अध्याय 22 / 28
मेहर की मौत
कागज़ी कसमें द्वारा Avni Oberoi
देवयानी के इल्ज़ाम के बाद अदालत की रिसेस में विहान आख़िरकार नैना के सामने उस रात का पूरा सच खोलता है, और एक याद में मेहर की अपनी आवाज़ बता देती है कि उसकी बीमारी उससे नहीं, उसकी माँ की सिखाई हुई कमज़ोरी छुपाने की आदत से छुपाई गई थी। कठघरे में लौट कर विहान सच बोल देता है, कमरा देवयानी के ख़िलाफ़ पलट जाता है, और वो नियम नंबर एक तोड़ कर नैना से हमेशा के लिए सच्ची शादी माँग बैठता है।
कमरे में अभी भी वही सन्नाटा था जो देवयानी के लफ़्ज़ों के बाद उतरा था, और विहान की कुर्सी की कड़ी लकड़ी के सिवा कोई हिलने को तैयार नहीं था। जज ने अपनी ऐनक ठीक की, और एक पल को भी विहान से नज़र नहीं हटाई।
जज ने आगे झुक कर पूछा, श्रीमान विहान, अदालत आपसे सीधा जवाब चाहती है, क्या आप इस इल्ज़ाम पर कुछ कहना चाहेंगे?
"मैं..." "मैं उस रात वहाँ नहीं था, जज साहिबा। ये... ये सच है।"
अदालत में एक हल्की सी सरगोशी दौड़ गई, और देवयानी के वकील ने पहली बार दिनों में अपनी मुस्कान दबाने की ज़हमत तक नहीं उठाई।
"सच बोल दिया, आख़िरकार।" "तो अदालत को ये भी बता दीजिए, श्रीमान, कि उस रात आप कहाँ थे, जब आपकी बीवी को साँस लेने में तकलीफ़ हो रही थी, और आपका फ़ोन बंद था।"
"मैंने... मैंने सोचा था वो ठीक हो जाएगी। उसने ख़ुद कहा था कि वो ठीक है।" "मुझे नहीं पता था, देवयानी जी। भगवान गवाह है, मुझे नहीं पता था।"
"नहीं पता था? या जानना ही नहीं चाहा? एक अरबों की कंपनी का मालिक अपनी बीवी के लिए एक डॉक्टर तक नहीं बुला सका।" "मेरी मेहर अकेली मरी, श्रीमान विहान। इससे बड़ा इल्ज़ाम और क्या होगा?"
गैलरी में देवेंद्र की आँखें एक पल को बंद हो गईं, जैसे उन्होंने वो लफ़्ज़ सुने हों जो वो ख़ुद बरसों से भीतर दबाए बैठे थे, और उनके हाथ की मुट्ठी उस भारी बैग पर और कस गई, जिसे उन्होंने अब तक किसी को नहीं दिखाया था।
"जज साहिबा, अनुमति दीजिए।" "मुझे अपने पति के साथ खड़े होने का हक़ है, और सच बोलने का भी।"
जज ने अपनी हथौड़ी नहीं उठाई, सिर्फ़ एक लंबी साँस ली, फिर बीस मिनट की रिसेस का ऐलान कर दिया। उसने साफ़ कहा, जब अदालत दोबारा जुटेगी, वो पूरा सच सुनना चाहेगी, अधूरा नहीं।
गैलरी में कायरा ने पिहू की उंगलियाँ कस कर पकड़ लीं, ठीक वैसे जैसे उसने महीनों पहले तूफ़ान वाली रात पकड़ी थीं, और काका, जो किसी बहाने अदालत तक चला आया था, दोनों को कंधों से घेर कर बाहर, गलियारे की धूप में ले गया। "समोसे खाओगी, दोनों? कोर्ट का समोसा दुनिया का सबसे ख़राब समोसा होता है, चलो देखते हैं," उसने बड़बड़ाते हुए कहा, सिर्फ़ इसलिए कि दोनों बच्चियाँ एक पल को कुछ और सोचें।
बीस मिनट की रिसेस में उन्हें एक तंग, खिड़की-रहित कमरे में बिठाया गया, जहाँ सिर्फ़ एक मेज़, दो कुर्सियाँ, और दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक थी।
"विहान, मुझे देखो।" "उस रात हुआ क्या था? पूरा सच। मुझसे नहीं, ख़ुद से मत छुपाओ।"
"बोर्ड मीटिंग थी, नैना। कंपनी डूब रही थी, तीन सौ लोगों की नौकरी दांव पर थी।" "मैंने मेहर को फ़ोन किया, पूछा, आऊँ क्या, और उसने कहा, नहीं, तुम जाओ, मैं ठीक हूँ।"
उसके हाथ मेज़ पर काँप रहे थे, जैसे वो अब भी उसी फ़ोन कॉल को पकड़े बैठा हो।
"मैं मीटिंग में रुका रहा। जब लौटा, वो जा चुकी थी।" "और देवयानी की बात सही है, अगर मैं उस रात वहाँ होता..."
"रुको। ये तुमने किससे पूछा कि तुम्हारे होने से क्या बदल जाता? डॉक्टर से? या सिर्फ़ अपने आप से, हर रात, अकेले?"
विहान का जवाब एक साँस के लिए अटक गया, जैसे किसी ने उससे पहली बार वो सवाल पूछा हो जो एक साल से उसकी अपनी आवाज़ ही उससे कभी नहीं पूछ पाई थी।
"मेहर की चिट्ठी में एक स्याह पंक्ति भी थी, विहान, याद है? कि उसकी बीमारी की कहानी पूरी सच नहीं थी।" "क्या हम अब भी नहीं जानते, वो अधूरी बात असल में क्या थी?"
"नहीं, नैना। मुझे बस इतना पता है कि जो कुछ भी अधूरा है, उसकी जड़ भी देवयानी तक ही जाती है।" "आज मैं सिर्फ़ अपने हिस्से का सच बोल सकता हूँ। बाक़ी सच शायद अभी किसी और की जेब में बंद है।"
और उसी पल, उस तंग कमरे की घड़ी की टिक-टिक के नीचे, विहान की आँखों के आगे वो रात फिर से खुल गई, ठीक वैसे जैसे वो एक साल से उसे बंद रखने की कोशिश करता आया था। फ़ोन की घंटी, मेहर की आवाज़, हर लफ़्ज़ वैसा ही जैसा वो उस रात याद करता था।
"विहान, तुम जाओ। तीन सौ घरों का सवाल है, मेरा सर दर्द तो कल तक ठीक हो जाएगा।" "पिहू सो रही है। मैं बस लेट जाऊँगी। जाओ, प्लीज़।"
उस वक़्त उसे नहीं पता था कि मेहर के सर दर्द के पीछे हफ़्तों से एक बीमारी छुपी बैठी थी, ऐसी बीमारी जिसे बताने से उसे रोका गया था, और रोकने वाली उसकी अपनी माँ थी।
"मम्मी कहती हैं कमज़ोर मत दिखो, विहान के घर वालों के सामने कभी बीमार मत पड़ो, वरना वो सोचेंगे मेहर की सेहत ठीक नहीं, ट्रस्ट का सौदा बिगड़ जाएगा।" "मुझे बचपन से यही सिखाया गया, दर्द छुपाओ, मुस्कुराओ।"
उसे याद आया, चिट्ठी की वो पंक्ति जो उसने पिछले महीने पढ़ी थी, कि दिवाली की उस रात मेहर बुख़ार में तप रही थी, फिर भी देवयानी के कहने पर मुस्कुरा कर मेहमानों से मिली थी, और अगले दिन अस्पताल जाने से पहले ही बेहोश हो गई थी, इसे भी घर के भीतर ही दबा दिया गया था।
"इसीलिए मैंने मम्मी से दूरी बना ली थी, विहान। हर बार जब मैं क़रीब जाती, वो मुझे फिर सिखाने लगतीं कि दर्द कैसे छुपाया जाता है।" "मैं नहीं चाहती थी पिहू भी वही सीखे।"
कॉल वहीं कट गया था, जैसे वो एक साल से कटता आया था, इससे पहले कि विहान उससे पूछ पाता कि दर्द असल में कैसा था, कितना पुराना था, किसने उसे इतने बरसों तक छुपाना सिखाया था।
बीस मिनट पूरे होते ही चपरासी ने फिर बुलावा भेजा, और विहान उस याद से बाहर निकल कर, नैना का हाथ थामे, वापस उसी कठघरे की तरफ़ चला। इस बार क़दम पहले से भारी नहीं, हल्के थे।
जज ने अपनी ऐनक ठीक की, और बहुत सीधे लहज़े में कहा कि अदालत अब अधूरा नहीं, पूरा सच सुनना चाहती है।
"जज साहिबा, मैं एक साल से ख़ुद को उस रात का मुजरिम मानता आया हूँ। पर आज सुबह मुझे पता चला कि मेहर की बीमारी की कहानी अधूरी थी, और अधूरी इसलिए थी क्योंकि उसे कमज़ोरी छुपाने पर मजबूर किया गया था।" "मैंने अपनी बीवी को नहीं खोया, जज साहिबा। मेरी सास ने अपनी बेटी की तक़लीफ़ को इतने बरस छुपाया कि जब तक हम में से किसी को पता चलता, बहुत देर हो चुकी थी।"
अफ़ताब खड़ा हुआ और जज की मेज़ पर मेहर की उस चिट्ठी की एक प्रमाणित प्रति रख दी, वही चिट्ठी जो एक साल स्टडी की दराज़ में बंद पड़ी रही थी, अब सुबूत के तौर पर दर्ज होने को तैयार।
कमरे की वो सर्द लहर, जो अभी-अभी विहान के ख़िलाफ़ फैली थी, इस बार धीरे-धीरे दिशा बदलने लगी, और सबकी निगाहें अब देवयानी की तरफ़ मुड़ गईं।
"ये झूठ है, बेबुनियाद इल्ज़ाम है, इस आदमी के पास कोई सुबूत नहीं..."
जज ने अपना हाथ उठा कर देवयानी को रोक दिया, आवाज़ में इस बार वही ठंडक थी जो अभी तक सिर्फ़ विहान के लिए बची थी। उसने कहा कि आज की सुनवाई सुबूत दोनों तरफ़ से माँगेगी, सिर्फ़ इल्ज़ाम एक तरफ़ से नहीं चलेगा।
नैना अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई, ठीक वैसे जैसे उसने रिसेस वाले कमरे में कहा था, और विहान के कंधे के बराबर आ खड़ी हुई। दोनों के बीच अब कोई काग़ज़ नहीं था, सिर्फ़ एक फ़ैसला था जो दोनों ने मिल कर लिया था।
और ठीक उसी पल, अदालत की उस ठंडी हवा में, विहान ने वो किया जो उसने ख़ुद से क़सम खाई थी कभी नहीं करेगा।
"जज साहिबा, माफ़ी चाहूँगा, ये अदालत की भाषा नहीं है, पर मुझे अब और नहीं छुपाना।" "ये शादी काग़ज़ पर शुरू हुई थी, नैना। पर मैं अब इसे काग़ज़ पर ख़त्म नहीं होने देना चाहता, कभी नहीं। मैं इसे हमेशा के लिए असली चाहता हूँ।"
कमरे में हर साँस एक साथ रुक गई, जज की क़लम, देवयानी के वकील की फ़ाइलें, गैलरी में एक-दूसरे की उंगलियाँ कस के थामे कायरा और पिहू, सब एक पल को थम गए।
देवयानी की कुर्सी की पीठ पर उसकी उंगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं, पर उसके मुँह से कुछ नहीं निकला, जैसे उसे पहली बार एहसास हुआ हो कि आज की लड़ाई वो हार चुकी है।
नैना की आँखों में एक साथ डर और एक साल का इंतज़ार दोनों उमड़ आए, जैसे उसे ख़ुद नहीं पता था कि उसका अपना जवाब आख़िर कौन-सा शब्द बनेगा।
विहान ने नैना की तरफ़ हाथ बढ़ाया, आँखों में एक साल के डर के बाद पहली बार सिर्फ़ एक सवाल था। और पूरी अदालत उसी एक जवाब के इंतज़ार में साँस रोके बैठी रही।
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