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अध्याय 5 / 28

नियम नंबर एक

कागज़ी कसमें द्वारा Avni Oberoi

उस दहलीज़ वाली रात को पूरे सात दिन बीत चुके थे। और उन सात दिनों में शीशे के उस घर ने एक नई ज़बान सीख ली थी, दफ़्तर की ज़बान। तय वक़्त, तय दूरियाँ, नाश्ते की मेज़ के दो सिरे, और उन दोनों के बीच एक अनकही, अनदेखी दीवार, जिसका नाम था, नियम नंबर एक। कोई जज़्बात नहीं।

"आपकी फ़ाइलें स्टडी में रख दी हैं, और पिहू का टिफ़िन तैयार है।" "गुड मॉर्निंग, मिस्टर विहान।"

"गुड मॉर्निंग। ... शुक्रिया।" "मैं निकल रहा हूँ। आज बोर्ड की मीटिंग है, लौटने में देर होगी।"

और वो लगभग भागता हुआ निकल गया। पूरे हफ़्ते से यही चल रहा था। दोनों एक ही घर में थे, एक ही मेज़ पर, और फिर भी एक-दूसरे से मीलों दूर। उस रात दहलीज़ पर जो एक इंच बची रह गई थी, उसका ज़िक्र किसी ने नहीं किया था। पर वो एक इंच अब पूरे घर में तैरती थी, हर कमरे में, हर ख़ामोशी में।

"नियम नंबर एक... कोई जज़्बात नहीं।" "सुन लिया नैना? कोई जज़्बात नहीं। ये सिर्फ़ काग़ज़ है। एक साल का इंतज़ाम। कायरा के लिए। बस इतना ही।"

पर जिस नियम को बार-बार दोहराना पड़े, वो नियम अंदर से टूट चुका होता है। नैना ने काग़ज़ को वापस दराज़ में डाल दिया, जैसे उसे बंद कर देने भर से दिल भी बंद हो जाएगा। उसे नहीं पता था कि उसी शाम, इस घर की सबसे सख़्त रात आने वाली थी। और उस रात के बाद, नियम नंबर एक फिर कभी पहले जैसा नहीं रहने वाला था।


और ठीक उसी दोपहर, शहर के दूसरे कोने में, एक शांत सा आदमी एक सस्ते से कैफ़े में बैठा, अपनी कॉफ़ी में चीनी घोल रहा था। रुस्तम। उसे जल्दी नहीं थी। उसके पेशे में जल्दी करने वाले सबूत खो देते हैं। वो किनारों पर काम करता था, वहाँ जहाँ लोग बात करते हैं, नाराज़ लोग, निकाले हुए लोग, और वो नौकर जिनकी ज़बान ढीली होती है।

"शुक्रिया। आपकी मदद याद रहेगी।" "एक डेकोरेटर, जिसे नैना ने पिछले महीने काम से निकाला था... और सिम्मी के ऑफ़िस का वो नया इंटर्न, जिसे ये तक नहीं पता कि किससे क्या कहना है, और क्या नहीं।"

और टुकड़ा-टुकड़ा, तस्वीर साफ़ होती जा रही थी। तारीख़ें आपस में मिलने लगी थीं। शादी से ठीक तीन हफ़्ते पहले तक, नैना और विहान ने एक-दूसरे का नाम तक नहीं सुना था। न कोई मुलाक़ात, न कोई पुरानी दोस्ती, न कोई प्रेम-कहानी। तीन हफ़्ते। और फिर अचानक, एक शादी।

"तीन हफ़्ते पुराना प्यार, एक साल पुरानी शादी का लिबास पहने हुए।" "काग़ज़ी। बिल्कुल काग़ज़ी।" "पर ये तस्वीर... इस आदमी की आँखों में जो है, वो तीन हफ़्ते में नहीं आता। हम्म। ... ख़ैर। तारीख़ें झूठ नहीं बोलतीं। और बहूजी को तारीख़ें चाहिए, तस्वीरें नहीं।"

उसने वो तारीख़ों वाली परची यूँ जेब में रखी, जैसे कोई चाकू म्यान में रखता है। एक सबूत तैयार था, और वो सीधा देवयानी के हाथ में जाने वाला था। पर अभी उसे थोड़ा इंतज़ार करना था। क्योंकि उसी रात, उस शीशे के घर में, अँधेरा एक बिल्कुल अलग कहानी लिखने वाला था।


रात के डेढ़ बजे। पूरा घर सो चुका था, शीशे की दीवारों के पार सिर्फ़ अँधेरा और शहर की दूर टिमटिमाती रौशनियाँ। और फिर, उस ख़ामोशी को चीरती हुई, एक आवाज़ आई। पहले एक कमरे से, एक बच्ची की तड़पती, बुख़ार में जलती कराह।

पिहू का नन्हा बदन बुख़ार से तप रहा था। विहान, जो कभी गहरी नींद सो ही नहीं पाता था, एक पल में उसके पास था, उसका माथा छूता हुआ, और उसका दिल डर से बैठ गया। और ठीक उसी पल, गलियारे के दूसरे सिरे से एक और आवाज़ आई। पर ये बुख़ार की कराह नहीं थी। ये एक चीख़ थी।

"मम्मा! ... मम्मा को मत ले जाओ!" "वो सफ़ेद गाड़ी... मम्मा, हाथ दो! मैं पकड़ लूँगी... मम्मा!"

"कायरा! कायरा, आँखें खोलो, मैं यहाँ हूँ।" "मौसी यहीं है, मेरी जान। कोई गाड़ी नहीं है, कोई किसी को नहीं ले जा रहा। बस एक सपना था... बस एक बुरा सपना था।"

और अचानक, उस अँधेरे गलियारे में, दो टूटे घरों की दो मुसीबतें आमने-सामने आ खड़ी हुईं। एक तरफ़ बुख़ार में जलती पिहू, दूसरी तरफ़ सपने में अपनी मरी हुई माँ को पुकारती कायरा। और बीच में वो दो अजनबी, जिन्होंने काग़ज़ पर कसम खाई थी कि वो कभी एक-दूसरे के क़रीब नहीं आएँगे।

"नैना, पिहू का बुख़ार बहुत तेज़ है।" "एक सौ तीन से ऊपर। थर्मामीटर टूट गया है, और काका गाँव गए हुए हैं। मुझे... मुझे समझ नहीं आ रहा क्या करूँ।"

"घबराइए मत। मैं सँभालती हूँ।" "फ़्रिज का ठंडा पानी नहीं, नल का सादा पानी लीजिए, एक कटोरी। और एक पतला रुमाल। पिहू के माथे और तलवों पर पट्टी रखनी है।" "और आप... आप ज़रा कायरा को पकड़िए। इसे अभी किसी का हाथ चाहिए, और मुझे पिहू को देखना है।"

और अगले ही पल, बिना सोचे, बिना किसी क्लॉज़ के, दोनों ने बच्चियाँ बदल लीं। नैना ने विहान की बुख़ार में जलती बेटी को गोद में लिया, और विहान ने नैना की काँपती हुई भांजी को। वो पत्थर बना आदमी, जो अपनी ही बीवी को छूने से डरता था, अब एक रोती हुई नन्ही बच्ची को सीने से लगाए बैठा था, जो उसकी अपनी थी भी नहीं।

"वो लोग... सफ़ेद गाड़ी में आए थे। मम्मा को ले गए।" "सब कहते हैं मम्मा तारा बन गई। पर तारे तो बहुत दूर होते हैं ना। मैं छू भी नहीं सकती उन्हें।"

"मुझे पता है, बेटा। ... मुझे बहुत अच्छे से पता है।" "पिहू की मम्मा भी तारा बन गई थी। बहुत साल पहले। और मैं भी बहुत दिनों तक यही सोचता रहा कि काश मैं उस रात उनका हाथ पकड़ लेता।" "पर सुनो... तारे छू नहीं सकते, ये सच है। पर वो हमें देखते ज़रूर हैं। हर रात।"

और नैना, पिहू के तपते माथे पर पट्टी रखते हुए ठिठक गई। वही अकड़ा हुआ, बर्फ़ जैसा आदमी अब उसकी कायरा के आँसू पोंछ रहा था, अपने ही सबसे गहरे ज़ख़्म से उसे दिलासा देते हुए। और उसी पल, नैना के भीतर वो बात उठ आई, जिसे वो सालों से दबाए बैठी थी।

"जिस रात रोशनी गई थी... मैं वहाँ नहीं थी।" "मैं एक क्लाइंट के संगीत में थी। किसी और की शादी सजा रही थी। किसी और दुल्हन को उसकी कसमें रटा रही थी।" "और मेरी अपनी बहन... मुझे बुला रही थी, और मैंने फ़ोन नहीं उठाया। कायरा की ये चीख़, ये सफ़ेद गाड़ी... मैं हर रात इसे सुनती हूँ, विहान।"

"मेहर के जाने की रात, मैं दफ़्तर में था।" "एक डील साइन कर रहा था। मेरा फ़ोन साइलेंट पर था।" "हम दोनों एक जैसे हैं, नैना। हम दोनों उस रात कहीं और थे, किसी काग़ज़ पर दस्तख़त करते हुए। ... शायद इसीलिए अब हम दोनों को काग़ज़ों पर इतना भरोसा है, और लोगों पर इतना कम।"

और वहीं, उस अँधेरे गलियारे के फ़र्श पर, दो बुख़ार में जलती-काँपती बच्चियों के बीच, नियम नंबर एक चुपचाप टूट गया। कोई जज़्बात नहीं, ये शर्त थी। पर उस रात, पहली बार, दोनों ने अपने सबसे गहरे जज़्बात एक-दूसरे के सामने रख दिए। किसी कैमरे के लिए नहीं, किसी अदालत के लिए नहीं। सिर्फ़ अपने लिए।

"देखिए... पिहू का बुख़ार उतर रहा है।" "पसीना आ गया इसे। अब ये चैन से सो जाएगी। और कायरा भी।" "आप बहुत अच्छे से सँभाल लेते हैं, विहान। पता नहीं आप ख़ुद को इतना पत्थर क्यों समझते हैं।"

"और तुम... तुम पूरी दुनिया की दुल्हनों को कसमें रटाती हो।" "पर आज मैंने देखा, तुम ख़ुद उन कसमों को कितनी सच्ची तरह निभाती हो। बिना किसी काग़ज़ के, बिना किसी शर्त के।"

और फिर वही एक इंच लौट आई। पर ये दहलीज़ वाली इंच नहीं थी, न कोई पड़ोसन देख रही थी, न कोई कैमरा तना था। ये असली थी, बेपर्दा, और इसीलिए दहलीज़ वाली इंच से हज़ार गुना ज़्यादा ख़तरनाक। और इस बार, किसी ने पीछे हटकर ख़ुद को नहीं बचाया। वो दोनों बस वहीं बैठे रहे, दो सोती बच्चियों को थामे, एक-दूसरे को देखते हुए, जब तक कि खिड़की के पार आसमान नीला न पड़ने लगा।

भोर होने को थी जब बुख़ार पूरी तरह उतर गया। थके-हारे, पर हल्के मन से, दोनों बच्चियों को उनके कमरे में लिटाने ले गए। पर कमरे की दहलीज़ पर दोनों ठिठक गए।

क्योंकि जिन दो अलग बिस्तरों पर उन्होंने बच्चियों को सुलाया था, वो दोनों अब ख़ाली थे। पिहू और कायरा, किसी तरह रात के अँधेरे में एक ही बिस्तर पर आ गई थीं, एक-दूसरे का हाथ थामे, माथे से माथा जोड़े। और उन दोनों के बीच, तकिये पर, वही मुड़ा-तुड़ा काग़ज़ रखा था। उनकी अपनी कसम, जिस पर बूढ़े काका का अँगूठा लगा था। दो बहनों का अनुबंध।

"मौसी... पिहू डर रही थी।" "इसलिए मैं इसके पास आ गई। बड़ी बहनें यही तो करती हैं ना।"

"हाँ मेरी जान। बड़ी बहनें बिल्कुल यही करती हैं।" "अब सो जाओ। दोनों। सुबह हो गई है।"

"एक हफ़्ते में... इन दोनों ने वो कर दिखाया, जो हम दो बड़े लोग एक काग़ज़ पर पूरा साल लगाकर भी शायद न कर पाएँ।" "ये बिना किसी शर्त के बहनें बन गईं।"

और यहीं इस पूरी कहानी की सबसे गहरी विडंबना थी। जिस रात इस काग़ज़ी घर में सब कुछ पहली बार सच हुआ था, हर आँसू, हर खुला हुआ जज़्बात, ठीक उसी रात कोई कैमरा नहीं था, कोई नज़र नहीं थी। बाहर की दुनिया के पास इस सच्ची रात का कोई सबूत नहीं था। पर उसके पास एक और ही सबूत तैयार खड़ा था, जिसे इस सच्ची रात की कोई परवाह ही नहीं थी।


उसी सुबह, शहर के दूसरे छोर पर, देवयानी के आलीशान ड्रॉइंग रूम में, संगमरमर और ठंडी रौशनी के बीच, रुस्तम एक पतली फ़ाइल लिए बैठा था। उसने वो फ़ाइल यूँ मेज़ पर रखी, जैसे कोई ताश का आख़िरी पत्ता रखता है।

"जो आपने माँगा था, बहूजी, वो मिल गया।" "शादी से ठीक तीन हफ़्ते पहले तक, ये दोनों एक-दूसरे को जानते तक नहीं थे। न कोई मुलाक़ात, न कोई रिश्ता। एक निकाला हुआ डेकोरेटर है, और एक ढीली ज़बान वाला इंटर्न। दोनों गवाही देंगे।" "तीन हफ़्ते, बहूजी। और फिर अचानक, एक शादी।"

"तीन हफ़्ते।" "जानती थी मैं। कोई औरत मेरी बेटी की जगह इतनी आसानी से नहीं ले सकती, जब तक कि उसके पीछे कोई सौदा न हो।"

"एक बात और कहूँ, बहूजी।" "काग़ज़ पर ये शादी झूठी है, इसमें कोई शक नहीं। पर मैं इन्हें कई हफ़्तों से देख रहा हूँ। और जो मैं कैमरे में देखता हूँ, वो हमेशा फ़ाइल की तारीख़ों से मेल नहीं खाता।" "ये लोग... इतने अच्छे कलाकार नहीं हैं।"

"कलाकार?" "बेटा, तुम तस्वीरें खींचते हो, दिल नहीं पढ़ते। मुझे इस बात से रत्ती भर फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वो एक-दूसरे को क्या समझते हैं।" "मुझे सिर्फ़ इस बात से फ़र्क़ पड़ता है कि जज उन्हें क्या समझेगा।"

और वो उठी, फ़ाइल हाथ में लिए खिड़की की ओर बढ़ी, जहाँ से दूर, शहर के उस पार, वो शीशे का घर चमक रहा था, जिसमें अभी-अभी एक सच्ची रात गुज़री थी। उसके होंठों पर वही तलवार जैसी मुस्कान थी।

"देख रहे हो वो घर, रुस्तम?" "उन्हें लगता है उन्होंने एक परिवार बना लिया है।" "पर ये शादी सिर्फ़ काग़ज़ की है। और काग़ज़, बेटा... काग़ज़ तो फाड़ा जा सकता है।"

और शहर के उस पार, उस शीशे के घर में, चार लोग चैन से सो रहे थे। दो नन्ही बहनें एक ही बिस्तर पर, हाथों में हाथ डाले। और दो बड़े लोग, जिन्होंने ज़िंदगी में पहली बार अपने दिल एक-दूसरे के सामने खोले थे। उन्हें नहीं पता था कि जिस काग़ज़ को उन्होंने कल रात सच बनाना शुरू किया था, ठीक उसी काग़ज़ को फाड़ने का फ़ैसला अभी-अभी, शहर के दूसरे छोर पर, ले लिया गया था।

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