अध्याय 8 / 28
शीशे का घर
कागज़ी कसमें द्वारा Avni Oberoi
उस अधूरे सवाल वाली रात के बाद शीशे का ठंडा घर चुपके-चुपके एक घर बनने लगा है, जहाँ नैना और विहान एक ही बात चाहने और एक-दूसरे से छुपाने लगे हैं, कि काश ये सब काग़ज़ी न होता। एक मानसून की रात तूफ़ान और बिजली का जाना दोनों को एक अकेली मोमबत्ती की लौ में आमने-सामने ला खड़ा करता है, जहाँ नियम नंबर एक टूटने को होता है, नैना ध्रुव के छोड़ जाने का ज़ख़्म खोलती है और विहान पहली बार मेहर के उस बंद ख़त का ज़िक्र करता है जो उसे पीछे खींच लेता है। उधर दो नन्ही जासूस काका की शह पर नैना की चीज़ें चुपके से विहान के कमरे में सजा देती हैं। और गहरी रात, नींद न आने पर बैठक-घर पार करती नैना को ताक़ पर रखी पुरानी घड
उस शाम बेंगलुरु के आसमान पर बादल किसी पुराने ग़ुस्से की तरह घिर आए थे, और शीशे के घर की ऊँची दीवारों पर पहली बूँदें यूँ गिरीं, जैसे कोई बाहर से अंदर झाँकना चाहता हो। नैना उस लॉन से लौटी थी, पर ध्रुव का वो सवाल अब भी उसके गले में एक काँटे की तरह अटका था... 'क्या तुम सच में उससे प्यार करती हो?'
पर उस बंद, ठंडे शीशे के घर में पिछले कुछ हफ़्तों में चुपके से कुछ बदल गया था। अब वहाँ रोटी की ख़ुशबू थी, बच्चों की खिलखिलाहट थी, और एक मेज़ थी जिस पर चार थालियाँ लगती थीं। उसी घर में दो बड़े थे, जो एक ही बात चाहने लगे थे और एक-दूसरे से छुपाए बैठे थे... कि काश ये सब काग़ज़ी न होता। पर दोनों में से किसी को नहीं पता था कि आज उनकी हर साँस पर किसी की नज़र थी।
खाने की मेज़ पर काका गरम फुलके परोस रहे थे, और कायरा और पिहू सिर जोड़े कुछ खुसुर-पुसुर कर रही थीं, जिसमें बीच-बीच में 'मम्मा' और 'पापा' के नाम उलझे हुए थे। तभी बाहर बिजली कड़की और पूरा घर एक पल के लिए नीली चमक में नहा गया।
"पिहू, चुप। इतनी ज़ोर से मत बोल।" "मम्मा और पापा आज एक ही मेज़ पर बैठे हैं ना, बस इतना काफ़ी है। हमारी योजना धीरे-धीरे चलेगी।" "मम्मा, बाहर तूफ़ान आ रहा है। तूफ़ान में तो सब लोग एक ही कमरे में सोते हैं ना? डर के मारे?"
"हाँ हाँ! एक ही कमरे में! मैं और कायरा दीदी तो एक ही कमरे में सोएँगे!" "और मम्मा-पापा भी एक कमरे में सो जाएँ ना, तो पापा को डर नहीं लगेगा। पापा रात में अकेले बहुत उदास लगते हैं।"
"पिहू, बेटा... चुपचाप खाना खाओ।" "तूफ़ान में कोई नहीं डरता, हमारा घर बहुत मज़बूत है। और तुम दोनों शैतान, फुसफुसाना बंद करो, वरना काका की खीर आज किसी को नहीं मिलेगी।" 'पापा रात में अकेले उदास लगते हैं...' नैना ने चोरी से उस ख़ाली कुर्सी की तरफ़ देखा।
तभी दरवाज़ा खुला और विहान अंदर आया, कंधों पर बारिश की बूँदें, चेहरे पर दिन भर की थकान। अनाइशा के वो लफ़्ज़ अब भी उसके कानों में गूँज रहे थे... 'जो घर काग़ज़ पर बनते हैं, वो लंबे नहीं चलते।' पर सामने जो था, वो किसी काग़ज़ जैसा नहीं लगता था। एक गरम रसोई, दो हँसती बच्चियाँ, और एक औरत जो उसके ठंडे घर को घर बना रही थी।
"पिहू, धीरे... पूरी भीग जाओगी।" "हाँ, आज जल्दी आ गया। तूफ़ान की वजह से।" "नैना। तुम... तुम लौट आईं। मुझे लगा शायद आज देर हो जाए।"
"नहीं... आज जल्दी निकल आई। वहाँ मन नहीं लगा।" "घर की याद आ रही थी।" "मतलब... बच्चियों की। कायरा तूफ़ान में घबरा जाती है।"
खाने के बाद, जब बड़े बरामदे में खड़े बारिश देख रहे थे, कायरा और पिहू ने एक-दूसरे को वो नज़र दी, जो सिर्फ़ साज़िशकर्ता एक-दूसरे को देते हैं। उनकी गुप्त कसम का अगला क़दम आज की रात था, और उनका सबसे भरोसेमंद साथी, बूढ़ा काका, इस मुहिम में उनके साथ खड़ा था।
"पिहू, प्लान याद है ना? मम्मा का शॉल, उनकी किताब, और वो छोटी वाली फ़ोटो... सब पापा के कमरे में रखनी है।" "जब मम्मा की चीज़ें पापा के कमरे में होंगी, तो मम्मा को वहाँ जाना ही पड़ेगा। यही तो हमारी असली चाल है।"
"मैंने मम्मा का शॉल ले लिया! ये कितना नरम है, कायरा दीदी।" "पर अगर मम्मा ने देख लिया तो? वो डाँटेंगी ना!" "काका, आप पहरा देना! मम्मा आए तो ज़ोर से खाँस देना!"
"हे भगवान, बुढ़ापे में ये घर मुझसे चोरियाँ करवाएगा।" "अच्छा जाओ, जल्दी करो, मेरी नन्ही देवियों। पकड़ी गईं तो काका को कुछ नहीं पता, समझीं?" "बरसों बाद इस घर में कोई शरारत हो रही है। मेहर बिटिया आज होती, तो वो भी तुम दोनों के साथ ही होती।"
और दोनों नन्ही जासूस दबे पाँव विहान के कमरे में घुस गईं, उस कमरे में जो मेहर के जाने के बाद किसी संग्रहालय जैसा ठंडा और तरतीब में पड़ा था। उन्होंने नैना का शॉल कुर्सी पर डाल दिया, किताब सिरहाने रख दी, और चप्पलें बिस्तर के पास यूँ सजा दीं, जैसे वो हमेशा से वहीं रहती हों। फिर दोनों बहनें अपनी कसम का काग़ज़ तकिये के नीचे दबाए, एक ही रज़ाई में दुबक कर सो गईं।
और बाहर, आसमान आख़िरकार पूरी तरह फट पड़ा। बारिश ने शीशे के घर को चारों तरफ़ से घेर लिया। और तभी, एक गहरी गड़गड़ाहट के साथ, पूरे घर की बिजली चली गई। वो जगमगाता शीशे का घर एक पल में अँधेरे में डूब गया, और बाहर बिजली की चमक ही उसकी इकलौती रोशनी रह गई।
"काका? बच्चियाँ ठीक हैं?" "कोई घबराना मत। मोमबत्तियाँ रसोई की दराज़ में हैं, मैं देखती हूँ।" "शहर की सबसे बड़ी वेडिंग प्लानर, और अपने ही घर में अँधेरे में टकरा रही है।"
"रुको... मैं यहीं हूँ।" "बच्चियाँ गहरी नींद में हैं, मैं देख आया। काका भी अपने कमरे में सो गए।" "जनरेटर तूफ़ान में बंद है। सुबह तक बस यही एक मोमबत्ती है। और... हम दोनों।"
एक मोमबत्ती की काँपती लौ में वो दोनों उस बड़े बैठक-घर में आमने-सामने बैठ गए, बीच में वही एक इंच, जो अब बर्फ़ नहीं, आग थी। बाहर बारिश हर शीशे पर थपकी दे रही थी, और उस अँधेरे में देखने को सिर्फ़ एक-दूसरे का चेहरा बचा था। और दोनों वही एक बात सोच रहे थे, जिसे नियम नंबर एक ने मना किया था।
"विहान... एक बात पूछूँ?" "जब आपने मुझे ये सौदा दिया था, तब आपको डर नहीं लगा? एक अजनबी को अपने घर में, अपनी बेटी के इतने पास ले आने में?" "मुझे तो हमेशा लगता था कि जो सबसे अपना होता है, वही सबसे पहले हाथ छोड़ता है। ध्रुव ने यही सिखाया था मुझे।"
"जिस साल रोशनी अकेली थी, कायरा गोद में नन्ही सी थी, और मुझे सबसे ज़्यादा किसी के रुकने की ज़रूरत थी... उसी साल ध्रुव ने कहा कि वो किसी और के बच्चे का बोझ नहीं उठा सकता, और चला गया।" "उसी रात मैंने तय कर लिया कि अब किसी के रुकने की उम्मीद नहीं रखूँगी। पर आप... आप एक अजनबी की भांजी के लिए रुक गए, विहान। मैंने माँगा भी नहीं था।"
"मैं रुका नहीं, नैना। मैं तो ख़ुद बरसों से एक बंद दरवाज़े के पीछे खड़ा हूँ।" "मेरी अलमारी में एक ख़त पड़ा है। मेहर का आख़िरी ख़त। पूरे एक साल से बंद, मुहर सलामत। मैं उसे खोल नहीं पाता।" "क्योंकि मुझे डर है कि उसमें लिखा हो, सब कुछ मेरी वजह से हुआ। तुम मुझे रुका हुआ कहती हो... सच तो ये है कि मैं आज भी वहीं फँसा हूँ, उसी रात, जिस रात वो चली गई।"
"विहान..." "आपने वो ख़त इसलिए नहीं खोला क्योंकि आप डरपोक हैं। आपने इसलिए नहीं खोला क्योंकि आप उसे इतना प्यार करते थे कि उसका आख़िरी लफ़्ज़ खोने से डरते हैं।" "जो आदमी इतना गहरा महसूस कर सकता है, वो पत्थर नहीं होता, विहान।"
और उस काँपती लौ में दोनों के चेहरे धीरे-धीरे पास आते गए। नियम नंबर एक, जो अब तक एक काँच की दीवार था, उस अँधेरे में चटकने ही वाला था। नैना की साँस विहान की साँस से जा टकराई, और एक पल के लिए वो पूरा घर, वो पूरा तूफ़ान, वो पूरे एक साल का सन्नाटा... बस उस एक इंच में सिमट आया।
"नहीं... रुको। मुझे... मुझे माफ़ करना।" "मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। अभी नहीं। जब तक मैं वो ख़त नहीं खोल लेता, तब तक मैं तुम्हारे साथ इंसाफ़ नहीं कर सकता।" "तुम्हें एक अधूरे आदमी का आधा हिस्सा देना, ये तुम्हारे साथ धोखा होगा।"
"कोई बात नहीं, विहान। मैं समझती हूँ।" "आपका ख़त, आपकी मेहर... वो आपकी हैं। मैं उनकी जगह नहीं लेना चाहती।" "शुभ रात्रि। और डरिए मत। सुबह हो ही जाएगी। सुबह हमेशा हो जाती है।"
विहान अकेला होने अपने कमरे में गया, पर वो कमरा आज अकेला नहीं था। कुर्सी पर नैना का शॉल पड़ा था, सिरहाने उसकी किताब, बिस्तर के पास उसकी चप्पलें, जैसे वो बरसों से यहीं रहती हो। उस भारी रात में भी विहान के होंठों पर एक थकी हुई मुस्कान तैर गई। उसने उस शॉल को उठाया नहीं, हटाया नहीं। बस उसे वहीं रहने दिया, अपने सूने कमरे में एक नन्ही सी गर्माहट की तरह।
रात का पिछला पहर। बारिश अब थम कर बस बूँद-बूँद टपक रही थी, और नैना की आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। उसके भीतर सब कुछ उलझा हुआ था... वो अधूरा लम्हा, विहान का वो बंद ख़त, और ध्रुव का वो सवाल जो अब भी बिन जवाब लटका था। प्यास लगी तो वो उठी, और उस ख़ामोश, अँधेरे बैठक-घर को धीरे-धीरे पार करने लगी।
"तुझे क्या हो गया है, नैना?" "ये काग़ज़ की शादी है। सिर्फ़ एक साल की। इसके बाद वो काग़ज़ ख़ुद फट जाएगा, ऐसा ही तो तय हुआ था।" "फिर तेरा दिल इस घर में इतनी गहरी जड़ें क्यों जमा रहा है? इतनी जल्दी, इतनी चुपके से?"
बैठक-घर के बीचोंबीच, ताक़ पर रखी वो पुरानी घड़ी टिक-टिक कर रही थी, वही घड़ी जो मेहर के ज़माने से इसी घर में थी। नैना एक पल के लिए उसके सामने ठिठक गई। और तभी, उस टिक-टिक के नीचे, एक और आवाज़ उभरी... एक बहुत ही बारीक, बिजली जैसी 'क्लिक'।
नैना के रोंगटे खड़े हो गए। घड़ियाँ ऐसी आवाज़ नहीं करतीं। उसने झुककर उस घड़ी के चेहरे की तरफ़ देखा, और उसके सीने में साँस जहाँ थी वहीं रुक गई। घड़ी के अंकों के ठीक पीछे, गहरे अँधेरे में, एक सुई की नोक जितनी नन्ही लाल रोशनी... टिमटिमा रही थी। जल रही थी, बुझ रही थी, फिर जल रही थी।
"ये... ये क्या है?" "एक... एक कैमरा।" "इस घड़ी में एक कैमरा छुपा है। इस घर में... कोई हमें देख रहा है। हर वक़्त।"
और उस एक पल में, वो पूरा घर, जो अभी-अभी एक घर बनने लगा था, फिर से शीशे का हो गया, हर दीवार पारदर्शी, हर कोना उघड़ा हुआ। मोमबत्ती की वो लौ, वो अधूरा लम्हा, विहान का मेहर के ख़त का ज़िक्र, बच्चियों की खिलखिलाहट... सब कुछ किसी की आँख के सामने से गुज़र चुका था। जिस नज़दीकी को देवयानी सोने से क़ीमती समझती थी, वो अब सिर्फ़ किसी लॉन में खींची एक तस्वीर नहीं थी। वो एक जीती-जागती आँख थी, इसी घर की दीवार के भीतर।
नैना उस टिमटिमाती लाल आँख के सामने जड़ हो कर खड़ी रह गई, उसकी अपनी साँस अब उसके कानों में किसी तूफ़ान की तरह गूँज रही थी। और उस ख़ामोश घर में, वो नन्ही 'क्लिक' की आवाज़ बार-बार होती रही... क्लिक... क्लिक... क्लिक। शीशे का घर, जिसे वो अपना समझने लगी थी, शुरू से ही उन्हें चुपचाप वापस देख रहा था।
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