Chapter 2 of 28
शर्तों की शादी
विहान का वकील अफ़ताब एक-एक शर्त फ़ैसले की तरह पढ़ता है, अलग कमरे, कोई भावना नहीं, दुनिया के सामने प्रेम का दिखावा, एक साफ़ साल, फिर ख़ामोश तलाक़, और कायरा की लड़ाई के लिए पैसा, और नैना अपनी एक शर्त जोड़ती है, कि बच्चियों के लिए ये घर कभी झूठा न लगे। शहर की सबसे नामी वेडिंग प्लानर की अपनी शादी पाँच मिनट के एक सरकारी दस्तख़त में निपट जाती है, और जब दो टूटे परिवार विहान के ठंडे शीशे के घर में पहली रात बिताने बैठते हैं, तभी गेट की घंटी बजती है और देवयानी बिना बताए नई बहू को परखने अंदर चली आती है।
"धारा चार। पति और पत्नी एक ही घर में, लेकिन अलग-अलग कमरों में रहेंगे। किसी भी हालत में इस शर्त में ढील नहीं दी जाएगी।"
चालीसवीं मंज़िल, शीशे की दीवारें, और उनके पार धुंध में डूबा पूरा बेंगलुरु। उस फ़ोन पर कही गई 'हाँ' को तीन दिन बीत चुके थे। और अब विहान का वकील, अफ़ताब, एक फ़ाइल यूँ पढ़ रहा था जैसे कोई जज फ़ैसला सुनाता है।
"सात साल में मैंने सैकड़ों शादियाँ सजाई हैं, मिस्टर अफ़ताब। पर आज तक किसी दूल्हे ने मुझे 'धारा चार' पढ़ कर नहीं सुनाई।"
"ये शादी नहीं है, मिस नैना। ये एक अनुबंध है। और अच्छे अनुबंध की एक ही ख़ूबी होती है, उसमें कुछ भी अनकहा नहीं छोड़ा जाता। धारा पाँच।"
"पति और पत्नी के बीच कोई भावनात्मक संबंध नहीं होगा। न कोई दावा, न कोई उम्मीद, न कोई हक़। ये रिश्ता शुरू से आख़िर तक पूरी तरह काग़ज़ी रहेगा।"
काग़ज़ी। नैना ने मन ही मन वो लफ़्ज़ चखा। काग़ज़ तो उसकी सारी उम्र का काम था, दूसरों की कसमें सुनहरे काग़ज़ों पर छपवाना। पर अपनी कसम का काग़ज़ इतना ठंडा होगा, ये उसने नहीं सोचा था।
"धारा छह। बाहर, दुनिया के सामने, आप दोनों एक प्रेम-विवाह का दिखावा करेंगे। एक ऐसा जोड़ा जो अपनी मर्ज़ी से, ख़ुशी से साथ आया हो। पड़ोसी, रिश्तेदार, और सबसे ज़रूरी, अदालत का जज, सबको यही दिखना चाहिए।"
"यानी मुझे एक ऐसे प्यार का मंचन करना है जो है ही नहीं।" "मज़ेदार बात बताऊँ, मिस्टर अफ़ताब? यही तो मेरा पेशा है। मैं सात साल से लोगों को यही सिखाती आई हूँ, प्यार में होने का दिखावा कैसे किया जाता है।"
"तो शायद ये अकेली शर्त है जिसमें आपको कोई मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।"
नैना की नज़र मेज़ के उस पार उठी। विहान खिड़की के पास, शहर की तरफ़ पीठ किए खड़ा था, वैसी ही बेदाग़ ठंडक ओढ़े जैसी उस रात संगीत में थी। जैसे उसकी अपनी शादी की शर्तें उसे छू ही न रही हों।
"धारा सात। ये अनुबंध ठीक एक साल का है। साल पूरा होते ही, एक ख़ामोश तलाक़। न शोर, न सफ़ाई, न किसी को कोई हिसाब। दोनों अपने-अपने रास्ते।"
तलाक़। एक ऐसी शादी जिसकी मौत की तारीख़ उसके जन्म से पहले ही तय थी।
"और आख़िरी शर्त। धारा आठ। दस्तख़त होते ही, एक तय रक़म आपके नाम कर दी जाएगी। कायरा की कस्टडी की क़ानूनी लड़ाई के लिए। एक अच्छा वकील, एक बेहतर अदालत।"
और उस एक लफ़्ज़ पर, कायरा, नैना की पीठ अकड़ गई। उसकी बहन की आख़िरी निशानी का नाम, एक अनुबंध की आख़िरी धारा बन कर मेज़ पर पड़ा था। एक क़ीमत। एक सौदा।
"रुकिए।" "आपने अपनी सारी शर्तें पढ़ लीं। अब एक शर्त मेरी।"
"बच्चियाँ। कायरा और पिहू। उन्हें कभी, किसी भी हाल में, ये पता नहीं चलेगा कि ये शादी झूठी है। उनके लिए ये घर सच्चा होगा। और मेरी कायरा इस घर में मेहमान बन कर नहीं रहेगी। वो इस घर की होगी। ठीक वैसे, जैसे पिहू है।"
"लिख लीजिए। धारा नौ। बच्चियों से जुड़ी हर बात में, ये शादी सच्ची है।"
अफ़ताब की क़लम एक पल को हवा में रुकी। बरसों से सिर्फ़ ठंडी धाराएँ लिखने वाला वकील, पहली बार एक ऐसी शर्त लिख रहा था जिसमें दिल की बू थी। उसने नैना को एक अजीब नज़र से देखा, फिर लिख दिया।
"और एक बात। पिहू। मैं उससे प्यार करूँगी। ये आपके किसी काग़ज़ में लिखा हो या न हो। अगर वो बच्ची मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाएगी, तो मैं आपकी धारा पाँच देख कर पीछे नहीं हटूँगी।"
"पिहू को एक माँ की ज़रूरत नहीं है, मिस नैना। उसे एक स्थिर घर चाहिए। एक पूरा दिखने वाला घर। बस इतना ही।"
"ये आप ख़ुद को समझा रहे हैं... या मुझे?"
विहान ने जवाब नहीं दिया। और उसकी वो ख़ामोशी, उस पूरे ठंडे काँच के कमरे में, शायद पहली सच्ची बात थी।
"तो... अगर दोनों पक्ष सहमत हैं, तो कृपया यहाँ, यहाँ, और यहाँ।"
पहले विहान ने बिना काँपे दस्तख़त किए। फिर क़लम नैना की तरफ़ बढ़ी, और उसे वो सारी दुल्हनें याद आईं जिन्हें उसने काँपते हाथों से अपना नाम लिखते देखा था।
"कायरा के लिए।"
क़लम काग़ज़ पर चली। एक लकीर, और कागज़ी कसमें अपनी पहली सच्ची स्याही पा गईं।
एक हफ़्ते बाद। सब-रजिस्ट्रार का सरकारी दफ़्तर, भिनभिनाती ट्यूब-लाइट, प्लास्टिक की टूटी कुर्सियाँ, और पुरानी फ़ाइलों की सीली गंध। बेंगलुरु की सबसे नामी वेडिंग प्लानर आज अपनी ही शादी के लिए एक सरकारी लाइन में लगी थी। टोकन नंबर सैंतालीस।
"नैना। नैना, इधर देख मेरी तरफ़। ये... ये कोई शादी है? यहाँ न मंडप है, न बैंड, न फूल, न पंडित। यहाँ तो लोग ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने आते हैं!"
"और मैरिज सर्टिफ़िकेट भी, सिम्मी। दोनों एक ही खिड़की से मिलते हैं। खिड़की नंबर तीन।"
"तू मज़ाक कर रही है और मेरा दिल बैठा जा रहा है। सात साल! सात साल से मैं तुझे सुन रही हूँ, 'सिम्मी, शादी एक ख़ूबसूरत झूठ है, मैं ये कभी नहीं करूँगी।' और आज तू एक अजनबी करोड़पति से... एक टोकन नंबर पर शादी कर रही है!"
"तो झूठ ही सही, सिम्मी। पर ये झूठ कम से कम कायरा को मुझसे नहीं छीनेगा। बाक़ी सब बाद में देखा जाएगा।"
और सिम्मी, जो पूरे रास्ते बड़बड़ाती आई थी, एक पल को चुप हो गई। 'कायरा' के आगे उसके पास भी कोई दलील नहीं थी। उसने चुपचाप नैना का हाथ थाम लिया।
"ठीक है। पर मैं तेरी गवाह हूँ, और गवाही में लिखवा दे रही हूँ, ये इस शहर की सबसे बेरंग शादी है। हम एक ढंग की सेल्फ़ी तक नहीं ले सकते इसमें।"
तभी काँच का दरवाज़ा खुला। विहान अंदर आया, ठीक वक़्त पर, हाथ में एक पतली फ़ाइल। जैसे किसी बोर्ड मीटिंग में आया हो, न कि अपनी शादी में।
"हे भगवान। ये तो अपनी शादी में भी ऐसे आया है जैसे कोई ऑडिट करने आया हो।"
"श्श्श, सिम्मी।"
खिड़की के पीछे बैठे रजिस्ट्रार ने, बिना नज़र उठाए, एक रटा-रटाया सवाल दागा, क्या दोनों पक्ष अपनी मर्ज़ी से, बिना किसी दबाव के, ये विवाह कर रहे हैं। एक पल की ख़ामोशी। और दोनों जानते थे कि उस कमरे में इससे बड़ा झूठ और कोई नहीं।
"जी। अपनी मर्ज़ी से।"
"जी।"
रजिस्ट्रार ने एक मोटा रजिस्टर घुमाया। इस बार विहान ने क़लम ख़ुद नैना की तरफ़ बढ़ाई, और उनकी उँगलियाँ एक पल को छू गईं, उस ठंडी हवा में एक अचानक, अनचाही गर्मी। दोनों ने महसूस किया, और दोनों ने अनदेखा कर दिया।
नैना ने झुक कर दस्तख़त किए, और उस एक लकीर के साथ वो क़ानूनन विहान की पत्नी बन गई। कुल वक़्त, पाँच मिनट। न कोई मंत्र, न अग्नि, न कोई ऐसी कसम जिसे वो झूठ मानती।
"मुबारक हो, कमबख़्त। दुनिया की सबसे बेतुकी शादी की सबसे बेतुकी गवाह बनने का मेरा शौक़ आज पूरा हुआ।"
नैना हँस दी। पर सिम्मी की जफ़्फ़ी में एक पल को उसकी आँखें भर आईं। हज़ारों दुल्हनों को उसने अपने हाथों से विदा किया था। और आज उसकी अपनी विदाई में सिर्फ़ एक टेढ़ा कैलेंडर और एक सरकारी मोहर थी।
"गाड़ी नीचे खड़ी है। कायरा का सामान शाम तक घर पहुँच जाएगा। आपको जो भी अपने साथ रखना हो, काका को बता दीजिएगा।"
"शुक्रिया, मिस्टर शर्मा।" "या अब मुझे आपको सिर्फ़ 'जी' कहना चाहिए? आख़िर आप मेरे पति परमेश्वर जो ठहरे।"
और एक पल के लिए, बस एक ही पल के लिए, विहान के होंठ का एक कोना हल्का सा हिला। हँसी नहीं, हँसी की सिर्फ़ एक परछाई। फिर वो भी बुझ गई।
"विहान ठीक है।"
शाम ढल रही थी जब गाड़ी ऊँचे लोहे के गेट से अंदर मुड़ी। काँच और स्टील का एक तीन-मंज़िला घर, ठंडा, बेदाग़, और इतना ख़ामोश कि यहाँ ज़ोर से साँस लेना भी नियम के ख़िलाफ़ लगता था। इतना अमीर, और इतना उदास।
उसके बग़ल में कायरा एक छोटे से बैग को सीने से चिपकाए बैठी थी, बिल्कुल चुप, बड़ी आँखों से उस विशाल घर को नापती हुई। उसने नैना की बाँह खींच कर बहुत धीरे से पूछा, क्या इतने बड़े घर में वो दोनों कहीं खो नहीं जाएँगी।
"नहीं, जान। जहाँ मैं हूँ, वहीं तुम्हारा घर है। चाहे वो एक कमरा हो... या ये पूरा शीशे का महल।"
दरवाज़ा एक बुज़ुर्ग आदमी ने खोला, झुकी कमर, सफ़ेद बाल, और आँखों में एक ऐसी नरमी जो उस पूरे पत्थर के घर में शायद अकेली गर्म चीज़ थी। काका, इस घर का पुराना रसोइया, जिसने मेहर के जाने से पहले भी इसी घर को खाना खिलाया था।
काका ने कायरा को देखा, और उसकी झुर्रियों वाली शक्ल खिल उठी। उसने कहा कि इस घर में बहुत दिनों बाद कोई नन्ही मेहमान आई है, और आज रात वो अपनी सबसे ख़ास खीर बनाएगा।
"चलिए, घर दिखा देता हूँ। नाश्ता ठीक सात बजे। पिहू आठ बजे स्कूल के लिए निकलती है। ये आपका कमरा, दूसरी मंज़िल पर, पूरब की तरफ़। मेरा कमरा गलियारे के बिल्कुल दूसरे सिरे पर है।"
गलियारे के बिल्कुल दूसरे सिरे पर। धारा चार, अब दीवारों में ढल कर सामने खड़ी थी। अलग कमरे, इतने दूर कि रात के अँधेरे में एक-दूसरे की परछाई तक न पड़े।
"काका खाना बनाते हैं, घर सँभालते हैं। एक ड्राइवर है, एक माली है। आपको किसी काम की ज़रूरत नहीं। आप बस... यहाँ रहिए। और जब कोई देख रहा हो, तो एक ख़ुश बीवी की तरह रहिए।"
"आपने घर के नियम... सच में प्रिंट करवा रखे हैं?" "मिस्टर विहान, मैंने अपनी शादी के लिए भी इतना बढ़िया शेड्यूल नहीं बनाया, जितना आपने रोज़ के नाश्ते के लिए बना रखा है।"
"नियम चीज़ों को आसान रखते हैं। जहाँ भावनाएँ नहीं होतीं, वहाँ ग़लतफ़हमियाँ भी नहीं होतीं।"
"या फिर वहाँ कुछ भी नहीं होता। कभी-कभी वो दोनों एक ही बात होती है, मिस्टर विहान।"
और तभी, सीढ़ियों के ऊपर से, एक नन्ही परछाई झाँकी। पिहू। लकड़ी की रेलिंग की सलाखों के बीच से, दो बड़ी-बड़ी आँखें उस नई लड़की पर टिकी थीं, जो एक बैग सीने से चिपकाए खड़ी थी।
और नीचे, कायरा ने ऊपर देखा। दो बच्चियाँ, एक छह की, एक पाँच की, उस विशाल ठंडे कमरे के आर-पार एक-दूसरे को चुपचाप देखती रहीं। किसी ने एक भी लफ़्ज़ नहीं कहा। पर कुछ, बहुत चुपके से, उसी पल तय हो गया।
उधर रसोई में, काका ने बहुत दिनों बाद मेज़ पर चार थालियाँ लगाईं। इस घर ने पूरे एक साल से चार थालियाँ नहीं देखी थीं। एक साल से यहाँ कोई खुल कर हँसा नहीं था।
पर उस रात, अपने नए ठंडे कमरे की खिड़की से बाहर जगमगाते शहर को देखती हुई, नैना एक बात नहीं समझ पा रही थी। अगर ये सब सिर्फ़ काग़ज़ था, तो उसकी उँगलियों पर उस एक पल की गर्मी अब तक क्यों टिकी थी, जब विहान की उँगलियाँ उसे छू गई थीं?
रात का पहला पहर। खिड़कियों के पार शहर जगमगा रहा था, और अंदर एक नाज़ुक शांति पसरी थी। नैना कायरा को सुला चुकी थी, और नीचे स्टडी में विहान लैपटॉप खोले बैठा था, जैसे उस दिन उसकी ज़िंदगी में कुछ बदला ही न हो।
और तभी, उस नाज़ुक सुकून को चीरती हुई, गेट की घंटी बजी। एक बार। फिर, बिना रुके, दूसरी बार। एक ऐसी घंटी जो इजाज़त नहीं माँगती। जो सिर्फ़ हुक्म देती है।
स्टडी में विहान का हाथ लैपटॉप पर आ कर रुक गया। रात के नौ बज रहे थे। इस वक़्त, बिना कोई ख़बर दिए, इस घर में सिर्फ़ एक ही इंसान बेधड़क आ सकता था।
इंटरकॉम पर काका की घबराई हुई आवाज़ आई। गेट पर देवयानी जी खड़ी थीं, और उनका ड्राइवर पीछे से सामान उतार रहा था, जैसे वो कुछ दिन रुकने के इरादे से आई हों।
"अभी? वो अभी नहीं आ सकतीं। किसी ने... किसी ने उन्हें बता दिया।"
और नैना, रसोई के दरवाज़े पर खड़ी, समझ गई। संगीत की उस रात, 'नानी' लफ़्ज़ सुनते ही एक बच्ची का हाथ जो उसकी उँगली पर कस गया था, ये वही नानी थी। पिहू की नानी। और अब, काग़ज़ों पर, नैना की सास।
नैना कुछ पूछती, इससे पहले ही घर का भारी दरवाज़ा खुला। ठंडी रात की हवा के साथ एक ख़ुशबू अंदर आई, महँगी, तीखी, और किसी भूली हुई याद की तरह चुभती हुई।
और फिर वो अंदर आई। देवयानी। एक बेदाग़ रेशमी साड़ी में, गले में वही मोती, हर क़दम नापा-तुला। उसने एक ही नज़र में पूरा कमरा पढ़ लिया, और फिर उसकी नज़र सीधे नैना पर आ कर ठहर गई।
"मैंने सुना, विहान, कि तुमने शादी कर ली।" "तीन दिन में सारा शहर जान गया। और मुझे, पिहू की अपनी सगी नानी को, किसी ने बताना तक ज़रूरी नहीं समझा।"
और नैना की रीढ़ में एक सर्द लहर दौड़ गई। उसने वो लफ़्ज़ नहीं सुने थे जो कुछ रातें पहले एक फ़ोन पर कहे गए थे। पर इस औरत की आँखों में ठीक वही चीज़ थी, मैं देख रही हूँगी। हर क़दम, हर नया चेहरा। और अब वो चेहरा नैना का था।
"आप बिना बताए, इस वक़्त..."
"एक माँ को अपनी बेटी के घर आने के लिए इजाज़त लेनी पड़ती है क्या, दामाद जी? ये घर मेहर का था। और मेहर की हर चीज़ पर मेरी नज़र आज भी रहती है।"
और फिर वो नैना की तरफ़ मुड़ी। ऊपर से नीचे तक एक ठंडी, तराशती नज़र, जो एक ही झटके में उसकी साधारण साड़ी, गहनों की कमी, और थकी आँखों का पूरा हिसाब लगा गई।
"तो तुम हो मेरी नई बहू। कितनी... अचानक आई हो तुम इस घर में।" "मिलते हैं तो सही, बेटा। मुझे उस औरत को ज़रा क़रीब से देखना है, जिसने मेरे दामाद को इतनी जल्दबाज़ी में शादी के लिए राज़ी कर लिया।"
और उसने मुस्कुरा दिया। एक खिंची हुई, नंगी तलवार जैसी मुस्कान, जिसमें दाँत तो पूरे थे, पर गर्मी एक भी नहीं।
नैना ने वो बढ़ा हुआ हाथ थाम लिया। ठंडा, सख़्त, मोतियों से लदा हुआ। और उस एक छुअन में वो पूरी तरह समझ गई, कि उसका काग़ज़ी झूठ अभी एक दिन पुराना भी नहीं हुआ था, और जंग, मुस्कुराती हुई, ख़ुद चल कर दरवाज़े से अंदर आ चुकी थी।
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