अध्याय 23 / 26 पढ़ने में 8 मिनट
आख़िरी सबूत
अंदर की बात द्वारा Avni Oberoi
पंद्रह मिनट की मोहलत में इशिता, जुगनू, और एक हिचकिचाता फिर पूरी तरह साथ देता आदित्य आख़िरी हार्ड कॉपी को मशीन से बचा लेते हैं, और आदित्य को आख़िरकार पूरा सच पता चलता है, कि उसकी खुदाई हमेशा खुराना-रतन के ख़िलाफ़ थी, उसके ख़िलाफ़ कभी नहीं। पर जीत की उसी घड़ी में खुराना-नकुल इशिता और किशोर पर आपराधिक शिकायत दर्ज करा देते हैं, और नीचे लॉबी में चाचा रतन ख़ुद आ पहुँचते हैं।
कैलाश वर्धान का वादा उसके कानों में अब भी गूँज रहा था, पंद्रह मिनट, इससे ज़्यादा नहीं। इशिता गेट से बाहर निकलते ही अपना फ़ोन निकाल चुकी थी, बिना ये सोचे कि वो नंबर डायल करने का हक़ उसने आज दोपहर ही खो दिया था। ... प्रेमी, टीम, वो लैब जिसे वो घर कहने लगी थी, सब आज दोपहर ही उससे छिन चुका था, पर उसके हाथ में अब भी वो एक चीज़ बची थी जिसे कोई नहीं छीन सका था, ठान। ... उसकी उँगली आदित्य के नाम पर रुक गई, एक पल के लिए, फिर उसने कॉल लगा दी।
दूसरी तरफ़ फ़ोन कई बार बजा, इतनी देर तक कि इशिता को लगा शायद वो नहीं उठाएगा। फिर एक थकी, ठंडी आवाज़ आई।
"क्या चाहिए तुम्हें, इस वक़्त?" ... "मैंने कहा था ना, दोबारा मत आना, दोबारा फ़ोन मत करना।"
"आदित्य, मैं माफ़ी नहीं माँग रही, अभी नहीं। अभी वक़्त नहीं है।" ... "फ़ीनिक्स को चुराने वाला जो सबूत है, तुम्हारी बेगुनाही का सबूत, वो अभी, इसी वक़्त, आर्काइव में जलाया जा रहा है। अगर वो जल गया, तो तुम कभी साबित नहीं कर पाओगे कि लीक तुमने नहीं किया।"
"और मुझे क्यों यक़ीन करना चाहिए? आज दोपहर तक तुम एक जासूस थी, इशिता। शायद अभी भी हो।"
"यक़ीन मत करो। बस पंद्रह मिनट के लिए मेरे साथ चलो, और अगर मैंने झूठ बोला हो, तो मुझे ख़ुद पुलिस के हवाले कर देना। पर अगर सच बोला, तो तुम्हारा फ़ीनिक्स बच जाएगा, और वो सबूत भी जो तुम्हारे नाम को हमेशा के लिए साफ़ कर देगा।"
फ़ोन पर एक लंबी ख़ामोशी आई। इशिता ने गाड़ी की खिड़की से बीतती सड़क को देखा, दिल धड़कता हुआ, हर सेकंड को गिनते हुए।
"अगर तुम झूठ बोल रही हो, तो ये आख़िरी बार होगा कि मैं तुम्हारी बात सुनूँ।" ... "टावर के पीछे वाले गेट पर मिलो। दस मिनट में।"
टावर के पीछे के गेट पर जुगनू पहले से खड़ा था, चाबियों का गुच्छा हाथ में, चेहरे पर उतनी ही घबराहट जितनी उत्साह। ... उसने हाथ हिलाकर दोनों को अंदर बुलाया, आवाज़ धीमी पर आँखें चमकती हुई।
"मैडम जी, साहब, मुझे लगा आप दोनों को मेरी ज़रूरत पड़ेगी। बेसमेंट का गार्ड चाय पीने गया है, दस मिनट का वक़्त है, मैंने ख़ुद उसे भेजा।" ... "कह दिया मुफ़्त की चाय है। कोई मना नहीं करता, साहब, यही मेरी असली ताक़त है।"
तीनों सीढ़ियों से नीचे उतरे, अँधेरे गलियारों से होते हुए, दिल की धड़कन क़दमों से तेज़ भागती हुई। ... तहख़ाने के दरवाज़े के पास पहुँचते ही एक भारी घर्र-घर्र की आवाज़ सुनाई दी, काग़ज़ काटने की मशीन की, अब भी चलती हुई।
दरवाज़े के बाहर ख़ुराना का एक जूनियर अफ़सर पहरा दे रहा था, हैरान होकर आदित्य को इतनी रात देख कर, हाथ अपने वॉकी-टॉकी की तरफ़ बढ़ता हुआ। ... आदित्य आगे बढ़ा, उसकी आवाज़ में वो अधिकार भरा जो उसने कभी अपने चचेरे भाई के सामने इस्तेमाल नहीं किया था।
"साइड हटो। मैं वर्धान हूँ, अभी भी।" ... "और ये मेरी टीम का हिस्सा है। कोई सवाल नहीं।"
जूनियर अफ़सर की उँगली वॉकी-टॉकी के बटन पर एक पल रुकी, ख़ुराना सर को जगाने के डर और वर्धान नाम की आदत भरी इज़्ज़त के बीच झूलती हुई।
"भाई, कल तेरी शिफ़्ट की चाय मेरी तरफ़ से, बस पाँच मिनट की बात है।"
जूनियर अफ़सर हिचकिचाया, फिर रास्ता छोड़ दिया, शायद डर से, शायद इसलिए क्योंकि वर्धान नाम अब भी उसका असर रखता था, शायद इसलिए क्योंकि जुगनू की मुफ़्त चाय का जाल इस इमारत में किसी क़ानून से कमज़ोर कभी नहीं पड़ा।
अंदर मशीन के पास काग़ज़ों का ढेर पड़ा था, आधा खिलाया जा चुका, और उसी ढेर के बीच, अभी तक अनछुई, वो असली अधिग्रहण फ़ाइल पड़ी थी जिसे इशिता ने आर्काइव में पहले पाया था। ... इशिता ने आगे बढ़कर मशीन बंद की, फ़ाइल खींच ली, और उसे सीने से लगा लिया, जैसे कोई डूबता हुआ आख़िरी साँस पकड़ता है।
"मिल गई... आदित्य, मिल गई।" ... "अब कोई इसे जला नहीं सकता।"
आदित्य ने वो फ़ाइल इशिता के हाथ से ले ली, उसे पढ़ा, धीरे-धीरे, और उसकी आँखों में कुछ बदलने लगा। ... उसे याद आया इशिता का हर सवाल, हर देर रात का बहाना, हर बार जब वो किसी ख़ास फ़ाइल के पास मिली थी, और अब हर टुकड़ा एक ऐसी तस्वीर बना रहा था जो उस तस्वीर से बिल्कुल अलग थी जो नकुल और खुराना ने उसे दिखाई थी। ... उसे वो रात भी याद आई जब उसने ख़ुद नकुल का जाल पलट दिया था, और तब भी उसने सोचा था कि वो सिर्फ़ अपनी नौकरी बचा रही है, ना कि किसी और की जंग लड़ रही है।
"ये सारी खुदाई... ये सारी रातें... तुम मेरे पीछे नहीं थीं, है ना?" ... "तुम हमेशा खुराना के पीछे थीं। मेरे फ़ीनिक्स के पीछे नहीं, उसे बचाने के लिए।"
"हाँ, आदित्य। मैं किशोर सिन्हा की बेटी हूँ। दस साल पहले जिस आविष्कारक को तुम्हारी कंपनी ने बर्बाद किया समझा जाता रहा, वही मेरे पापा हैं, और मुझे उस सबूत के लिए यहाँ भेजा गया था जो उन्हें इंसाफ़ दिला सके।" ... "पर जो सबूत मिला, वो वर्धान के ख़िलाफ़ नहीं निकला, आदित्य। वो मेरे अपने चाचा रतन और तुम्हारे खुराना के ख़िलाफ़ निकला। मैं तुम्हारे पीछे कभी नहीं थी। मैं हमेशा उन दोनों के पीछे थी।"
आदित्य कुछ देर चुप रहा, फ़ाइल हाथ में तौलते हुए, इशिता के चेहरे को उस तरह देखते हुए जैसे उसने महीनों पहले देखा था, पहली बार फिर से।
"मैं तुम्हें अभी माफ़ नहीं कर रहा, इशिता।" ... "पर मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूँ, आज रात के लिए। खुराना और नकुल, दोनों के ख़िलाफ़।" ... "और शायद... शायद मैं इतना ग़ुस्से में इसलिए भी था, क्योंकि जो भरोसा टूटा, वो सिर्फ़ एक बॉस का भरोसा नहीं था।"
"अगर आप दोनों का रोमांस बाद के लिए बचा सकें, तो साहब, ऊपर का गार्ड चाय ख़त्म कर चुका होगा।"
तीनों जल्दी से ऊपर लौट आए, फ़ाइल इशिता के बैग में महफ़ूज़, ठीक उतने ही वक़्त में जितना कैलाश ने वादा किया था। ... सीढ़ियों के आख़िरी मोड़ पर, मशीन की घर्र-घर्र की आवाज़ धीरे-धीरे बंद हो गई, ख़ुराना के आदमी को शायद अभी तक पता नहीं चला था कि सबसे ज़रूरी पन्ना उसके हाथ से पहले ही निकल चुका था।
भोर होने से पहले, जब तीनों टावर की पार्किंग में साँस ले ही रहे थे, पूरब में आसमान का किनारा हल्का सा नीला पड़ने लगा था, और उसी उजाले के साथ आदित्य का फ़ोन बजा, फिर इशिता का, दोनों एक साथ, इतनी रात में आने वाली किसी भी कॉल से ज़्यादा भारी।
"कंपनी लीगल से एक ईमेल है, अभी अभी भेजा गया, नकुल की सी.सी. के साथ।" ... "इशिता सिन्हा के ख़िलाफ़ आपराधिक शिकायत दर्ज की गई है, कॉर्पोरेट जासूसी और सीलबंद आर्काइव में सेंध के लिए, और उसमें एक नाम और जुड़ा है, किशोर सिन्हा, सह-साज़िशकर्ता के तौर पर।"
इशिता का ख़ून जम गया, पापा का नाम सुनकर, उनके कमज़ोर दिल का ख़याल करते हुए, ये सोचकर कि एक पुलिस की चिट्ठी भी उन्हें उतना ही तोड़ सकती है जितना दस साल पहले की अदालत ने तोड़ा था।
"ये सबूत मिलने की ख़बर सुनते ही खुराना ने पलटवार किया, इशिता। इसका मतलब वो जानता है कि हम जीत रहे हैं।" ... "तुम्हारे पापा तक ये कभी नहीं पहुँचेगा। मैं ये देख लूँगा।"
जुगनू का फ़ोन भी उसी वक़्त बजा, नीचे रिसेप्शन से, और उसका चेहरा फ़ीका पड़ गया।
"मैडम जी... नीचे लॉबी में कोई आया है, आपका नाम लेकर।" ... "कहता है, ख़ुद रतन सिन्हा है।"
इशिता ने नीचे खिड़की से झाँका, और वहाँ, लॉबी की बत्तियों में, चाचा रतन खड़े थे, मुस्कुराते हुए, हाथ में वही पुराना, नरम अंदाज़ लिए जो कभी उसे घर जैसा लगता था। ... अभी दस मिनट पहले तक वो सोच रही थी कि सबसे बुरी रात ख़त्म हो चुकी है, फ़ाइल उसके बैग में थी, आदित्य उसके साथ खड़ा था, और शायद, शायद, आगे का रास्ता आसान होगा। ... उसके फ़ोन पर वो ईमेल अब भी खुला पड़ा था, उसके पापा का नाम, "सह-साज़िशकर्ता", और नीचे खड़ा वो आदमी जो जानता था कि उस नाम को बचाने के लिए वो कुछ भी करने को तैयार है, एक जासूस की तरह नहीं, एक बेटी की तरह।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।