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Chapter 7 of 28

पुरानी परछाई

कागज़ी कसमें by Avni Oberoi

उस बंद चिट्ठी वाली रात को पूरा एक हफ़्ता बीत चुका था। और उन सात दिनों में शीशे के घर ने एक ऐसी आवाज़ सीख ली, जो मेहर के जाने के बाद इन दीवारों ने सुनी न थी... खिलखिलाहट। बग़ीचे से कायरा और पिहू की खुसुर-पुसुर तैरती आती, जिसमें 'मम्मा' और 'पापा' के नाम उलझे होते, और बीच-बीच में बूढ़े काका की दबी हँसी, जो अब उन नन्ही साज़िशों में बराबर का शरीक था।

पर एक चीज़ थी जो उस पूरे हफ़्ते में टस से मस नहीं हुई। विहान की अलमारी की उस लकड़ी की तिजोरी में, मख़मल में लिपटा, मेहर का वो आख़िरी ख़त अब भी बंद पड़ा था, मुहर सलामत। उसने उसे निकाला ज़रूर था, पर बिना खोले वापस रख दिया था। पर अब वो बंद लिफ़ाफ़ा उस पर एक रुकी हुई साँस की तरह भारी था, हर सुबह, हर रात।

और उसी सुबह, नाश्ते की मेज़ पर, वही एक इंच दोनों के बीच थी। पर अब वो बर्फ़ नहीं थी। विहान, वो पत्थर बना आदमी, आज कुछ अजीब कर रहा था। उसने बिना कहे नैना की प्याली में चाय उंडेल दी, और चीनी के ठीक दो चम्मच, बिल्कुल उतने ही जितने उसे पसंद थे।

"ये... ये आपने मेरी चाय बनाई?" "अरबों की कंपनी चलाने वाले मिस्टर विहान ने मेरी चाय में दो चम्मच चीनी डाली, और वो भी बिल्कुल सही? लगता है नियम नंबर एक में कोई नया उप-नियम जुड़ गया है।"

"तुमने पिछले हफ़्ते सत्रह बार शिकायत की थी कि इस घर की चाय किसी बोर्ड मीटिंग जैसी लगती है।" "मैंने बस... एक समस्या हल कर दी। इसमें कोई जज़्बात नहीं है।" "सिर्फ़ अच्छी चाय है।"

और दोनों ने एक साथ अपनी-अपनी प्लेट की तरफ़ देखा, और दोनों के होंठों पर एक मुस्कान आई जिसे दोनों दूसरे से छुपा गए। नियम नंबर एक अब भी दीवार पर टँगा था। पर वो दीवार अब काँच की हो चली थी, इतनी बारीक कि कोई ज़ोर से साँस भी ले, तो चटक जाए।

"अच्छा, मुझे निकलना है। सिम्मी ने सुबह से पंद्रह मैसेज कर दिए हैं।" "शहर की सबसे बड़ी शादी, मल्होत्रा साहब की बेटी की। लड़के वालों ने अपनी अलग इवेंट टीम लगा दी है, और आज दोनों टीमों की पहली मीटिंग है।" "दो प्लानर, एक शादी। भगवान उस बेचारी शादी को बचाए।"

नैना अपना बैग उठाकर निकल गई, अपने काम की उस दुनिया में लौटती हुई, जहाँ वो दूसरों की कसमें सजाती थी। उसे नहीं पता था कि लड़के वालों की टीम में एक ऐसा चेहरा उसका इंतज़ार कर रहा था, जिसे उसने बरसों पहले अपने दिल के दरवाज़े से निकाल दिया था। एक पुरानी परछाई, जो आज उस दरवाज़े पर लौट रही थी।


एक आलीशान होटल का लॉन, आधा बना मंडप, और उसके बीचों-बीच सिम्मी, फ़ोन कान से चिपकाए, दूसरे हाथ से हवा में तलवारें चला रही थी। मल्होत्रा साहब की बेटी की शादी, और लड़की की माँ की एक ऐसी ज़िद, जिसने पूरी टीम की नींद उड़ा रखी थी।

"नैना! भगवान का शुक्र है तू आ गई। लड़की की मम्मी को एंट्री के लिए असली हाथी चाहिए। असली। हाथी। मैंने कहा मैडम, ये पाँच सितारा होटल है, चिड़ियाघर नहीं।" "और ऊपर से लड़के वालों की टीम... उनका जो नया हेड आया है ना, वो कहता है सारी सजावट उसके हिसाब से होगी। बड़ा आया शहंशाह।"

"हाथी को मैं संभाल लूँगी, सिम्मी। हाथी से मुझे कभी डर नहीं लगा। मुझे इंसानों से डर लगता है। कहाँ है लड़के वालों का ये नया हेड? चल, मीटिंग निपटाते हैं, फिर तेरी हथिनी का इंतज़ाम करते हैं।"

और तभी सिम्मी के पीछे से एक आवाज़ आई, एक ऐसी आवाज़ जो नैना के कानों को किसी पुराने गीत की तरह रट्टे थी। "नमस्ते। तो लड़के वालों की तरफ़ से मैं हूँ।" नैना पलटी, और उसके पैरों तले की ज़मीन एक पल के लिए बरसों पीछे खिसक गई। सामने ध्रुव खड़ा था।

"नैना।" "...तुम। मुझे सच में नहीं पता था कि लड़की वालों की प्लानर तुम हो।" "शहर छोड़े मुझे बरसों हो गए थे। पिछले महीने ही लौटा हूँ। और लौटते ही... सीधे तुम्हारे सामने। दुनिया वाक़ई बहुत छोटी है।"

"ध्रुव।" "तुम यहाँ हो। ठीक है। हम दोनों प्रोफ़ेशनल हैं। ये मल्होत्रा साहब की बेटी की शादी है, इसमें हमारी कोई पुरानी बात नहीं आएगी। सजावट का पूरा ख़ाका मेरे पास है। मीटिंग तीन बजे। देर मत करना।"

सिम्मी का चेहरा एक पल में सब समझ गया। ये वही आदमी था। वो ध्रुव, जिसने बरसों पहले नैना की उँगली से अंगूठी उतरवा दी थी।

जब रोशनी अकेली पड़ी थी, कायरा अभी नन्ही थी, और नैना ने अपनी बहन और भांजी का हाथ थामने का फ़ैसला किया था, तब यही आदमी कह कर चला गया था कि वो किसी और के बच्चे की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर नहीं ढो सकता।

"नैना, तू ठीक है? मैं अभी मल्होत्रा साहब से कहती हूँ कि लड़के वाले अपना प्लानर बदलें।" "इस आदमी ने तेरे साथ जो किया... तुझे आज इसके साथ खड़े होकर एक मंडप सजाने की कोई ज़रूरत नहीं है।"

"नहीं। कुछ नहीं बदलेगा, सिम्मी।" "अगर मैं आज इस आदमी के सामने काँप गई, तो वो जीत जाएगा। और मैं उसे इतनी सस्ती जीत नहीं दूँगी।" "वैसे भी... कसमों पर से मेरा यक़ीन इसी आदमी ने उठाया था। अब इससे डरने को बचा ही क्या है।"


उसी दोपहर, शहर के दूसरे छोर पर, शीशे के घर के दरवाज़े पर एक और मेहमान बिन बुलाए आ खड़ा हुआ। लंबी, सजी-धजी, हाथ में पिहू के लिए महँगे तोहफ़ों का थैला। अनाइशा। वो लड़की, जिसे देवयानी हमेशा से विहान के लिए 'सबसे सही' मानती आई थी।

"विहान! इतने दिन हो गए, मैंने सोचा पिहू से मिल आऊँ। बेचारी बच्ची।" "देवयानी आंटी बता रही थीं कि तुमने अचानक शादी कर ली। इतनी जल्दी, इतने चुपके से... सबको बड़ा अजीब लगा, विहान।" "पूरा शहर बात कर रहा है। भला कोई किसी अजनबी से यूँ रातों-रात शादी क्यों करेगा? जब तक कि कोई... छुपी हुई वजह न हो।"

"अनाइशा। पिहू सो रही है। और मेरी शादी की वजह सिर्फ़ एक है, कि मैं अपनी बेटी से प्यार करता हूँ।" "देवयानी को मेरी शादी में इतनी दिलचस्पी है, तो वो सीधे मुझसे पूछ सकती हैं। तुम्हें अपनी जासूसी पर भेजने की ज़रूरत नहीं।"

"इतने कड़े क्यों हो, विहान। मैं तो बस तुम्हारी ख़ैरख़्वाह हूँ।" "मैं बस इतना कहूँगी। जो घर काग़ज़ पर बनते हैं, वो लंबे नहीं चलते। और जिस दिन ये काग़ज़ का घर गिरेगा... मैं यहीं हूँगी। जैसे हमेशा से थी।"

और ठीक जिस वक़्त अनाइशा उस घर में अपनी जगह गरम कर रही थी, शहर के उस लॉन में एक काली गाड़ी की खिड़की के पीछे से एक कैमरे की आँख झपकी। रुस्तम ने ख़ामोशी से नैना और ध्रुव की वो तस्वीर खींच ली, जिसमें दोनों पास-पास खड़े थे। उसे नहीं पता था कि ये आदमी कौन है, पर वो जानता था कि 'ख़ुशहाल दुल्हन' की किसी और मर्द के साथ ऐसी तस्वीर, देवयानी के लिए सोने से क़ीमती होगी।

और उसी रात, देवयानी के फ़ोन की स्क्रीन पर वो तस्वीर खुली, जिसमें वही नज़दीकी थी जो बरसों से बनती है। देवयानी को नहीं पता था कि ये आदमी नैना का अतीत है। उसने बस वो देखा, जो वो देखना चाहती थी। और उसके होंठों पर वही तलवार जैसी मुस्कान लौट आई। 'तो नई बहू का भी कोई राज़ है। बहुत ख़ूब, बेटा।'


उसी शाम, ढलते सूरज के साथ, विहान अपने कमरे की खिड़की से नीचे गेट की तरफ़ देख रहा था। एक काली गाड़ी गेट पर रुकी। नैना उतरी। और उसके साथ एक आदमी भी उतरा, जिसने उसे गेट तक छोड़ा, और जाते-जाते एक पल ज़्यादा वहीं ठिठका रहा।

विहान के सीने में कुछ ऐसा उठा, जो उसके किसी अनुबंध की किसी शर्त में लिखा नहीं था। कुछ गरम, कुछ नुकीला, कुछ जो उसका अपना नहीं लगता था।

"देर हो गई आज।" "गेट पर जो आदमी तुम्हें छोड़ने आया था... वो भी शादी की टीम का हिस्सा है? बड़ी देर तक खड़ा रहा वहाँ।"

"आप... खिड़की से देख रहे थे?" "वो ध्रुव है। लड़के वालों का प्लानर। और... बहुत बरस पहले, वो और भी कुछ था। वही आदमी, जिसका ज़िक्र मैंने आपसे किया था। जो दरवाज़े से निकल गया था।" "पर आपको इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है, विहान? नियम नंबर एक। कोई जज़्बात नहीं। याद है ना?"

"मुझे... मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।" "मैं बस... ये सोच रहा था कि क्या ये उस जाँच के लिए ठीक है। अगर रुस्तम जैसा कोई तुम्हें किसी दूसरे मर्द के साथ यूँ देख ले, तो हमारी शादी पर सवाल उठ जाएगा। बस इतनी सी... प्रैक्टिकल बात है।" "इसमें और कुछ नहीं।"

और उस कमरे में वो झूठ दोनों के बीच आ बैठा, और दोनों ने उसे साफ़ सुना। ये 'प्रैक्टिकल बात' नहीं थी, और दोनों जानते थे। विहान के चेहरे पर वो चीज़ थी जिसे जलन कहते हैं, और उसने पहली बार उसे अपने भीतर पकड़ा था। और वो इससे डर गया। एक पत्थर बना आदमी, जो पूरे एक साल से कुछ महसूस नहीं करता था, आज एक अजनबी के गेट पर एक पल ठिठकने भर से हिल गया।

"रात हो गई है। मैं... मैं सोने जा रही हूँ।" "और विहान... आपको मेरे अतीत से डरने की कोई ज़रूरत नहीं। वो दरवाज़ा मैंने बरसों पहले बंद कर दिया था।" "बस... मुझे नहीं पता था कि उसकी दस्तक पर आपका दिल यूँ चौंकेगा।"


अगली शाम, जब मीटिंग ख़त्म हो चुकी थी और लॉन धीरे-धीरे ख़ाली हो रहा था, नैना अपनी फ़ाइलें समेट रही थी। और ध्रुव वहीं रुका रहा, ठीक इसी पल का इंतज़ार करता हुआ, जब वो अकेली हो, कोई सिम्मी न हो, कोई भीड़ न हो।

"नैना, एक मिनट। सिर्फ़ एक मिनट, प्लीज़।" "मैं जानता हूँ मुझे ये कहने का कोई हक़ नहीं। पर बरसों से ये बात मेरे सीने में एक पत्थर की तरह अटकी है।" "मैंने ग़लती की थी, नैना। अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ग़लती। तुम्हें, कायरा को, रोशनी को छोड़कर जाना... मैं कायर था। और मैंने इसकी सज़ा हर एक दिन भुगती है।"

"ध्रुव, अब ये सब कहने का क्या फ़ायदा।" "जिस रात तुम गए थे, उसी रात मैंने कसमों पर यक़ीन करना छोड़ दिया था। तुमने ही मुझे सिखाया था कि वादे सिर्फ़ लफ़्ज़ होते हैं, हवा में लिखे हुए।" "आज मैं दूसरों की शादियाँ सजाती हूँ, और अंदर से जानती हूँ कि वो सारी चमक-दमक एक ख़ूबसूरत झूठ है।"

"पर तुमने भी तो शादी कर ली, नैना। इतनी अचानक। एक ऐसे आदमी से, जिसे कोई ठीक से जानता तक नहीं।" "पूरा शहर कह रहा है कि ये शादी कुछ और है। मुझे सिर्फ़ एक बार सच बता दो। ये तुम्हारी काग़ज़ी शादी... इसका मतलब क्या है? क्या तुम सच में उससे प्यार करती हो? या ये भी एक ख़ूबसूरत झूठ है, बाक़ी सबकी तरह?" "क्योंकि अगर ये झूठ है, नैना... तो मैं इंतज़ार करूँगा। जब तक तुम लौट न आओ।"

और वो सवाल दोनों के बीच हवा में लटका रह गया। नैना का मुँह खुला, पर आवाज़ नहीं निकली। क्योंकि सच कहती, तो कहती क्या? कि आज सुबह उसी आदमी ने उसकी चाय में ठीक उतनी ही चीनी डाली थी, और कल रात उसकी आँखों की जलन उसे डराने के बजाय अच्छी लगी थी। कि कायरा की पूरी लड़ाई इसी शर्त पर टिकी थी कि ये सब झूठ ही रहे, और एक साल बाद वो काग़ज़ ख़ुद फट जाएगा।

और इन सब सवालों के बीच खड़ी नैना, जिसके पास हर मुश्किल दुल्हन के हर सवाल का जवाब था, आज एक अकेले सवाल के सामने बिल्कुल ख़ामोश थी। उसने ध्रुव को कोई जवाब नहीं दिया। न हाँ, न ना। बस वो सवाल उसके गले में एक काँटे की तरह अटका रहा, न निगला जाता, न उगला।

क्योंकि जिस पल वो इस सवाल का सच्चा जवाब देती, उसी पल ये काग़ज़ी कसमें या तो हमेशा के लिए टूट जातीं, या फिर सबसे सच्ची बन जातीं। और नैना उस सच का सामना करने के लिए तैयार नहीं थी। इसलिए वो चुप रही। और उसकी वो चुप्पी, इस पूरी कहानी की सबसे ज़ोरदार आवाज़ थी।

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