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अध्याय 18 / 28

तलाक़ की तारीख़

कागज़ी कसमें द्वारा Avni Oberoi

सुबह के दस बजे, शहर के एक नामी बुटीक के आईनों के बीच, नैना एक घबराई हुई दुल्हन के लहँगे की आख़िरी सलवटें ठीक कर रही थी, मुँह में तीन पिन दबाए, हाथ बिजली की तरह तेज़।

"हिलिए मत... बस एक सेकंड... हो गया।" "अब देखिए। परफ़ेक्ट।"

दुल्हन आईने में ख़ुद को देख कर रो पड़ी, ख़ुशी से, डर से, दोनों से। नैना ने उसके कंधे थपथपाए, वही पुरानी लाइन दोहराई जो उसने सैकड़ों दुल्हनों को कही थी।

"कसमें डरावनी लगती हैं, पर याद रखिए, आप सिर्फ़ आज की क़सम नहीं खा रहीं। आप हर उस दिन की क़सम खा रही हैं जो आज के बाद आएगा।"

तभी मेज़ पर उलटा रखा उसका फ़ोन थरथराया। नैना ने बिना देखे उसे पलटा, सोच कर कि सिम्मी होगी, कैटरर के किसी नए बवाल के साथ। पर स्क्रीन पर एक साल पुराना, ख़ुद उसका बनाया हुआ रिमाइंडर चमक रहा था, "आज: शादी के काग़ज़ का एक साल पूरा, शर्त के मुताबिक़ ख़ुद-ब-ख़ुद रद्द।"

उसी की उँगलियों ने ये रिमाइंडर एक साल पहले टाइप किया था, उसी दिन जब वो एक अजनबी के साथ पाँच मिनट में दस्तख़त कर के निकली थी। आज ठीक एक साल पूरा हो रहा था। आज वो तारीख़ थी, जिस पर काग़ज़ के मुताबिक़ ये शादी अपने आप ख़त्म हो जानी थी।

नैना की उँगलियाँ, जो अभी दो मिनट पहले तक बिल्कुल स्थिर थीं, अचानक काँपने लगीं। फ़ोन फिर बजा, इस बार एक मैसेज, "ध्रुव" नाम की स्क्रीन पर, "आज तुम्हारे साथ की वो आख़िरी शाम बहुत याद आती है। अगर तुम्हें कभी असली ज़िंदगी वापस चाहिए हो... मैं यहीं हूँ।"

नैना ने फ़ोन बंद कर के बैग में डाल दिया, जैसे उसे दिखाई ही न दिया हो। पर मन में एक ही सवाल टँग गया, जिसका जवाब उसके पास अब तक नहीं था, उस ख़ाली म्यूज़िक बॉक्स के ख़ाने जितना अनसुलझा। रुस्तम का वो सबूत कहाँ गया, वो अब भी नहीं जानते थे, और आज, इस तारीख़ के भार तले, वो सवाल भी उतना ही भारी लग रहा था।


शहर के दूसरे छोर पर, विहान की कंपनी के काँच के टावर में, उसकी मेज़ पर भी वही तारीख़ खुली पड़ी थी, अफ़ताब का भेजा एक ईमेल, विषय: "अनुबंध की समाप्ति, अगला क़दम।"

दरवाज़े पर दस्तक हुई, पर जवाब का इंतज़ार किए बिना ही दरवाज़ा खुल गया। अनाइशा अंदर आई, रेशमी साड़ी में, हाथ में दो कॉफ़ी के कप, जैसे उसे न्यौता चाहिए ही न हो।

"विहान, तुम्हारी सेक्रेटरी को मना करना नहीं आता, तो मैंने ख़ुद ही रास्ता बना लिया।" "एक साल... आज पूरा एक साल हो गया ना, तुम्हारी उस काग़ज़ी शादी को?"

"अनाइशा, अभी वक़्त नहीं है।" "क्या काम था?"

"काम नहीं, फ़िक्र है, विहान। देवयानी आंटी से बात हुई, कस्टडी की सुनवाई पास आ रही है। जज के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि तुमने ये शादी सच में की, या सिर्फ़ पिहू के लिए।" "और अगर आज, ठीक एक साल पूरे होने पर, तुम इसे बढ़ा दो... तो हर वकील पूछेगा क्यों। अगर आज इसे ख़त्म कर दो, जैसा काग़ज़ में लिखा है, तो कोई सवाल ही नहीं उठेगा। साफ़, सीधा, इज़्ज़तदार।"

"और तुम्हें इस 'इज़्ज़तदार रास्ते' में इतनी दिलचस्पी क्यों है?"

"क्योंकि मैं तब से इंतज़ार कर रही हूँ जब तुम अकेले थे, विहान। मेहर के बाद से। मैंने कभी जल्दी नहीं की, कभी ज़बरदस्ती नहीं की।" "मैं बस इतना कह रही हूँ, नैना अच्छी औरत है, पिहू को उससे लगाव भी है, ठीक है। पर एक साल की शर्त पूरी हो गई। उसे उसका मुआवज़ा दो, उसकी भांजी की लड़ाई के लिए जो पैसा चाहिए वो दो, और उसे इज़्ज़त से रुख़्सत करो। इसमें बुराई क्या है?"

"मुआवज़ा" शब्द विहान के कानों में किसी तमाचे की तरह बजा। उसने एक पल को सोचा कि नैना को पैसे देकर विदा करना ठीक वैसा ही होगा जैसे उसकी सास देवयानी की भाषा में। उसने कहना चाहा कि नैना कोई शर्त नहीं है जिसे पूरा करके भेज दिया जाए, कि पिछले एक साल में जो कुछ इस घर में बना है वो किसी मुआवज़े से तौला नहीं जा सकता। पर उसे डर था, अगर उसने आज नैना को रोकने की बात कही, तो क्या ये वैसा ही नहीं लगेगा जैसा देवयानी ने महीनों पहले कहा था, एक ख़रीदी हुई शादी को ज़बरदस्ती और लंबा खींचना।

"अनाइशा, तुम्हें फ़ैसला लेने की ज़रूरत नहीं। ये मेरा घर है, मेरा फ़ैसला है।" "अब निकलो। मुझे काम है।"

अनाइशा उठी, मुस्कुराई, जैसे उसे कोई जल्दी न हो, जैसे वो जानती हो कि वक़्त उसके साथ है। दरवाज़े पर रुक कर उसने पीछे मुड़ कर देखा, "सोच लेना, विहान। आज की तारीख़ इंतज़ार नहीं करती।"


शाम को घर लौटते ही विहान को दरवाज़े पर काग़ज़ के फूलों से सजा एक हाथ से बना कार्ड मिला, जिस पर टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट में लिखा था, "मम्मा पापा की शादी को एक साल!"

पिहू उछलती हुई आगे आई, हाथ में वही कार्ड, जिसके एक कोने में रिबन से एक बहुत छोटी, ज़ंग खाई चाबी बँधी थी, वही चाबी जो कुछ हफ़्ते पहले उसकी अपनी पुरानी खिलौनों की पेटी से निकली थी।

"पापा! पापा! देखो, मैंने और कायरा दीदी ने बनाया!" "एक साल हो गया आपकी शादी को, तो मैंने अपनी सबसे अच्छी चाबी उसमें बाँध दी, क्योंकि सिम्मी आंटी ने बोला था शादी की सालगिरह पर कुछ पुराना और कुछ नया देना चाहिए। ये पुराना है!"

विहान का हाथ उस कार्ड को थामे एक पल को जम गया। उसकी बेटी को नहीं पता था कि आज वो तारीख़ थी, जिस पर काग़ज़ के मुताबिक़ ये पूरा घर, ये पूरी शादी, ख़त्म हो सकती थी। उसने घुटनों के बल बैठ कर पिहू को गले लगाया, ताकि वो अपनी आँखों की नमी उससे छुपा सके।

"बहुत सुंदर है, बेटा। सबसे सुंदर तोहफ़ा।" "जाओ, कायरा दीदी को बुलाओ, आज रात हम सब मिलकर आइसक्रीम खाएँगे।"

रसोई के दरवाज़े से काका ने ये सब देखा, और आइसक्रीम का कटोरा लाते हुए धीमी आवाज़ में बड़बड़ाया, आधा नैना को सुनाते हुए, आधा ख़ुद से। "देवयानी जी के घर के नौकरों से सुना, बड़े साहब देवेंद्र जी अब खुल कर बीवी से बहस करने लगे हैं, कल रात भी घर में ज़ोर से बात हुई। पर बेचारे अकेले पड़ जाते हैं वहाँ, कोई साथ देने वाला नहीं।"

नैना ने सुना, और एक पल को सोचा कि देवेंद्र जैसे किसी बूढ़े आदमी के लिए अकेले खड़े होना कितना भारी होगा, फिर उसका ध्यान अपने ही फ़ोन की तरफ़ लौट आया, जो जेब में एक बार फिर बज रहा था। स्क्रीन पर फिर वही नाम, ध्रुव। इस बार उसने उठा लिया, बरामदे में जाकर, आवाज़ धीमी करके।

"नैना... मुझे नहीं पता तुमने मेरा मैसेज पढ़ा या नहीं। मैंने आज एक ऑफ़र लिया है, दिल्ली में अपनी ख़ुद की इवेंट कंपनी शुरू करने का।" "मैं चाहता हूँ तुम मेरे साथ पार्टनर बनो, नैना। असली काम, असली नाम, कोई नक़ली शादी नहीं जिसमें छुपना पड़े। एक असली ज़िंदगी। सोचना... बस इतना कहना था।"

"ध्रुव, मेरी ज़िंदगी नक़ली नहीं है। और अभी... अभी मुझे सोचने का वक़्त नहीं है।" "मुझे जाना होगा।"

उसने फ़ोन काटा, पर बरामदे में उतनी ही देर और खड़ी रही जितनी उस कॉल में नहीं लगी थी, सोचती हुई कि क्या उसने अभी एक असली ज़िंदगी को ना कहा, या सिर्फ़ एक पुराने डर को टालने की एक और वजह ढूँढ ली।

अंदर, आइसक्रीम की कटोरियाँ ख़ाली हो चुकी थीं, बच्चियाँ सो चुकी थीं, और बरामदे की सीढ़ियों पर नैना और विहान पास-पास बैठे थे, जितना पास एक साल में कभी नहीं बैठे थे।

"आज... आज पूरा एक साल हो गया, नैना। जिस दिन काग़ज़ पर लिखा था कि ये सब ख़त्म हो जाएगा।"

"पता है।" "अफ़ताब ने आज सुबह ईमेल भेजा था ना? आगे का काग़ज़ी काम..."

"नैना, मैं..." "...मैं कल अफ़ताब से बात कर लूँगा। कोई जल्दी नहीं है।"

"ठीक है।" "मैं... मैं सोने जा रही हूँ। कल लंबा दिन है।"

और दोनों अपने-अपने कमरे की तरफ़ मुड़ गए, दोनों एक ही अनकहे वाक्य से भाग रहे थे, नैना इस डर से कि रुकने को कहना कायरा की लड़ाई के लिए ज़बरदस्ती जैसा लगेगा, विहान इस डर से कि रुकने को कहना नैना को फिर एक ख़रीदी हुई औरत जैसा महसूस कराएगा।


अगली सुबह, नैना कायरा का टिफ़िन लिए स्टडी के आगे से गुज़र रही थी, तभी अंदर से विहान की आवाज़ सुनाई दी, फ़ोन पर, पहले से तीन मिनट पुरानी बातचीत के बीच में।

"हाँ अफ़ताब, समझ गया। जैसा तय हुआ था, वैसा ही करते हैं। तलाक़ के काग़ज़ात तैयार कर लो, आज की तारीख़ से।"

नैना के पैर वहीं ठिठक गए, टिफ़िन का हाथ हवा में रुक गया। उसने बस यही सुना, "तलाक़ के काग़ज़ात, जैसा तय हुआ था।" उसे और सुनने का हौसला नहीं हुआ। वो दरवाज़े से पीछे हट गई, चुपचाप, जैसे किसी ने उसके सीने पर हाथ रख कर धक्का दिया हो।

पर नैना नहीं सुन पाई कि विहान की आवाज़ ठीक उसी पल काँप गई थी, कि उसने एक साँस रोक कर आगे कहा था।

"अफ़ताब... पर काग़ज़ पर दस्तख़त करने से पहले, मुझे एक बार और सोचना है। सच कहूँ तो..." "...मैं ये नहीं कर सकता। मैं नैना को इस घर से जाने नहीं दे सकता। पर मुझे नहीं पता कैसे उसे बिना डराए, बिना ख़रीदी हुई महसूस कराए, ये बात कहूँ।"

कमरे में सिर्फ़ फ़ोन की हल्की सी घरघराहट थी, और एक आदमी जो पहली बार एक साल में अपने डर से बड़ा सच बोल रहा था, बिल्कुल अकेला, बिना जाने कि गलियारे में उसकी बीवी उससे तीन क़दम पहले ही मुड़ चुकी है।

उधर नैना अपने कमरे में पहुँच चुकी थी, दरवाज़ा धीरे से बंद किया, और अलमारी के सबसे ऊपर वाले ख़ाने से वो पुराना सूटकेस खींच लिया, वही जो वो एक साल पहले इस घर में लाई थी।

उसके हाथ काँप रहे थे, पर रुके नहीं। एक-एक करके उसने अपने कपड़े तह करने शुरू कर दिए, बिना रोए, बिना सोचे, जैसे अगर उसने एक पल को भी सोचा तो उसके हाथ रुक जाएँगे।

"एक साल पहले जो तय हुआ था... वही सही है। मुझे इसी के लिए तैयार रहना चाहिए था।"

और उस सुबह, घर के दो कोनों में, दो अधूरे सच एक साथ साँस ले रहे थे, एक स्टडी में बोला गया, जिसे कोई सुनने वाला नहीं बचा था, और एक गलियारे में सुना गया, जिसका बस आधा हिस्सा ही असली था। नैना का सूटकेस भरता जा रहा था, और विहान को अब तक ख़बर नहीं थी कि उसकी बीवी घर छोड़ने की तैयारी कर चुकी है।

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