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Chapter 14 of 28

पहली सच्ची रात

कागज़ी कसमें by Avni Oberoi

कमरे में वक़्त एक पल को जम गया था। नैना का चेहरा अब भी विहान के क़रीब था, उसका हाथ अब भी उसकी कमर पर, और दहलीज़ पर देवयानी की परछाईं, तलवार जैसी मुस्कान लिए, उनके बीच की हर साँस नाप रही थी।

"अफ़सर साहिबा, देखा आपने?" "अभी दो मिनट पहले ये दोनों मुझसे कह रहे थे कि इनका प्यार सच्चा है। और जैसे ही दरवाज़ा बंद मिला, वही 'सच्चा प्यार' एक कमरे में अकेले होते ही और गहरा हो गया।" "इतने माहिर अभिनेता तो मैंने बड़े-बड़े स्टेज पर भी नहीं देखे।"

नैना का वो मुखौटा, जो महीनों से हर सवाल पर मुस्कुरा कर टिका रहता था, आज पहली बार पूरी तरह उतर गया। और उसके नीचे से जो निकला, वो डर नहीं था। ग़ुस्सा था।

"मम्मी जी, बहुत हो चुका।" "आपने मुझे झूठा कहा, मेरी शादी को नाटक कहा, मैं सब सुनती रही, सब बर्दाश्त करती रही, कायरा के लिए।"

"पर ये जो अभी हुआ, दरवाज़े के पीछे, वो अभिनय नहीं था।" "और आप ये बेहतर जानती हैं, क्योंकि आपने भी कभी वो चेहरा देखा होगा जो सच में प्यार करता है। अपनी बेटी मेहर का चेहरा, याद है आपको?"

एक पल को देवयानी की आँखों में कुछ हिला, मेहर के नाम पर, कोई पुराना दर्द जो उसने बरसों से किसी को दिखने नहीं दिया था। पर अगली ही साँस में बर्फ़ फिर जम गई।

"भावुक बातों से अदालत नहीं चलती, नैना।" "अफ़सर साहिबा को ये सब जज साहब के सामने भी दिखाओगे क्या? या वहाँ फिर से 'बात इतनी सीधी नहीं है' सुनने को मिलेगा?"

"माँ जी।" "तीन महीने पहले मैं यही कहता, कि बात इतनी सीधी नहीं है। आज कहता हूँ, बात बिल्कुल सीधी है।" "मैं नैना से प्यार करता हूँ। और अगर इसे साबित करने के लिए हर बार दरवाज़ा खुलवाना पड़े, तो खुलवा लीजिए। मैं नहीं थकूँगा।"

"अफ़सर साहिबा," "आप जो रिपोर्ट लिखेंगी, वो लिखिए। पर मैं इतना कहूँगी, इस घर में जो प्यार है, वो कायरा और पिहू के लिए भी उतना ही सच है जितना हम दोनों के बीच। और वो कभी काग़ज़ पर नहीं, दिल पर लिखा गया था।"

अफ़सर की कलम एक पल को रुक गई, बस एक पल, और फिर वो फिर से लिखने लगी। पर वो एक पल, नैना ने साफ़ देखा, और उसमें एक उम्मीद की किरण थी।

कोने में बैठी अफ़सर ने बाक़ी कुछ नहीं कहा। बस अपनी फ़ाइल में लिखती रही, धीरे, बिना जल्दी के, चेहरा एक ताश के पत्ते जितना सपाट। ये पता चलना नामुमकिन था कि उसने अभी जो देखा, वो उसके काग़ज़ पर किसके हक़ में गया।

"जैसी मर्ज़ी, विहान बेटा।" "अरे भाई, फंक्शन ख़त्म हुआ लगता है। सबको खाना खिलाओ।" "पर याद रखना, बेटा। मैंने अभी हार नहीं मानी। मैंने बस... आज का दांव चला है।"

धीरे-धीरे मेहमान बिखरने लगे, हलवाई अपने बर्तन समेटने लगे, और वो जगमगाता जश्न, जिसे देवयानी ने बुना था, अपनी ही चाल में उलझ कर बिखर गया। अफ़सर बिना कोई फ़ैसला सुनाए, बिना मुस्कुराए, चुपचाप गेट से निकल गई, और उसकी ख़ामोशी अपने पीछे किसी भी शब्द से ज़्यादा डरावनी छोड़ गई।


सीढ़ियों की ओट में, जहाँ से पूरा हॉल दिखता था, कायरा और पिहू घुटनों में सिर छुपाए बैठी थीं। उन्होंने सब देख लिया था, डांस, चुंबन, दरवाज़ा, नानी का ग़ुस्सा।

"दीदी... नानी बहुत गुस्से में थीं।" "क्या हमारा प्लान ख़राब हो गया? मम्मा-पापा हमसे नाराज़ हो जाएँगे क्या?"

"नहीं हुआ ख़राब, पिहू।" "तूने सुना नहीं? पापा ने आज नानी को मना नहीं किया। पापा ने कहा कि वो मम्मा से सच में प्यार करते हैं।" "ये तो हमारा प्लान काम कर गया। बस... नानी को अच्छा नहीं लगा।"

और ठीक उनके सिर के ऊपर, दीवार पर टंगे कैलेंडर पर, वो एक तारीख़ अब भी लाल घेरे में बंद थी, वो तारीख़ जिस दिन काग़ज़ पर लिखी शादी का एक साल पूरा होना था। नौ महीने बाक़ी थे। नौ महीने, जिनमें एक झूठी शादी को सच साबित होना था, या हमेशा के लिए ख़त्म।

"दीदी, वो लाल गोला क्या है?" "हर बार जब भी तुम उसे देखती हो, तुम्हारा चेहरा उदास हो जाता है।"

"कुछ नहीं है, पिहू।" "बस एक तारीख़ है। हम उसे आने से पहले ही मिटा देंगे। मैंने कसम खाई है।"

कायरा ने पिहू को कस के गले लगा लिया, ठीक वैसे जैसे कभी ख़ुद उसे कोई गले लगाता तो सारा डर उतर जाता। दो बहनों के बीच वो गले लगना किसी भी बड़े के वादे से ज़्यादा पक्का था।


आधी रात को घर आख़िरकार सो गया, कायरा-पिहू एक-दूसरे से लिपटी अपने कमरे में, काका रसोई की बत्ती बुझा कर, और देवयानी का काफ़िला अपने घर लौट चुका था। पर दो कमरों में नींद नहीं थी।

रात की हवा में मोगरे की महक थी, वही महक जो पिछली रात भी इसी बगीचे में तैरी थी, जब पहली बार दोनों ने एक-दूसरे से झूठ बोलना छोड़ा था।

नैना बालकनी में खड़ी थी, वही जगह जहाँ कल रात पहली बार पूरा सच बोला गया था, और नीचे बगीचे में विहान भी चहलक़दमी कर रहा था, जैसे दोनों के पैर बिना पूछे एक ही जगह की तरफ़ खिंच आए हों।

"सो नहीं पाई?" "मैं भी नहीं। आज जो हुआ, हॉल में, उस दरवाज़े पर..." "मैं उसे भूल नहीं पा रहा, नैना। और मुझे भूलना भी नहीं है।"

"तुम्हें पता है, जिस दिन मेरा मंगेतर मुझे छोड़ गया था, उसी दिन मैंने कसम खाई थी कि किसी और की कसम पर कभी यक़ीन नहीं करूँगी।" "मैंने सैकड़ों जोड़ों को कसमें दिलाईं, और हर बार अंदर से हँसती रही। आज पहली बार, मुझे अपनी कसम पर हँसी नहीं आ रही।"

"मैं भी नहीं भूल पा रही।" "मैंने ख़ुद को समझाया था कि ये सिर्फ़ काग़ज़ है, सिर्फ़ एक साल का सौदा। पर आज रात, दरवाज़ा खुलने से पहले वाला वो एक पल... मैंने ज़िंदगी में इतना सच कभी महसूस नहीं किया।"

"मुझे लगता है... नहीं, मुझे पता है।" "मैं तुमसे प्यार करता हूँ, नैना। ये कोई अनुबंध की शर्त नहीं है। ये मेरा अपना दिल है, जो मुझे लगा था अब कभी धड़केगा ही नहीं।"

और वहाँ, उस ठंडी बालकनी में, बिना किसी भीड़ के, बिना किसी कैमरे के, बिना किसी अफ़सर के, नैना ने पहली बार अपनी पूरी सच्चाई ज़ुबान पर ला दी।

"मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ, विहान।" "एक वेडिंग प्लानर जो कसमों पर यक़ीन नहीं करती थी, आज अपनी ही कसम पर यक़ीन करने लगी है।"

और एक पल के लिए, सिर्फ़ एक पल के लिए, ये कोई काग़ज़ी सौदा नहीं लगा, ये बस दो लोग लगे जिन्होंने आख़िरकार वो पा लिया था जो दुनिया भर के जोड़ों को नैना सजाती आई थी, और ख़ुद कभी नहीं पा सकी थी।

उनके माथे छू गए, साँसें आपस में उलझ गईं, और एक लंबी, गहरी चुप्पी में दोनों वो सब कह गए जो शब्दों से बड़ा था। पर ठीक उसी पल, नैना की नज़र बालकनी की रेलिंग से परे, दूर उस दीवार-घड़ी की खिड़की पर जा टिकी, जहाँ कभी एक कैमरा छुपा मिला था।

"रुको।" "विहान, रुको ज़रा।" "आज हॉल में क्या हुआ, याद है? हमारा सबसे सच्चा पल भी उस औरत ने सबूत बना दिया। अगर अदालत को एक पल को भी लगा कि ये शादी, ये प्यार, कायरा को हथियाने के लिए रचा गया नाटक है... तो मैं उसे हमेशा के लिए खो दूँगी।"

"तुम सही कह रही हो।" "और मेरी तरफ़ से भी एक डर है, नैना, जो मैं तुम्हें अभी नहीं बता सकता।" "मेहर गए एक साल हुआ, और मैं आज किसी और के लिए इतना कुछ महसूस कर रहा हूँ। ये ख़ुशी... मुझे इसका हक़ ही नहीं लगता।"

"नैना, रुको, हम रास्ता ढूँढ लेंगे..." "शायद... शायद अभी नहीं।"

दोनों वहीं खड़े रहे, हाथ अभी छूटे नहीं थे, पर बीच की वो दूरी, जो कल रात मिट गई थी, आज एक अलग वजह से फिर लौट आई। एक तरफ़ अदालत का डर, दूसरी तरफ़ एक मरी हुई औरत का बोझ।

"जाओ, विहान। सो जाओ।" "हम दोनों को आज रात अपने-अपने भूतों से मिलना है, लगता है।"


विहान अपने कमरे में नहीं, अपने स्टडी में गया। वहाँ, दराज़ के सबसे नीचे ताले में बंद, वही चीज़ रखी थी जिसे उसने एक साल से छुआ तक नहीं था।

मेहर का आख़िरी ख़त। उसकी अपनी लिखावट में नाम लिखा था, 'विहान के लिए', मुहर आज तक बंद, उसका काँपता अँगूठा हर बार वहीं आ कर रुक जाता था।

मेज़ पर बस एक स्टडी लैंप जल रहा था, और उसकी पीली रोशनी में मेहर की एक पुरानी तस्वीर मुस्कुरा रही थी, वही तस्वीर जो विहान ने कभी हटाई नहीं थी।

"मेहर..." "मैंने आज किसी और से कहा कि मैं प्यार करता हूँ। मुझे लगा था ये सबसे मुश्किल लफ़्ज़ होंगे।" "पर असल में मुश्किल तो ये है, तुम्हारा ये ख़त खोलना। शायद इसीलिए अब तक नहीं खोला। डर लगता है कि तुम मुझसे नाराज़ हो।"

उसका हाथ लिफ़ाफ़े के ऊपर एक इंच की दूरी पर रुका रहा, ठीक वैसे ही जैसे कल रात दहलीज़ पर रुका था। पर आज, वो इंच पार करने का हौसला उसमें था।

उसकी उँगलियाँ काँपती रहीं, फिर एक झटके में, एक साल का डर तोड़ते हुए, उसने मुहर तोड़ दी। काग़ज़ बाहर निकला, मेहर की उसी नाज़ुक लिखावट में, जो कभी उसकी हर सुबह की चिट्ठी हुआ करती थी।

विहान की आँखें पन्ने पर दौड़ीं, धीरे-धीरे, फिर तेज़, फिर एक जगह जा कर रुक गईं, जैसे किसी ने उसकी साँस रोक दी हो।

पहला पन्ना सामान्य था, मेहर की अपनी माफ़ी, अपने प्यार के शब्द। पर जैसे ही उसकी नज़र दूसरे पन्ने पर गई, उसकी साँस अटक गई।

और उसका चेहरा बदल गया। रंग उड़ गया, हाथ काँपने लगे, और वो काग़ज़ उसकी उंगलियों से लगभग छूट गया।

"नहीं..." "ये... ये सच नहीं हो सकता।" "मेहर के बारे में... देवयानी के बारे में... जो मैं एक साल से सच मानता आया, वो सब... झूठ था।"

स्टडी की उस मद्धम रोशनी में, विहान अकेला बैठा रहा, हाथ में वो खुला ख़त लिए, जिसके शब्द अभी सिर्फ़ उसकी आँखों तक पहुँचे थे, किसी और तक नहीं। काग़ज़ पर लिखी वो सच्चाई, जो उसने साल भर ख़ुद से भी छुपाई थी, अब उसकी पूरी दुनिया उलटने को तैयार खड़ी थी।

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