अध्याय 28 / 28
सच्ची कसमें
कागज़ी कसमें द्वारा Avni Oberoi
एक मौसम बाद घर क़ानून और रोज़मर्रा दोनों में पूरा है, और नैना विहान को इस घर के सबसे नन्हे मेहमान की ख़बर दे देती है। बिखरे सिरे सिमटते हैं, मेहर का आशीर्वाद निभाया जाता है, और छत पर बिना किसी शर्त की गई कसमों के साथ काग़ज़ी कसमें आख़िरकार सबसे सच्ची कसमें बन जाती हैं।
बरामदे की उसी ख़ामोशी में विहान की रुकी हुई साँस अभी लौटी नहीं थी। नैना के वो लफ़्ज़, इस घर का सबसे नन्हा मेहमान, जो अभी आया भी नहीं, हवा में अब भी तैर रहे थे, और उन्हें समझने में विहान के पत्थर बने दिल को एक पूरी साँस भर का वक़्त लग गया।
"नन्हा मेहमान... जो अभी आया भी नहीं... नैना... तुम... क्या तुम वही कह रही हो जो मैं समझ रहा हूँ?"
"हाँ, विहान। इस घर की सबसे बड़ी वेडिंग प्लानर को अब एक ऐसी तैयारी करनी है जिसकी कोई रिहर्सल नहीं होती। हमारा बच्चा आ रहा है। तुम्हारा और मेरा।"
एक साल पहले जो आदमी एक कब्र की पहरेदारी में जमा बैठा था, जिसने हर जज़्बात को सख़्त शर्तों के पीछे बंद कर रखा था, उसकी आँखों से अब आँसू यूँ बहे जैसे बरसों की जमी बर्फ़ आख़िरकार पिघल कर बह चली हो।
"एक बच्चा... हमारा अपना... मैंने सोचा था कि मैं बस पिहू को बचा पाऊँ तो बहुत है, नैना। और तुमने मुझे एक पूरा घर दे दिया। एक पूरी दुनिया।"
विहान ने नैना को अपनी बाँहों में यूँ भर लिया जैसे वो कोई सबसे नाज़ुक चीज़ हो, पहले उसके माथे पर, फिर उसके होंठों पर एक लंबा, धीमा बोसा, और उस एक पल में एक साल की सारी दूरी, सारी शर्तें, सारे नियम काग़ज़ की तरह गल गए।
"अब रोओगे तुम? वो आदमी जो कभी अनुबंध की हर शर्त बर्फ़ जैसी आवाज़ में पढ़वाता था? पर सच कहूँ विहान, मुझे भी डर लग रहा है। मैं वो औरत हूँ जिसने कसमों पर से यक़ीन उठा दिया था, और अब मेरे अंदर एक पूरी नई कसम पल रही है।"
"तो हम इसे भी वैसे ही निभाएँगे, नैना, जैसे हमने बाक़ी सब निभाया। एक-एक दिन। बिना किसी काग़ज़ के, बस सच के साथ।"
और ठीक उसी पल सीढ़ियों पर दो नन्ही परछाइयाँ उतरीं, कायरा और पिहू, नींद भरी आँखें मलती हुई, पर उनके चेहरों पर वो शरारत जो कहती थी कि इस घर का हर बड़ा राज़ सबसे पहले इन्हीं दो जासूसों को पता चलता है।
"मम्मा! तो सच में एक छोटा वाला आ रहा है? हमारा अपना, बिलकुल छोटा-सा? अब हम तीन हो जाएँगे! कायरा दीदी, मैं, और वो नन्हा वाला!"
"मम्मा, हमारी वो पुरानी कसम याद है? जिस पर काका का अँगूठा भी लगा था? अब उसमें एक और नाम जोड़ना पड़ेगा। तीसरा नाम।"
और वहीं, आधी रात के उस बरामदे में, वो चार लोग जो कभी एक काग़ज़ के सौदे से एक-दूसरे की ज़िंदगी में आए थे, अब बिना किसी काग़ज़ के एक सच्चा परिवार बन कर खड़े थे, और उनके बीच एक पाँचवाँ, अभी अनदेखा नाम, चुपके से जुड़ने की तैयारी में था।
मौसम बदल गया। बेंगलुरु की बारिशें आईं और गुज़र गईं, और उनके साथ नैना का वो नन्हा राज़ अब सबकी नज़रों में आ चुका था, साड़ी के पल्लू के नीचे एक नर्म, गोल उभार, और उसकी चाल में वो थकी हुई चमक जो सिर्फ़ आने वाली माँओं में होती है।
और शहर के उस छोटे-से बुटीक दफ़्तर में, जहाँ कभी नैना दूसरों की कसमें सजाती थी और मन ही मन उन पर हँसती थी, अब कुछ बदल चुका था। अब जब वो किसी घबराई हुई दुल्हन को उसके फेरों के लफ़्ज़ थमाती, तो उन लफ़्ज़ों पर उसका अपना यक़ीन भी साथ खड़ा होता।
"घबराओ मत। ये लफ़्ज़ सिर्फ़ काग़ज़ पर लिखी एक रस्म नहीं हैं। मैं जानती हूँ, क्योंकि मैंने ख़ुद देखा है, कि जो कसम सच्ची हो, वो किसी भी अदालत से, किसी भी तूफ़ान से बड़ी होती है।"
और सिम्मी, जो कभी क़सम खाती थी कि नैना का दिमाग़ ख़राब हो गया है जो एक अजनबी से काग़ज़ी शादी कर बैठी, अब उसी नैना का बढ़ा हुआ पेट देख कर हर दूसरे दिन रोने लगती और हर तीसरे दिन कहती कि उसने तो पहले ही कह दिया था कि ये शादी सच्ची निकलेगी।
"सिम्मी ने ऐलान कर दिया है कि इस बच्चे की मौसी वही बनेगी, और उसने अभी से इसकी पहली सालगिरह की थीम तक सोच ली है। मैंने कहा, सिम्मी, बच्चे को पैदा तो होने दे पहले।"
और उसी हफ़्ते एक बे-नाम लिफ़ाफ़ा दफ़्तर पहुँचा, जिसमें न कोई चिट्ठी थी, न कोई माँग, बस कुछ पुरानी तस्वीरें, वो सब लम्हे जो कभी एक लंबे लेंस से चुराए गए थे, और नीचे बस एक लाइन, मुझे इन्हें झूठा साबित करने रखा गया था, पर ये मेरी खींची सबसे सच्ची तस्वीरें निकलीं। रुस्तम, वो जासूस जिसने आख़िर में देवयानी का नहीं, अपने ज़मीर का साथ दिया था।
"जिस आदमी को हमारा प्यार झूठा साबित करने के लिए रखा गया था, नैना, आख़िर में उसी की गवाही ने उसे सबसे सच्चा साबित किया। और अफ़ताब कहता है कि अब हमारे बीच दस्तख़त करने को एक भी काग़ज़ नहीं बचा। ज़िंदगी में पहली बार, कोई शर्त नहीं।"
"न कोई शर्त, न कोई अनुबंध, न ध्रुव की कोई पुरानी परछाई, न अनाइशा का कोई झूठ। बस हम चार। और ये पाँचवाँ, जो रास्ते में है।"
उधर उस शीशे के घर की दीवारें अब ठंडी नहीं रहीं। एक रविवार की दोपहर गेट पर वही बूढ़ा आदमी आ खड़ा हुआ, हाथ में पिहू के लिए एक छोटा-सा तोहफ़ा, देवेंद्र, जिसे विहान ने अपनी आँखों के सामने, अपनी शर्तों पर, पिहू से मिलने की इजाज़त दे रखी थी।
"नाना! आप फिर आए! काका ने आज आपके लिए भी वही वाली चाय बनाई है जो आपको पसंद है!"
देवेंद्र ने पिहू को यूँ देखा जैसे उसमें अपनी खोई बेटी मेहर की झलक हो, और जाते-जाते उसने विहान से धीरे से कहा कि देवयानी ने हिरासत की उन ठंडी दीवारों से बस एक ही सवाल भिजवाया है, कोई माफ़ी नहीं, कोई बहाना नहीं, सिर्फ़ इतना, कि क्या बच्ची ख़ुश है।
"उसे उसकी सज़ा मिली है, देवेंद्र जी, और वो उसका अपना चुना हुआ है। मैं उसे माफ़ नहीं कर सकता। पर आप उसे इतना बता दीजिए, कि हाँ। पिहू ख़ुश है। बहुत ख़ुश। इतना जानने का हक़ एक नानी को है।"
और भीतर रसोई से काका की खनकती आवाज़ आ रही थी, वही बूढ़ा काका जिसने इस घर को मेहर के जाने से पहले से खिलाया था, अब दो बच्चियों और एक आने वाले तीसरे मेहमान के लिए दुगुने चाव से पक रहा था, और चुपके से दोनों बहनों की हर नई शरारत पर परदा भी डाल रहा था।
"काका कहते हैं कि जब छोटा वाला आएगा, तो सबसे पहले उसे उनकी बनाई खीर खिलाई जाएगी। पर मैंने कह दिया, नहीं काका। सबसे पहले वो हमारी कसम वाला काग़ज़ देखेगा, ताकि उसे पता चले कि वो किस परिवार में आया है।"
"और मैं उसे बताऊँगी कि इस घर में कोई कभी अकेला नहीं होता। मेरी मम्मा नहीं थी, फिर आ गई। कायरा दीदी अकेली थी, फिर मैं आ गई। अब वो आएगा, तो उसके पास तो पहले से ही दो-दो दीदी होंगी!"
और उन दो बहनों की उस बात में इस पूरे घर का सच छुपा था, कि जो रिश्ता उन्होंने बिना किसी काग़ज़, बिना किसी शर्त के, सिर्फ़ एक अँगूठे से चुना था, वही अब इस घर की सबसे मज़बूत दीवार था, जिसके भीतर एक तीसरी नन्ही जान महफ़ूज़ आने वाली थी।
उसी रात, जब घर सो गया, विहान ने अलमारी से मेहर की वो चिट्ठी निकाली, वही जो कभी एक साल तक बंद पड़ी रही थी, और जिसके शब्दों ने इस परिवार को उसका सबसे पहला आशीर्वाद दिया था। नैना उसके पास आ बैठी, और उन्होंने मेहर की आवाज़ को एक बार फिर, आख़िरी बार, इस घर में गूँजने दिया।
"विहान, अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो मैं जा चुकी हूँ। पर मैं चाहती हूँ कि तुम रुको मत। अपने आप को माफ़ कर दो। किसी को इतना प्यार करना कि पिहू को फिर से एक माँ मिल जाए। मेरी बेटी की हँसी किसी और के आँसुओं की क़ीमत पर न आए। जो तुम्हें दोबारा जीना सिखा दे, उसे थाम लेना। ये मेरी आख़िरी कसम है, और मेरी इजाज़त भी।"
और वो औरत, जो अपनी नियंत्रण करने वाली माँ के डर में घुट कर चली गई थी, अपने पीछे इस घर के लिए सबसे बड़ा तोहफ़ा छोड़ गई थी, एक इजाज़त, एक आशीर्वाद, जिसने विहान को उसकी कब्र से उठा कर एक नई ज़िंदगी की दहलीज़ पर ला खड़ा किया था। नैना ने उस चिट्ठी को यूँ छुआ जैसे किसी बड़ी बहन का हाथ हो।
"शुक्रिया, मेहर। तुमने मुझे कभी देखा तक नहीं, फिर भी मुझे अपना घर, अपनी बेटी सौंप दी। मैं वादा करती हूँ, पिहू को तुम्हारी हर बात याद रहेगी। हर एक बात। ये मेरी भी कसम है।"
कुछ हफ़्ते बाद, उसी शीशे के घर की छत पर, जहाँ कभी एक जासूस ने चोरी से उनकी पहली तस्वीर खींची थी, अब एक छोटी-सी, बिना किसी मेहमान के, बिना किसी दिखावे की एक रस्म सजी थी, वो जश्न, वो अपना हनीमून, जिसकी इजाज़त उस पुराने अनुबंध ने कभी नहीं दी थी।
"नैना, पहली बार जो कसमें हमने लीं, वो एक वकील ने लिखी थीं। दो अलग कमरे, कोई जज़्बात नहीं, बस एक साल। आज जो कसम मैं ले रहा हूँ, उसे कोई काग़ज़ नहीं बाँधता। बस मैं तुमसे कह रहा हूँ, हर साल, ज़िंदगी भर, मैं तुम्हें फिर से चुनूँगा।"
"और मैं, जो कभी किसी कसम पर यक़ीन नहीं करती थी, आज तुमसे बस एक कसम खाती हूँ, विहान। कि इस घर में हर वादा सच होगा। चाहे वो काग़ज़ पर लिखा हो, या न लिखा हो।"
और तभी, जैसे उन्हें ऐन इसी लम्हे का इंतज़ार हो, कायरा और पिहू छत पर आ धमकीं, हाथों में फूलों की टूटी-फूटी मालाएँ और एक नया काग़ज़ जिस पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में कुछ लिखा था।
"मम्मा, हमने तय कर लिया है! अब से हर साल आप और पापा ये वाली शादी दोबारा करोगे! और उसकी पूरी प्लानिंग हमारी अपनी वेडिंग प्लानर मम्मा करेगी!"
"और हमने अपनी कसम वाले काग़ज़ पर तीसरे नाम के लिए जगह भी छोड़ दी है। जैसे ही छोटा वाला आएगा, उसका भी अँगूठा लगेगा। फिर हम तीन बहन-भाई हो जाएँगे। हमेशा के लिए।"
और नैना ने उन दोनों बहनों को, अपने बढ़े हुए पेट के साथ जितना समेट सकती थी उतना समेट लिया, वो दोनों बच्चियाँ जो इस पूरी कहानी की असली सूत्रधार थीं, जिन्होंने बड़ों से बहुत पहले तय कर लिया था कि ये एक परिवार है।
"देखो न, विहान। हम बड़ों ने काग़ज़ पर कसमें लिखीं, शर्तें लगाईं, तारीख़ें डालीं। और इन दो बच्चियों ने बिना किसी काग़ज़ के, सिर्फ़ एक अँगूठे से, वो कसम ली जो सबसे पहले सच हुई।"
"शायद इसीलिए, नैना। शायद सबसे सच्ची कसमें वही होती हैं जो डर से नहीं, प्यार से ली जाती हैं। फिर चाहे वो काग़ज़ पर लिखी हों, या दिल पर।"
और उस रात, उस शीशे के घर की छत पर, बेंगलुरु की जगमगाती रौशनियों के नीचे, नैना, जिसने कभी किसी कसम पर यक़ीन नहीं किया था, मुस्कुराई। क्योंकि उसे आख़िरकार वो सच मिल गया था जिसे वो सालों नकारती रही, कि कुछ कसमें काग़ज़ पर शुरू होती हैं, और दिल पर जाकर पूरी होती हैं।
जो कसमें काग़ज़ी थीं, वही आख़िर में सबसे सच्ची निकलीं। और उस घर में, जहाँ अब हर वादा असली था, एक नन्ही नई साँस आने की तैयारी में थी, और दो बहनें अपनी उस पुरानी, अँगूठे वाली कसम में एक तीसरा नाम जोड़ने का इंतज़ार कर रही थीं, वो कसम जो किसी अदालत ने नहीं, बस दो नन्हे दिलों ने लिखी थी।
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