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Chapter 6 of 28

माँ जैसा कोई

कागज़ी कसमें by Avni Oberoi

उस सच्ची रात को तीन सुबहें बीत चुकी थीं। और उन तीन सुबहों में शीशे के घर की वो दफ़्तर जैसी ठंडी ज़बान एक डिग्री पिघल चुकी थी। नाश्ते की मेज़ के दो सिरे अब थोड़ा पास खिसक आए थे, विहान चाय ख़त्म होने के बाद भी एक पल ज़्यादा बैठने लगा था, और वो एक इंच अब भी दोनों के बीच थी, पर अब उसमें बर्फ़ नहीं, एक अजीब सी गर्माहट थी।

और ठीक उसी सुबह, जब काका अब तक गाँव से नहीं लौटे थे, गेट की घंटी बजी। कोई मेहमान आने वाला नहीं था। नैना ने विहान की तरफ़ देखा, विहान ने इंटरकॉम की तरफ़। स्क्रीन पर एक अधेड़ उम्र की औरत खड़ी थी, हाथ में एक फ़ाइल, और चेहरे पर वो पेशेवर मुस्कान जो कुछ भी नहीं बताती।

"नमस्ते। मैं मिसेज़ राव, फ़ैमिली कोर्ट की ओर से नियुक्त बाल कल्याण अधिकारी।" "आपके यहाँ बच्ची पिहू की देखभाल की एक निगरानी विज़िट के लिए आई हूँ। बिना पहले बताए, यही नियम है। मुझे अंदर आने की इजाज़त दीजिए।"

और नैना के पैरों तले ज़मीन एक पल को खिसक गई। दो दिन पहले ही अफ़ताब ने चेताया था कि देवयानी ने अदालत में पिहू की देखभाल की एक फ़ौरी जाँच की अर्ज़ी लगवा दी है, और ऐसी जाँच कभी बता कर नहीं आती। जिस काग़ज़ को फाड़ने की कसम देवयानी ने उस रात खाई थी, ये उसी का पहला वार था, और वो अब दरवाज़े पर खड़ा था।

"ठीक है। ठीक है, घबराने का वक़्त नहीं है।" "मैंने इस शहर में तीन सौ शादियाँ सजाई हैं, विहान। रूठे हुए दूल्हे, नख़रे वाली सासें, आख़िरी मिनट पर भागे हुए पंडित। एक परिवार सजाना क्या मुश्किल है।" "आप ऊपर जाकर टाई मत बांधिए, हम आम घर हैं, अरबपति का शोरूम नहीं। बालों में हाथ फेरिए, और... भगवान के लिए, ज़रा मुस्कुराइए।"

"नैना, मुझे झूठ बोलना नहीं आता।" "मैं बोर्ड के सामने खड़ा होकर करोड़ों का सौदा कर सकता हूँ। पर मैं... मैं किसी अजनबी की आँखों में देखकर ये नहीं कह सकता कि हम एक प्यार करने वाला जोड़ा हैं। मेरी आवाज़ पकड़ी जाएगी।"

"तो झूठ मत बोलिए।" "जो सच है, वही कहिए। कि इस घर में दो बच्चियाँ हैं जो एक-दूसरे के लिए जान देती हैं। कि उस रात आपने कायरा को सीने से लगाया था। वो झूठ नहीं था, विहान।" "बस... मेरा हाथ ऐसे पकड़िए, जैसे उसे छोड़ना नहीं चाहते। बाक़ी सच अपने आप बोल देगा।"

और यहीं इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी विडंबना थी। शहर की सबसे नामी वेडिंग प्लानर, जिसे कसमों पर यक़ीन नहीं था, अब एक जाँच अधिकारी की पैनी नज़रों के सामने अपने ही झूठे परिवार को सच की तरह सजाने जा रही थी। और शहर के दूसरे छोर पर, देवयानी उसी रिपोर्ट का इंतज़ार कर रही थी, जो इस घर को झूठा साबित कर देगी। विहान ने गेट खोलने का बटन दबाया।


मिसेज़ राव अंदर आईं, और उनकी नज़र एक कैमरे की तरह पूरे कमरे को नाप गई। दीवारों पर टँगी तस्वीरें, सोफ़े पर पड़े खिलौने, हवा में तैरती चाय की ख़ुशबू। वो बैठीं और फ़ाइल खोली। बरसों से घर परखने वाली आँखें जानती थीं कि सजाया हुआ घर कैसा दिखता है।

"बहुत ख़ूबसूरत घर है। ... तो, आप दोनों की मुलाक़ात कैसे हुई थी?" "और शादी को कितना वक़्त हुआ? मैं इसलिए पूछ रही हूँ, क्योंकि फ़ाइल में कुछ तारीख़ें बड़ी नई-नई सी लगती हैं।"

"जी, एक कॉमन फ़्रेंड की शादी में। मैं उस शादी की प्लानर थी।" "पहली नज़र में तो नहीं, पर... दूसरी नज़र में शायद। और फिर दोनों बच्चियाँ थीं, दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत थी, तो हमने सोचा देर क्यों करें।"

"जी। ... हमारी सोच बहुत मिलती है।" "हम एक बहुत ख़ुश परिवार हैं।"

मिसेज़ राव की क़लम एक पल के लिए रुकी। उन्होंने विहान के जकड़े कंधों को देखा, नैना की ज़रा तेज़ मुस्कान को, और उन दो हाथों को जो यूँ थमे थे जैसे किसी मीटिंग में हाथ मिलाया जाता है। उन्होंने कुछ लिखा, और वो एक शब्द नैना को दूर से चाकू जैसा लगा।

"मिस्टर विहान, माफ़ कीजिएगा, पर मैं साफ़ बात करती हूँ। बीस साल से यही काम कर रही हूँ।" "मेरे पास एक शिकायत आई है कि ये शादी असली नहीं है। कि आप दोनों अलग कमरों में रहते हैं, कि शादी से हफ़्तों पहले तक आप एक-दूसरे को जानते तक नहीं थे।" "और सच कहूँ, तो अब तक जो मैंने इस कमरे में देखा है, उसने इस शिकायत को ग़लत साबित नहीं किया।"

अलग कमरे। हफ़्तों पहले तक अजनबी। ये ठीक वही तारीख़ें थीं जो रुस्तम ने देवयानी के हाथ में रखी थीं, अब एक अदालती फ़ाइल का रूप लेकर इसी कमरे में लौट आई थीं। नैना का गला सूख गया। विहान ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, और बंद कर लिया। बड़ों का अभिनय हार रहा था। और ठीक उसी पल, गलियारे से दो नन्हे क़दमों की आवाज़ आई।


और वो दोनों अंदर आ गईं, जिन्होंने कभी अभिनय करना सीखा ही नहीं था। पिहू आगे, अपनी गुड़िया घसीटते हुए, और कायरा उसके पीछे, हमेशा की तरह एक क़दम पास, अपनी छोटी बहन पर नज़र रखे हुए। मिसेज़ राव की क़लम रुक गई, और उनकी आवाज़ अपने आप नरम हो गई।

"अरे वाह, कितनी प्यारी गुड़िया है। इधर आओ बेटा।" "मुझे एक बात बताओगी... ये आंटी कौन हैं?"

"आंटी?" "ये आंटी नहीं हैं। ये तो मेरी मम्मा हैं।" "जब मुझे बहुत तेज़ गरमी हो जाती है ना, तो मम्मा पूरी रात मेरे सिर पर ठंडा कपड़ा रखती हैं। और मुझे हँसाती भी हैं। पहले वाली मम्मा तारा बन गई थी, पर अब मेरे पास नई मम्मा है।"

और वो एक शब्द, मम्मा, उस कमरे में किसी घंटी की तरह बज उठा। किसी ने पिहू को ये नहीं सिखाया था। किसी रिहर्सल में ये नहीं लिखा था। नैना जहाँ खड़ी थी, वहीं जम गई, और उसकी आँखें एक पल में भर आईं। और दरवाज़े के पास खड़ा विहान, वो पत्थर बना आदमी, बस देखता रह गया, जैसे उसके सीने में एक साल से बंद कोई चीज़ हिल गई हो।

"हाँ मेरी जान।" "मम्मा यहीं है। और आज रात भी ठंडा कपड़ा रखूँगी, अगर ज़रूरत पड़ी तो। पक्का।"

"और तुम? तुम कायरा हो ना।" "मैंने सुना है तुम्हारे पापा बहुत व्यस्त रहते हैं। ठंडे से आदमी हैं। बच्चों के लिए उनके पास वक़्त नहीं।"

"ये झूठ है।" "मेरे पापा ठंडे नहीं हैं। जिस रात मुझे डरावना सपना आया था, वो सफ़ेद गाड़ी वाला, उस रात पापा ने मुझे पूरी रात गोद में लिया था।" "और पापा ने मुझे बताया कि मम्मा वाले तारे हमें हर रात देखते हैं। जो पापा ऐसी बातें बताता है, वो ठंडा नहीं होता। आप ग़लत हैं।"

और फिर उन दोनों ने वो सबसे सीधी सी बात की, जो किसी फ़ाइल में नहीं लिखी जा सकती। कायरा ने पिहू का हाथ थामा, और पिहू उससे यूँ सट गई जैसे वो हमेशा से उसकी बड़ी बहन रही हो। मिसेज़ राव, जो एक झूठ पकड़ने आई थीं, चुपचाप उन दो जुड़े हाथों को देखती रहीं। उनका बरसों का तजुर्बा जानता था, बड़े लोग झूठ को सजा सकते हैं, पर दो बच्चियाँ इस तरह एक-दूसरे को गढ़ नहीं सकतीं।

"बीस साल में मैंने बहुत सजे हुए घर देखे हैं। बड़े, आलीशान, और अंदर से बिल्कुल ख़ाली।" "पर ये दो बच्चियाँ... इन्हें कोई सिखा नहीं सकता।" "मेरी रिपोर्ट अदालत में जाएगी। फ़ैसला मेरा नहीं है। पर आज इस कमरे में जो मैंने देखा, वो मैं ज़रूर लिखूँगी।"


गेट बंद हुआ, और पूरे घर ने एक लंबी साँस छोड़ी। बच्चियाँ अपनी गुड़िया लेकर बग़ीचे में भाग गईं, जैसे अभी-अभी कोई तूफ़ान गुज़रा ही न हो। पर नैना अब भी वहीं खड़ी थी, जहाँ वो एक शब्द उसे लगा था। मम्मा। वो हिल नहीं पा रही थी।

"मैंने उसे कभी नहीं सिखाया, विहान।" "मैंने कभी नहीं कहा कि मुझे मम्मा बुलाओ। मैं तो ख़ुद को हर रोज़ याद दिलाती हूँ कि ये एक साल का इंतज़ाम है, कि ये मेरी बच्ची नहीं है।" "पर उसने मुझे मम्मा कहा। और सबसे डरावनी बात ये है कि मैं चाहती थी वो ये कहे।"

"आज मैंने कुछ देखा।" "मैंने तुम्हें उन दोनों के लिए लड़ते देखा। मेरी बेटी के लिए, अपनी भांजी के लिए, ऐसे जैसे दोनों तुम्हारा अपना ख़ून हों।" "मेहर के जाने के बाद, इस घर में कुछ भी ज़िंदा महसूस नहीं हुआ था। पूरे एक साल तक। आज पहली बार... कुछ हिला।"

और यहीं दोनों के बीच वो बात आ खड़ी हुई, जिसे दोनों छुपाए बैठे थे। विहान को उस बर्फ़ के नीचे पहली बार कुछ पिघलता महसूस हुआ, और नैना ने पहली बार उस पत्थर के पीछे छुपे आदमी की एक पूरी झलक देखी। और वही एक इंच फिर लौट आई। न कोई पड़ोसन, न कोई अधिकारी, न कोई कैमरा। सिर्फ़ वो दोनों, और वो एक इंच, जो अब पहले से कहीं ज़्यादा भरी हुई थी।

"ये... ये सही नहीं है।" "हमने काग़ज़ पर दस्तख़त किए हैं, विहान। एक साल, फिर ख़ामोश तलाक़। मेरी कायरा की पूरी लड़ाई इसी शर्त पर टिकी है कि मैं पेशेवर रहूँ।" "मैं फिर से किसी पर यक़ीन नहीं कर सकती। पिछली बार जब किया था, तो वो आदमी दरवाज़े से निकल गया था।"

"तुम सही कह रही हो।" "नियम नंबर एक। कोई जज़्बात नहीं। ... मैं याद रखूँगा।" "पर नैना... कुछ नियम हम इसलिए बनाते हैं, ताकि उन्हें तोड़ने से डरते रहें।"

और दोनों पीछे हट गए, हर बार की तरह, अपने-अपने काग़ज़ी क़िले में। पर इस बार पीछे हटना पहले से ज़्यादा मुश्किल था। दोनों एक ही छत के नीचे, दो अलग कमरों में, एक ही ख़्वाहिश को दबाए, और एक-दूसरे से छुपाए। पर उस रात, विहान के कमरे में नींद नहीं थी।


रात के उस पहर में, जब पूरा घर सो चुका था, विहान अपने कमरे में अकेला जाग रहा था। जो कुछ आज उसने महसूस किया था, वो उसे डरा रहा था। क्योंकि हर बार जब नैना का ख़याल उसके दिल में उठता, ठीक उसके पीछे एक और चेहरा आ खड़ा होता। मेहर। और उसके साथ आता वो पुराना, भारी अपराधबोध।

"मुझे माफ़ कर दो, मेहर।" "मैंने ख़ुद से कहा था कि मैं दोबारा कभी किसी को अपने दिल के पास नहीं आने दूँगा। और आज, एक अजनबी औरत को अपनी बेटी की माँ बनते देखकर, मेरे सीने में कुछ ऐसा हिला जो एक साल से मरा पड़ा था।" "क्या ये तुम्हारे साथ बेवफ़ाई है? मुझे बताओ। तुम तो हमेशा हर सवाल का जवाब जानती थीं।"

और फिर वो उठा। अलमारी के सबसे ऊपरी ख़ाने में, कपड़ों के नीचे, एक छोटी सी लकड़ी की तिजोरी रखी थी, जिसकी चाबी वो हमेशा अपने पास रखता था। उसने उसे खोला। अंदर, मख़मल के एक टुकड़े में लिपटा, एक लिफ़ाफ़ा रखा था। सफ़ेद, पुराना, किनारों से हल्का पीला पड़ता हुआ। और उस पर, एक जानी-पहचानी लिखावट में, सिर्फ़ एक ही शब्द लिखा था। विहान।

"पूरा एक साल हो गया, मेहर।" "तुम्हारी आख़िरी चिट्ठी। तुमने जाने से ठीक पहले लिखी थी, और कहा था कि सही वक़्त आने पर ही खोलूँ।" "पर मैं आज तक इसकी मुहर नहीं तोड़ पाया। क्योंकि जिस दिन इसे खोलूँगा, उस दिन मुझे मानना पड़ेगा कि तुम सच में जा चुकी हो।"

और यहीं, इस पूरी कहानी ने एक ऐसा काग़ज़ रख दिया, जिसे अभी कोई नहीं जानता था। एक साल से बंद, एक चली गई औरत की आख़िरी चिट्ठी, विहान की अपनी अलमारी में, अनखुली, अनपढ़ी। उस बंद लिफ़ाफ़े में मेहर के आख़िरी शब्द थे, कुछ ऐसा जो इस काग़ज़ी घर की हर चीज़ को उलट सकता था, इस शादी को, इस लड़ाई को, इन दो बहनों के आने वाले कल को।

विहान का अँगूठा उस मुहर पर काँप रहा था, न उसे खोल पा रहा था, न वापस रख पा रहा था। और उस बंद काग़ज़ में जो सच सो रहा था, अगर वो कभी जागा, तो इस घर में कुछ भी, कोई भी कसम, पहले जैसी नहीं रहेगी। पर आज रात, वो सच अभी बंद था। और विहान को नहीं पता था कि उसे खोलने का दिन, अब बहुत दूर नहीं था।

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