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Chapter 10 of 28

मेहर का हिस्सा

कागज़ी कसमें by Avni Oberoi

विहान के लैपटॉप की वो ठंडी नीली रोशनी अब बैठक-घर की उस घड़ी वाली आँख से दूर, बगीचे के उसी कोने में जल रही थी, जहाँ कोई दीवार कान नहीं लगाती थी। बेंगलुरु की रात गुनगुनी थी, पर हाथ में पकड़ी वो सच्चाई किसी बर्फ़ के टुकड़े जैसी ठंडी। दो लोग एक बच्ची की क़ीमत को घूरे जा रहे थे, सादे अक्षरों में, रुपयों में लिखी हुई।

"मैंने ये अर्ज़ी रात भर पढ़ी है, नैना। बार-बार। पर लफ़्ज़ अपनी जगह से हिलते ही नहीं।" "मेहर के शेयर, उसका ट्रस्ट, देवयानी की हर अर्ज़ी... सब घूम-फिर कर एक जगह आ मिलती हैं। जिसके पास पिहू की कस्टडी, उसके पास मेहर का पूरा हिस्सा।"

"और आप पूरे एक साल यही मानते रहे कि वो बस एक टूटी हुई नानी है, जो अपनी मरी बेटी की निशानी को सीने से लगाना चाहती है।" "विहान, मैंने बरसों बड़े घरानों की शादियाँ सजाई हैं। मुझे एक हुनर आ गया है... आँसुओं के पीछे का जोड़-घटाव पढ़ना।"

"पर देवयानी को पैसे की कमी क्या है? वो लोग हमेशा से रईस रहे हैं। इतना बड़ा घर, वो रुतबा..." "...मैं ये किस भरोसे पर कह रहा हूँ? जैसे मुझे सच में पता हो।"

"रुतबा और रुपया एक चीज़ नहीं होते, विहान। मैंने ऐसी कितनी शादियाँ सजाई हैं, जहाँ बाहर शामियाना झिलमिलाता है और अंदर पूरा घर गिरवी रखा होता है।" "जो इंसान अपनी ही नातिन को ख़ज़ाने की चाबी बना दे, उसे पैसा चाहिए ही चाहिए। इतना, कि वो एक बच्ची की मुस्कान भी उसके बदले बेच दे।"

"मुझे एक बात याद आ रही है। मेहर ज़िंदा थी, तब भी देवयानी उसके पीछे पड़ी रहती थी, कि वो अपने शेयर अपनी माँ के नाम कर दे। मेहर हँस कर टाल देती थी।" "मैं समझता था बस पैसों की आम बात है। वो उसी दिन से पिहू के पीछे थी, है ना? मेहर के जीते-जी भी।"

"आप ये इसलिए नहीं देख पाए, विहान, क्योंकि आप एक साल से ख़ुद को कठघरे में खड़ा किए बैठे थे।" "जिसे यक़ीन हो कि सारी ग़लती उसी की है, वो सामने वाले की चाल कभी नहीं देख पाता। आप मातम कर रहे थे, और उसी की आड़ में देवयानी अपना हिसाब जोड़ रही थी।"

और उस अँधेरे बगीचे में, दोनों के बीच कोई चीज़ चुपचाप अपनी शक्ल बदल गई। वो अजनबियों की तरह एक साझे मसले पर दस्तख़त करने बैठे थे, और आज पहली बार वो एक ही तरफ़ खड़े दो लोग थे, एक ही सच के पीछे। नियम नंबर एक अब दोनों के बीच एक पुराने मज़ाक़ की तरह पड़ा था, जिस पर अब कोई नहीं हँसता था।

"मैं इस घर में सिर्फ़ कायरा के लिए आई थी, विहान। बस एक दस्तख़त, एक साल, और अपनी भांजी की लड़ाई का पैसा।" "पर आज पहली बार लगा कि मैं यहाँ सिर्फ़ अपनी बच्ची के लिए नहीं, आपकी बच्ची के लिए भी लड़ रही हूँ। और ये किसी अनुबंध में नहीं लिखा था।"

"एक साल में जो मैं नहीं देख पाया, तुमने एक रात में देख लिया।" "मैंने तुम्हें एक इंतज़ाम समझ कर बुलाया था, नैना। एक शर्त। और तुम इस पूरे शीशे के घर की सबसे साफ़ नज़र निकलीं।"


सुबह आई, और अपने साथ वो आवाज़ ले आई जो ये घर बरसों से भूल चुका था... दो बच्चियों की खिलखिलाहट। कायरा और पिहू की गुप्त मुहिम अब एक नए, दिलेर दौर में पहुँच चुकी थी। पापा के कमरे में मम्मा का शॉल रखने के बाद, दोनों नन्ही जासूस अब उससे भी बड़ी चालें चल रही थीं।

"मम्मा! मम्मा! आज हमने ना पापा की कुर्सी और आपकी कुर्सी को पास-पास कर दिया! बिलकुल सटा के!" "कायरा दीदी ने बताया कि जब दो कुर्सियाँ पास होती हैं, तो लोग भी पास हो जाते हैं। ये उसने अपनी किताब में पढ़ा है!"

"अच्छा? किताब में पढ़ा है?" "तुम दोनों तो बड़ी शरारती हो गई हो, मेरी पिहू रानी। और क्या-क्या लिखा है इस किताब में, ज़रा मैं भी तो सुनूँ।"

"किताब में लिखा है कि हर घर में एक मम्मा और एक पापा होते हैं, और वो साथ रहते हैं, हमेशा।" "मम्मा, आप जाओगी तो नहीं ना? कायरा दीदी कहती है कि अब आप हमारी असली वाली मम्मा हो। जाना मत। कभी भी।"

और पिहू के पीछे, दरवाज़े में कायरा चुपचाप खड़ी थी, बस अपनी माँ का चेहरा पढ़ती हुई। वो बड़ी बहन, छह साल की, पर सदियों पुरानी आँखों वाली, जिसे किसी वादे पर यक़ीन नहीं था, सिवाय इसी एक के। और नैना को उस पल फिर वही क्रूर हिसाब समझ आया, जो कल रात स्क्रीन पर लिखा था। अगर देवयानी जीती, तो ये दोनों बहनें एक-दूसरे से छीन ली जातीं, हमेशा के लिए।

"पिहू ठीक कह रही है।" "इस घर में मुस्कान लौट आई है, नैना। और मैं तो भूल ही चुका था कि ये आवाज़ कैसी होती है।" "चलो, दोनों जासूस, नाश्ता ठंडा हो रहा है। और हाँ... कुर्सियाँ पास ही रहने देना।"


उस रात, जब दोनों नन्ही बहनें आख़िरकार सो गईं, तो घर एक नई तरह की ख़ामोशी में डूब गया। अब दोनों को पता था कि उस शीशे की आँख की पहुँच कहाँ तक है, और कहाँ नहीं। खुली छत, जहाँ आसमान के सिवा कोई नहीं देखता था, अब उनकी इकलौती आज़ाद जगह थी।

"पता है, आज पिहू ने जो कहा... 'अब आप हमारी असली वाली मम्मा हो'... मैं दिन भर वही सुनती रही।" "मैं दूसरों की झूठी कसमें सजाने वाली औरत हूँ, विहान। और एक नन्ही बच्ची मुझे बिना किसी काग़ज़ के अपनी माँ मान बैठी है। मैं इसे झूठ कैसे कहूँ?"

"तो मत कहो।" "हम दुनिया को दिखाने के लिए झूठ बोलते हैं, कैमरे को दिखाने के लिए झूठ बोलते हैं... पर पिछले कुछ हफ़्तों से, नैना, मैं एक झूठ अपने आप से भी बोल रहा हूँ। और वो सबसे मुश्किल है।"

"नियम नंबर एक, विहान। कोई जज़्बात नहीं। आपने ख़ुद ये शर्त लिखवाई थी, अफ़ताब से, उस पहले दिन।" "...और आज आप ही उसे तोड़ने की बात कर रहे हैं?"

"शायद वो नियम कभी हमें बचाने के लिए बना ही नहीं था।" "शायद वो मुझे तुमसे बचाने के लिए था, नैना। और वो बुरी तरह नाकाम हो गया।"

एक साँस भर की दूरी पर, पूरा एक साल सिमट कर बस एक इंच रह गया। और तभी, उस नरम अँधेरे पर लटकी वो तलवार चमक उठी... वो एक साल की तारीख़, वो ख़ामोश तलाक़ की शर्त, जो अब भी काग़ज़ पर लिखी थी। और इस बार पीछे हटने वाली नैना थी, वो, जिसका सबसे ज़्यादा दांव पर लगा था।

"कायरा की गोद लेने की अर्ज़ी अब भी अदालत में लटकी है, विहान।" "अगर मैंने ये शादी सच मान ली, और एक साल बाद ये अपनी शर्त के मुताबिक़ ख़त्म हो गई, तो मैं कायरा के सामने क्या लेकर खड़ी रहूँगी? मुझे उस बच्ची के लिए मज़बूत रहना है। मैं अभी जज़्बात का ख़र्च नहीं उठा सकती।"

और यूँ वो एक क़दम की दूरी पर खड़े रह गए, दो लोग जो ठीक एक ही मना की हुई चीज़ चाहते थे। और दोनों को पक्का यक़ीन था कि सामने वाला नहीं चाहता। उस पूरे शीशे के घर की सबसे क्रूर दूरी वही एक इंच थी, जिसे दोनों पाटना चाहते थे, और दोनों उससे डरते थे।


उधर शहर के दूसरे छोर पर, महँगी पर बेजान चीज़ों से भरे एक ड्राइंग रूम में, एक सब्र वाले आदमी ने मेज़ पर एक फ़ाइल रख दी। छह हफ़्ते की निगरानी ने ठीक ग़लत चीज़ साबित कर दी थी। रुस्तम जितना उस घर को देखता, उतना ही उसे यक़ीन होता कि जो वो देख रहा है, वो नक़ली नहीं है।

"मैं आपसे साफ़ बात करूँगा, मैडम। मैं इस शादी को झूठा साबित नहीं कर सकता... क्योंकि अब वो झूठी रही ही नहीं।" "मुझे बीस साल हो गए इस काम में। मैं दो लोगों के बीच का सच दूर से पहचान लेता हूँ। और उस घर में जो पल रहा है, वो सच है। इस पर अदालत में कोई मुझसे नहीं जीतेगा।"

पर किसी जासूस को इसलिए पैसे नहीं मिलते कि वो अपने ग्राहक को वो सच लाकर दे, जो वो सुनना ही नहीं चाहती। तो रुस्तम ने वही किया जो उसके जैसे लोग करते हैं। उसने अपना निशाना बदल दिया। अगर शादी को नहीं तोड़ा जा सकता, तो दुल्हन को तोड़ा जा सकता था। और उसने पहली बार अपना लेंस सीधे नैना की तरफ़ घुमा दिया।

"तो इस बार मैंने शादी को छोड़ कर, इस औरत का कल खंगाला। नैना, जो बहन रोशनी की मौत के बाद अकेली रह गई थी।" "मुझे फ़ैमिली कोर्ट का एक पुराना काग़ज़ मिला, मैडम, इस शादी से ऐन पहले का। एक अदालत ने इसे अपनी ही भांजी कायरा को गोद लेने से इनकार कर दिया था। वजह... अकेली औरत, कर्ज़ में डूबी, सिर पर कोई पक्की छत नहीं।"

"और फिर मैंने पैसों के निशान पर हाथ रखा।" "इस शादी के ऐन आसपास, विहान के एक खाते से एक बड़ी रक़म इस औरत के वकील तक पहुँची है। कायरा की क़ानूनी लड़ाई का पूरा ख़र्च। सीधे लफ़्ज़ों में, मैडम... विहान ने इस औरत को, इस शादी के बदले, पैसे दिए हैं।"

और फिर रुस्तम ने वो जुमला कहा, और उस जुमले की शक्ल ख़ुद उसे भी अच्छी नहीं लगी। क्योंकि वो जुमला इसलिए ज़हरीला था, कि उसका एक-एक लफ़्ज़ काग़ज़ पर सच था।

"आपको ये शादी झूठी साबित करने की ज़रूरत ही नहीं है, मैडम।" "आपको बस इतना कहना है... कि एक कर्ज़ में डूबी औरत, जिसे उसकी अपनी भांजी अदालत ने देने से मना कर दिया था, उसने पैसे लेकर एक अमीर विधुर से शादी कर ली, और अब वो एक बच्ची, पिहू, को सीढ़ी बना कर दूसरी बच्ची, कायरा, को हासिल करना चाहती है। एक ख़रीदी हुई माँ, जो एक बच्ची के दम पर दूसरी बच्ची चुरा रही है।"

"रुस्तम..." "तुमने अभी-अभी वो चीज़ मेरी मेज़ पर रख दी है, जो मैं छह हफ़्तों से ढूँढ रही थी।" "मैं इस शादी को झूठा साबित करने में अपना क़ीमती वक़्त बर्बाद कर रही थी। और मुझे उसकी ज़रूरत ही नहीं थी। मुझे तो बस उस औरत का अपना सच काफ़ी है।"

"अब मैं उस औरत को उसी हथियार से काटूँगी, जो उसने ख़ुद मेरे हाथ में थमा दिया है।" "जिस दिन मैं अदालत में और दुनिया के सामने ये कहूँगी कि नैना एक ख़रीदी हुई दुल्हन है, जो एक अनाथ बच्ची को मोहरा बना रही है, उस दिन न पिहू उसके पास बचेगी, न कायरा। और उस सच को साबित करने के लिए मुझे एक भी झूठ नहीं बोलना पड़ेगा।"

और वहाँ से बहुत दूर, एक खुली छत पर, दो लोग एक बेवक़ूफ़ इंच की दूरी पर खड़े थे, गुनगुने, लगभग ख़ुश, और इस बात से पूरी तरह अनजान। कि जो काम उन्होंने बच्चियों को बचाने के लिए किया था, ठीक वही अब उन्हें छीनने का हथियार बन कर उनकी तरफ़ तना खड़ा था। उस घर की तरफ़ एक ख़तरा चल पड़ा था, और उसका सबसे भयानक हिस्सा यही था, कि उसे झूठ की ज़रूरत ही नहीं थी। उसका नाम सच था।

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