसमें से जानकारी लीक हो रही है।" ... "इसकी अगुवाई आदित्य कर रहे हैं, और नतीजा हमारे सामने है। मेरी सिफ़ारिश है, प्रोजेक्ट अभी बंद हो, और इसकी जाँच ख़ुद आदित्य से शुरू हो।"

"नकुल... तुम? तुम मेरे ही ख़िलाफ़..." ... "ये मेरी टीम है। तुम जानते हो हमने इस पर क्या-क्या दिया है। तुम... तुम अपने ही भाई को बेच रहे हो?"

और इशिता वहीं खड़ी सब देखती रही, मजबूर, ख़ामोश। वो जानती थी कि नकुल झूठ बोल रहा है, कि लीक ख़ुद उसकी बिछाई हुई है, कि वो अपने ही भाई को कुर्सी के लिए बेच रहा है। ... और वो कुछ नहीं कर सकती थी, क्योंकि सच बोलते ही उसका अपना नक़ाब गिर जाता। उस पूरे कमरे में सिर्फ़ एक जासूस थी जो असली गद्दार को पहचानती थी, और उसी के होंठ सिले हुए थे।

"आदित्य का अपना ख़ून उसे बेच रहा है..." ... "...और उसे बचाने के लिए, या तो मुझे अपना सबसे बड़ा राज़ खोलना होगा, या उसे अपनी आँखों के सामने डूबते देखना होगा।"

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