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Chapter 4 of 28

बनावटी हनीमून

कागज़ी कसमें by Avni Oberoi

अगली सुबह ठीक नौ बजे, विहान के शीशे वाले स्टडी में, अफ़ताब ने एक पतली फ़ाइल मेज़ पर यूँ रखी, जैसे कोई डॉक्टर किसी की एक्स-रे रखता है। सधे हुए हाथ, और उससे भी ज़्यादा सधी हुई ख़राब ख़बर।

"कल रात देवयानी के वकील का संदेश आया था, विहान।" "वो कस्टडी की अर्ज़ी में एक नई लाइन जोड़ रहे हैं। वो कहते हैं ये शादी असली नहीं... एक इंतज़ाम है। सिर्फ़ पिहू को उनसे दूर रखने के लिए रचा गया एक नाटक।"

'नाटक।' विहान ने वो लफ़्ज़ यूँ सुना जैसे किसी ने उसकी सबसे मज़बूत दीवार पर पड़ी पहली दरार का नाम ले लिया हो। क्योंकि वो जानता था, वो लफ़्ज़ झूठ नहीं था।

"उन्हें इतनी जल्दी कैसे पता चला?" "हमारी शादी को अभी हफ़्ता भी नहीं हुआ, अफ़ताब।"

"जज को ये नहीं जानना कि उन्हें कैसे पता चला। जज को बस इतना देखना है कि क्या ये शादी सच लगती है।" "और अभी... नहीं लगती। दो अलग कमरे, एक बीवी जिसे तुमने आज तक किसी के सामने छुआ तक नहीं, और एक दूल्हा जो अपनी ही दुल्हन से चार क़दम दूर खड़ा रहता है।"

"तो तुम चाहते क्या हो?"

"एक काग़ज़ी शादी को भी साबित होना पड़ता है, विहान। और सबूत लोगों की आँखों में होता है।" "बाहर निकलो। साथ में। शहर को दिखाओ। एक डिनर, कुछ तस्वीरें, एक ऐसा जोड़ा जिस पर पूरे बेंगलुरु को यक़ीन आ जाए। एक... हनीमून, जो सबको दिखे।"

"हनीमून हमारे किसी क्लॉज़ में नहीं है।"

"क्लॉज़ हम बचा लेंगे, विहान।" "पर पिहू नहीं बचेगी, अगर जज को ये शादी काग़ज़ी लगी।"

और ठीक उसी पल, दरवाज़े पर एक और आवाज़ आई। नैना, हाथों में चाय के दो कप लिए, दहलीज़ पर ठिठकी हुई। उसने पूरी बात नहीं सुनी थी, पर वो आख़िरी लफ़्ज़ काफ़ी था। और उस लफ़्ज़ के साथ, एक कड़वी सी हँसी उसके होंठों पर आ गई।

"तो अब मुझे... अपनी ही शादी प्लान करनी है।" "पूरे शहर की दुल्हनों के सपने सजाने वाली नैना, अब अपने लिए एक नक़ली हनीमून का सेट लगाएगी।" "वाह। क़िस्मत का मज़ाक़ भी क्या कमाल का है।"

"तुम्हें ये सब करने की ज़रूरत नहीं है..."

"ज़रूरत है।" "आपकी पिहू के लिए, और मेरी कायरा के लिए भी। जज को अगर एक जोड़ा चाहिए, तो उसे दुनिया का सबसे प्यारा जोड़ा दिखेगा।" "आख़िर सजाना तो मेरा काम है ना। चलिए, मिस्टर विहान। आपकी ज़िंदगी की सबसे मुश्किल शादी की तैयारी शुरू।"

उस शाम, विहान का वो ठंडा ड्रॉइंग रूम नैना के हाथों एक रिहर्सल हॉल बन गया। सौ दूल्हों को उसने प्यार का अभिनय सिखाया था, पर आज उसके सामने उसकी ज़िंदगी का सबसे अकड़ा हुआ क्लाइंट खड़ा था। उसका अपना पति।


"ठीक है। शुरू करते हैं सबसे आसान चीज़ से।" "जब हम बाहर हों, और मैं कुछ कहूँ, तो आप मेरी तरफ़ देखिएगा। मेरे कंधे के पीछे दीवार पर नहीं, मेरी आँखों में। जैसे... जैसे इस पूरे कमरे में सबसे दिलचस्प चीज़ मैं ही हूँ।"

"कितनी देर?"

"क्या कितनी देर?"

"कितनी देर देखना है। कोई तय समय? तीन सेकंड? पाँच?" "मुझे एक नियम चाहिए, नैना। वरना अजीब लगेगा।"

नैना एक पल को बस उसे देखती रह गई। ये आदमी एक नज़र के लिए भी क्लॉज़ माँग रहा था। प्यार के लिए एक नियम। और उसे हँसी आ गई, पूरे दिन में पहली सच्ची वाली।

"हे भगवान। नज़र के कोई तीन सेकंड नहीं होते, मिस्टर सीईओ।" "आप बस एक बार सोचना छोड़ दीजिए। और हाथ ऐसे नहीं।" "आपका हाथ किसी बोर्ड जैसा अकड़ा हुआ है। हाथ थामना है, किसी समझौते पर दस्तख़त नहीं करने।"

और जैसे ही नैना ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया, विहान की उँगलियाँ ठीक वैसे ही अकड़ गईं जैसे उस सुबह नाश्ते की मेज़ के नीचे अकड़ी थीं। बर्फ़। पर इस बार भागने को कोई देवयानी नहीं थी, नापने को कोई नज़र नहीं थी। बस वो दोनों, और एक ख़ाली कमरा।

"साँस लीजिए। ... मैं कोई शीशा नहीं हूँ जो छूने भर से टूट जाऊँगी।" "बस एक हाथ है। ज़रा ढीला छोड़िए इसे।"

और बहुत धीरे-धीरे, जैसे बरसों की जमी बर्फ़ पहली धूप में पिघलती है, विहान की उँगलियाँ ढीली पड़ीं। एक पल को, सिर्फ़ एक पल को, वो सचमुच किसी का हाथ थामे खड़ा था। और उस पल कमरे की हवा ज़रा सी बदल गई। दोनों ने महसूस किया, और दोनों ने ही उसे न मानने का फ़ैसला किया।

और सोफ़े के पीछे से, दो जोड़ी आँखें ये सब चुपचाप देख रही थीं। पिहू और कायरा, अपनी उसी मुड़ी-तुड़ी कसम का काग़ज़ सीने से लगाए, साँस रोके।

"दीदी! दीदी, देखा तुमने? पापा ने मम्मा का हाथ पकड़ा!" "हमारी कसम काम कर रही है! नंबर तीन... पापा हाथ पकड़ेंगे। हो गया ना!"

कायरा ने जल्दी से अपनी नन्ही बहन का मुँह हाथ से ढँक दिया, पर उसकी अपनी आँखों में भी एक चमक थी। वो जानती थी कि बड़े लोग पकड़े जाने पर सब कुछ रोक देते हैं। ये उनका राज़ था, और राज़ को राज़ ही रहना था। दो नन्ही जासूस दुबक कर फिर से अपने मिशन पर लौट गईं।

"आप... अभी मुस्कुरा रहे थे।" "मैंने इस घर में आकर पहली बार देखा।"

"वो... रिहर्सल के लिए था।" "तुमने ही तो कहा था। सोचना छोड़ दो।"

पर दोनों जानते थे कि वो मुस्कान किसी रिहर्सल के लिए नहीं थी। नैना ने अपना क्लिपबोर्ड सीने से लगा लिया, ठीक कायरा की तरह, जैसे वो कोई ढाल हो। और उस शाम, पहली बार, उसे अपने ही बनाए इस नाटक से ज़रा डर लगा। क्योंकि सबसे अच्छा अभिनय वही होता है, जिसमें कलाकार ख़ुद भूल जाए कि वो अभिनय कर रहा है।

दो रातों बाद, शहर के सबसे ऊँचे रेस्तराँ की छत पर, रौशनी में नहाई एक मेज़। नैना ने वो शाम ऐसे सजाई थी जैसे किसी और की शादी हो। सही मेज़, सही रौशनी, वो कोना जहाँ से गुज़रता हर इंसान उन्हें देख सके। आज उनका नाटक घर से निकल कर सड़क पर आ गया था।


"मुस्कुराते रहिए। उस कोने वाली मेज़ पर आपकी कंपनी के दो लोग बैठे हैं।" "अब हाथ मत खींचिए। पूरा शहर देख रहा है। हम दुनिया का सबसे ख़ुश जोड़ा हैं, याद है ना?"

"मुझसे इस तरह... सबके सामने..." "मुझसे ये अच्छे से नहीं होता, नैना।"

"तो बाक़ी सबको छोड़िए। सिर्फ़ मुझे देखिए।" "अच्छा, मुझे बताइए... पिहू आज सुबह क्या कह रही थी? वो तितली वाली बात। पूरी।"

और अपनी बेटी के ज़िक्र पर, विहान का वो अकड़ा हुआ चेहरा अपने आप नरम पड़ गया। वो पिहू की सुबह वाली शरारत सुनाने लगा, और सुनाते-सुनाते सचमुच मुस्कुरा दिया। असली मुस्कान। और नैना, जो उसे प्यार का अभिनय सिखाने आई थी, एक पल को ख़ुद भूल गई कि ये सब झूठ था।

पर हर मंच के पीछे एक अँधेरा होता है। और उस रात, उस अँधेरे के पास एक कैमरा था। सड़क के उस पार, एक बंद खड़ी गाड़ी में, एक बेहद शांत सा आदमी बैठा था। महँगा कोट, और उससे भी ठंडी नज़र, और एक लंबी काली लेंस, जो सीधे उस जगमगाती छत की ओर तनी थी। रुस्तम।

"जी, बहूजी। मैं देख रहा हूँ उन्हें।" "आपने कहा था आपको एक नक़ली शादी की तस्वीरें चाहिए।" "तो एक बात बता दूँ। नक़ली जोड़े इतने पास बैठ नहीं पाते। नक़ली जोड़ा घबराता है, चौंकता है। और ये दोनों... घबरा नहीं रहे।"

और उसने अपनी उँगली शटर पर रख दी। ठीक उसी पल, नैना ने कुछ कहा, और विहान हँस पड़ा, और उस हँसी में उसने नैना की तरफ़ यूँ देखा, जैसे वो सचमुच इस पूरी दुनिया में और कहीं नहीं, बस वहीं होना चाहता हो। क्लिक। रुस्तम की पहली तस्वीर खिंच गई।

"हम्म।" "अजीब बात है।" "आपने कहा था ये प्यार झूठा है, बहूजी। पर ये वाला लम्हा..." "ये तो बिल्कुल नक़ली नहीं लग रहा।"

और यही इस पूरे खेल की सबसे बड़ी विडंबना थी। जिस लम्हे को झूठा साबित करने रुस्तम रात भर से बैठा था, ठीक वही लम्हा सबसे सच्चा निकला। कैमरे ने वो चीज़ पकड़ ली थी जिसे अभी उन दोनों ने ख़ुद को भी मानने से इनकार कर दिया था। पहली तस्वीर खिंच चुकी थी। और अब इस काग़ज़ी घर पर एक आँख भी लग चुकी थी।

रात के लगभग बारह बजे, शीशे के घर की दहलीज़। ऊपर बच्चियाँ कब की सो चुकी थीं, गाड़ी दूर खड़ी थी, और सामने वाले घर की बालकनी में पड़ोसन अभी भी जाग रही थी, हर नज़ारे को ताकती हुई। नैना के लिए, ये उस पूरी शाम का आख़िरी सीन था।


"एक मिनट रुकिए।" "सामने वाली आंटी अभी भी देख रही हैं। सुबह तक पूरे मोहल्ले को पता चल जाना चाहिए कि हम कितने ख़ुश हैं।" "बस एक... गुड नाइट किस। दिखावे का। कैमरों के लिए।"

"नैना..."

"बस एक सेकंड का मामला है, मिस्टर विहान। झुकिए, पास आइए, और अलग हो जाइए। मैंने सौ दूल्हों को यही सिखाया है। बहुत आसान है।"

और वो झुके। पूरी शाम का वो सारा नाटक, वो हर छुई हुई उँगली, वो हर नक़ली मुस्कान, सब सिमट कर उन दोनों के बीच की उस एक इंच की दूरी में आ ठहरा। नैना की साँस रुक गई। और विहान की नज़र, ज़िंदगी में पहली बार, उसके होंठों पर आकर ठहर गई।

और वो एक इंच... अचानक बहुत बड़ी भी हो गई, और बहुत छोटी भी। ये अब दिखावे के लिए नहीं था। पड़ोसन, कैमरे, अदालत, वो सारा शहर, सब एक साथ ग़ायब हो गए। बस उन दोनों की उखड़ती साँसें बचीं, और बीच में वो एक साँस भर की दूरी, जो अब ख़ुद-ब-ख़ुद मिटी जा रही थी।

"विहान..."

और फिर, जैसे किसी ने दोनों को एक ही झटके में बर्फ़ के पानी में डुबो दिया हो, दोनों पीछे हट गए। एक साथ। साँसें उखड़ी हुई, दिल बेतरह धड़कते हुए, और आँखों में एक ही सवाल, जिसका जवाब दोनों देने से डर रहे थे। ये अभिनय नहीं था। और सबसे डरावनी बात तो यही थी कि उस एक पल में, दोनों ही चाहते थे कि वो एक इंच मिट जाती।

"बस... इतना ही काफ़ी है।" "परफ़ेक्ट शॉट। गुड नाइट, मिस्टर विहान।"

और वो तेज़ क़दमों से अंदर चली गई, एक बार भी पीछे मुड़े बिना। विहान वहीं दहलीज़ पर खड़ा रहा, अपने उसी हाथ को देखता हुआ जो कुछ पल पहले किसी का हाथ थामे था। उस रात, गलियारे के दो अलग सिरों पर, दो अलग कमरों में, दो लोग जागते रहे। और दोनों एक ही बात सोच रहे थे, वो एक बात जिसे कोई क्लॉज़, कोई काग़ज़, कोई शर्त कभी नहीं रोक सकती थी... काश वो एक इंच मिट जाती।

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