Chapter 21 of 28
बच्चों की गवाही
एक नाज़ुक सुलह के बाद अदालत दोबारा जुटती है, और जज बच्चियों को अपने चैंबर में अकेले सुनती है, जहाँ कायरा और पिहू अपनी कसम को किसी काग़ज़ से बड़ा साबित कर देती हैं। एक अनजान नंबर से आया रुस्तम का संदेश और उसका देवयानी से इस्तीफ़ा उम्मीद जगाता है, पर ठीक तभी देवयानी ख़ुद उठ कर खुली अदालत में विहान पर मेहर की मौत का ज़िम्मेदार होने का इल्ज़ाम लगा देती है, और पूरा कमरा उसके ख़िलाफ़ ठंडा पड़ जाता है।
अनाइशा का नाम कमरे में गूँजते हुए देर तक हवा में लटका रहा, जब तक अफ़ताब ने आगे बढ़ कर धीमे से न कहा कि आज रात इस पर कुछ नहीं किया जा सकता, सुबह इसे सम्भाला जाएगा। नैना कायरा को वापस उसके कमरे में ले गई, चादर ऊपर तक खींची, और देर तक उसके सिर पर हाथ फेरती रही, जब तक उसकी साँसें बराबर न हो गईं।
जब वो बाहर निकली, विहान दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ जेब में, आँखों में वो शर्मिंदगी जो पूरे दिन उसके अंदर जमा होती रही थी।
"नैना... आज दोपहर मैंने जो पूछा..." "वो सवाल तुम्हारे लिए नहीं था। वो मेरे उस डर के लिए था जो एक साल से मुझसे छुपा बैठा था, कि जो मुझे मिल गया है, उसे मैं रखने लायक़ भी हूँ या नहीं।"
विहान की आवाज़ में आज पहली बार वो जानी-पहचानी कानूनी सफ़ाई नहीं थी, कोई धारा नहीं, कोई शर्त नहीं, सिर्फ़ एक आदमी जो डर के बारे में सच बोल रहा था।
"जब तुमने वो पूछा, विहान, एक पल को मुझे लगा जैसे मैं फिर से कठघरे में खड़ी हूँ, इस बार तुम्हारे सामने।" "पर मुझे पता है। जिस दिन मैंने पहली बार ज़ोर से कहा कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ, वो दिन मेरे लिए भी आसान नहीं था।" "अगली बार जब डर लगे... मुझसे पूछ लेना, अदालत को सुनाने के बाद नहीं।"
"वादा।"
उस रात के बाद घर में एक नाज़ुक-सी सुलह उतर आई, हालाँकि अनाइशा का साया अभी भी दहलीज़ पर मंडरा रहा था। अगले सात दिन अफ़ताब हर शाम घर आता, नैना और विहान से वही सवाल बार-बार दोहरवाता जो अदालत में फिर पूछे जा सकते थे, जब तक जवाब उनकी अपनी ज़ुबान का हिस्सा न बन जाएँ, थके हुए नहीं, सच्चे लगें।
उधर कायरा और पिहू ने अपनी कसम वाला वो पुराना काग़ज़ काका से माँग कर तकिये के नीचे रख लिया, जैसे परीक्षा से पहले कोई ताबीज़। आख़िरकार वो सुबह आ गई जब अदालत को अंतिम बहस के लिए दोबारा जुटना था, और इस बार पूरा परिवार, एक हाथ में उम्मीद और दूसरे में डर लिए, उसी ठंडे गलियारे में जा खड़ा हुआ।
इस बार जज ने ख़ुद फ़ैसला लिया कि पहले वो दोनों बच्चियों से, वकीलों और गवाहों की भीड़ से दूर, अपने चैंबर में, सिर्फ़ एक काउंसलर की मौजूदगी में बात करेंगी। वहाँ कोई फ़ाइल नहीं थी, कोई मुहर नहीं, सिर्फ़ दो कुर्सियाँ, एक जज, और दो बहनें जो हाथ थामे अंदर आईं।
जज ने अपनी ऐनक उतार दी, आवाज़ नरम कर के पूछा, बेटा, तुम दोनों घर में साथ रहना पसंद करती हो?
"हाँ! कायरा दीदी मेरी असली बहन है। हमने कसम खाई थी, याद है, वो अँगूठे वाली!" "मम्मा-पापा भी अब एक-दूसरे का हाथ पकड़ते हैं। पहले नहीं पकड़ते थे।"
जज की क़लम एक पल को रुक गई। पिहू ने वो बात किसी की सिखाई हुई नहीं, अपनी मर्ज़ी से जोड़ी थी, और इसीलिए वो सबसे भारी लग रही थी।
"जज आंटी, काग़ज़ पर जो भी लिखा हो, मुझे नहीं पता।" "पर मैं और पिहू, हमने अपने हाथ से एक कसम लिखी थी, कि हम बहनें रहेंगी, चाहे कुछ भी हो जाए। हम उस कसम को नहीं तोड़ेंगे। आप चाहें तो हमें अलग-अलग जगह भेज दीजिए, हम फिर भी बहनें रहेंगी।"
जज ने आगे झुक कर, बहुत नरमी से, एक कठिन सवाल पूछा, अगर अदालत को यही सही लगे कि तुम दोनों अलग-अलग घरों में रहो, तो क्या होगा?
"तो हम रोज़ फ़ोन पर बात करेंगे, जज आंटी। और जिस दिन हम बड़े होंगे, हम ख़ुद साथ रहने का फ़ैसला करेंगे।" "पर आप ऐसा मत कीजिए। हमने अपनी माँओं को खोते देखा है। हमें एक-दूसरे को खोते मत देखिए।"
चैंबर में एक पल को कोई कुछ नहीं बोला। काउंसलर ने अपनी नोटबुक में कुछ लिखा, जज ने एक लंबी साँस ली, और पहली बार पूरी सुनवाई में उसकी आँखों में कुछ नरम पड़ता दिखा।
"और नानी बस पैसे की बात करती हैं, हमेशा। कायरा दीदी सिर्फ़ मेरी बात करती है।" "मुझे दीदी वाला घर पसंद है।"
"जज आंटी, आपकी कुर्सी मेरी वाली से बड़ी क्यों है? क्या आप भी किसी की दीदी हैं?"
काउंसलर ने हँसी दबाई, ख़ुद जज के होंठों पर भी एक पल को हल्की सी मुस्कान आ गई, इससे पहले कि वो फिर से अपनी गंभीरता ओढ़ ले। जज ने अपनी नोटबुक बंद की, दोनों बच्चियों को धन्यवाद कहा, और काउंसलर को इशारा किया कि उन्हें बाहर, अपने माँ-बाप के पास ले जाया जाए। जो सच बड़ों की बरसों की गवाही अदालत को नहीं दिखा पाई थी, वो दो नन्ही आवाज़ों ने बिना किसी तैयारी के, बिना किसी झूठ के, उस चैंबर में रख दिया था।
बाहर गलियारे में नैना और विहान बेंच पर बैठे इंतज़ार कर रहे थे, जब नैना के फ़ोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया। उसने स्क्रीन पर वो नाम नहीं पहचाना, उसने पहली लाइन पढ़ी और साँस रोक ली।
"'जो लिफ़ाफ़ा मैंने महीनों पहले उस गेट पर छोड़ा था, वो देवयानी के काम कभी नहीं आया। ग़लत हाथ में कभी नहीं गया। बस भरोसा रखिए, बाक़ी सामने आएगा।'" "दस्तख़त है, आर।"
"रुस्तम।" "मतलब जो कुछ भी उसने देवयानी को उस रात दिया था... वो असली सुबूत नहीं था?"
"या असली सुबूत कभी उस लिफ़ाफ़े में था ही नहीं। मुझे नहीं पता, विहान। पर महीनों में पहली बार लगा जैसे कोई हमारी तरफ़ खड़ा है, भले उसका चेहरा हमें अब तक नहीं दिखा।"
"क्या हम इसे उम्मीद कह सकते हैं, नैना? इस साल में हमने बहुत बार सोचा था कि हालात सुधर रहे हैं, ठीक उससे पहले जब सब बिगड़ गया।"
"शायद नहीं, अभी नहीं। पर आज दो बच्चियों ने अपने दम पर एक जज का दिल जीता, विहान। आज मुझे थोड़ी उम्मीद रखने का हक़ है।"
तभी अफ़ताब तेज़ क़दमों से आया, और बताया कि देवयानी के वकील की टीम में हलचल है, उनका मुख्य गवाह रुस्तम, तीन हफ़्ते पहले ही इस्तीफ़ा दे चुका है, और तब से देवयानी से किसी काम पर संपर्क में नहीं है। "उनका सबसे भरोसेमंद हथियार अब उनके पास नहीं है," अफ़ताब ने कहा, अपनी आवाज़ में हफ़्तों बाद पहली उम्मीद के साथ।
गलियारे के दूसरे कोने में देवेंद्र चुपचाप बैठे थे, अपनी पत्नी से कुछ दूर, हाथ में एक भारी बैग जिसे उन्होंने किसी को नहीं दिखाया। उनकी आँखें नैना और विहान की तरफ़ एक पल को उठीं, कुछ कहने को हुईं, फिर चुप हो गईं।
तभी चपरासी ने फिर से नाम पुकारा। सुनवाई दोबारा शुरू होने वाली थी, और उम्मीद की वो नन्ही सी लौ, जो अभी-अभी जली थी, उसे अंदर उस कठघरे तक ले जाना था।
भीतर लौटते ही कमरे का मिज़ाज बदला हुआ महसूस हुआ। देवयानी के वकील की चाल में वो पुरानी चिकनाहट नहीं थी, और जज ने पिछली सुनवाई से नरम, पर पूरी तरह चौकस निगाहों से दोनों पक्षों को देखा।
अफ़ताब उठा और बहुत ठहरी हुई आवाज़ में दलील दी, कि काग़ज़ पर लिखी शर्तें एक साल पुरानी हैं, पर जो दो बच्चियाँ अभी उस चैंबर से निकली हैं, उनकी गवाही किसी काग़ज़ से बड़ी है। जज ने सिर हिलाया, धीरे, पर हिलाया ज़रूर।
और ठीक उसी पल, अपने वकील के इशारे का इंतज़ार किए बिना, देवयानी ख़ुद अपनी जगह से खड़ी हो गई। उसका चेहरा, जो महीनों से सिर्फ़ शांत तलवार जैसा रहा था, आज पहली बार बेचैन लग रहा था।
"जज साहिबा, इससे पहले कि ये कमरा दो बच्चियों की मासूमियत में बह जाए, अदालत को एक बात जाननी चाहिए।" "मेरी बेटी मेहर यूँ ही नहीं मर गई। वो आदमी," "उस रात जब मेरी बेटी को सबसे ज़्यादा उसकी ज़रूरत थी, वो उसके पास नहीं था। वो आदमी अपनी ही पत्नी की मौत का ज़िम्मेदार है।"
"नहीं..."
कमरे में एक साँस भर की ख़ामोशी छाई, और फिर एक सर्द लहर हर चेहरे पर फैल गई। जज ने अपनी क़लम रोक दी, अपनी नज़र धीरे-धीरे विहान की तरफ़ घुमाई, और इस बार उस नज़र में कोई गर्मजोशी नहीं थी, सिर्फ़ एक नया, ठंडा सवाल था। विहान का चेहरा सफ़ेद पड़ गया, और पूरा कमरा, जो अभी-अभी दो बच्चियों की वजह से थोड़ा पिघला था, एक झटके में फिर से उतना ही ठंडा हो गया, इस बार सीधे उसी आदमी के ख़िलाफ़, जिसने कभी अपनी मरी हुई पत्नी का नाम भी पूरी अदालत के सामने लेने की हिम्मत नहीं जुटाई थी।
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