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अध्याय 1 / 28

पहला झूठ

कागज़ी कसमें द्वारा Avni Oberoi

"आँखें... मेरी तरफ़। हाँ, बिल्कुल ऐसे ही। अब एक गहरी साँस लो। तुम कहीं नहीं भागोगी, रिया। तुम बस वही लाइन बोलोगी जो मैंने तुम्हें सिखाई है।"

परदे के उस पार आठ सौ मेहमान थे, हीरों से लदे हुए, और एक मंच जिस पर हज़ार बल्ब जल रहे थे। परदे के इस पार, घुटनों के बल बैठी एक काँपती हुई दुल्हन, और उसका हाथ थामे... नैना।

बेंगलुरु का सबसे महँगा सितारा होटल, और आज उसकी छत पर एक और परी-कथा सजी थी। नैना उसी परी-कथा की कारीगर थी। वेडिंग प्लानर। दूसरों के सपने सजाने वाली।

दुल्हन की आँखों से काजल बह चला था। तीन घंटे का मेकअप, और एक पल का डर। वो 'मुझसे नहीं होगा' वाली घबराहट, जो हर दुल्हन को आख़िरी लम्हे पर आती है, और जिसे नैना पिछले सात साल से हज़ार बार सँभाल चुकी थी।

"तुम्हें कुछ याद नहीं रखना, जान। मैं यहीं परदे के पीछे रहूँगी। तुम बस मेरे होंठ देखना और मेरे पीछे बोलना। ठीक है? बोलो... 'मैं तुम्हें अपना जीवनसाथी चुनती हूँ।'"

दुल्हन ने काँपते होंठों से दोहराया। और नैना ने भी, बिना आवाज़ के, वही लफ़्ज़ अपने होंठों पर चलाए। मैं तुम्हें अपना जीवनसाथी चुनती हूँ।

फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि दुल्हन उन लफ़्ज़ों पर यक़ीन करती थी। और नैना... नैना को इन लफ़्ज़ों पर यक़ीन किए हुए बरस बीत चुके थे।

"अब जाओ। सिर ऊँचा, मुस्कुराओ, और उस बंदे को देखो जो तुम्हारे लिए मंच पर खड़ा पसीने में नहा रहा है। जाओ, तुम्हारी परी-कथा तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।"

परदा हटा। तालियाँ गूँजीं। दुल्हन रौशनी में चली गई... और नैना अँधेरे में रह गई, जैसे हमेशा रहती थी।

नैना ने दीवार से पीठ टिका दी। पैर दुख रहे थे, कमर टूट रही थी, और फ़ोन में तीन मिस्ड कॉल थीं। तीनों बैंक से।

तीन हफ़्ते हुए थे उसकी बहन रोशनी को गुज़रे। तीन हफ़्ते, और ज़िंदगी ने साँस लेने की मोहलत तक नहीं दी थी।

रोशनी की एक निशानी पीछे रह गई थी। कायरा। छह साल की। नैना की भांजी, और अब नैना की पूरी दुनिया।

परसों, फ़ैमिली कोर्ट में, एक जज ने अपनी ऐनक के ऊपर से नैना को देखा था और पूछा था कि एक अकेली, कर्ज़ में डूबी औरत भला एक बच्ची की ज़िम्मेदारी कैसे उठाएगी। और उसी अदालत में एक और रिश्तेदार बैठा था। पैसे वाला, रसूख़ वाला, जो कायरा को गोद लेने के लिए हाथ बढ़ा रहा था। नैना के हाथ से उसकी बहन की आख़िरी निशानी भी फिसल रही थी।


शोर से बचने के लिए नैना एक साइड कॉरिडोर में मुड़ी, जहाँ बुफ़े की मेज़ें लगी थीं। और वहीं, एक लंबे सफ़ेद मेज़पोश के नीचे, उसे दो नन्हे जूते दिखे।

"अच्छा... तो यहाँ छुपा है खज़ाना।"

उसने झुक कर मेज़पोश उठाया। नीचे एक बच्ची बैठी थी, पाँच साल की, गुलाबी फ़्रॉक में, घुटनों में सिर छुपाए। किसी ने उसके बाल दो चोटियों में बाँधे थे, बहुत क़रीने से, जैसे किसी ने बहुत कोशिश की हो।

"मैं छुपी नहीं हूँ। मैं... बस यहाँ रह रही हूँ।"

"अच्छा? और किराया कितना है? क्योंकि जगह तो बढ़िया है। ठंडी, शांत, और खाने के इतने पास।"

बच्ची ने सिर उठाया। आँखें बड़ी, गीली, और उम्र से कहीं ज़्यादा बूढ़ी।

"आप मज़ाक कर रही हो।"

"बिल्कुल नहीं। मैं तो सोच रही हूँ मैं भी अंदर आ जाऊँ। बाहर आठ सौ लोग नाच रहे हैं, और मेरे पैर कब के मर चुके हैं। थोड़ी जगह दोगी?"

और नैना, बिना जवाब का इंतज़ार किए, मेज़ के नीचे घुस कर उसके बग़ल में बैठ गई, अपनी महँगी साड़ी समेत।

"आप बहुत बड़ी हो। आप अंदर नहीं आ सकतीं!"

"श्श्श। किसी को मत बताना। ... तो बताओ, हम यहाँ किससे छुप रहे हैं?"

"सब मुझसे पूछते हैं मैं ख़ुश क्यों नहीं हूँ। और नानी कहती हैं मुझे मुस्कुराना चाहिए। पर मुस्कुराना... थका देता है।"

नैना कुछ पल चुप रही। पाँच साल की एक बच्ची के मुँह से ये लफ़्ज़... और नैना को अपनी कायरा याद आ गई, जो अब हर रात नींद में रोशनी को ढूँढ़ती थी।

"पता है, मुझे भी। इसीलिए मैं मुस्कुराने के बजाय... मुँह बनाती हूँ। देखो।"

और बेंगलुरु की सबसे नामी वेडिंग प्लानर ने, एक बुफ़े की मेज़ के नीचे बैठ कर, आँखें भेंगी कीं, गाल फुलाए, और जीभ बाहर निकाल ली।

"ये... ये तो बहुत गंदी शक्ल है!"

"और भी हैं मेरे पास। ये देखो। इसका नाम है, 'नानी जब हरी सब्ज़ी खिलाती हैं'।"

बच्ची हँसी। पहले एक खिलखिलाहट, फिर खुल कर, दोनों हाथों से मुँह ढाँप कर, वैसे जैसे बच्चे तब हँसते हैं जब हँसी उन्हें ख़ुद हैरान कर दे।

और तभी, मेज़पोश की झिरी से, नैना को दो चमड़े के जूते दिखे। महँगे, काले, और बिल्कुल स्थिर। कोई खड़ा था। और सुन रहा था।

"पिहू।"

बच्ची की हँसी एक पल में बुझ गई। वो चुपचाप मेज़ के नीचे से निकल आई।

नैना भी बाहर निकली, साड़ी सँभालती, चेहरे पर वो पेशेवर मुस्कान चढ़ाती जो उसका असली चेहरा छुपा लेती थी। और सीधे उस आदमी के सामने आ खड़ी हुई। लंबा, तीखे नैन-नक़्श, बेदाग़ काली शेरवानी, और आँखों में एक ऐसी ठंडक जैसे किसी ने बहुत पहले उनमें की सारी आग बुझा दी हो। ये पिहू का पिता था। विहान।

"तुम्हें हर जगह ढूँढ़ रहा था, बेटा। सब ढूँढ़ रहे थे।"

"मैं आंटी के साथ थी।"

विहान की नज़र नैना पर उठी। और उसमें एक अजीब सा भाव था। शक नहीं, शुक्रिया नहीं... कुछ और। जैसे उसने कोई ऐसी चीज़ देखी हो जिसे वो भूल चुका था।

"ये एक साल से नहीं हँसी।"

नैना रुक गई।

"इसकी माँ के जाने के बाद से। एक साल हो गया। मैंने डॉक्टर बदले, स्कूल बदला, खिलौनों से कमरा भर दिया... और आपने एक मेज़ के नीचे बैठ कर, दो मिनट में वो कर दिया जो मैं एक साल में नहीं कर पाया।"

"बच्चे अजनबियों के सामने खुल जाते हैं, मिस्टर। उनसे कोई उम्मीद जो नहीं होती।"

उसने ये हल्के में कहा था, पर लफ़्ज़ ख़ुद उसे चुभ गए। उम्मीद। वही तो थी जो नैना ने बहुत पहले छोड़ दी थी।

"आप वो प्लानर हैं। मेरी कज़न की शादी आप सँभाल रही हैं।"

"जी। नैना। और अगर पिहू भूखी है, तो बुफ़े में गुलाब जामुन हैं, जिन्हें मैंने ख़ुद तीन बार चखा है। ड्यूटी समझ कर।"

"आप कितना लेती हैं?"

"किस बात का?"

"आज रात का। पिहू के साथ रहने का। वो आपके साथ ख़ुश है। मैं इसकी क़ीमत दे सकता हूँ।"

और पहली बार उस पूरी शाम में, नैना की पेशेवर मुस्कान उतर गई।

"मैं बच्चों की हँसी नहीं बेचती, मिस्टर, जो भी आपका नाम है। मैं शादियाँ बेचती हूँ। और वो भी अब सिर्फ़ इसलिए क्योंकि मुझे पैसों की सख़्त ज़रूरत है। पर हर चीज़ की क़ीमत नहीं होती।"

विहान कुछ पल उसे देखता रहा, जैसे किसी ने बरसों बाद उसे उसकी अपनी ज़बान में जवाब दिया हो। और वो हैरान रह गया हो।

"पापा, आंटी की गंदी शक्लें देखो न। बहुत मज़ेदार हैं!"

"अच्छा? बाद में देखूँगा, बेटा। अभी नानी तुम्हें ढूँढ़ रही होंगी।"

और उस एक लफ़्ज़ पर, नानी, बच्ची का हाथ जो नैना की उँगली थामे था, थोड़ा और कस गया। नैना ने महसूस किया, पर समझी नहीं। ... अभी नहीं।


रात के ग्यारह बज चुके थे। मेहमान छँट रहे थे, बत्तियाँ मद्धम हो रही थीं, और नैना पंडाल के एक कोने में खड़ी वेंडरों का हिसाब कर रही थी, जब एक आवाज़ ने उसे रोका।

"मुझे आपसे एक बात करनी है। और मैं जानता हूँ ये अजीब लगेगी। इसलिए मैं सीधे मुद्दे पर आऊँगा।"

"मिस्टर, रात के ग्यारह बजे हैं और मेरे पास अभी सत्ताईस बिल गिनने बाक़ी हैं। सीधे मुद्दे पर ही आइए, प्लीज़।"

"मुझे एक बीवी चाहिए। काग़ज़ पर। एक साल के लिए।"

नैना ने उसे देखा, फिर अपने आस-पास, जैसे कोई छुपा हुआ कैमरा ढूँढ़ रही हो।

"वाह। ये अब तक का सबसे भोंडा मज़ाक है जो किसी क्लाइंट के रिश्तेदार ने मुझे सुनाया है। और यक़ीन मानिए, कॉम्पिटीशन कड़ी है।"

"मैं मज़ाक नहीं करता। मेरे पास उसके लिए वक़्त नहीं है।"

और फिर उसने, वैसे ही जैसे कोई बोर्ड मीटिंग में आँकड़े रखता है, अपनी पूरी ज़िंदगी नैना के सामने खोल कर रख दी।

"मेरी पत्नी मेहर एक साल पहले गुज़र गई। पिहू पाँच साल की है। और उसकी नानी, मेरी सास, अदालत में मुझसे उसकी कस्टडी माँग रही हैं। कहती हैं कि एक अकेला, काम में डूबा आदमी एक बच्ची को नहीं पाल सकता।"

नैना का दिल एक पल को रुक गया। ये लफ़्ज़ उसने कहीं और भी सुने थे। परसों। एक अदालत में। ... अपने बारे में।

"मेरे वकील का कहना है कि जज सिर्फ़ एक चीज़ देखता है। स्थिर घर। एक ऐसा घर जिसमें माँ हो, बाप हो, नियम हों। एक अकेला बाप हार जाता है। एक शादीशुदा घर जीत जाता है।"

"तो एक जज को ख़ुश करने के लिए आप एक अजनबी से शादी कर लेंगे?"

"हाँ। और वो अजनबी आप हैं।"

"मैं? आपने मुझे आज शाम देखा है। पूरे दो घंटे।"

"मैंने आपको दो घंटे में वो करते देखा जो पैसा एक साल में नहीं कर पाया। पिहू को आपके साथ चैन है। और..."

वो रुका। और पहली बार उसकी सधी हुई आवाज़ में एक हल्की सी दरार आई।

"और मैंने सुना है कि आप भी एक बच्ची के लिए लड़ रही हैं। और हार रही हैं।"

नैना की रीढ़ में एक सर्द लहर दौड़ गई। ये आदमी उसके बारे में जानता था।

"आपको... आपको ये किसने बताया?"

"बेंगलुरु छोटा शहर है। और मेरी कज़न बातूनी। आपकी बहन गुज़र गईं। आप उनकी बेटी को गोद लेना चाहती हैं, पर अदालत एक अकेली, कर्ज़ में डूबी औरत को मना कर रही है। और एक अमीर रिश्तेदार उसी बच्ची पर दावा ठोक रहा है।"

हर लफ़्ज़ सही था। और हर सही लफ़्ज़ चुभा।

"मैं आपको वही दे सकता हूँ जो अदालत आपसे माँग रही है। एक स्थिर घर। एक शादीशुदा पता। और... वो पैसा जो एक अच्छे वकील के लिए चाहिए। आपकी कायरा के लिए।"

कायरा। उसने कायरा का नाम लिया। और नैना को लगा जैसे किसी ने उसका सबसे कमज़ोर, सबसे छुपा हुआ तार छू लिया हो।

"आप... आप मेरी भांजी का नाम अपने सौदे में इस्तेमाल कर रहे हैं?"

"मैं आपको एक रास्ता दे रहा हूँ। मेरी बेटी बचेगी, आपकी भांजी बचेगी। एक दस्तख़त, और दो टूटे घर एक साथ ठीक हो जाएँगे।"

"और भावनाएँ? प्यार? वो सब कहाँ जाएगा इस हिसाब-किताब में?"

"कोई भावना नहीं। अलग कमरे। एक साफ़ साल। फिर एक ख़ामोश तलाक़, और हम दोनों अपने-अपने रास्ते। ये शादी नहीं है, मिस नैना। ये एक कॉन्ट्रैक्ट है। शर्तों वाला।"

और नैना, जो सारी उम्र दूसरों की सच्ची कसमें सजाती आई थी, पहली बार एक ऐसी शादी के सामने खड़ी थी जो शुरू ही झूठ से होती थी। और सबसे बुरी बात? ... वो उसे लुभा रही थी।

"मुझे... मुझे सोचने का वक़्त चाहिए।"

"कल शाम तक। इससे ज़्यादा मेरे पास नहीं है।"

उसने एक कार्ड नैना के हाथ में रखा, पलटा, और अँधेरे में चला गया, वैसे ही जैसे आया था। बिना किसी गर्मी के।


और ठीक उसी वक़्त, शहर के दूसरे कोने में, एक आलीशान बंगले की बालकनी में, एक औरत फ़ोन कान से लगाए खड़ी थी। देवयानी। पिहू की नानी। साठ के क़रीब, तराशा हुआ चेहरा, गले में मोती, और आँखों में वो ठंडक जो सिर्फ़ बहुत पैसे या बहुत नुक़सान से आती है।

"नहीं, वकील साहब। मुझे तारीख़ नहीं, नतीजा चाहिए। वो बच्ची मेहर की निशानी है। और मेहर की निशानी इसी घर में आएगी, उस अकेले आदमी के पास नहीं।"

उसने फ़ोन पर कुछ सुना, और एक हल्की, ठंडी हँसी हँसी।

"विहान चालाक है। वो कुछ न कुछ करेगा। हो सकता है कोई नई नौकरानी रख ले, कोई नई कहानी गढ़ ले, ताकि जज को लगे उसका घर पूरा है।"

"पर मैं मेहर की माँ हूँ। मैंने उस घर की एक-एक ईंट रखी है। वो जो भी करेगा, मुझे पता चलेगा। हर क़दम, हर नया चेहरा, हर झूठ। ... मैं देख रही हूँगी।"

फ़ोन कट गया। और उधर, शहर के उस पार, एक होटल की छत पर, नैना अपने हाथ में एक सफ़ेद कार्ड थामे खड़ी थी। ये जाने बिना कि वो जिस घर में क़दम रखने की सोच रही थी, उसकी हर दीवार पर पहले से एक निगाह टिकी थी।


उस रात नैना बहुत देर से घर लौटी। एक छोटा सा किराए का फ़्लैट, जहाँ एक नाइट लैंप जल रहा था। और उसकी मद्धम रौशनी में, दो तकियों के बीच, कायरा सोई थी। एक हाथ अब भी उस तरफ़ फैला हुआ, जहाँ कभी उसकी माँ सोती थी।

नैना बहुत देर तक दरवाज़े में खड़ी उसे देखती रही। छह साल की एक बच्ची, जिसकी पूरी दुनिया अब एक अदालत के एक फ़ैसले पर टिकी थी।

उसकी मुट्ठी में विहान का कार्ड था। सफ़ेद, सख़्त, महँगा। उस पर बस एक नाम और एक नंबर।

नैना ने सारी उम्र दूसरों की कसमें लिखी थीं। 'जीवन भर साथ'। 'सुख में, दुख में'। 'मौत भी हमें अलग न करे'। और हर बार उसने मन में सोचा था, कितना ख़ूबसूरत झूठ।

उसका अपना मंगेतर भी तो ऐसे ही एक वादे के साथ आया था। और उस दिन चला गया था जिस दिन नैना ने कहा था कि वो अपनी अनाथ भांजी को ख़ुद पालेगी। कसमें टूटती हैं। नैना ये किसी से बेहतर जानती थी।

पर आज एक आदमी उसके सामने एक ऐसा वादा रख गया था जो टूटने के लिए ही बना था। एक साल। कोई भावना नहीं। सिर्फ़ काग़ज़। सिर्फ़ शर्तें। और उस झूठे वादे के बदले में... कायरा। उसकी बहन की आख़िरी निशानी। एक घर। एक मौक़ा।

नैना ने काँपते हाथों से नंबर मिलाया। एक घंटी। दो। फिर वही सर्द, सधी हुई आवाज़।

"नैना।"

नैना ने आँखें बंद कर लीं। सात साल की सजाई हुई झूठी कसमें उसके गले में अटकी थीं। पीछे कमरे में कायरा की साँसें चल रही थीं। और नैना ने, ज़िंदगी में पहली बार, एक ऐसी कसम खाने का फ़ैसला किया जिस पर उसे ख़ुद यक़ीन नहीं था।

"हाँ।"

दूसरी तरफ़ एक पल की ख़ामोशी छा गई।

"मैं तैयार हूँ। ... कायरा के लिए।"

पहली कसम। पहला झूठ। ... और इस झूठ की असली क़ीमत, नैना को अभी चुकानी बाक़ी थी।

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