Chapter 15 of 28
मेहर की चिट्ठी
सुबह होते ही नैना विहान को स्टडी में रात भर की उसी हालत में पाती है, चिट्ठी अब भी उसके हाथ में खुली। दोनों साथ बैठ कर मेहर के आख़िरी शब्द पढ़ते हैं, देवयानी के नियंत्रण से भागती एक बेटी की चिट्ठी, जिसे डर था कि उसकी माँ एक दिन जायदाद के लिए पिहू को हथिया लेगी, और जिसकी आख़िरी ख़्वाहिश थी कि विहान ख़ुद को माफ़ कर के दोबारा प्यार करे। पर चिट्ठी में एक और स्याह पंक्ति है, मेहर की बीमारी की असली कहानी शायद देवयानी के सिवा किसी को नहीं मालूम, और एक छुपे सुबूत का इशारा भी। नैना और विहान अब आख़िरकार एक ही तरफ़ खड़े हो कर तय करते हैं कि अब छुपना नहीं, सच ढूँढना है, चाहे क़ीमत कुछ भी हो।
खिड़की के बाहर आसमान की काली चादर धीरे-धीरे स्लेटी होने लगी थी, और विहान अब भी स्टडी की उसी कुर्सी पर बैठा था, हाथ में वो खुला ख़त लिए, जैसे रात भर हिला तक न हो।
नैना की आँख जल्दी खुल गई। आदत से मजबूर, नाश्ते से पहले वो एक बार कायरा-पिहू के कमरे में झाँक आई, दोनों बहनें गहरी नींद में एक-दूसरे से लिपटी थीं, वही पुराना काग़ज़ का फूल दोनों की मुट्ठियों के बीच दबा हुआ।
नीचे नाश्ते की मेज़ पर विहान की जगह ख़ाली थी। काका की परेशान शक्ल ख़ुद बता रही थी कि साहब रात भर स्टडी से बाहर नहीं निकले, और चाय भी वहीं ठंडी पड़ी रह गई थी।
काका दो बार चाय की ट्रे लिए स्टडी के दरवाज़े तक आए, और दोनों बार बिना कुछ कहे लौट गए, क्योंकि साहब की वो सूनी नज़र काग़ज़ पर ऐसे टिकी थी कि उन्हें डर लगा कोई आवाज़ भी उसे तोड़ देगी।
"विहान?" "तुम रात भर यहीं बैठे रहे? तुम्हारा चेहरा... क्या हुआ, बताओ मुझे।"
विहान ने सिर उठाया, आँखें लाल, थकी हुई, जैसे किसी ने उसकी अंदर की पूरी दुनिया रात भर में उलट कर रख दी हो।
"मैंने मेहर की चिट्ठी पढ़ ली, नैना।" "एक साल... एक साल मैं इससे डरता रहा। और अब जब पढ़ ली है, तो लग रहा है जैसे मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी ग़लत समझी थी।"
"तो अब अकेले मत ढोओ इसे।" "जो भी लिखा है, हम साथ पढ़ेंगे। आज से नहीं, कल से ही, अकेले कुछ नहीं।"
काग़ज़ पुराना पड़ चुका था, किनारे हल्के पीले, स्याही कहीं-कहीं धुँधली, जैसे इस पर आँसू गिरे हों, लिखते वक़्त, या शायद बाद में, विहान के अपने, जब भी उसने इसे छूने की हिम्मत जुटाई और वापस रख दी।
विहान ने काँपते हाथों से काग़ज़ को सीधा किया, एक गहरी साँस ली, और पहली बार, मेहर के शब्द ज़ोर से पढ़ने लगा।
काग़ज़ पर लिखा था, "विहान, अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो मैं जा चुकी हूँगी, और तुमने आख़िरकार वो हिम्मत जुटा ली जो मुझे हमेशा पता थी तुम्हारे अंदर है।"
"तुम्हें पता है मैं अपनी मम्मी के क़रीब कभी नहीं रही, पर तुम्हें ये कभी नहीं पता था क्यों। मम्मी को मेरी ख़ुशी नहीं चाहिए थी, विहान। उन्हें बस ये चाहिए था कि मैं उनकी मुट्ठी में रहूँ, हर फ़ैसला उनका हो, हर पैसा उनके हाथ से गुज़रे।"
"जब पिहू पैदा हुई, मम्मी की आँखों में जो चमक आई, वो नानी वाला प्यार नहीं था। मैंने वो चमक पहचान ली, वही चमक जो उन्होंने मेरे पापा के ट्रस्ट के काग़ज़ों पर देखी थी। मुझे डर है, विहान, अगर मुझे कुछ हो गया, तो वो पिहू को मेरी बेटी नहीं, अपनी जायदाद की चाबी समझेंगी।"
"जायदाद की चाबी।" "एक बच्ची को चाबी समझना... मुझे यक़ीन नहीं आ रहा कोई नानी, कोई दादी ऐसा सोच भी कैसे सकती है।"
"उसे पता था।" "मेहर को शुरू से पता था, और मैंने कभी सुना नहीं। मैं सोचता रहा देवयानी बस एक दुखी माँ हैं जो अपनी बेटी को खो चुकी हैं।"
"तुम्हें कैसे पता होता, विहान? मेहर ने ख़ुद तुम्हें कभी नहीं बताया।" "आगे पढ़ो। रुको मत।"
और फिर, काग़ज़ पर, मेहर के आख़िरी शब्दों का सबसे भारी हिस्सा आया, "विहान, मेरी सबसे आख़िरी ख़्वाहिश ये नहीं कि तुम मेरे लिए मातम मनाते रहो। मेरी ख़्वाहिश ये है कि तुम ख़ुद को माफ़ कर दो, और दोबारा प्यार करो।"
"पिहू को एक हँसती हुई माँ चाहिए, विहान, एक मरी हुई की सिर्फ़ यादें नहीं। जो भी वो लड़की होगी जो तुम्हारा हाथ थामेगी, उसे बताना कि मेहर ने ख़ुद उसे इजाज़त दी थी, बहुत पहले।"
"और अगर वो लड़की तुम्हारे घर में पहले से ही है, अगर उसने पहले ही मेरी पिहू को हँसाना सिखा दिया है, तो मुझसे इजाज़त माँगने की भी ज़रूरत नहीं, विहान। बस उससे कहना, मेहर की तरफ़ से शुक्रिया।"
"मेरी पिहू को बताना, जब वो बड़ी हो, कि उसकी मम्मा ने उसे किसी काग़ज़ी जायदाद से नहीं, अपनी पूरी जान से चाहा था। और ये भी, कि प्यार करने के लिए एक ही माँ काफ़ी नहीं होती, जितनी मिल जाए, उतनी कम है।"
"विहान..." "उसने तुम्हें आज़ाद कर दिया था। एक साल पहले ही, बिना जाने कि तुम्हें आज़ादी कब मिलेगी।" "रोशनी ने भी शायद मुझसे यही कहा होता, कि मैं ख़ुद को जीने का हक़ दूँ।"
"और मैं एक साल से ख़ुद को इसी गुनाह में बंद रखे बैठा था, कि तुमसे प्यार करना मेहर के साथ बेवफ़ाई है।" "मेहर ने ख़ुद मुझे इजाज़त दी थी, नैना। मेरे तुमसे मिलने से भी पहले।"
पर जैसे विहान ने अगला पन्ना पलटा, उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई, क्योंकि मेहर के शब्द अब एक अलग सुर में बदल गए थे, डर का सुर, जैसे लिखते वक़्त भी वो पीछे मुड़ कर देख रही हो।
"एक बात और है, विहान, जो शायद तुम्हें कभी पूरी तरह पता नहीं चली। मेरी बीमारी की जो कहानी सबको मालूम है, वो पूरी सच नहीं है। जब मुझे पहली बार डर लगा था, अस्पताल जाने से बहुत पहले, मम्मी ने कहा था, ये घर की इज़्ज़त का सवाल है, कमज़ोरी मत दिखाना, बाहर किसी को पता मत चलने देना।"
"विहान... इसका मतलब क्या है? देवयानी को कुछ पता था? कुछ ऐसा जो..."
"मैं नहीं जानता, नैना। पर अगर ये सच है..." "तो जो कहानी मुझे बताई गई थी, कि मेहर की बीमारी अचानक, बिना किसी वजह के बढ़ गई, वो कहानी शायद पूरी नहीं थी।"
और अचानक विहान को वो अदालती अर्ज़ी याद आई, मेहर की जायदाद और ट्रस्ट की, जो कुछ हफ़्तों पहले उसने ख़ुद देवयानी के काग़ज़ों में दबी हुई खोदी थी। मेहर की चिट्ठी और वो अर्ज़ी, दोनों अब एक ही डर की तरफ़ इशारा कर रहे थे।
"मैं उसी घर में था, नैना, हर रात, हर दिन। और मुझे कभी शक तक नहीं हुआ कि कोई उसे इतना डरा रहा है।" "अब मैं ये पिहू के साथ नहीं होने दूँगा। कभी नहीं।"
"मुझे लगता था कोई मुझ पर नज़र रखे हुए है, विहान, अपने आख़िरी महीनों में। घर के भीतर से, बाहर से भी। शायद मेरा वहम था। या शायद नहीं।"
और फिर, आख़िरी पंक्तियों में, मेहर ने एक बात और लिख छोड़ी थी, "मैंने कुछ रखा है, विहान, अपने बचाव के लिए, अपनी बेटी के भविष्य के लिए। अगर कभी ज़रूरत पड़े, तो पिहू की उस पुरानी म्यूज़िक बॉक्स को ढूँढना, वो जो मेरी अम्मा ने मुझे दी थी। सच वहीं छुपा है।"
"एक म्यूज़िक बॉक्स।" "विहान, ये कोई विदाई की चिट्ठी नहीं है। ये एक नक़्शा है।"
ठीक उसी वक़्त ऊपर कायरा और पिहू की आँख खुली, और सीढ़ियों से उतरते हुए दोनों ने देखा कि मम्मा-पापा नाश्ते की मेज़ से भी दूर, स्टडी की खिड़की के पास, सिर जोड़े कुछ बहुत ग़ौर से बात कर रहे थे, हाथ अब भी थामे हुए।
"दीदी, देखो! मम्मा-पापा का हाथ अभी भी साथ है।" "हमारा प्लान सच में काम कर गया ना?"
"हाँ, पिहू। पर पापा के चेहरे पर कुछ और भी है।" "जैसे कोई नई मुश्किल। हमें पता करना होगा वो क्या ढूँढ रहे हैं। हम भी मदद कर सकते हैं।"
खिड़की से अब पूरी सुबह की रोशनी भीतर आ रही थी, और विहान, जो रात भर एक क़ब्र की तरह ख़ामोश बैठा था, अब पहली बार सीधा बैठा, कंधे तने हुए।
"बहुत हो गया छुपना, नैना।" "एक साल से मैं देवयानी की हर चाल का जवाब सिर्फ़ बचाव में देता रहा हूँ। अब नहीं। अगर मेहर ने सच छुपाया है मेरे लिए, हमारी बेटी के लिए, तो मैं उसे ढूँढ निकालूँगा।"
"हम ढूँढ निकालेंगे।" "मैं अब सिर्फ़ कायरा के लिए नहीं लड़ रही, विहान। मैं तुम्हारे लिए भी लड़ रही हूँ। हम दोनों के लिए।"
"अफ़ताब को कल सुबह बुलाना होगा।" "और पिहू के पुराने सामान वाले संदूक़ में वो म्यूज़िक बॉक्स ढूँढनी होगी, चाहे पूरा घर उलट देना पड़े।"
"और देवयानी को कानोंकान ख़बर नहीं होनी चाहिए कि हम जानते हैं।" "जो सुबूत मेहर ने छुपाया है, वो हमें उन तक पहुँचने से पहले हाथ लगना चाहिए।"
और वहाँ, उस सुबह की धूप में, दो लोग जो तीन महीने पहले तक अजनबी थे, आख़िरकार एक ही तरफ़ खड़े हो गए, न काग़ज़ के लिए, न कायरा और पिहू के लिए, बल्कि एक-दूसरे के लिए।
"नैना, एक साल मैं एक क़ब्र की रखवाली करता रहा।" "आज से मुझे एक भविष्य चाहिए। तुम्हारे साथ। ये कोई अनुबंध की शर्त नहीं है। ये मेरा अपना फ़ैसला है।"
मेहर की उस ख़त की आख़िरी पंक्ति और एक ज़िंदा औरत के हाथ की गर्माहट, दोनों एक ही सुबह विहान को एक ही रास्ते पर ला खड़ा कर चुके थे। एक क़ब्र नहीं, एक भविष्य। और उस भविष्य की पहली शर्त थी, अब सच को छुपाना नहीं, उसे ढूँढ निकालना, चाहे उसकी क़ीमत कुछ भी हो, चाहे देवयानी तक पहुँचने में जितना वक़्त लगे। दीवार पर टंगे उस लाल घेरे वाले कैलेंडर की नौ महीने की उलटी गिनती अब सिर्फ़ गिनने की चीज़ नहीं रही, आज से वो हराने की चीज़ बन गई थी।
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