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Chapter 20 of 28

काग़ज़ बनाम दिल

कागज़ी कसमें by Avni Oberoi

जज ने काग़ज़ नीचे रखा, अपनी घड़ी देखी, और भारी, थकी आवाज़ में कहा कि अदालत को इस नए सबूत पर विचार करने के लिए वक़्त चाहिए... सुनवाई ठीक एक हफ़्ते बाद, अंतिम बहस के लिए दोबारा बुलाई जाएगी, तब तक दोनों पक्ष अपने-अपने जवाब दाख़िल करें। कमरे में हलचल शुरू हो गई, पर नैना और विहान अपनी जगह से हिले नहीं, जैसे उनके पैरों के नीचे से फ़र्श ही खिंच गया हो।

चपरासी ने वो काग़ज़ उठाया और उस पर एक मुहर लगाई, प्रदर्श अ, एक्ज़िबिट ए। एक साल पहले जिस अनुबंध पर दोनों ने चुपचाप, बिना किसी गवाह के दस्तख़त किए थे, वो अब अदालत की अलमारी में, एक केस नंबर के नीचे, हमेशा के लिए दर्ज हो चुका था।

"यहाँ रुकने का वक़्त नहीं है।" "अंदर चलिए। जो अभी हुआ, उसका असर सिर्फ़ पिहू के केस तक नहीं रुकेगा।"

एक छोटे से ख़ाली कमरे में तीनों दाख़िल हुए। अफ़ताब ने दरवाज़ा बंद किया, अपनी फ़ाइल मेज़ पर रखी, और पहली बार उसकी आवाज़ में थकान से ज़्यादा कुछ और सुनाई दिया, डर।

"ये अनुबंध कहता है, शादी सुविधा की थी, पैसा दिया गया, अलग कमरे थे। ये सिर्फ़ पिहू की कस्टडी को नहीं डुबोता।" "कायरा की गोद लेने की अर्ज़ी भी नैना की 'स्थिरता' पर टिकी है। और स्थिरता का सबूत... यही शादी थी।"

"मतलब... अगर ये शादी झूठी मानी गई..." "...तो कायरा भी..."

"मैं झूठ नहीं बोलूँगा। अगर दूसरे जज ने ये फ़ाइल माँगी, तो हाँ, वो सवाल वहाँ भी उठेगा।" "इसलिए एक हफ़्ता है। एक हफ़्ते में हमें साबित करना है कि ये काग़ज़ जितना भी पुराना हो, दिल उससे नया और सच्चा है।"

अफ़ताब ने अपनी घड़ी देखी, कुछ बुदबुदाया कि उसे रजिस्ट्रार से बात करनी है, और कमरे से निकल गया, दोनों को अपने-अपने डर के साथ अकेला छोड़ कर।

"नैना... अंदर तुमने जो कहा..." "वो जज के लिए था... या सच में?"

"तुम अभी भी यही पूछ रहे हो?" "एक साल में मैंने तुम्हें सैकड़ों बार सच दिखाया, विहान। पर आज, जब मैंने वो सच अदालत के सामने ज़ोर से कहा, तुम्हें बस यही डर लगा कि कहीं वो एक्टिंग तो नहीं थी?"

"मेरा मतलब वो नहीं था... मैं बस..." "मुझे डर लगता है, नैना। कि जो मुझे मिला है, वो कहीं छिन न जाए।"

पर वो लफ़्ज़ एक पल देर से आए। नैना पहले ही मुड़ चुकी थी, अपना बैग उठा रही थी, अपनी आँखों में उभर आया पानी उसी बरसों पुरानी तरकीब से छुपा रही थी, जिससे वो सैकड़ों दुल्हनों को रुलाए बिना मुस्कुरा देती थी।

शाम को शीशे के घर में एक अजीब सी ख़ामोशी थी। पिहू और कायरा को बता दिया गया था कि कोर्ट का काम थोड़ा लंबा खिंच गया है, पर दोनों बच्चियाँ, जो झूठी मुस्कानों को अब मीलों दूर से पहचान लेती थीं, चुपचाप एक-दूसरे का हाथ थामे बैठी रहीं। तभी गेट की घंटी बजी, तेज़ी से, तीन बार, और उसके पीछे-पीछे सिम्मी की आवाज़, जो दरवाज़ा खुलने से पहले ही अंदर आ चुकी थी।

"मुझे अभी पता चला! एक क्लाइंट की सास ने बताया, जिसकी भांजी अदालत में क्लर्क है, कि आज तुम्हारे केस में कोई काग़ज़ निकला!" "बोल, क्या हुआ, और मेरे लिए चाय मत बनाना, मैं ख़ुद बना लूँगी, पर पहले बोल।"

"हमारा अपना अनुबंध, सिम्मी। वही जो अफ़ताब की तिजोरी में सील था। देवयानी के वकील के हाथ में आ गया।" "और विहान ने मुझसे पूछा कि मैंने आज जज के सामने जो कहा, वो सच था या सिर्फ़ केस के लिए।"

"उसने ये पूछा?" "एक साल तुमने उस आदमी के लिए, उन बच्चियों के लिए अपनी जान लगा दी, और वो पूछ रहा है कि तुम एक्टिंग कर रही थी?" "नैना, सच बोलूँ? डर हर किसी को बेवकूफ़ बना देता है। यहाँ तक कि पत्थर के आदमी को भी।"

"मुझे उसका डर समझ आता है, सिम्मी। बस... आज मुझे लगा जैसे मैंने पहली बार पूरा सच बोला, और उसे सिर्फ़ एक चाल दिखी।"

दूसरी तरफ़ स्टडी में विहान अकेला बैठा था, अपने ही सवाल को बार-बार दोहरा कर ख़ुद को कोसता हुआ। तभी दरवाज़ा बिना खटखटाए खुला, और सिम्मी अंदर आ गई, हाथ में चाय के दो कप, एक उसके लिए भी।

"मैं यहाँ आपको लेक्चर देने नहीं आई, विहान जी।" "बस इतना जान लीजिए, जिस औरत ने आज अदालत में, अजनबियों के सामने, पहली बार खुल कर कहा कि वो आपसे प्यार करती है, उसे घर आकर सिर्फ़ इतना सुनना पड़ा, कि क्या वो एक्टिंग थी।" "बाक़ी आप ख़ुद समझदार हैं। मैं चलती हूँ, चाय ठंडी होने से पहले पी लीजिएगा।"

सिम्मी के जाने के बाद विहान देर तक उस चाय को छूता तक नहीं, अपनी ही ग़लती के भार तले बैठा, ये जानते हुए कि माफ़ी माँगने का सही लम्हा वो आज दोपहर ही खो चुका था।

रात को क़रीब दस बजे अफ़ताब लौट आया, इस बार अकेला नहीं, अपने साथ एक पतली सी फ़ाइल भी लाया था। नैना और विहान के बीच की ठंडक अभी पूरी तरह पिघली नहीं थी, पर दोनों जानते थे कि आज रात एक ज़्यादा ज़रूरी सवाल का जवाब चाहिए, वो काग़ज़ बाहर आया कैसे।

"मैंने अपने दफ़्तर की तिजोरी ख़ुद जाँची। मुहर नहीं टूटी, लॉग में कोई एंट्री नहीं। वो कॉपी वहाँ से नहीं निकली।" "मतलब जो बाहर गया, वो आपके घर की कॉपी थी, विहान साहब। वही जो आपने अपनी स्टडी की दराज़ में रखी थी।"

"वो दराज़ मेरे और नैना के अलावा किसी और ने खोली ही नहीं।" "ये तो... ये तो अभी भी यहीं है। कोई निकाल कर नहीं ले गया।"

"तो किसी ने इसे चुराया नहीं, विहान।" "किसी ने बस... इसकी तस्वीर खींची। और वापस रख दी। जैसे कुछ हुआ ही न हो।"

"तो सवाल ये नहीं कि इसे कौन ले गया। सवाल ये है कि इस दराज़ तक, बिना शक जगाए, किसकी पहुँच थी।" "काका को इस घर में तीस साल हो गए। सिम्मी यहाँ मुश्किल से आती है, और स्टडी में कभी नहीं। मैं ख़ुद... तो बचा कौन?"

कमरे में एक नाम अनकहा तैर रहा था, एक चेहरा जो पिछले कुछ महीनों में इस घर की दहलीज़ इतनी बार पार कर चुका था कि किसी ने उस पर शक करने की ज़हमत ही नहीं उठाई।

"नहीं। वो तो बस... देवयानी की तरफ़ से आती थी, मिलने। हमारी दोस्त जैसी बन गई थी।" "अनाइशा..."

कोई ठोस सबूत नहीं था, सिर्फ़ एक नाम जो हवा में बहुत भारी लटक गया था। पर उसी पल दरवाज़े पर एक नन्ही आहट हुई, नंगे पाँव, आधी नींद में, फिर भी सुनने के लिए काफ़ी जागी हुई।

कायरा दरवाज़े पर खड़ी थी, अपने भालू को सीने से चिपकाए, आँखों में नींद कम, डर ज़्यादा।

"मम्मा... वो काग़ज़ वाली बात... क्या उससे हम टूट जाएँगे?" "पिहू पूछ रही थी, क्या हम बहनें अब अलग हो जाएँगी?"

"नहीं, मेरी जान। जो काग़ज़ पर लिखा है, उससे बड़ा वो है जो तुम दोनों ने दिल से लिखा था, याद है? वो कसम, वो अँगूठे का निशान?" "वो कोई अदालत नहीं मिटा सकती।"

कायरा ने सिर हिलाया, पर फिर उसका माथा सिकुड़ गया, जैसे उसे कुछ और याद आ गया हो, कुछ जो उसे अजीब तो लगा था, पर तब इतना ज़रूरी नहीं लगा था।

"मम्मा... वैसे अनाइशा आंटी को पापा के 'बोरिंग वाले काग़ज़' बहुत पसंद हैं ना?" "उस दिन जब आप बाज़ार गई थीं, उन्होंने पापा की स्टडी वाली दराज़ खोली थी, और अपने फ़ोन से कुछ तस्वीरें खींची थीं। बोलीं थीं, नानी को दिखाने के लिए, कि पापा कितने अच्छे से काग़ज़ सम्भालते हैं।"

कमरे में जो नाम अभी-अभी हवा में तैरा था, वो अब एक बच्ची की मासूम आवाज़ में, पूरी तरह ठोस हो चुका था। विहान की मुट्ठियाँ भिंच गईं। नैना ने एक लंबी साँस ली, जैसे किसी ने सीने पर पत्थर रख दिया हो।

"अनाइशा।" "वो हमारे घर में, हमारी बेटियों के बीच, हमारे भरोसे में बैठ कर, देवयानी के लिए तस्वीरें खींचती रही।"

"हमने उसे अंदर आने दिया, विहान। अपनी मर्ज़ी से।" "और उसी भरोसे ने आज हमें अदालत में हरा दिया।"

जिस काग़ज़ी सौदे को झूठा साबित करने के लिए देवयानी ने महीनों पहले एक जासूस भेजा था, उसे तोड़ने वाला हाथ आख़िर में किसी अजनबी का नहीं था। वो हाथ उसी चेहरे का था जिसे इस घर ने अपनी मेज़ पर बिठाया, अपनी बेटियों से मिलवाया, और अपना मान लिया था, अनाइशा का।

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