अध्याय 8 / 26 पढ़ने में 12 मिनट
आधा हस्ताक्षर
अंदर की बात द्वारा Avni Oberoi
पिछली रात के शक से बेचैन इशिता समझ जाती है कि पापा ने वो विक्रय-पत्र अदालत में ख़ुद देखा था, इसलिए वो बारीकियाँ जानते थे, पर जो मूल अधिग्रहण दस्तावेज़ उन्हें कभी नहीं दिखाया गया, वो अब भी सीलबंद तहख़ाने में बंद है, और उसे यही तय करना है। वर्धान के तीस साल के जलसे की भीड़ और आधी-ख़ाली इमारत का फ़ायदा उठाकर, जुगनू की चाबियों और अनजान मदद से, इशिता आख़िरकार सीलबंद फ़िज़िकल आर्काइव में उतरती है और वो मूल फ़ाइल पा लेती है जो उसके पापा को कभी देखने नहीं दी गई। पर जो दस्तख़त उसके पापा की तकनीक वर्धान को बेच गया, वो न पापा का है, न जाली, वो एक ऐसे सह-मालिक का असली, क़ानूनी दस्तख़त है जिसने पेटेंट पापा
सुबह से ही वर्धान का पूरा टावर एक दुल्हन की तरह सजाया जा रहा था। ... मज़दूर लंबे-लंबे बैनर टाँग रहे थे, कैटरिंग वाले चाँदी की ट्रे क़तारों में लगा रहे थे, और लॉबी की हवा में वर्धान इंडस्ट्रीज़ के तीस साल पूरे होने का सुनहरा जश्न तैरने लगा था। ... और इस सारी चमक-दमक के बीच से, रात भर की जागी, थकी-हारी एक इशिता चुपचाप गुज़र रही थी, जिसके कानों में अब भी कल रात का वही फ़ोन गूँज रहा था।
रात भर वो एक ही सवाल को उलटती-पलटती रही थी, जैसे कोई काँटा जो न निगला जाए, न उगला जाए। ... नीली स्याही। दाईं तरफ़ का कोना। चौदह अगस्त। दूसरा पन्ना। वो शर्त। ... जो काग़ज़ पापा ने कभी अपनी आँखों से देखा ही नहीं था, उसकी एक-एक बारीकी उन्हें रट्टे की तरह कैसे याद थी? और फिर वही सवाल, जिसे सोचना भी एक गुनाह जैसा था... पापा, आप मुझसे क्या छुपा रहे हैं?
पर भोर होते-होते एक जवाब ख़ुद-ब-ख़ुद उसके सामने आ खड़ा हुआ, इतना सीधा कि उसे अपने ही शक पर शर्म आ गई। ... अदालत। दस साल पहले, उस मुक़दमे में, वो विक्रय-पत्र सबूत के तौर पर पेश हुआ था, और पापा उसी कमरे में बैठे थे। उन्होंने उसे अपनी आँखों से देखा था।
तभी तो वो जानते थे... वो नीली स्याही, वो कोना, वो तारीख़, वो एक-एक बारीकी। ... वो झूठ नहीं बोल रहे थे। और उसने, उन्हीं की बेटी ने, एक पल के लिए अपने टूटे हुए पापा पर शक कर लिया था।
पर जैसे ही उस शक की गाँठ खुली, ठीक उसके नीचे एक और, कहीं ज़्यादा तीखा सच चमक उठा। ... अदालत में जो काग़ज़ पापा को दिखाया गया था, वो तो सिर्फ़ ऊपर की परत थी, वो नतीजा जो वर्धान के वकीलों ने उनके सामने पटक दिया था।
पर उस विक्रय-पत्र के नीचे जो मूल अधिग्रहण दस्तावेज़ दबा था, वो पूरी फ़ाइल जिसमें असली सौदा, असली दस्तख़त, असली सच बंद था, वो पापा को कभी, एक बार भी देखने नहीं दी गई थी। ... दस साल से वो एक टुकड़े से लड़ रहे थे। और पूरी फ़ाइल... पूरी फ़ाइल इसी इमारत के सीलबंद तहख़ाने में, बस एक माला नीचे, उसका इंतज़ार कर रही थी।
और आज की रात, ये टावर ख़ुद उसे वो मौक़ा थमा रहा था। ... तीस साल का जश्न, नीचे लॉबी में सारे इन्वेस्टर, सारा बोर्ड, सारी सिक्योरिटी सिमट आएगी, और ऊपर के माले... लीगल का माला... अँधेरे में, ख़ाली, बेपहरा पड़ा रहेगा। ... इससे बेहतर परदा उसे शायद कभी नहीं मिलने वाला था।
"अरे मैडम, आप यहाँ आराम से बैठी हैं!" ... "और नीचे देखो ज़रा। जुगनू ये कुर्सियाँ लगाओ, जुगनू वो फूल टाँगो, जुगनू पचास किलो का झूमर अकेले छत पर चढ़ाओ! ... अमीरों की पार्टी है, और पसीना जुगनू का बहेगा। मेरी तो कमर ही टूट गई, क़सम से।"
"तो एक कप चाय तो बनती है, जुगनू भाई। बैठो दो मिनट।" ... "पर सच बताना, आज इतनी बड़ी पार्टी में तुम अकेले ही पूरी इमारत सँभालोगे? ऊपर के सारे माले भी?"
"ऊपर?" ... "ऊपर आज कौन जाएगा, मैडम! आज तो सारा तमाशा नीचे लॉबी में है। ... बल्कि आज तो लीगल वाले माले के सारे बड़े दरवाज़े खुले छोड़ दिए हैं, कैटरिंग और सफ़ाई वालों के लिए, और परसों फ़ायर वालों की जाँच भी है ना, तो वो बायोमेट्रिक ताला भी बंद कर रखा है। ... बस वो अंदर वाला पुराना लोहे का पिंजरा, आर्काइव वाला, उसकी चाबी अब भी मेरे ही इस गुच्छे में लटकती है। साहब लोगों ने डुप्लिकेट खो दी, अब दिन में दस बार जुगनू ऊपर-नीचे दौड़ता है।"
और जुगनू हँसते-हँसते वो भारी चाबी अपनी उँगली पर घुमा रहा था, उसे भनक तक नहीं थी कि उसने अभी-अभी इशिता के हाथ में उस दरवाज़े का नक़्शा थमा दिया था, जिसे खोलने वो दस साल का सफ़र तय करके इस शहर तक आई थी। ... खुले दरवाज़े। बंद बायोमेट्रिक। और आख़िरी चाबी, जो जुगनू के गुच्छे में झूल रही थी। आज रात। बस आज रात।
रात को जब लॉबी संगीत, हँसी और गिलासों की खनक से भर उठी, जब मंच पर वर्धान इंडस्ट्रीज़ के तीस साल का सुनहरा इतिहास चमकती स्क्रीनों पर नाच रहा था, तब उस भीड़ के एक कोने से एक परछाईं चुपचाप रोशनी से बाहर सरक गई। ... एक पल के लिए उसे भीड़ में आदित्य दिखा, गहरे सूट में, अकेला, ऊबा हुआ, किसी को ढूँढती नज़रों से इधर-उधर देखता हुआ, और इशिता ने झट से मुँह फेर लिया, क्योंकि आज उसके पास उन आँखों का सामना करने की हिम्मत नहीं थी।
लिफ़्ट नहीं, सीढ़ियाँ। एक-एक माला जश्न का शोर पीछे छूटता गया, और लीगल का माला एक ठंडे, अँधेरे कुएँ की तरह उसके सामने खुल गया। ... और वहीं, आर्काइव के उस पुराने लोहे के पिंजरे के सामने, चाबियों का गुच्छा सँभाले, जुगनू पहले से खड़ा था, अपने ही साये से डरता हुआ।
"मैडम, आप सच में आ गईं!" ... "मैंने तो शाम को बस यूँ ही बात की थी। ... आदित्य सर ने सच में आपको इसी वक़्त, इस पार्टी के बीच में, पुरानी फ़ाइलें निकालने भेजा है?"
"कल सुबह बोर्ड के सामने लीक की सफ़ाई देनी है, जुगनू भाई। ... आदित्य सर को कुछ पुराने पेटेंट रेफ़रेंस चाहिए, बस दस मिनट का काम है। तुम पिंजरा खोल दो, मैं फ़ाइल उठाई और चली। तुम्हारा नाम बीच में कभी नहीं आएगा, ये मेरा वादा है।"
"आपके लिए, मैडम... चलो।" ... और उसने गुच्छे में से वो सबसे पुरानी, सबसे भारी चाबी निकाली, ताले में घुमाई, और पिंजरे का वो लोहे का दरवाज़ा एक लंबी, थकी हुई चरचराहट के साथ खुल गया। ... "बस दस मिनट, मैडम। मैं ऊपर मोड़ पर खड़ा रहूँगा। कोई आया तो मैं खाँसूँगा, ज़ोर से, ऐसे... खों-खों! समझ गईं ना? आज मेरी नौकरी आपके हाथ में है।"
इशिता ने सिर हिला दिया, पर भीतर कहीं कुछ कसक उठा। ... जुगनू जैसा भला आदमी, जो उसे बिना एक भी सवाल पूछे अपनी रोज़ी-रोटी सौंप रहा था, और वो... वो उसी भरोसे को एक चाबी की तरह इस्तेमाल कर रही थी। इस इमारत में हर भरोसा उसके हाथों में आकर एक हथियार बन जाता था।
पिंजरे के अंदर दस साल की सीलबंद ख़ामोशी भरी थी। ... पुराने काग़ज़, धूल और भूली हुई स्याही की एक भारी, मुर्दा-सी गंध। लोहे की ऊँची अलमारियों की क़तारें, हर एक पर साल की मुहर, और उन सबके बीच इशिता की टॉर्च की एक पतली, काँपती लकीर।
उसकी उँगलियाँ सालों पर फिसलती गईं, पीछे, और पीछे, उस एक साल तक, जिसने उसकी पूरी ज़िंदगी दो टुकड़ों में तोड़ दी थी।
और वहीं, एक धूल भरे भूरे डिब्बे में, वो फ़ाइल पड़ी थी। मोटी, बँधी हुई, कोने पर एक फीका पड़ चुका लेबल... वर्धान इंडस्ट्रीज़, अधिग्रहण, सिन्हा पेटेंट। ... वही मूल दस्तावेज़, जो दस साल से उसके पापा को देखने नहीं दिया गया था, अब उसके काँपते हाथों में था।
उसने डिब्बा खोला, फ़ाइल बाहर निकाली, और उसकी जिल्द पर हाथ फेरा, जैसे वो कोई ज़िंदा, साँस लेती चीज़ हो। ... दस साल की नफ़रत, दस साल की क़समें, दस साल का सफ़र, सब सिमट कर इसी एक पल में, इन्हीं पन्नों में आ ठहरा था। ... पापा, मैं आ गई, उसने मन ही मन कहा, अब सब ठीक हो जाएगा, अब मैं आपका नाम वापस ले आऊँगी।
पन्ने पलटते-पलटते वो वहाँ आकर रुकी, जहाँ पेटेंट वर्धान के नाम हुए थे। हस्तांतरण का पन्ना। और सबसे नीचे... वो दस्तख़त। ... उसने ख़ुद को तैयार किया था एक भद्दे, जाली, जल्दबाज़ी में घसीटे गए दस्तख़त के लिए, वो सबूत जो चीख़-चीख़ कर कहता, ये चोरी है, ये डाका है।
पर जो उसके सामने था, वो साफ़ था। शांत। नोटरी की मुहर, गवाहों के दस्तख़त, हर कोने पर क़ानून की छाप। ... ये जाली नहीं था। ये बिल्कुल असली था।
और वो दस्तख़त... वो उसके पापा का था ही नहीं। ... इशिता अपने पापा की लिखावट पहचानती थी, उन्हीं हाथों ने तो उसे पहला अक्षर लिखना सिखाया था। ये वो हाथ नहीं था। ... पर ये किसी अजनबी का भी नहीं लगता था। ये किसी ऐसे का दस्तख़त था जिसे इन पेटेंटों पर दस्तख़त करने का हक़ था। एक सह-मालिक। कोई, जो उसके पापा की पूरी ज़िंदगी में आधे का साझेदार था।
और वहीं, उस ठंडे लोहे के पिंजरे में, इशिता की दस साल पुरानी कहानी उसके अपने हाथों में दरकने लगी। ... कोई डाका नहीं था। कोई दैत्य नहीं था जिसने रात के अँधेरे में सब छीन लिया हो। एक विक्रय था। असली, क़ानूनी, गवाहों के सामने हुआ विक्रय।
और जहाँ विक्रय होता है, वहाँ एक बेचने वाला भी होता है। कोई, जिसके पास बेचने का हक़ था। ... पापा की ज़िंदगी पर वो दूसरा नाम आख़िर किसका था?
तभी दूर गलियारे के मोड़ से जुगनू की वो घबराई हुई, बनावटी खाँसी गूँज उठी, और इशिता का दिल हलक़ में आ गया।
"खों... खों-खों! ... मैडम! जल्दी करो, ऊपर से कोई नीचे आ रहा है! मुझे... मुझे किसी के क़दम सुनाई दे रहे हैं! भगवान के लिए, जल्दी!"
"बस एक मिनट, जुगनू भाई," ... उसने फुसफुसा कर कहा, पर उसकी उँगलियाँ उस पन्ने से हट ही नहीं पा रही थीं। बस एक तस्वीर। बस एक और मिनट, और सब उसके हाथ में होगा।
पर वो क़दम रुके नहीं। ... जुगनू के डरे हुए, हड़बड़ाए क़दमों जैसे नहीं, ये क़दम धीमे थे, नपे-तुले, एक ऐसे आदमी के क़दम जिसे इस इमारत में किसी से डरने की ज़रूरत नहीं थी। ... और आर्काइव के दरवाज़े के दूधिया शीशे पर एक लंबी परछाईं आकर ठहर गई। इशिता ने अपनी टॉर्च बुझा दी और साँस रोक ली।
"इस माले पर आज ताला लगा होना चाहिए था।" ... खुराना की आवाज़, शहद जैसी नरम और छुरी जैसी तेज़, शीशे के उस पार से रेंगती हुई अंदर चली आई। "कैटरिंग वालों को यहाँ तक की छूट किसने दे दी? ... कुछ फ़ाइलें, मियाँ, दस साल पहले एक ख़ास वजह से बंद हुई थीं। और जो चीज़ बंद है, उसे बंद ही रहना चाहिए। उसे कुरेदना... किसी की सेहत के लिए ठीक नहीं होता।"
इशिता पिंजरे के सबसे अँधेरे कोने में, अलमारियों की ओट में, पत्थर बन गई। ... शीशे के पार वो परछाईं दरवाज़े के हैंडल की तरफ़ बढ़ी, और इशिता का दिल एक पल के लिए धड़कना ही भूल गया। बस एक क़दम, बस एक धक्का, और दस साल का सारा सफ़र यहीं, इसी पिंजरे में, इसी अँधेरे में ख़त्म हो जाता।
"...ख़ैर।" ... "आज रात यहाँ किसी के पास आने की फ़ुरसत नहीं। और ऊपर मेरा इंतज़ार हो रहा है। ... कल सुबह सबसे पहले इस पूरे माले की जाँच करवाओ। और ये दरवाज़े... आज के बाद हमेशा के लिए बंद रहेंगे।" ... और परछाईं शीशे से हट गई, क़दमों की आहट धीरे-धीरे दूर होती चली गई।
जब तक उसके क़दमों की आख़िरी आहट भी सन्नाटे में डूब नहीं गई, इशिता हिली तक नहीं। फिर, काँपते हाथों से, उसने अपना फ़ोन निकाला।
खुराना की परछाईं अभी उस शीशे से पूरी तरह उतरी भी नहीं थी कि इशिता ने वो पन्ना अपने कैमरे में क़ैद कर लिया, बिना फ़्लैश के, एक बार, दो बार। हस्तांतरण का पन्ना। वो असली दस्तख़त। वो सह-मालिक की लाइन। ... मिल गया। दस साल का सबूत अब उसके फ़ोन में था।
और अब, सिर्फ़ अब, एक पल की उस चुराई हुई सुरक्षा में, उसने फ़ोन को अपनी आँखों के बिल्कुल पास लाकर वो नाम पढ़ना चाहा। उस आदमी का नाम, जिसने क़ानूनन, अपने ही दस्तख़त से, उसके पापा की पूरी ज़िंदगी वर्धान को बेच दी थी।
पर वो नाम पूरा था ही नहीं। ... पन्ने का ऊपरी कोना फटा हुआ था, जैसे किसी ने सालों पहले, जान-बूझ कर, उस नाम का पहला हिस्सा नोच कर फेंक दिया हो। पहला नाम ग़ायब था, हमेशा के लिए।
पर जो बचा था, जो उस फटे-पुराने काग़ज़ पर अब भी ज़िंदा था, वो था उसका आख़िरी नाम। वो कुलनाम।
और इशिता की टॉर्च की मद्धम रोशनी में वो अक्षर एक-एक करके उभरे, और उसका ख़ून जम गया। ... सिन्हा। ... जिस आदमी ने उसके पापा के पेटेंट वर्धान को बेचे थे, वो न कोई अजनबी था, न कोई दैत्य, न वर्धान का कोई मोहरा। वो उसके अपने ख़ानदान का था। उसका अपना ख़ून।
दस साल जिस मिशन के लिए वो जी थी, जिस दुश्मन से नफ़रत करना उसने अपनी साँसों में घोल लिया था, उसकी पूरी ज़मीन एक ही पल में उसके पैरों तले से खिसक गई। ... पापा हमेशा कहते थे कि वो तकनीक सिर्फ़ उनकी थी, अकेले उनकी, उनके अपने हाथों की तपस्या। तो फिर उनकी ज़िंदगी पर ये दूसरा नाम किसका था, ये आधा फटा हुआ नाम, ये सिन्हा, जो उसका अपना था? ... और उस सीलबंद तहख़ाने के अँधेरे में अकेली खड़ी इशिता को पहली बार वो बात समझ आई, जिसका डर उसे अब उम्र भर सताने वाला था... जिस चोरी का सबूत ढूँढने वो दुश्मन के घर में घुसी थी, वो चोरी शायद उसके अपने घर से हुई थी।
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