अध्याय 26 / 28
काग़ज़ फाड़ दो
कागज़ी कसमें द्वारा Avni Oberoi
नैना के जाने की बात के जवाब में विहान अनुबंध की हर शर्त को क़ानूनी तौर पर रद्द करवा कर, सबके सामने काग़ज़ फाड़ देता है, ताकि कोई भी उनके प्यार को कभी एक चाल न कह सके, और फिर उसी रात सिम्मी, काका और दोनों बच्चियों की सजाई एक असली, बिना शर्तों वाली शादी में नैना से नई, सच्ची कसमें लेता है। जश्न ख़त्म होते ही गेट पर एक कोर्ट क्लर्क पिहू की कस्टडी का अंतिम फ़ैसला एक सील बंद लिफ़ाफ़े में थमा जाती है, अब भी अनखुला।
विहान वहीं खड़ा रहा, नैना के लफ़्ज़ अब भी हवा में तैर रहे थे, और उसके अंदर कुछ था जो टूटने से इनकार कर रहा था।
"नहीं, नैना। तुम कहीं नहीं जाओगी।" "मुझे... मुझे बस एक मिनट दो। सोचने दो।"
"मैंने बहुत सोचा है, विहान। रातों से सोच रही हूँ। ये अकेला रास्ता है जो कायरा को हर शक से बचाता है।"
नैना की आवाज़ में वो पुराना डर काँप रहा था, वही जो एक साल पहले उस पहली अदालती इनकार के दिन से उसके साथ चलता आया था, कि प्यार कितना भी सच्चा हो, दुनिया की नज़र में हमेशा एक कमी ढूँढ ही लेगी।
"तुम एक साल से इस घर की जान हो, नैना। और अब तुम कह रही हो कि तुम्हें जाना चाहिए, ताकि दुनिया को यक़ीन आ जाए कि तुम यहाँ की नहीं हो? ये कैसा इंसाफ़ है?"
"नहीं। रास्ता ये नहीं है कि तुम दूर जाओ। रास्ता ये है कि जो शक की जड़ है... वो अनुबंध... उसे हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया जाए।"
"मतलब? अफ़ताब ख़ुद कह चुके हैं, वो अदालत के रिकॉर्ड से मिट नहीं सकता।"
"मिट नहीं सकता, ठीक है। पर उसका मतलब बदला जा सकता है। मैं उसे काग़ज़ पर ही ख़त्म करूँगा, नैना। हर शर्त, हर तारीख़, हर क्लॉज़, मैं ख़ुद अदालत के सामने खड़ा हो कर कहूँगा कि ये अब कुछ नहीं, सिर्फ़ काग़ज़ का एक पुराना टुकड़ा है।"
"तुम... तुम पूरा अनुबंध रद्द करवाना चाहते हो? सबके सामने?"
"मैं चाहता हूँ दुनिया देखे कि हमारे बीच अब कोई काग़ज़ नहीं बचा, नैना। कोई शर्त नहीं, कोई साल की सीमा नहीं, कोई पैसा नहीं। सिर्फ़ हम, बिना किसी सबूत की ज़रूरत के।" "और अगर काग़ज़ ही न बचे, तो कोई भी अदालत, कोई भी समाज-सेविका, तुम्हें ख़रीदी हुई माँ नहीं बुला सकती। ख़रीदने के लिए एक बिल चाहिए होता है, और मैं वो बिल आज फाड़ने वाला हूँ।"
"काग़ज़ फाड़ दो", उसने कहा, और वो तीन लफ़्ज़ इतने महीनों की हर शर्त, हर डर, हर नक़ली मुस्कान का जवाब बन गए।
"और अगर अदालत ने इसे भी एक चाल समझ लिया तो?"
"तो कम से कम हम इस बार सच के लिए हारेंगे, नैना, झूठ के लिए नहीं। और मैं तुम्हें बताऊँ... हम हारेंगे नहीं।"
अगली सुबह अफ़ताब के दफ़्तर में एक कुर्सी ख़ाली नहीं रही, कोर्ट अधिकारी ख़ुद वहाँ गवाह बनने पहुँच गई थीं, विहान की माँग पर।
"विहान, जो तुम माँग रहे हो... वो एक हलफ़नामा है, अनुबंध की हर शर्त को अमान्य घोषित करने का, साथ में एक सार्वजनिक बयान। इसके बाद कोई क्लॉज़ नहीं बचेगा जिसकी आड़ ली जा सके।"
"यही तो मैं चाहता हूँ, अफ़ताब। कोई आड़ ना बचे। ना मेरे लिए, ना नैना के लिए।"
"और सच कहूँ तो... इससे कायरा के केस को भी सीधा फ़ायदा होगा। जिस दिन अनुबंध नाम की कोई चीज़ बचेगी ही नहीं, उस दिन कोई भी अदालत ये नहीं कह पाएगी कि नैना जी ने कुछ ख़रीदा। सिर्फ़ एक शादी बचेगी, और एक माँ।"
"सिर्फ़ एक माँ..." "कब से किसी ने मुझे सिर्फ़ इतना ही कहा था?"
अफ़ताब ने एक फ़ाइल आगे बढ़ाई, वही पुरानी, जिस पर सबसे ऊपर तारीख़ लिखी थी, शादी से भी पहले की, और साथ में एक और ख़बर भी थी, कि देवयानी अब भी हिरासत में पूछताछ का सामना कर रही थी, उसकी वही तलवार जैसी मुस्कान अब किसी क़ैद की दीवार के पीछे बुझ चुकी थी।
"धारा एक, विवाह की एक साल की सीमा, रद्द। धारा दो, अलग कमरों की शर्त, रद्द। धारा तीन, तलाक़ की पूर्व-निर्धारित तारीख़, रद्द। धारा चार, कोई भी राशि जो विवाह की शर्त के रूप में दी गई, अब सिर्फ़ एक तोहफ़ा मानी जाएगी, कोई सौदा नहीं।"
विहान ने ख़ुद उस पुराने अनुबंध के काग़ज़ को अपने हाथों में लिया, एक पल के लिए उसे यूँ थामे रखा जैसे एक साल का वज़न तौल रहा हो, और फिर उसे बीच से फाड़ दिया, धीरे, पूरी तरह, दोनों टुकड़े मेज़ पर रख कर।
"अब कोई अनुबंध नहीं है, नैना। सिर्फ़ तुम हो, और मैं हूँ, और जो हमने बिना किसी काग़ज़ के चुना है।"
नैना उस फटे काग़ज़ को देखती रही, और उसके अंदर वही पुरानी दीवार, जिसने उसे कभी किसी कसम पर यक़ीन नहीं करने दिया था, आख़िरकार पूरी तरह गिर गई।
"तो अब... अब हम सच में एक नई शुरुआत कर सकते हैं?"
"आज रात, नैना। बिना किसी शर्त के, बिना किसी दस्तावेज़ के, मैं तुमसे फिर से एक वादा करना चाहता हूँ। सिर्फ़ इस बार, असली।"
शाम होते-होते वही ठंडा शीशे का घर पहचान में नहीं आ रहा था, फूलों की लड़ियाँ, दीयों की क़तारें, और बीच आँगन में एक छोटा सा मंडप, सब कुछ बस कुछ घंटों में खड़ा हो गया था।
सिम्मी सुबह से इस घर में तूफ़ान की तरह घूम रही थी, हर फूल, हर दीया, हर छोटी-सी चीज़ ख़ुद अपने हाथों से लगाई थी, क्योंकि आज उसकी सबसे अच्छी सहेली की बारी थी, जो सालों दूसरों के सपने सजाती रही थी।
"नैना, तूने मुझे इस पागलपन के लिए सिर्फ़ बारह घंटे दिए! पर क़सम से, ये मेरी अब तक की सबसे अच्छी शादी है, और मैंने सैकड़ों सजाई हैं।"
"क्योंकि इस बार तू दिल से सजा रही है, सिम्मी। किसी क्लाइंट के लिए नहीं।"
काका ने आज अपनी सबसे अच्छी शेरवानी निकाली थी, दरवाज़े पर खड़े हो कर दूल्हे का स्वागत यूँ कर रहे थे जैसे वो ख़ुद परिवार के सबसे बड़े बुज़ुर्ग हों, आँखें भरी हुईं, और उन्होंने बस इतना कहा कि जाओ बेटा, जा कर अपनी दुल्हन का हाथ थामो, इस बार बिना किसी डर के, और वो एक लफ़्ज़ पूरे साल भर की दुआ जैसा लगा।
कायरा और पिहू, दोनों छोटे-छोटे घाघरों में सजी, मंडप की तरफ़ फूल बिखेरती हुई चलीं, दोनों के चेहरे पर वही जीत की मुस्कान थी जो महीनों पहले उन्होंने काका के अँगूठे के निशान वाली अपनी गुप्त कसम पर पाई थी।
"ये मम्मा-पापा की असली वाली शादी है! हमारी कसम सच में सच हो गई!"
कायरा को आज सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी दी गई थी, वो पुराना, अँगूठे के निशान वाला काग़ज़ जिस पर उन दोनों ने बहनें बनने की कसम लिखी थी, उसे एक छोटी थाली में सजा कर मंडप के बीचों-बीच रख दिया, जैसे कोई गुप्त गवाह इस असली शादी को देख रहा हो।
नैना, एक साधारण, सुर्ख़ जोड़े में, बिना किसी भारी गहनों के, मंडप की तरफ़ बढ़ी, और विहान, जो सालों से हर भावना को एक क्लॉज़ के पीछे छुपाता रहा था, उसे देखते ही अपनी आँखों में उभर आए आँसू छुपा नहीं पाया।
दोनों ने एक-दूसरे को मालाएँ पहनाईं, धीरे, बिना किसी जल्दी के, ठीक वैसे नहीं जैसे उस पहले सरकारी दफ़्तर में पाँच मिनट में हुआ था, बल्कि जैसे हर पल को जान-बूझकर लंबा खींचा जा रहा हो।
पंडित जी की मौजूदगी नाम भर की थी, असली कसमें ख़ुद दोनों ने अपने शब्दों में गढ़ीं, ठीक वहाँ, दीयों की रौशनी में।
"नैना, मैंने तुमसे एक काग़ज़ी सौदे में शादी की थी, एक साल के लिए, बिना जज़्बात के। पर तुमने मेरी बेटी को हँसना सिखाया, मुझे फिर से जीना सिखाया, और मेरे पत्थर बने दिल को पिघलाया। आज, मैं तुमसे फिर वादा करता हूँ, इस बार बिना किसी तारीख़ के, बिना किसी शर्त के, कि मैं तुम्हारे साथ रहूँगा, हर हाल में, जब तक ज़िंदगी है।"
"विहान, मैंने कसमों पर यक़ीन करना कब का छोड़ दिया था, दूसरों की शादियाँ सजाते-सजाते। पर तुमने, और हमारी दो बेटियों ने, मुझे फिर से सिखाया कि कुछ वादे झूठ से शुरू हो कर भी दिल तक पहुँच सकते हैं। आज मैं तुमसे वादा करती हूँ, कायरा और पिहू की माँ बन कर, तुम्हारी पत्नी बन कर, हमेशा तुम्हारे साथ खड़ी रहूँगी, बिना किसी काग़ज़ के, सिर्फ़ दिल के भरोसे।"
और वहीं, उस छोटे से आँगन में, काग़ज़ी कसमें आख़िरकार, पूरी तरह, असली कसमों में बदल गईं।
बाद में, जब सब लोग खाने-पीने में मशग़ूल थे, विहान और नैना मंडप के एक कोने में चुपचाप खड़े हो कर वो पूरा साल याद करने लगे, सरकारी दफ़्तर का वो पाँच मिनट का दस्तख़त, नियम नंबर एक, कैमरे वाली घड़ी, अदालत की वो लंबी लड़ाई, सब कुछ, एक ही रात में एक पूरे घेरे की तरह बंद होता हुआ।
"एक साल पहले मैंने एक अजनबी को एक सौदा ऑफ़र किया था, नैना। आज मैंने उसी अजनबी को अपनी पूरी ज़िंदगी सौंप दी।"
"और मैंने एक झूठी कसम को हाँ कहा था, सिर्फ़ कायरा के लिए। आज पता चला, वो कसम मुझे मेरा असली घर भी दे गई।"
रात गहराते-गहराते मेहमान एक-एक कर घर लौटने लगे, दीयों की लौ धीमी पड़ने लगी, और नैना और विहान गेट तक आख़िरी मेहमानों को विदा करने आए, हाथ में हाथ डाले, अब पति-पत्नी, बिना किसी काग़ज़ी शर्त के।
तभी गेट के बाहर एक गाड़ी रुकी, इतनी रात को, इतनी अचानक, कि दोनों की हँसी एक पल को ठिठक गई।
गाड़ी से एक कोर्ट क्लर्क उतरी, हाथ में एक सील बंद लिफ़ाफ़ा थामे, चेहरे पर ना ख़ुशी, ना दुख, सिर्फ़ एक सरकारी, बेचेहरा गंभीरता।
"इतनी रात को? आज? हमारी शादी की रात?"
क्लर्क ने एक औपचारिक नज़र दोनों के गले में पड़ी मालाओं पर डाली, फिर वो लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ा दिया, बिना एक भी अतिरिक्त लफ़्ज़ के।
"पिहू की कस्टडी का अंतिम फ़ैसला," उसने कहा, "आज शाम सील हो कर आया है। जज साहिबा ने कहा, आज ही रात पहुँचा दिया जाए।"
नैना के हाथ काँपने लगे जब उसने वो सील बंद लिफ़ाफ़ा अपनी हथेली में लिया, और विहान की नज़र उसी काग़ज़ पर टिकी रह गई, जो अब तक बिना खुले, उनकी सारी ख़ुशी और सारे डर को एक साथ अपने भीतर बंद किए हुए था।
गेट पर खड़े दो नए-नवेले पति-पत्नी, गले में मालाएँ, हाथ में एक ऐसा लिफ़ाफ़ा जो अभी तक बंद था, और भीतर, ठीक उसी पल, दोनों बच्चियाँ बेख़बर सो रही थीं, ये जाने बिना कि उनके घर का आख़िरी फ़ैसला अभी-अभी दरवाज़े पर आ पहुँचा था।
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