अध्याय 16 / 28
नन्ही चाबी
कागज़ी कसमें द्वारा Avni Oberoi
विहान और नैना, कायरा और पिहू की मदद से, पिहू की भुला दी गई म्यूज़िक बॉक्स ढूँढ निकालते हैं, जिसकी तली में एक बारीक ताला जड़ा है, ठीक वैसा जैसा मेहर की चिट्ठी ने इशारा किया था। उसकी नन्ही चाबी ख़ुद पिहू बरसों से, बिना जाने, अपने ख़ज़ाने में सम्भाले हुए थी। रात को, बच्चियों के सोने के बाद, दोनों आख़िरकार वो ख़ाना खोलते हैं, पर वो ख़ाली मिलता है, बेदाग़ धूल और एक उलझे लाल धागे के साथ, जो साफ़ बता देते हैं कि उनसे पहले कोई और यहाँ आ चुका है।
नाश्ते की मेज़ अब सिर्फ़ खाने की मेज़ नहीं रही थी, विहान ने अपनी चाय एक ही घूँट में ख़त्म कर दी, जैसे वक़्त अचानक क़ीमती हो गया हो।
"काका को बुलाओ, नैना, पर अकेले में। कोने वाला स्टोर रूम, वहीं पिहू के पुराने सामान का संदूक़ रखा है, मेहर के जाने के बाद किसी ने वो कमरा खोला तक नहीं।" "बस याद रहे, वो कमरा उस दीवार वाली घड़ी के कैमरे की नज़र में नहीं आता।"
"अच्छा हुआ।" "पर काका को क्यों बुला रहे हो, सीधे ख़ुद वहाँ क्यों नहीं चलते?"
"क्योंकि उस कमरे की चाबी काका के पास है, नैना। मैंने ख़ुद कभी वो दरवाज़ा खोलने की हिम्मत नहीं जुटाई। एक साल से।"
उस एक वाक्य में विहान ने जितना कह दिया, उतना उसने पूरे साल में शायद किसी से नहीं कहा था, और नैना को समझ आ गया कि आज का दिन सिर्फ़ एक सुबूत ढूँढने का नहीं, एक बंद दरवाज़ा खोलने का भी था।
तभी सीढ़ियों पर दो जोड़ी नन्हे पैरों की आवाज़ आई, पिहू और कायरा, दोनों अभी भी नींद में झूलती हुई, पर दोनों की आँखें कल सुबह वाली उस तस्वीर से अब भी भरी हुई थीं, मम्मा-पापा का हाथ थामे खड़े रहना।
"म्यूज़िक बॉक्स?" "पापा, आप मेरा गाने वाला डिब्बा ढूँढ रहे हो? वो तो मम्मा का था!"
विहान की साँस एक पल को अटक गई। एक पाँच साल की बच्ची ने, बिना किसी को बताए, वही तार पकड़ लिया था जो एक बंद चिट्ठी ने रात भर उसे थमाया था।
"पिहू, चुप। पापा और मम्मा किसी ज़रूरी चीज़ की तलाश में हैं। हमें शोर नहीं मचाना, ठीक है?" "हम मदद करेंगे, पर चुपचाप।"
"हाँ बेटा, तुम्हारी मम्मा का म्यूज़िक बॉक्स।" "तुम्हें याद है वो कहाँ रखा है?"
पिहू ने माथे पर सलवटें डाल कर सोचा, जैसे कोई बड़ा फ़ैसला ले रही हो, फिर एक ज़ोर के इरादे से सिर हिलाया।
"पता है! ऊपर वाले कमरे में, बड़े संदूक़ में। काका अंकल ने कहा था वो मेरी बेबी वाली चीज़ें हैं, छूने नहीं दिया।" "पर अब तो मैं बड़ी हो गई हूँ ना, पापा?"
"बहुत बड़ी, मेरी जान। आज तुम हमें रास्ता दिखाओगी।"
काका दरवाज़े पर आ खड़े हुए, चेहरे पर वही जाना-पहचाना डर, पर आँखों में एक हल्की राहत भी, जैसे एक साल से इंतज़ार कर रहे हों कि कोई आख़िर उस कमरे का दरवाज़ा खोलने को कहे।
काका ने ताला खोला, दरवाज़ा भारी सी चरचराहट के साथ खुला, अंदर की हवा बासी थी, धूप की एक पतली लकीर परदे के किनारे से भीतर गिर रही थी।
कमरे के बीचों-बीच एक छोटा संदूक़ रखा था, ऊपर एक मोटी चादर, जैसे किसी ने जान-बूझकर उसे ढक कर भुला देना चाहा हो।
"मेहर ने ये सब ख़ुद सजाया था, पिहू के पैदा होने से पहले।" "मुझमें हिम्मत नहीं थी इसे फिर से देखने की।"
चादर हटते ही अंदर से निकलीं छोटी फ्रॉक्स, एक भूरा टेडी, हाथ से बना एक ग्रोथ चार्ट जिस पर मेहर की लिखावट में तारीख़ें थीं, और सबसे नीचे, मलमल में लिपटा एक लकड़ी का बक्सा।
"ये है ना, पिहू? यही तुम्हारा म्यूज़िक बॉक्स है?"
पिहू की आँखें बड़ी हो गईं, हाथ बढ़ा कर उसने बक्से पर बनी नक़्क़ाशी को छुआ, एक परी जो हाथ में एक तारा लिए उड़ रही थी।
"हाँ! ये वाला! मम्मा इसको घुमाती थीं और मैं सोती नहीं थी, बस सुनती रहती थी।" "मुझे उनकी आवाज़ याद नहीं है पापा, पर ये गाना... ये गाना जैसे याद है।"
उस एक वाक्य ने कमरे में मौजूद तीनों बड़ों को एक साथ चुप कर दिया, नैना की आँखें भर आईं, और विहान ने पिहू को कस कर गले लगा लिया, बहुत देर तक।
"पिहू, कभी-कभी गाना याद रहना भी काफ़ी होता है। मुझे भी मम्मी रोशनी की लोरी याद है, चेहरा नहीं।"
विहान ने बक्से को घुमाया, ऊपर की चाबी वाली घुंडी ढूँढी, पर घुमाते ही एक धीमी, भर्राई हुई धुन बजने की जगह, एक हल्की सी क्लिक की आवाज़ के साथ बक्सा रुक गया।
"ये नहीं बज रहा। पहले तो बजता था, मुझे याद है, शादी से बहुत पहले..." "नैना, नीचे एक अलग सा ख़ाना है। एक छोटे से ताले वाला।"
नैना ने बक्से को उलट कर देखा, नीचे सच में एक बारीक, नन्हा सा ताला जड़ा था, इतना छोटा कि आम चाबी उसमें फिट ही न हो।
"इसकी चाबी... मेहर ने चिट्ठी में लिखा था सच यहीं छुपा है। पर इस ताले की चाबी कहाँ है, इतनी छोटी चाबी तो कहीं भी हो सकती है।"
और तभी पिहू ने, बिना किसी ड्रामे के, अपनी फ्रॉक की जेब से एक धागे में पिरोई हुई छोटी सुनहरी चीज़ निकाली।
"ये? ये तो मेरी है। मम्मा ने दी थी, कहा था कभी मत खोना, ये मेरा ख़ज़ाना है।" "मैं इसे रोज़ अपने ट्रेज़र टिन में रखती हूँ, दीदी को भी पता है।"
"पापा! मैंने वो देखी है, कई बार। पिहू के गुड़िया वाले डिब्बे में, वो कहती है ये उसकी सबसे क़ीमती चीज़ है।"
विहान ने काँपते हाथों से वो नन्ही चाबी ली, बिलकुल उस ताले के नाप की, और समझ गया कि मेहर ने अपनी सबसे बड़ी हिफ़ाज़त सबसे मासूम हाथों में सौंपी थी, जान-बूझकर।
"तुमने इसे पूरे एक साल सम्भाल कर रखा, बेटा। बिना जाने क्यों।" "तुम्हारी मम्मा को तुम पर कितना भरोसा था।"
पर ठीक जब विहान ने वो चाबी ताले की तरफ़ बढ़ाई, नैना ने उसका हाथ रोक दिया।
"अभी नहीं। बच्चों के सामने नहीं, और दिन की रोशनी में भी नहीं। अगर अंदर वो है जिसका डर देवयानी को है, तो हमें एक पल की भी लापरवाही नहीं करनी।"
उसी शाम, शहर के दूसरे छोर पर, एक छोटे किराए के दफ़्तर में, रुस्तम अपनी स्क्रीनों के सामने बैठा वही पुराना फ़ुटेज बार-बार देख रहा था, नाश्ते की मेज़ पर विहान की ख़ाली कुर्सी, फिर बाद में दोनों का हाथ थामे खड़ा होना।
चार महीने पहले जब देवयानी ने ये काम सौंपा था, रुस्तम को यक़ीन था ये एक आसान सौदा है, एक झूठी शादी का पर्दाफ़ाश, कुछ हफ़्तों का काम। पर स्क्रीन पर जो वो अब देख रहा था, वो झूठ नहीं लग रहा था।
उसने फ़ुटेज को धीमा किया, वही लम्हा जब विहान ने नैना का हाथ पकड़ा था, ठीक कैमरे के सामने, बिना ये जाने कि कोई देख रहा है। एक असली आदमी की तरह, दिखावे के लिए नहीं।
तभी उसका फ़ोन बजा, स्क्रीन पर सिर्फ़ एक नाम, देवयानी।
फ़ोन उठाते ही दूसरी तरफ़ से देवयानी की आवाज़ किसी हुक्म की तरह गिरी, "रुस्तम, चार महीने हो गए। मुझे नतीजा चाहिए, सबूत चाहिए, कोई भी दरार जो मैं अदालत में इस्तेमाल कर सकूँ। तुम्हारी तनख़्वाह किसी फ़ुटेज देखने के लिए नहीं है, कुछ तोड़ने के लिए है।"
"जल्द ही, देवयानी जी। कुछ ऐसा मिला है जिसे पक्का करने में थोड़ा वक़्त लगेगा।" "जल्दबाज़ी में ग़लत सबूत आपके ही ख़िलाफ़ जा सकता है।"
देवयानी की आवाज़ और तीखी हो गई, "थोड़ा वक़्त? रुस्तम, मुझे लग रहा है तुम भूल रहे हो कि पैसे किसकी जेब से आ रहे हैं।" फिर फ़ोन कट गया, बिना अलविदा कहे।
रुस्तम ने फ़ोन नीचे रखा, पर स्क्रीन को देखता रहा, वही जमी हुई तस्वीर, दो हाथ जो एक-दूसरे को थामे हुए थे।
चार महीने पहले वो सिर्फ़ एक जासूस था, एक हिसाब बराबर करने वाला आदमी। आज रात, पहली बार, उसे एहसास हुआ कि उसके कैमरे ने जो कुछ चुराया है, वो एक झूठ का सुबूत नहीं, एक सच्चे प्यार का गवाह बन चुका है।
रुस्तम ने लैपटॉप बंद किया, अंधेरे में देर तक बैठा रहा, ये तय न कर पाते हुए कि जो काम उसने लिया था, वो अब किस क़ीमत पर पूरा करना मुमकिन होगा।
रात गहरी होते ही, दोनों बच्चियों को सुला कर, नैना और विहान दबे पाँव उसी स्टोर रूम में लौट आए, हाथ में एक टॉर्च, और वो नन्ही चाबी।
"अगर अंदर कुछ नहीं निकला तो?" "अगर मेहर की चिट्ठी सिर्फ़ एक डरी हुई औरत का वहम थी तो?"
"तो भी हमने कोशिश की, विहान। चाहे कुछ भी निकले, हम साथ देखेंगे।"
विहान ने वो नन्ही चाबी उस बारीक ताले में डाली, एक हल्का सा प्रतिरोध, फिर एक धीमी सी 'खट' की आवाज़, जैसे एक साल पुराना ताला आख़िरकार हार मान रहा हो।
नीचे का पतला ख़ाना बाहर खिसका, और दोनों ने साथ में टॉर्च की रोशनी उसके अंदर डाली।
अंदर कुछ नहीं था। कोई काग़ज़ नहीं, कोई तस्वीर नहीं, कोई पेन ड्राइव नहीं, सिर्फ़ मख़मल की एक पतली परत, जिस पर धूल की एक भी तह तक नहीं जमी थी।
"विहान... ये ख़ाली नहीं है, ये खाली किया गया है। यहाँ धूल तक नहीं है, बाक़ी बक्से में तो एक साल की धूल जमी है।"
विहान की टॉर्च एक कोने पर ठिठक गई, मख़मल की परत का एक कोना हल्का सा उधड़ा हुआ था, और उसमें उलझा था लाल धागे का एक बारीक़ सा टुकड़ा, बिलकुल वैसा जैसा कोर्ट की फ़ाइलों को बाँधने में इस्तेमाल होता है।
"कोई पहले ही यहाँ आ चुका है, नैना।" "और उन्हें भी वही चाबी मिल गई थी जो एक साल से हमारी पिहू के गले में लटकी थी।"
टॉर्च की उस काँपती रोशनी में, ख़ाली मख़मल के उस टुकड़े के सामने, दोनों को एक साथ यक़ीन हो गया कि मेहर का छुपाया सच अब उनके हाथ में नहीं, किसी और के क़ब्ज़े में जा चुका था, और वो कोई और, इस पूरे साल, उनके अपने घर जितना क़रीब रहा होगा।
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