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अध्याय 11 / 28

ख़रीदी हुई माँ

कागज़ी कसमें द्वारा Avni Oberoi

छत वाली उस रात की सुबह अभी ठीक से जागी भी नहीं थी कि शीशे के घर का गेट एक ऐसे मेहमान के लिए खुल गया, जिसका बुलावा किसी ने नहीं भेजा था। विहान दफ़्तर निकल चुका था, दोनों बच्चियाँ काका के साथ बगीचे में थीं, और नैना घर में अकेली थी। और तभी, रेशम में लिपटी, अपने भीतर एक तलवार तह किए, देवयानी अंदर चली आई।

"बैठो, बेटी, बैठो। मैं ज़्यादा देर नहीं रुकूँगी।" "मैं जानती थी विहान इस वक़्त घर पर नहीं होगा। इसलिए तो आई हूँ। जो बात मुझे तुमसे करनी है, वो हम दो औरतों के बीच की है।"

"देवयानी जी, विहान घर पर नहीं हैं, तो बेहतर हो कि आप शाम को..." "...आप बैठिए। मैं चाय भिजवाती हूँ।"

"चाय रहने दो। मैं मीठा घोलने नहीं आई।" "पहचानती हो इसे? फ़ैमिली कोर्ट का काग़ज़, इसी साल का। जिस पर लिखा है कि एक कर्ज़ में डूबी औरत को उसकी अपनी भांजी कायरा को गोद देने से मना कर दिया गया।" "तुम्हारा काग़ज़ है, बेटी। तुम्हारे अपने हाथ की लिखी अर्ज़ी।"

"ये आपके पास कहाँ से आया?" "ये अदालत का काग़ज़ है, देवयानी जी। ये आपका मामला नहीं है।"

"अकेला होता तो न होता। पर इसके साथ एक और काग़ज़ रख कर देखो।" "इस शादी के ऐन पहले, विहान के एक खाते से एक मोटी रक़म तुम्हारे वकील तक पहुँची। कायरा की लड़ाई का पूरा ख़र्च। सीधा हिसाब, बेटी। एक तरफ़ पैसा, दूसरी तरफ़ दस्तख़त।"

"हाँ। वो पैसा कायरा की क़ानूनी लड़ाई के लिए था। ये हमारे अनुबंध में शुरू से लिखा था। इसमें छुपा कुछ नहीं है।" "मैंने चोरी नहीं की, देवयानी जी। मैंने एक सौदा किया, खुली आँखों से।"

"सौदा। हाँ। यही एक लफ़्ज़ मैं तुम्हारे अपने मुँह से सुनना चाहती थी।" "तो अदालत में भी यही कहूँगी। एक कर्ज़ में डूबी औरत, जिसे उसकी अपनी भांजी अदालत ने नहीं दी, उसने पैसे लेकर एक अमीर विधुर से शादी की, और अब उसी की मासूम पिहू को सीढ़ी बना कर अपनी कायरा हासिल करना चाहती है।" "एक ख़रीदी हुई माँ, बेटी। जो एक बच्ची के कंधे पर पैर रख कर दूसरी बच्ची चुरा रही है।"

और यही इसका सबसे ज़हरीला हिस्सा था। नैना बरसों से दूसरों के झूठ के पीछे का सच पढ़ती आई थी, पर इस कहानी में पकड़ने को एक भी झूठ नहीं था। देवयानी का एक-एक लफ़्ज़ काग़ज़ पर सच था, और सच से लड़ने का कोई हुनर नैना के पास नहीं था।

"पिहू मेरे लिए सीढ़ी नहीं है।" "आप जो चाहे काग़ज़ पढ़ लीजिए, देवयानी जी। पर उस बच्ची को मैंने अपनी बेटी की तरह... वो मुझे मम्मा कहती है। और वो किसी अनुबंध में लिखा हुआ नहीं है।"

"मुझे पता है वो तुम्हें मम्मा कहती है, बेटी। यही तो सबसे ख़तरनाक बात है।" "पर एक बात बताऊँ? तुम बड़ी भोली हो अगर तुम्हें लगता है कि विहान ने तुम पर आँख मूँद कर भरोसा कर लिया। एक अरबपति यूँ ही किसी अजनबी को अपनी बेटी के सिरहाने नहीं बिठा देता।" "पूछना कभी उससे... तुम्हें घर में बिठाने से पहले, उसने तुम्हारे बारे में क्या-क्या पता करवाया था।"


और जैसे घर ने ख़ुद उसकी बात का जवाब देना चाहा हो, गेट फिर से बजा। विहान की गाड़ी, वक़्त से पहले लौटी हुई। और वो अंदर आया, ठीक उस मंज़र के बीचों-बीच, जो उसे कभी देखना नहीं था।

"देवयानी जी। आप... यहाँ? मुझे बताए बिना?" "ये सब क्या हो रहा है?"

"अरे, विहान, तुम आ गए। अच्छा हुआ।" "मैं बस अपनी नई बहू से थोड़ी बातचीत कर रही थी। पैसे की, काग़ज़ की, और उस सौदे की, जो तुम दोनों ने मिल कर किया है।" "मैंने इससे कहा कि अदालत में मैं यही कहूँगी, कि तुमने एक कर्ज़ में डूबी औरत को पैसे देकर ख़रीद लिया, ताकि मेरी पिहू तुम्हारे पास बनी रहे। बताओ, विहान... मैं ग़लत तो नहीं कह रही?"

और यही थी उसके आने की असली वजह। नैना को तोड़ना तो बहाना था, देवयानी यहाँ विहान का चेहरा पढ़ने आई थी। कल रात छत पर जो नाज़ुक चीज़ उन दोनों के बीच उगी थी, वो अब विहान की अगली साँस पर टँगी थी।

"देवयानी जी, ये... ये बात इतनी सीधी नहीं है।" "जो अनुबंध हुआ है, उसकी अपनी एक क़ानूनी शक्ल है। आप उसे इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश नहीं कर सकतीं।" "...आप जो कह रही हैं, वो पूरा सच नहीं है।"

नैना ने उस जवाब की शक्ल सुन ली। वो इनकार नहीं था, वो एक वकील की सधी हुई कतरनी थी। उसने ये नहीं कहा कि नैना इन बच्चियों से सच में प्यार करती है, बस इतना कि बात सीधी नहीं है। और उस एक दरार में, देवयानी का ज़हर अपना घर बना बैठा।

"बस, इतना ही काफ़ी है।" "देखा, बेटी? मैंने तुमसे झूठ नहीं कहा था। 'पूरा सच नहीं है', यही तो कहा इसने। मतलब आधा सच तो है।" "तुम दोनों आराम से सोचो। मैं फिर आऊँगी। मेरे पास तो बहुत वक़्त है, और... बहुत काग़ज़।"

गेट उसके पीछे बंद हो गया, पर वो अपना ज़हर कमरे में छोड़ गई, जैसे कोई मेहमान जो जाने का नाम ही नहीं लेता। कल रात जो दो लोग एक गुनगुने इंच की दूरी पर खड़े थे, आज एक पूरे ठंडे कमरे की दूरी पर खड़े थे।


"आप चुप क्यों रहे, विहान?" "वो औरत मुझे मेरे ही घर में ख़रीदी हुई माँ कह गई, और आपके पास कहने को बस इतना था, कि 'बात इतनी सीधी नहीं है'?"

"मैं क्या कहता, नैना? जो उसने कहा, उसका एक हिस्सा... काग़ज़ पर तो वैसा ही दिखता है। पैसा गया, दस्तख़त हुए।" "मैं वहीं भड़क कर सब झुठला देता, तो वो उसी को सबूत बना लेती कि हम घबराए हुए हैं।"

"काग़ज़ पर वैसा ही दिखता है।" "आप ठीक कह रहे हैं। काग़ज़ पर मैं एक ख़रीदी हुई औरत ही हूँ। यही तो हमारे अनुबंध की पहली शर्त है, है ना। पैसा, दस्तख़त, और कोई जज़्बात नहीं।" "कल रात छत पर जो हुआ, उसे भूल जाइए। शायद वो भी इसी सौदे का हिस्सा था।"

"नैना, कल रात... वो सौदा नहीं था। ये तुम भी जानती हो।" "मुझे अचानक क्या कहना है, समझ ही नहीं आया। मैं ऐसा ही हूँ। जहाँ बोलना चाहिए, वहीं मेरी ज़बान जम जाती है।"

"मैं अब कुछ नहीं जानती, विहान।" "बस इतना जानती हूँ कि आज सुबह, जब मेरी क़ीमत उस मेज़ पर खुली रखी थी, आप चुप थे। और चुप्पी भी एक जवाब होती है। सबसे साफ़ जवाब।"

और ठीक तभी, क्योंकि बच्चे बड़ों के मातम की घड़ी नहीं देखते, दोनों नन्ही बहनें बगीचे से भागती हुई अंदर आ गईं। पिहू आगे, धूप जैसी। और कायरा एक क़दम पीछे, जो पहले ही दोनों बड़ों के चेहरे पढ़ चुकी थी।

"मम्मा! देखो, काका ने मुझे काग़ज़ का फूल बनाना सिखाया! ये आपके लिए है!" "कायरा दीदी कहती है कि असली वाली मम्मा को हमेशा पहला फूल देते हैं। और आप हमारी असली वाली मम्मा हो ना, इसलिए ये सबसे पहला फूल आपका है।"

"हाँ, मेरी जान... पहला फूल हमेशा मम्मा का।" "ये बहुत सुंदर है, पिहू रानी। इसे मैं हमेशा अपने पास रखूँगी। हमेशा-हमेशा।"

"मम्मा, आपकी आँखें लाल हैं।" "वो लंबे बालों वाली नानी फिर आई थी क्या? पिहू को मत बताना, पर मुझे वो नानी बिलकुल अच्छी नहीं लगती। जब भी वो आती है, ये पूरा घर ठंडा हो जाता है।"

और दो नन्ही बच्चियों के सिरों के ऊपर से, दोनों बड़ों ने एक-दूसरे को देखा, और नज़रें फेर लीं। क्योंकि बच्ची ठीक कह रही थी। घर ठंडा पड़ गया था, और दोनों में से कोई ज़बान पर नहीं ला सकता था कि ये पाला कौन लेकर आया।


उस रात घर सो गया, पर नैना नहीं सोई। देवयानी की चुभाई हुई सुई अपना धीमा काम कर चुकी थी। एक जुमला रात भर घूमता रहा, ''पूछना कभी उससे, तुम्हें बिठाने से पहले उसने तुम्हारे बारे में क्या-क्या पता करवाया।'' और चोट खाया इंसान पूछता नहीं। चोट खाया इंसान ख़ुद ढूँढने निकल पड़ता है।

"मुझे बस एक चीज़ चाहिए।" "बस एक लफ़्ज़, कहीं भी, जो ये कहे कि मैं इस घर में सिर्फ़ एक सौदा नहीं हूँ। कि कल रात छत पर जो था, वो सच था।" "बस... एक लफ़्ज़।"

अध्ययन-कक्ष। विहान का वो ठंडा, करीने से सजा कमरा, जहाँ हर जज़्बात एक फ़ाइल में बंद और ताले में था। सबसे पहले उसे अनुबंध मिला, उन्हीं दोनों की काग़ज़ी कसमें। और उसके ठीक नीचे, एक सादी फ़ाइल, जिसके ऊपर उसी का नाम लिखा था। नैना।

"ये... मेरा नाम?" "ये तारीख़... ये तो शादी से भी पहले की है। हमारी पहली मुलाक़ात से भी पहले की।"

और एक-एक पन्ना पलटते हुए, फ़ाइल ने बता दिया कि वो क्या है। वो एक रिपोर्ट थी। नैना के बारे में।

उसके कर्ज़, उसकी फ़र्म का हिसाब, रोशनी की मौत, वो ध्रुव जो उसे छोड़ कर चला गया था, गोद लेने से इनकार वाला वो काग़ज़... सब कुछ। किसी अजनबी के सधे हाथों से इकट्ठा किया हुआ, उस दिन से हफ़्तों पहले, जिस दिन विहान ने उसके सामने अपना ठंडा सौदा रखा था।

"देवयानी ने आज सुबह मुझे ख़रीदी हुई माँ कहा।" "और आपने? आपने तो मुझे इस घर में बिठाने से भी पहले... मुझे जाँच लिया था। इस घर का पहला जासूस देवयानी नहीं थी, विहान। पहला जासूस तो आप ख़ुद थे।"

और जिस औरत को उस सुबह ख़रीदी हुई कहा गया था, उसे अब आधी रात, उस ठंडे कमरे में अकेले, इस बात का दूसरा आधा हिस्सा समझ आ गया। उसे सिर्फ़ ख़रीदा नहीं गया था। उससे भी पहले, उसकी जाँच की गई थी, ठीक उसी हाथ से, जो कल रात उसके चेहरे को छूते-छूते रुक गया था।

जिस आदमी पर उसने अभी-अभी भरोसा करना शुरू किया था, उसने भी उसे सबसे पहले अँधेरे से ही देखा था। ठीक देवयानी की तरह। ठीक रुस्तम की तरह। वो अपनी क़ीमत का सबूत ढूँढने आई थी, और वो सबूत निकला एक ऐसी फ़ाइल, जिसने इस घर में उसके क़दम रखने से भी पहले उसकी क़ीमत लगा दी थी।

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