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Chapter 23 of 28

आख़िरी दांव

कागज़ी कसमें by Avni Oberoi

कमरे की वो ख़ामोशी अभी टूटी नहीं थी, जब नैना ने विहान की आँखों में देखा, और अपने काँपते हाथ को उसके बढ़े हुए हाथ की तरफ़ बढ़ाया।

"हाँ, विहान। मैं भी अब इसे काग़ज़ पर ख़त्म नहीं होने देना चाहती।" "मैं भी इसे हमेशा के लिए असली चाहती हूँ।"

विहान की आँखों में जो एक साल से जमी बर्फ़ थी, वो उसी एक पल में पूरी तरह पिघल गई।

"बस यही सुनना था, नैना।"

कमरे में एक साथ कई साँसें छूट गईं, गैलरी में कहीं किसी की आँख भर आई, और जज ने भी एक पल को अपनी सारी क़ानूनी सख़्ती भूल कर, सिर्फ़ एक इंसान की तरह मुस्कुराने से मुश्किल से ख़ुद को रोका।

जज ने अपनी मुस्कान वापस ज़ब्त कर के पूछा, क्या श्रीमती नैना ये बात अदालत के रिकॉर्ड में औपचारिक रूप से दर्ज करना चाहेंगी।

"जी, जज साहिबा। मैं चाहती हूँ ये मेरे बयान का हिस्सा बने।"

सिर्फ़ देवयानी की मेज़ पर बैठी क़लम एक जगह रुक गई, उसकी आँखों में हार का कोई आँसू नहीं था, सिर्फ़ एक ठंडा, तेज़ी से घूमता हिसाब।

उसी गर्मजोशी के बीच अफ़ताब की कुर्सी एक झटके से पीछे खिसकी, और उसका चेहरा उतनी ख़ुशी में शामिल नहीं हुआ जितना बाक़ी कमरे का था।

"जज साहिबा, माफ़ी चाहूँगा, क्या अदालत को दस मिनट की रिसेस दी जा सकती है?" "ये एक निजी लम्हा है, जज साहिबा, और निजी लम्हों को खुली अदालत में जल्दबाज़ी में तय नहीं करना चाहिए।"

जज ने सिर हिलाया, दस मिनट की रिसेस दे दी, और चपरासी को इशारा किया कि दोनों पक्षों को अलग-अलग कमरों में ले जाया जाए।

"अफ़ताब, क्या मैंने अभी कुछ ग़लत कह दिया?"

उन्हें फिर उसी तंग, खिड़की-रहित कमरे में बिठाया गया, जहाँ बीस मिनट पहले विहान ने अपना पूरा सच बोला था।

"ग़लत नहीं, नैना जी। पर ख़तरनाक ज़रूर है।" "देवयानी का वकील कल यही कहेगा, कि जिस दिन केस हारने का डर सबसे बड़ा था, ठीक उसी दिन ये शादी अचानक असली घोषित कर दी गई। वो इसे प्यार नहीं, रणनीति कहेगा।"

"ये रणनीति नहीं है, अफ़ताब। ये हफ़्तों पहले सच हो चुका था। सिर्फ़ कहने की हिम्मत आज जुटी।"

"और कायरा? अगर मेरी शादी शक के घेरे में आई, तो उसकी गोद लेने की अर्ज़ी का क्या होगा, अफ़ताब? मैंने ये सब सिर्फ़ उसके लिए तो शुरू किया था।"

"मुझे पता है, नैना जी। इसलिए हमें अदालत को वो दिखाना है जो हमें पता है, तारीख़ें।" "मेहर की चिट्ठी, बच्चियों की चैंबर वाली गवाही, वो घड़ी में लगा कैमरा, इनमें से हर एक चीज़ हफ़्तों पुरानी है। हम अभी अदालत से एक हफ़्ते की मोहलत माँगेंगे, टाइमलाइन का सुबूत जोड़ने के लिए, और वही टाइमलाइन कायरा के केस को भी बचाएगी, दोनों अर्ज़ियाँ एक ही सच पर टिकी हैं।" "और एक बात और, अनाइशा वाला लीक अब भी अदालत की फ़ाइल में दर्ज है। हमें ये भी दिखाना होगा कि वो लीक किसी साज़िश का हिस्सा था, हमारी शादी की नीयत का सुबूत नहीं।" "पर तब तक, दोनों को कुछ नहीं कहना, कहीं भी, किसी के सामने भी नहीं।"

"नैना, जब तक मेरी साँस चलती है, कायरा को कुछ नहीं होगा। वो मेरी भी बेटी है, काग़ज़ पर लिखा हो या ना हो।"

नैना ने मेज़ के नीचे विहान का हाथ थाम लिया, और एक पल के लिए, अफ़ताब की चेतावनियों के बीच भी, दोनों को याद आया कि इस सारे डर के नीचे एक असली, कमाया हुआ सुकून भी था।

उसी वक़्त दरवाज़े पर एक हल्की सी दस्तक हुई, और कायरा, काका का हाथ छुड़ा कर, बिना इजाज़त लिए अंदर आ गई।

"आप लोग इतने परेशान क्यों हैं? पापा ने हाँ कहा, मम्मा ने भी हाँ कहा।" "बस इतना ही तो होना था।"

कमरे में एक पल को कोई कुछ नहीं बोला, क्योंकि कायरा की बात में कोई ग़लती नहीं थी, सिर्फ़ यही सच अदालत की भाषा में इतना आसान कभी नहीं लगता।

"काश अदालतें भी छह साल की उम्र में सोचना सीख लें, बेटा।"

अदालत दोबारा जुटी, और जज ने अफ़ताब की गुज़ारिश मान ली, टाइमलाइन के सुबूत जोड़ने के लिए एक हफ़्ते की मोहलत दे दी। पर जज ने ये भी कहा कि अंतिम फ़ैसले से पहले, देवयानी को अपनी नातिन से एक आख़िरी नियंत्रित मुलाक़ात का हक़ है, अदालत परिसर के भीतर ही, एक कोर्ट अधिकारी की निगरानी में, ठीक दस मिनट के लिए।

सुनवाई ख़त्म होने के इंतज़ार में कायरा और पिहू काका के पास गलियारे की बेंच पर बैठी बतिया रही थीं। पिहू ने कायरा के कान में फुसफुसाया, "दीदी, नानी से मिलने के बाद हम आइसक्रीम खाएंगे ना?", और कायरा ने सिर हिला कर उसकी उंगलियाँ थाम लीं, ठीक वैसे जैसे वो हर बार थामती थी।

"सिर्फ़ दस मिनट, मेरी जान। पापा यहीं गलियारे में रहेंगे, ठीक बाहर।"

"जाओ, मेरी जान। लौट कर मुझे वो कहानी सुनाना जो नानी बताएंगी, ठीक है?"

कोर्ट का गलियारा उस दोपहर एक हलचल भरे मेले जैसा हो गया था, वकील, फ़ाइलें, चाय के कप, और उसी भीड़ के बीच पिहू को उसकी नानी के पास, तयशुदा दस मिनट के लिए, अधिकारी के साथ ले जाया गया।

गलियारे के एक कोने में देवेंद्र अब भी चुपचाप बैठे थे, वही भारी बैग गोद में लिए, अपने परिवार को आख़िरकार साथ हँसते देख कर उनकी आँखों में राहत और डर दोनों एक साथ तैर आए।

देवयानी घुटनों के बल पिहू के सामने बैठी, चेहरे पर वही पुरानी मुलायमियत ओढ़े, पर उसकी आँखें कमरे के हर दरवाज़े को नाप रही थीं, हर उस पल को गिन रही थीं जो अधिकारी का ध्यान कहीं और भटका दे।

उसने पहले पिहू के बाल सहलाए, उसकी फ्रॉक की तारीफ़ की, उसे उसकी माँ मेहर की एक पुरानी, प्यारी याद सुनाई, ठीक उतनी देर तक जितनी देर में अधिकारी की चौकसी थोड़ी ढीली पड़ जाए।

उसने अधिकारी से एक गिलास पानी माँगा, फिर अपने फ़ोन पर एक ज़रूरी कॉल का बहाना बनाया, और उसी एक मिनट की, बिल्कुल मामूली-सी खाली जगह में, पिहू के कान में फुसफुसाया, "चलो बेटा, नानी के साथ थोड़ा घूम आएं, कोई नहीं देखेगा," और उसका हाथ थाम कर भीड़ की तरफ़, गलियारे के एक मोड़ की तरफ़ चुपचाप खींच लिया।

ठीक दस मिनट बाद जब नैना पिहू को वापस लेने गलियारे में पहुँची, वहाँ अधिकारी अकेला खड़ा था, एक गिलास पानी हाथ में लिए, उलझा हुआ, और देवयानी की कुर्सी ख़ाली थी।

"पिहू?" "पिहू, कहाँ हो तुम?"

भीड़ छँटने लगी थी, वकील अपने कमरों में लौट रहे थे, और हर आवाज़ जो अभी तक शोर थी, अब एक-एक कर ख़ामोश होती जा रही थी।

"पिहू! जवाब दो, बेटा!"

विहान अपने कमरे से भागता हुआ आया, उसका चेहरा नैना की आवाज़ की सिर्फ़ एक झलक से ही सफ़ेद पड़ चुका था।

"क्या हुआ, नैना? पिहू कहाँ है?"

"पता नहीं, विहान। अधिकारी अकेला खड़ा था, देवयानी की कुर्सी ख़ाली थी, और पिहू..." "पिहू कहीं नहीं है।"

विहान एक तरफ़ भागा, गार्ड के केबिन और लिफ़्ट की तरफ़, और नैना दूसरी तरफ़, उन सीढ़ियों की तरफ़ जो पार्किंग तक जाती थीं, दोनों एक ही नाम पुकारते हुए, अलग-अलग दिशाओं में, अपनी-अपनी उम्मीद के सहारे।

अफ़ताब ने गलियारे के सुरक्षा गार्ड को इशारा कर के गेट बंद करवाने को कहा, उसकी आवाज़ में अब क़ानूनी सफ़ाई नहीं, सिर्फ़ एक डरा हुआ आदमी की फुर्ती थी।

गैलरी के पास बेंच पर बैठी कायरा की आँखें अचानक चौड़ी हो गईं, जैसे उसने कुछ देखा हो जो किसी और ने नहीं देखा, पर उसकी आवाज़ भागते वकीलों और चीखते नामों के शोर में दब गई, इससे पहले कि वो कुछ कह पाती।

"पिहू! बेटा, प्लीज़, जवाब दो!"

उसने एक बंद दरवाज़ा धकेला, फिर दूसरा, दोनों ख़ाली, फ़ाइलों और कुर्सियों के सिवा वहाँ कुछ नहीं था, और हर ख़ाली कमरे के साथ उसका दिल थोड़ा और डूब गया।

कोई जवाब नहीं आया। सिर्फ़ नैना की अपनी आवाज़ गलियारे की दीवारों से टकरा कर लौट आई, और उसके पीछे एक ख़ालीपन जो उसने इससे पहले कभी इतना गहरा महसूस नहीं किया था।

दूसरी तरफ़ से ख़ाली हाथ लौटा विहान ठीक उसी पल उसके बराबर आ पहुँचा, साँस फूली हुई, और उसकी आँखें भी उसी दिशा की तरफ़ घूम गईं जिस तरफ़ नैना का पूरा शरीर जम चुका था।

और ठीक तभी, कहीं दूर, किसी बंद दरवाज़े के पीछे से, या शायद किसी खुली खिड़की के उस पार से, पिहू के म्यूज़िक बॉक्स की वो नन्ही, टिमटिमाती धुन बजने लगी।

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